अंग्रेज़ों की नाक में दम करने वाले टीपू के पिता हैदर अली की कहानी

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
1757 में प्लासी की लड़ाई जीतने के एक दशक के अंदर ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों को अंदाजा हो गया था कि भारतीय राजाओं की सैन्य क्षमता तेज़ी से बढ़ रही है और उनके लिए प्लासी जैसी जीत को दोहराना मुश्किल हो सकता है.
भारतीय रजवाड़ों को सैन्य तकनीक में यूरोपीय निपुणता की बराबरी करने में सिर्फ़ एक दशक लगा था. 1760 के दशक के मध्य तक ये साफ़ होने लगा था कि उनके और अंग्रेज़ों की सैन्य क्षमता के बीच की दूरी करीब-करीब पाटी जा चुकी है. अंग्रेज़ों को सबसे पहले दक्षिण में चुनौती मिली थी हैदर अली से.
लेविन बी बोरिंग अपनी किताब 'हैदर अली एंड टीपू सुल्तान' में लिखते हैं, "18वीं सदी में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ संघर्ष का केंद्र मैसूर था. मैसूर को दुनिया पूर्वी हिस्से के इतिहास में सबसे दिलेर और रोमांचक गतिविधियों की जन्मस्थली माना जाता है. ये वो इलाका था जहाँ अंग्रेज़ों को अपने सबसे ख़तरनाक प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ा था. इस इलाके के नेता का नाम था हैदर अली."
हालांकि हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान का शासन 38 सालों का ही रहा लेकिन इस छोटे समय में ऐसी घटनाएं घटीं जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया."

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जन्मजात योद्धा
हैदर के बारे में कहा जाता है कि वो पंजाबी मूल के थे और मैसूर की सेना में ऊँचे ओहदे पर काम करते थे. सन 1776 में उन्होंने मैसूर के वाडियार राजा को पद से हटाकर सत्ता पर अधिकार जमा लिया था. उन्होंने मैसूर की सेना का आकार बढ़ाया और छोटे पड़ोसी राज्यों पर अधिकार करना शुरू कर दिया.
इरफ़ान हबीब अपनी किताब 'रेसिस्टेंस एंड मॉडर्नाइज़ेशन अंडर हैदर अली एंड टीपू सुल्तान' में लिखते हैं, "हैदर ने अपने सैनिकों को प्रशिक्षित करने के लिए फ़्रेंच कमांडरों को बुलवाया. श्रीरंगपट्टनम की सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए उन्होंने फ़्रेंच इंजीनियरों का सहारा लिया. हैदर ने अपनी नौसेना बनाने की भी कोशिश की. उसके पास सन 1766 में दो बड़े युद्ध पोत, सात छोटे युद्ध पोत और 40 छोटी नौकाएं थीं. इन सबका कमांडर एक यूरोपियन था जिनका नाम स्टेनेट था."
हैदर के बारे में कहा जाता है कि वो एक जन्मजात सैनिक थे. वो घुड़सवारी में तो निपुण थे ही, उन्हें तलवार और बंदूक चलाने में भी उतनी ही महारत थी.
लेविन बोरिंग लिखते हैं, "हैदर में थकान को बर्दाश्त करने का ज़बरदस्त माद्दा था. सैनिकों का नेतृत्व करते हुए उन्हें अपने जीवन के प्रति ख़तरे की ज़रा भी फ़िक्र नहीं थी इसलिए उनके सैनिक उनके लिए कोई भी जोखिम उठाने के लिए तैयार रहते थे. हैदर की ख़ासियत थी युद्ध के समय संयत रहना और तेज़ी से अचानक हमला बोलना जिसमें अधिकतर में उन्हें कामयाबी मिलती थी."

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हैदर की दिनचर्या
मेस्थर ला टू ने अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ हैदर एंड हिज़ सन टीपू सुल्तान' में लिखा है कि हैदर का क़द करीब 5 फ़ीट छह इंच का था. उनका रंग गेंहुआ था और चेहरा खुरदरापन लिए हुए था. उनमें मीलों पैदल या घोड़े की पीठ पर चलने की क्षमता थी. वो सफ़ेद मलमल के कपड़े और पगड़ी पहनना पसंद करते थे.
"उनको आभूषणों का शौक नहीं था. हालांकि देखने में हैदर आकर्षक नहीं थे, लेकिन उनकी उपस्थिति विश्वास और ऊर्जा का आभास देती थी. वो रोज़ आधी रात को सोने जाते थे और सुबह छह बजे सूर्य की किरण फूटने के साथ ही उठ जाते थे."
मेस्थर ने लिखा है, "मैसूर का राजा बनने के बाद उन्होंने अपने चेहरे के सारे बाल कटा दिए थे. उनके न तो दाढ़ी थी, न मूछें, न ही पलकें और भवें. सुबह 8 से 9 बजे के बीच वो राजमहल से दरबार आते था उसके बाद वो बालकनी पर चढ़कर हाथियों और घोड़ों की सलामी लेते थे. हैदर बिल्कुल भी पढ़े-लिखे नहीं थे. बहुत मुश्किल से उन्होंने अपने नाम का शुरुआती अक्षर 'है' लिखना सीखा था."
हैदर रवानी से कन्नड़, तेलुगू, मराठी और तमिल बोल सकते थे लेकिन उन्हें फ़ारसी और अरबी की बिल्कुल भी समझ नहीं थी लेकिन निरक्षरता के बावजूद उसकी याददाश्त हाथियों जैसी थी. दशकों पहले मिले शख़्स को भी पहचानने की उनमें अद्भुत क्षमता थी.

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हैदर की सहिष्णुता
हैदर के शासनकाल में धार्मिक मामलों को बहुत अधिक तरजीह नहीं दी जाती थी. हैदर ने मैसूर के मशहूर दशहरा त्योहार को जो कि सन 1610 से मनाया जाता आ रहा था जारी रखने की अनुमति दी थी. वो दशहरा के त्योहार में खुद भाग लेते थे.
विजयादशमी के दसवें दिन निकाले जाने वाले जुलूस में वो सबसे आगे हाथी पर बैठ कर चलते थे. मार्क विल्क्स ने अपनी किताब 'हिस्टॉरिकल स्केचेज़ ऑफ़ द साउथ ऑफ़ इंडिया इन एन अटेंम्प्ट टु ट्रेस द हिस्ट्री ऑफ़ मैसूर' में लिखा था, "सारे मुसलमान राजाओं में हैदर सबसे अधिक सहिष्णु थे. उनको अपने धर्म के अनुसार प्रार्थना करना और रोज़े रखना न तो आता था और न ही उन्हें सिखाया गया था. उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया था कि सभी धर्म ईश्वर की देन हैं और ईश्वर की नज़र में सभी धर्म बराबर हैं."
हैदर ने 27 अप्रैल, 1769 को शृंगेरी मठ के जगतगुरू शंकराचार्य को एक पत्र लिखा था. एके शास्त्री अपनी किताब 'द रिकॉर्ड्स ऑफ़ द श्रंगेरी धर्मस्थान' में लिखते हैं, "एक पत्र में ज़िक्र है कि हैदर ने जगतगुरू को एक हाथी, पाँच घोड़े, एक पालकी, पाँच ऊँट और देवी शारदा अंबा के लिए एक साड़ी, दो शॉल और 10 हज़ार रुपयों की थैली भेंट भेजी थी. उन्होंने जगतगुरू को एक महान और पवित्र आत्मा के तौर पर संबोधित किया था."
रॉकेट का सबसे पहले इस्तेमाल

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अगस्त, 1767 में हैदर ने ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी. उस समय हैदर की सेना में 50 हज़ार सैनिक थे. उस समय तक कंपनी को पता नहीं था कि हैदर के पास इस स्तर की आधुनिक सेना है. हैदर के सिपाहियों की राइफ़लें और तोपें आत्याधुनिक फ़्रेंच तकनीक पर आधारित थीं. उनकी तोपों का बोर और पहुंच कंपनी की सेना से कहीं अधिक थी.
फ़्रेंच इतिहासकार ज्यां मेरी लाफ़ों अपनी किताब इंडिका :एसेज़ इन इंडो-फ़्रेंच रिलेशंस 1630-1976 में लिखते हैं, "कई मामलों में हैदर के सैनिक अंग्रेज़ों के सैनिकों से कहीं अधिक मौलिक और सामरिक रूप से होशियार थे. वो विरोधी सेना को तितर-बितर करने के लिए ऊँटों से रॉकेट फ़ायर करने में पारंगत हो चुके थे. हैदर अपनी सेना को आगे बढ़ाने और रसद का आपूर्ति के लिए बैलों का इस्तेमाल करते थे जो उस समय नई बात थी और जिसे बाद मे अंग्रेज़ों ने भी अपनाया था."
आख़िरकार अंग्रेज़ों को हैदर से संधि करने पर मजबूर होना पड़ा, इससे भारत के कई रजवाड़ों को यह अहसास हो गया कि अंग्रेज़ों को लड़ाई में हराया और हैरान किया जा सकता है.

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अंग्रेज़ों पर हमला
सात फ़रवरी , 1780 को वादगाँव की संधि के एक वर्ष बाद मराठा नेता नाना फड़नवीस ने अपने पुराने दुश्मन हैदर अली को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें अपने मतभेद भुलाकर साथ मिलकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ धावा बोलना चाहिए.
एक महीने के अंदर हैदराबाद के निज़ाम ने भी हैदर का साथ देने का फ़ैसला कर लिया. गर्मी आते-आते इन तीनों शक्तियों ने अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया.
एक महीने बाद अंग्रेज़ों के ठिकाने मद्रास में ख़बर पहुंची कि हैदर के पास फ़्रांस से हथियारों की बड़ी खेप पहुंच चुकी है. आख़िरकार, 17 जुलाई, 1780 को हैदर अली ने अंग्रेज़ों पर एक बार फिर हमला बोल दिया. इस बार उनके पास पहले से दोगुनी सेना थी.
उनकी सेना में 60 हज़ार घुड़सवार सैनिक, 35 हज़ार पैदल सैनिक और 100 तोपें थीं. कागज़ पर मद्रास की रक्षा के लिए कंपनी के 30 हज़ार सैनिक तैनात किए गए थे लेकिन सही मानो में उस माह सिर्फ़ आठ हज़ार सैनिकों को ही इकट्टा किया जा सका था.
मार्क विल्क्स अपनी किताब 'हिस्टॉरिकल स्केचेज़ ऑफ़ द साउथ ऑफ़ इंडिया' में लिखते हैं, "हैदर जिस गति से आगे बढ़े उसने अंग्रेज़ों के सैनिकों की संख्या को और कम कर दिया. इनमें से बहुत से सैनिकों के परिवार आरकोट में रह रहे थे. अपने बीबी-बच्चों की सुरक्षा के ख़ातिर इन सैनिकों ने अंग्रेज़ों का साथ छोड़ दिया. उन लोगों ने या तो हैदर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया या रिश्वत के बदले अपने ठिकानों के दरवाज़े खोल दिए. हैदर ने मद्रास, वैल्लोर और आरकोट के आसपास के गाँवों मे आग लगाकर कंपनी की रसद आपूर्ति को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया."

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मुनरो और बेली की सेना के मिलन का प्रयास विफल
25 अगस्त, 1780 को दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों के सबसे बड़े जमावड़े ने हैदर की सेना से भिड़ने के लिए मद्रास से मार्च कर कांचीपुरम की तरफ़ बढ़ना शुरू किया. इस फ़ौज का नेतृत्व जनरल हेक्टर मुनरो कर रहे थे. ये वही जनरल थे जिन्होंने 15 साल पहले बक्सर की लड़ाई में शुजाउद्दौला को हराया था.
इस बार उनकी सेना मे सिर्फ़ पाँच हज़ार सैनिक थे जिन्हें महीनों से वेतन नहीं दिया गया था और उनका मुकाबला हैदर की एक लाख सैनिकों की विशाल सेना से था. उनसे 30 मील उत्तर में कर्नल विलियम बेली को आदेश मिला कि वो अपने सैनिकों के साथ मुनरो की सेना से जा मिलें.
ग़ुलाम हुसैन ख़ाँ अपनी किताब 'सैर मुताख़रीन' में लिखते हैं, "हैदर के पास इतने सैनिक थे कि उन्होंने सारी भूमि को समुद्र की नाराज़ लहरों की तरह ढंक रखा था. उसके पीछे चल रहे तोपख़ाने का कोई अंत नहीं दिखाई देता था. इस बीच भयंकर बारिश शुरू हो गई और बेली को अपने सैनिकों को कोर्तालैयर नदी पार कराने में ग्यारह दिन लग गए. हैदर के बेटे टीपू के लिए इतना समय काफ़ी था कि वो मुनरो और बेली की सेना के बीच अपने 11 हज़ार सैनिकों को पहुंचा पाते.

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हैदर की सेना ने बेली की सेना को घेरा
दोनों सेनाओं के बीच पहली भिड़ंत 6 सितंबर को हुई. कैप्टेन मुआत ने अपने पेपर 'अकाउंट ऑफ़ द डिफ़ीट ऑफ़ पोलिलूर' में लिखा, "लगातार होती बारिश में धान के खेतों में घुटनों तक के पानी में लड़ती हुई बेली की सेना की कमियाँ पूरी तरह से उजागर हो गईं और उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा. दोनों सेनाओं ने आमने-सामने नहीं, बल्कि दूर से लड़ाई लड़ी."
कुछ देर बाद उन्हें कुछ आगे ढ़ोल और नगाड़ों की आवाज़ सुनाई पड़ी. बेली ने समझा कि मुनरो के सैनिक उसकी सहायता के लिए आ रहे हैं. जब वो सैनिक नज़दीक आए तब उन्होंने पाया कि हैदर अपने 25 हज़ार सैनिको के साथ उनके सामने आ पहुंचा है. बाद में बेली के छोटे भाई ने 'अकाउंट ऑफ़ पोलिलूर' में लिखा, "हमें हैदर के घोड़ों ने घेर लिया. उनके पीछे उनकी तोपें थीं. करीब 50 तोपों ने हमारे चारों ओर अर्ध वृत्ताकार गोला-सा बना लिया. हैदर ने थोड़ी देर के लिए लड़ाई रोकने का आदेश दिया और पीछे आ रही अपनी बड़ी तोपों को आगे कर दिया. उनके आगे हमारे लिए कोई मौका नहीं था."

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अंग्रेज़ों की हार
अपना सारा बारूद ख़त्म हो जाने के बाद बेली ने आत्मसमर्पण करने के प्रयास में अपनी तलवार से एक रुमाल बाँध कर उसे ऊपर उठा दिया. बेली ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वो हथियार डाल दें लेकिन कुछ सैनिक उनका आदेश सुन नहीं पाए और वो फ़ायरिंग करते रहे. नतीजा ये हुआ कि हैदर ने आत्मसमर्पण स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
उनके घुड़सवारों ने लड़ाई हार चुकी अंग्रेज़ी सेना का कत्ल करना शुरू कर दिया. एलन ट्रिटन ने अपनी किताब 'वेन द टाइगर फ़ॉट द थिसेल' में 73वीं हाइलैंड रेजिमेंट के एक लेफ़्टिनेंट को कहते हुए बताया, "मौत से बच गए लोग बहुत मुश्किल से खड़े हो पा रहे थे. कुछ का दम घुट रहा था. कुछ सैनिक हिल भी नहीं पा रहे थे क्योंकि उनके ऊपर उनके साथियों के शव पड़े हुए थे. कुछ सैनिक हाथी के पैरो तले रौंदे जा चुके थे. कुछ के सारे कपड़े फट गए थे और वो चिलचिलाती धूप में प्यासे पड़े हुए थे और आसानी से जंगली जानवरों के शिकार बन रहे थे. अंग्रेज़ सेना के 86 अधिकारियों में से 36 मारे गए थे, 34 घायल हुए थे और 16 लोगों को बंदी बना लिया गया था."
बेली के सिर और पीठ में चोट लगी थी. उन्हें अपनी एक टाँग से भी हाथ धोना पड़ा था. आख़िरकार बेली को एक तोपगाड़ी में बाँध कर हैदर के सामने लाया गया और दूसरे क़ैदियों के साथ ज़मीन पर बैठा दिया गया. कंपनी के सैनिकों को पहली बार अनुभव हुआ कि हार और क़ैदी बन जाने का मतलब क्या होता है.

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अंग्रेज़ कैदियों के साथ बुरा व्यवहार
करीब सात हज़ार अंग्रेज़ सैनिकों को बंदी बनाया गया था. एक कैदी जेम्स स्करी ने अपनी किताब 'द कैप्टिविटी, सफ़रिंग एंड इस्केप ऑफ़ जेम्स स्करी' में लिखा था, "दस साल तक हैदर की कैद में रहने के बाद मैं पूरी तरह से भूल चुका था कि कुर्सी पर किस तरह से बैठा जाता है और किस तरह छुरी और काँटे से खाना खाया जाता है. मैं अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल करना तक भूल गया था. मेरी खाल काली पड़ गई थी और मैं यूरोपियन कपड़े पहनना नापसंद करने लगा था."
माया जासानॉफ़ ने अपनी किताब 'एज ऑफ़ द एंपायर कॉन्क्वेस्ट एंड कलेक्टिंग इन द ईस्ट 1750-1850' में लिखते हैं, "अगर हैदर ने बेली की हार के बाद लड़ाई जारी रखी होती तो अंग्रेज़ों के गिरे मनोबल को देखते हुए इस बात की संभावना बहुत कम थी कि फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज जीतने में उन्हें नाकामी मिलती. ये कंपनी का सौभाग्य था कि हैदर अपने सैनिकों को बचा कर रखना चाहते थे. उन्होंने कंपनी से सीधे भिड़ने की नीति त्याग दी और इक्का-दुक्का हमला कर भाग निकलने की नीति पर अमल करने लगे."
आने वाले कुछ महीनो में गवर्नर जनरल हेस्टिंग्स हैदर के मराठों के साथ हुए गठबंधन को तोड़ने में कामयाब हो गए. हेस्टिंग्स ने मराठा कमांडर महादजी सिंधिंया के साथ एक समझौता किया जिसके तहत मराठा अंग्रेज़ों के दोस्त बन गए. नतीजा ये हुआ कि अंग्रेज़ों के साथ हुई अगली लड़ाई में हैदर अपनी सफलता नहीं दोहरा सके.
विलियम डेलरिंपिल अपनी किताब 'द अनार्की' में लिखते हैं, "अगर 1780 में ही हैदर और उनके साथियों ने कंपनी पर दबाव कम नहीं किया होता तो अंग्रेज़ उसी समय हमेशा के लिए भारत से निकल जाते. बाद में पुणे और मैसूर के दरबारों को इस बात का हमेशा रंज भी रहा कि वो मौके को ढंग से भुना नहीं पाए."

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पीठ के कैंसर से मृत्यु
सन 1782 में हैदर की पीठ पर एक फोड़ा निकल आया. धीरे-धीरे उस फोड़े का आकार बढ़ता गया, बाद में पता चला कि हैदर को पीठ का कैंसर था.
दूसरे एंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान हैदर की इस गंभीर बीमारी ने उसकी शक्ति और गति को बहुत हद तक कम कर दिया था. 7 दिसंबर, 1782 को ज़मीन से शिखर तक पहुंचने वाले इस शख़्स ने 60 साल की उम्र में हमेशा के लिए आँखें मूँद लीं.
शामा राव ने अपनी किताब 'मॉडर्न मैसूर फ़्रॉम बिगिनिंग टू 1868' में लिखा, "ये कहने में कोई अतिशियोक्ति नहीं है कि जिस समय हैदर की मौत हुई वो भारत के इतिहास की एक घटना मात्र नहीं थी. उनकी मौत ने भारत में ब्रिटिश ताकत की नींव रख दी जो उसके जीते जी शायद संभव नहीं हो पाता."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















