दिल्ली हिंसा: मारे गए हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल के घर का माहौल

रतनलाल की पत्नी पूनम और बच्चे

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इमेज कैप्शन, रतनलाल अपनी पत्नी पूनम और बच्चे के साथ
    • Author, भूमिका राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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तारीख़ 24 फ़रवरी. दिन सोमवार. दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल के लिए यह एक आम सा दिन था. बरसों की आदत के मुताबिक़ उन्होंने सोमवार का व्रत रखा हुआ था. सुबह 11 बजे वह अपने दफ़्तर यानी गोकुलपुरी एसीपी ऑफ़िस के लिए रवाना हो गए.

ठीक 24 घंटे बाद जब घड़ी ने फिर सुबह के 11 बजाए, तब बीबीसी रतनलाल के घर के दरवाज़े पर खड़ा है. चंद घंटों में यहां का नज़ारा बदल चुका है, क्योंकि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोधियों और समर्थकों के बीच हुई हिंसा ने रतनलाल को लील लिया.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चांद बाग़, भजनपुरा, बृजपुरी, गोकुलपुरी और जाफ़राबाद में हुई इस हिंसा में अब तक रतन लाल समेत सात लोगों की मौत हो चुकी है और 90 से ज़्यादा लोग घायल हैं.

पत्नी को कब मिली ख़बर

रतन लाल के घर पहुंचने पर हमारी उनके ताऊ के बेटे दिलीप और भांजे मनीष से बात हुई. दोनों ने बताया कि रतन लाल की पत्नी पूनम को अभी तक नहीं बताया गया है कि उनके पति अब इस दुनिया में नहीं हैं.

लेकिन घर के अंदर से आ रहीं पूनम की चीख़ें इस बात की तस्दीक़ कर रही हैं कि उन्हें इस अनहोनी का अंदाज़ा हो गया है.

अभी शनिवार को ही तो उन्होंने शादी की 16वीं सालगिरह मनाई थी.

रतन लाल ने 1998 में नौकरी जॉइन की थी और तब उन्हें दिल्ली पुलिस की ओर से रॉबर्ट वाड्रा की सिक्यॉरिटी में तैनात किया गया था. दो साल पहले ही प्रमोशन के बाद वह हेड कॉन्स्टेबल बने थे.

रतन लाल के भाई दिलीप सराय रोहिल्ला के पास रहते हैं. उन्होंने हमें बताया, "कल जब बच्चे ट्यूशन के लिए चले गए थे, तब पूनम ने टीवी पर ख़बर सुनी कि रतन लाल को गोली लग गई है. तब तक टीवी पर सिर्फ़ ख़बर ही आ रही थी. रतन लाल की फोटो नहीं थी. फिर शायद पड़ोसियों ने पूनम का टीवी बंद करा दिया. तब से टीवी बंद ही है."

सीकर में रहने वाली रतनलाल की मां को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.

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इमेज कैप्शन, सीकर में रहने वाली रतनलाल की मां को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.

जहांगीर पुरी में रहने वाले रतन लाल के भांजे मनीष बताते हैं, "दिल्ली में जो दंगे हो रहे हैं, उनके बारे में तो हमें पता ही था. ये भी पता था कि मामा की ड्यूटी वहीं लगी है. जब हमने टीवी में सुना कि रतन लाल को गोली लग गई, तो हमें लगा कि दिल्ली पुलिस में एक ही रतन लाल थोड़ी न हैं. लेकिन फिर थोड़ी देर बाद फेसबुक वग़ैरह देखकर हमें पता चल गया कि मामा को गोली लगी है. हम तुरंत यहां चले आए, लेकिन मामी को अभी हम लोगों ने बताया नहीं है."

राजस्थान के सीकर के रहने वाले 44 साल के रतन लाल तीन भाइयों में सबसे बड़े थे. मंझले भाई दिनेश गांव में गाड़ी चलाते हैं और छोटे भाई मनोज बेंगलुरु में एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं. रतन लाल की मां संतरा देवी सीकर में ही दिनेश के साथ रहती हैं.

दिलीप ने हमें बताया कि रतन लाल की मां अभी सीकर में ही हैं और उन्हें भी इस घटना के बारे में कुछ नहीं बताया गया है.

पूनम की चीखें घर के बाहर तक सुनाई दे रही हैं.

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पूनम कह रहीं, "जब वो आएंगे, तभी खाना खाऊंगी"

रतन लाल के तीन बच्चे हैं. बड़ी बेटी परी 11 साल की हैं. छोटी बेटी कनक आठ साल की हैं और एक बेटा राम पाँच साल का है. तीनों केंद्रीय विद्यालय में पढ़ते हैं. जैसे ही घर के आस-पास लोग इकट्ठे होने शुरू हुए, इन बच्चों को पड़ोसियों के घर भेज दिया गया. इन तीनों में से सिर्फ़ परी को ही पता है कि उनके पापा अब कभी नहीं लौटेंगे.

रतन लाल के रिश्तेदारों से बात करते हुए हमें पता चला कि उन्होंने पाँच साल पहले लोन लेकर बुराड़ी के अमृत विहार में घर बनवाया था. संकरी गलियों के अंदर बने इस घर की दीवारों पर अभी तक पुताई भी नहीं हुई है.

आज इसी घर के बाहर पचासों जोड़ी चप्पलें रखी हुई हैं. जिस दरवाज़े पर लोगों का जमघट लगा है, वहां से एक ब्लैक बोर्ड दिख रहा है, जिस पर बच्चों ने चॉक से कुछ लकीरें खींच रखी हैं. पुराने मॉडल का एक कंप्यूटर भी रखा है. पूनम जिस बेड पर बैठी हैं, उस पर उन्हें संभालने के लिए और भी महिलाएं बैठी हैं.

पूनम चीख़-चीख़कर रोती हैं, दहाड़ें मारती हैं और बार-बार बेहोश हो जाती हैं. टीवी देखने के बाद से उन्होंने कुछ भी नहीं खाया है. कोई खाने को कहता है, तो कहती हैं, "जब वो आ जाएंगे, तो उन्हीं के साथ खाऊंगी."

रतनलाल के घर के बाहर इकट्ठा सभी लोग उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे.

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संकरी गलियों में बने इस घर तक पहुंचने के लिए हमें कई लोगों से रास्ता पूछना पड़ा. लोगों ने रास्ता तो बताया ही, साथ ही अपने-अपने हिस्से के रतन लाल के बारे में भी बताया.

यहां कोई यह कहते नहीं थक रहा कि रतन लाल बहुत बढ़िया आदमी थे. बड़े मिलनसार थे. जो उन्हें नाम से नहीं जानता था, वो मूंछों से तो पहचान ही जाता था.

मीडियावाले ऐसा कैसे कर सकते हैं

मनीष बताते हैं, "पिछली बार जब शाहीन बाग़ और सीलमपुर में प्रोटेस्ट शुरू हुआ था, तब भी मामा वहां तैनात किए गए थे. ड्यूटी पर उनके हाथ में चोट भी लगी थी. लेकिन वो पुलिस वाले सिर्फ़ ड्यूटी पर होते थे. जैसे ही घर के इलाक़े में घुसते थे, आम आदमी बन जाते थे. आपने रौब झाड़ने वाले पुलिस वाले देखे होंगे, जिन्हें देखते ही डर लगने लगता है. मामा बिल्कुल ऐसे नहीं थे. दफ्तर और पुलिस की बातें घर लेकर नहीं आते थे."

रतन लाल के जो पड़ोसी उनके हंसमुख स्वभाव की तारीफ़ करते नहीं थक रहे, वो मीडिया से बहुत नाराज़ हैं. उन्होंने बताया कि सोमवार रात 11 बजे के आसपास मीडिया के कुछ लोग रतन लाल के घर आ गए और उनके सोते हुए बच्चों को जगाकर फोटो खींचने लगे. वो हैरान हैं कि आख़िर मीडिया वाले ऐसा कैसे कर सकते हैं.

लोगों में ग़ुस्सा इस बात को लेकर भी है कि जब दिल्ली जैसे शहर में ख़ुद पुलिस वाले सुरक्षित नहीं हैं, तो आम लोगों का क्या ही कहा जा सकता है.

रतनलाल के पड़ोसी कहते हैं कि जो लोग उन्हें नाम से नहीं जानते थे, वो मूंछों से ज़रूर जानते थे

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परिवार की क्या मांगें हैं?

घर के आसपास इकट्ठा लोग दबी ज़ुबान में कह रहे हैं कि जब तक मांगें नहीं मानी जातीं, तब तक वो रतन लाल का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे.

जब हमने दिलीप से रतन लाल के परिवार की मांगों के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया, "हमारी मांग सीधी है. भाई को शहीद का दर्जा दिया जाए, क्योंकि वो अपने लिए नहीं, बल्कि लोगों को बचाने के लिए मरे हैं. भाभी को सरकारी नौकरी दी जाए और तीनों बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का पूरा इंतज़ाम किया जाए."

लेकिन यह सब बहुत आगे की बातें हैं. रतन लाल के परिवार को अभी तक यही नहीं पता है कि उनके साथ हुआ क्या है! पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी नहीं है. पिछली रात 'आप' विधायक संजीव झा परिवार से मिलने आए थे, लेकिन दिल्ली पुलिस की ओर से परिवार को अब तक कोई जानकारी नहीं दी गई है.

यहां के लोग सोशल मीडिया पर बहुत ऐक्टिव हैं. तक़रीबन सभी के पास हिंसा से जुड़े फोटो, वीडियो, ख़बरें, अफ़वाहें... न जाने क्या-क्या और कितना-कितना आ रहा है. लोग अभी इन्हीं के भरोसे हैं. क्योंकि एक शख़्स, जिस पर वो सबसे ज़्यादा भरोसा करते थे, वह अब उनके बीच नहीं है.

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