नौ साल से फरार चल रहे एक हत्यारे को बिस्किट के एक पैकेट ने कैसे पकड़वाया?

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- Author, भार्गव पारीख
- पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए
बहुत से लोगों को हर सुबह चाय के साथ बिस्किट खाने की आदत होती है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इसी आदत ने कई महीनों से फरार चल रहे अपराधी का सुराग पुलिस को दे दिया.
अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहा एक दोषी पैरोल पर रिहा होने के बाद नौ साल तक फरार रहा था.
इस दौरान उसने दोबारा शादी कर ली और एक घर बसा लिया.
लेकिन बिस्किट के एक पैकेट की वजह से पुलिस उस तक पहुंच गई और अपराधी को पकड़कर दोबारा जेल में डाल दिया.
पूरी घटना क्या है?

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सूरत की एक इंजीनियरिंग कंपनी में काम करने वाले सुरेंद्र वर्मा शहर के सचिन इलाके में एक कमरे के मकान में किराए पर रहते थे. पत्नी और उनके बीच अक्सर झगड़ा होता था.
साल 2007 में सुरेंद्र ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी और पुलिस ने उन्हें हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया. पुख्ता सबूतों और गवाहों की गवाही के आधार पर सूरत सत्र न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई, तब से वह लाजपुर जेल में अपनी सजा काट रहे थे.
सूरत के एसीपी नीरव गोहिल ने बताया, "2016 में सुरेंद्र वर्मा ने पैरोल के लिए आवेदन किया था. उनका आवेदन स्वीकार कर लिया गया और सुरेंद्र को 28 दिनों की जमानत दी गई. पैरोल के दौरान ही सुरेंद्र फरार हो गया, जिसके चलते सचिन पुलिस स्टेशन में उसके ख़िलाफ़ 'कारागार अधिनियम' के तहत मामला दर्ज किया गया."
सुरेंद्र वर्मा के एक रिश्तेदार रविंद्र कुमार ने बताया, "सुरेंद्र के परिवार के पास उत्तर प्रदेश में कुछ ज़मीन थी, लेकिन उससे कोई विशेष आमदनी नहीं होती थी. सुरेंद्र ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे. खेती से अच्छी आमदनी न होने के कारण वह बेओहरा गांव से 10 किलोमीटर दूर करवी में रिक्शा चलाते थे और लोगों को रिक्शा में बिठाकर चित्रकूट ले जाते थे."
रविंद्र ने बताया, "साल 2005 में उन्होंने अपनी ही जाति की एक लड़की से शादी कर ली. कुछ समय बाद, काम की तलाश में वे गांव के कुछ लोगों के साथ सूरत चले गए और एक कारखाने में काम करने लगे. इसके अलावा, वे रात में किराए का रिक्शा भी चलाते थे."
आरोप है कि सुरेंद्र अपनी पत्नी से दहेज की मांग कर रहे थे और दहेज के पैसे से खुद का रिक्शा खरीदने की बात करते थे.
इसी बीच उनके रिश्तेदारों को पता चला कि सुरेंद्र ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी थी.
नौ साल से फरार चल रहे अपराधी को कैसे पकड़ा गया?

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पुलिस ने पैरोल पर रहते हुए फरार हुए 42 साल के सुरेंद्र को पकड़ने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया था.
एसीपी गोहिल ने कहा, "सबसे पहले, सुरेंद्र के गांव के लोगों से कुछ जानकारी मिलने के बाद हमने एक टीम बनाई. जांच के लिए टीम को सुरेंद्र के पैतृक गांव, उत्तर प्रदेश भेजा गया. हम यूपी पुलिस के भी संपर्क में थे."
सुरेंद्र को आशंका थी कि एक दिन पुलिस उसे ढूंढने आएगी, इसलिए पैरोल तोड़ने के बाद उन्होंने अपने माता-पिता और भाई से कोई संपर्क नहीं रखा.
पुलिस के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सुरेंद्र का गांव छोटा है, इसलिए उन्होंने धैर्यपूर्वक कुछ रिश्तेदारों से पूछताछ की.
पता चला कि सुरेंद्र बेओहरा से कुछ ही दूरी पर स्थित कारवी में रिक्शा चला रहे थे. यहां पुलिस ने कुछ रिक्शा चालकों से पूछताछ की.
जब पुलिस ने रिक्शा चालकों को सुरेंद्र की तस्वीर दिखाई, तो उनमें से एक रिक्शा चालक ने बताया कि सुरेंद्र यहाँ इलेक्ट्रिक रिक्शा चलाते थे और अब दूसरी महिला से शादी कर ली है और उसके साथ एक किराए के मकान में रहते हैं. इस दंपती का एक बेटा भी है.
छह महीने पहले, सुरेंद्र शंकरपुर गांव में अपने साले की शादी में भी शामिल हुए थे. पुलिस ने जब सुरेंद्र की दूसरी पत्नी के भाई से पूछताछ की, तो पता चला कि वह गुरुग्राम में एक मजदूर के रूप में काम करते हैं. पुलिस के पास अब सुरेंद्र की पत्नी का फ़ोन नंबर और पता भी था.
सुरेंद्र को हर सुबह चाय के साथ बिस्किट खाने की आदत थी. इसलिए पुलिस ने सादे कपड़ों में दो दिनों तक उसके घर के पास निगरानी रखी.
इसी बीच, 14 नवंबर को जब सुरेंद्र अपने बेटे के साथ बिस्किट खरीदने आए तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया. गुरुग्राम में गिरफ़्तार सुरेंद्र को गुजरात पुलिस उत्तर प्रदेश से सूरत लाई और अदालत में पेश किया.
कैसे मिली पैरोल

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सुरेंद्र ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी थी और इस अपराध के लिए वह जेल में थे, जहां से उन्हें पैरोल पर रिहा किया गया था.
हत्या के दोषी को पैरोल कब मिल सकती है, इस बारे में अधिवक्ता आशीष शुक्ला ने कहा, "हत्या के मामले में सजा काट रहे हत्यारे को दो तरीकों से पैरोल मिल सकती है. पहला, यदि हत्यारे के परिवार में कोई गंभीर रूप से बीमार है या इसके लिए कोई ठोस कारण है, तो वह अपने वकील की मदद से उच्च न्यायालय में आवेदन कर सकता है. यदि न्यायालय आवेदन स्वीकार कर लेता है, तो उसे पैरोल मिल जाती है."
"दूसरा, जब कोई कैदी अपनी सजा के कुछ साल पूरे कर लेता है, तो निर्धारित फॉर्म भरकर पैरोल के लिए आवेदन कर सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















