'वंदे मातरम' का क्या है इतिहास और क्या वाकई इसके कुछ हिस्से हटाए गए थे?

इमेज स्रोत, Prakash Singh/Bloomberg via Getty Images
'वंदे मातरम' के 150 साल पूरे होने के मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में सोमवार को इस पर चर्चा की शुरुआत की. साथ ही राज्यसभा में भी इस मुद्दे पर मंगलवार से बहस शुरू हुई.
पीएम ने कहा, "जब वंदे मातरम के पचास वर्ष हुए तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था. जब इसके 100 साल हुए देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था. तब भारत के संविधान का गला घोंट दिया गया था."
उन्होंने कहा, "इसके 150 वर्ष उस महान अध्याय को उस गौरव को पुनःस्थापित करने का अवसर है."
पीएम मोदी ने कहा, "यह गीत ऐसे समय पर लिखा गया जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ सल्तनत बौखलाई हुई थी. भारत पर भांति-भांति का दबाव था, भांति-भांति के जुल्म कर रही थी और भारत के लोगों को अंग्रेज़ों के द्वारा मजबूर किया जा रहा था."
'वंदे मातरम' को लेकर लंबे समय से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच विवाद चल रहा है.
इसी वजह से संसद के दोनों सदनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीख़ी बयानबाज़ी की संभावना जताई जा रही है.
भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि पार्टी ने स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान इस गीत के कुछ अहम हिस्से को हटा दिया था तो वहीं कांग्रेस ने इन आरोपों को निराधार बताया.
साथ ही भारतीय जनता पार्टी के कई नेता मांग कर रहे हैं कि इसे शैक्षणिक संस्थानों में गाना अनिवार्य कर देना चाहिए.
समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दल इसका ये कहते हुए विरोध कर रहे हैं कि जबरन इसे नहीं थोपा जाना चाहिए.
यह गीत बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में लिखा जो बांग्ला और संस्कृत में था.
यह गीत बाद में बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपनी प्रसिद्ध लेकिन विवादस्पद कृति 'आनंदमठ' (1885) में जोड़ दिया.
बाद में रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इसके लिए एक धुन भी बनाई.
क्या है विवाद?

इमेज स्रोत, Raj K Raj/Hindustan Times via Getty Images
7 नवंबर को 'वंदे मातरम' की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ से जुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया था कि, कांग्रेस ने 1937 के फ़ैज़ाबाद अधिवेशन से पहले 'वंदे मातरम के कुछ अहम हिस्सों को हटा दिया था.'
उन्होंने तब कहा था, "1937 में वंदे मातरम के कुछ अहम पदों को, उसकी आत्मा के एक हिस्से को हटा दिया गया था. वंदे मातरम को तोड़ दिया गया था. ये अन्याय क्यों किया गया. इसी ने विभाजन के बीज बोए."
बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी आरोप लगाया कि नेहरू जी 'वंदे मातरम' को लेकर 'सहज नहीं थे.'
इन आरोपों के जवाब में कांग्रेस प्रवक्ता जयराम नरेश ने वंदे मातरम पर सब्यसाची भट्टाचार्य की लिखी एक किताब का ज़िक्र करते हुए एक्स पर पोस्ट किया था, "कांग्रेस वर्किंग कमेटी की 1937 में हुई बैठक से तीन दिन पहले ख़ुद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने नेहरू जी को इस बारे में ख़त लिखा."
"वंदे मातरम से वो ख़ुद जुड़े हुए थे और उन्होंने ही सुझाव दिया कि इस गीत के पहले दो स्टेंजा (हिस्सों) को अपनाना चाहिए, और बैठक में लिया गया फ़ैसला उन्हीं के ख़त से प्रभावित था. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर पर विभाजनकारी विचारधारा रखने का आरोप लगा रहे हैं."
योगी सरकार का फ़ैसला और उसका विरोध

इमेज स्रोत, Sunil Ghosh/Hindustan Times via Getty Images)
इसके अलावा 10 नवंबर को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि उनकी सरकार राज्य के स्कूलों, कॉलेजों और शिक्षा संस्थाओं में 'वंदे मातरम' को गाना अनिवार्य कर देगी.
वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने के कार्यक्रम के दौरान 11 नवंबर को बाराबंकी ज़िले में उन्होंने कहा, "जो भी वंदे मातरम का विरोध कर रहा है, वह भारत माता का विरोध कर रहा है."
उन्होंने कहा कि, "आज भी कुछ लोग हैं, रहेंगे हिंदुस्तान में, खाएंगे हिंदुस्तान में, लेकिन वंदे मातरम नहीं गाएंगे."
जिसके जवाब में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 13 नवंबर को बरेली में कहा, "मुख्यमंत्री जी की कुर्सी जब हिलने लगती है तो वो साम्प्रदायिक हो जाते हैं."
उन्होंने कहा, "यह बहस आज हम कर रहे हैं, क्या उस समय जो संविधान के निर्माता थे उन्होंने बहस नहीं की? इसीलिए राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दिया. अगर यही होता कि इसे गाना ज़रूरी है तो क्यों अनिवार्य नहीं किया गया? उन्होंने लोगों की चॉइस पर छोड़ दिया था."
अखिलेश यादव ने यह भी कहा, "भाजपाइयों से कई बार पूछा गया कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत क्या है, तो वे नहीं जानते थे. भाजपाई राष्ट्रगीत गा नहीं पाए."
इस गीत को स्कूलों में अनिवार्य किए जाने के ऐलान से मुस्लिम नेताओं ने भी ऐतराज़ जताया है.
संभल से समाजवादी पार्टी के सांसद ज़ियाउर्रहमान बर्क ने मीडिया से कहा कि किसी को यह गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है, क्योंकि संविधान ने सभी को स्वतंत्रता दे रखी है.
संभल से ही समाजवादी पार्टी के विधायक इक़बाल महमूद ने बीबीसी से कहा, "हालाँकि राष्ट्रगान का हम सम्मान करते हैं और उसे गाते भी हैं, लेकिन वंदे मातरम का न तो समर्थन करते हैं और न ही विरोध."
क्या है 'वंदे मातरम' का इतिहास?

इमेज स्रोत, Twitter@RailMinIndia
बंकिम चंद्र चटर्जी (1838-1894) पहले हिंदुस्तानी थे जिन्हें इंग्लैंड की रानी ने भारतीय उपनिवेश को अपने अधीन में लेने के बाद 1858 में डिप्टी कलेक्टर के पद पर नियुक्त किया था.
वे 1891 में रिटायर हुए और अंग्रेज़ शासकों ने उन्हें 'राय बहादुर' समेत कई उपाधियों से सम्मानित किया.
यह गीत उन्होंने 1875 में लिखा जो बांग्ला और संस्कृत में था. यह गीत बाद में बंकिम ने अपनी प्रसिद्ध लेकिन विवादस्पद कृति 'आनंदमठ' (1885) में जोड़ दिया.
इस गीत से जुड़ा एक रोचक सच यह है कि इसमें जिन प्रतीकों और जिन दृश्यों का ज़िक्र है वे सब बंगाल की धरती से ही संबंधित हैं.
इस गीत में बंकिम ने सात करोड़ जनता का भी उल्लेख किया है जो उस समय बंगाल प्रांत (जिस में ओडिशा-बिहार शामिल थे) की कुल आबादी थी. इसी तरह जब अरबिंदो घोष ने इसका अनुवाद किया तो इसे 'बंगाल का राष्ट्रगीत' का टाइटल दिया.
रबीन्द्रनाथ टैगोर ने इस गीत के लिए एक ख़ूबसूरत धुन भी बनाई थी.
बंगाल के बंटवारे ने इस गीत को सचमुच में बंगाल का राष्ट्रगीत बना दिया. 1905 में अंग्रेज़ सरकार की ओर से बंगाल के विभाजन के विरुद्ध उठे जनआक्रोश ने इस गीत विशेषकर इसके मुखड़े को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक हथियार में बदल दिया.
तब स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में हिस्सा ले रहे लोगों ने अंग्रेज़ी शासन के ख़िलाफ़ अपने प्रदर्शन में इस गाने का भरपूर इस्तेमाल किया. इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों ही शामिल थे.

इमेज स्रोत, Ishant Chauhan/Hindustan Times via Getty Images
वंदे मातरम का नारा उस समय सारे बंगाल में आग की तरह फैल गया जब बारीसाल (अब बांग्लादेश में) में किसान नेता एम रसूल की अध्यक्षता में हो रहे बंगाल कांग्रेस के प्रांतीय अधिवेशन पर अंग्रेज़ सेना ने 'वंदे मातरम' गाने के लिए बर्बर हमला किया. रातों रात यह बंगाल ही नहीं बल्कि सारे देश में गूंजने लगा.
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने भी वंदे मातरम गाया.
यह नारा साझे राष्ट्रवाद का मंत्र बन गया बिल्कुल वैसे ही जैसे इंक़लाब ज़िंदाबाद. 20वीं शताब्दी का दूसरा दशक आते-आते अंग्रेज़ विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन देशव्यापी रूप ले चुका था.
कांग्रेस, जिसके नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था उसने वंदे-मातरम पर विभाजन को रोकने के गाँधी, नेहरू, अबुल कलाम आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस को लेकर 1937 में एक समिति बनाई जिस ने इस गीत पर आपत्तियां आमंत्रित कीं.
सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि यह गीत एक धर्म विशेष के हिसाब से भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित करता है. यह सवाल केवल मुसलमान संगठनों ने ही नहीं बल्कि सिख, जैन, ईसाई और बौद्ध संगठनों ने भी उठाया.
इसका हल यह निकाला गया कि इस गाने के शुरू के केवल दो अंतरे गाए जाएंगे जिनमें कोई धार्मिक पहलू नहीं है.
लेकिनआरएसएस और हिन्दू महासभा ने पूरे गीत को अपनाने की मांग की. वहीं मुस्लिम लीग ने पूरे गीत का विरोध किया.
हिंदुत्व रिसर्चर स्निगधेंदु भट्टाचार्य बीबीसी न्यूज़ बांग्ला से कहते हैं, " 1937 की शुरुआत से मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीडरशिप के एक तबके ने वंदे मातरम का विरोध करना शुरू किया था."
स्निगधेंदु भट्टाचार्य ने कहा, "उस समय जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष थे. कांग्रेस नेताओं का एक गुट चाहता था कि वंदे मातरम का पूरा गाना स्वीकार किया जाए, जबकि दूसरा गुट इसे ख़ारिज करना चाहता था. हालांकि, कुछ नेता चाहते थे कि पहले दो छंदों को स्वीकार किया जाए. इस विवाद का कारण गाने में ही छिपा है."
"पहले दो छंदों के बाद, गाने में दुर्गा स्तुति है, जो लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते, जैसे मुस्लिम या ब्राह्मण, वे इसे क्यों मानेंगे? और सिर्फ़ यह गाना ही नहीं, बल्कि पूरे आनंद मठ उपन्यास पर इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप है. बंकिम चंद्र ने संन्यासी-फ़कीर विद्रोह का संदर्भ चुना, जो अंग्रेजों के खिलाफ़ एक विद्रोह था. हालांकि, उपन्यास लिखते समय, उन्होंने इसे मुस्लिम शासक के खिलाफ़ हिंदू संन्यासियों के विद्रोह के रूप में पेश किया."
वो कहते हैं कि जब 1937 में इस पर बड़ा विवाद शुरू हुआ तो जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने रबींद्रनाथ टैगोर की सलाह मांगी.
स्निगधेंदु भट्टाचार्य कहते हैं, "रबींद्रनाथ का मानना था कि मुस्लिम समुदाय समेत किसी को भी गीत के शुरुआती दो छंदों पर आपत्ति जताने की कोई वजह नहीं है. लेकिन बाद के छंदों पर आपत्ति करने के लिए काफ़ी कारण थे. उन्होंने यह भी कहा कि पहले दो छंदों को नॉवेल से पूरी तरह अलग रखने में उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं हुई. रबींद्रनाथ की सलाह पर, कांग्रेस ने तय किया कि पहले दो छंद सभी कार्यक्रमों में गाए जाएँगे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















