महाराजा दलीप सिंह: दो कुर्सियों की ​​नीलामी, मिस्र की मुलर से शादी और ग़रीबी में बीते आख़िरी पल की कहानी

महाराजा दलीप सिंह की दो कुर्सियां

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इमेज कैप्शन, महाराजा दलीप सिंह की दो कुर्सियों की नीलामनी हो गई है
    • Author, एलिस कनिंगहम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सुफ़ोक

सिख साम्राज्य के अंतिम सिख शासक दलीप सिंह की 19वीं सदी की दो कुर्सियों की हाल ही में नीलामी की गई है.

ओलंपिया ऑक्शन्स के अनुसार, इन दोनों कुर्सियों की नीलामी 8,000 पाउंड (लगभग 9 लाख 45 हज़ार रुपये) में हुई.

दलीप सिंह (1838-1893) को पांच साल की उम्र में सिख महाराजा की उपाधि दी गई थी. लेकिन 1849 में अंग्रेजों के सिख साम्राज्य पर कब्ज़ा करने के बाद, उन्हें सुफ़ोक-नॉरफ़ॉक सीमा पर एल्वेडेन हॉल भेज दिया गया था.

नीलाम की गई कुर्सियां ​​दलीप सिंह की संपत्ति का हिस्सा थीं.

ओलंपिया ऑक्शन्स के विशेषज्ञ निकोलस शॉ ने नीलामी से पहले कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि नीलामी में इन कुर्सियों में लोगों की "काफ़ी दिलचस्पी" होगी.

महाराजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे बेटे

महाराजा दलीप सिंह की तस्वीर

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इमेज कैप्शन, महाराजा दलीप सिंह के पिता की मौत उनके जन्म के एक साल बाद ही हो गई थी

दलीप सिंह महाराजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे बेटे थे, जिन्होंने 1799 में पंजाब में सिख साम्राज्य की स्थापना की थी.

अपने निर्वासन के बाद, दलीप सिंह 15 साल की उम्र में इंग्लैंड आ गए थे. इंग्लैंड में रहने के दौरान वह ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी विक्टोरिया के घनिष्ठ मित्र बने रहे.

1863 में उन्होंने एल्वेडेन एस्टेट संपत्ति ख़रीदी थी. 1893 में 55 साल की उम्र में उनके निधन के बाद ये संपत्ति जानेमाने गिनीज़ ब्रूइंग परिवार के एडवर्ड सेसिल गिनीज़ ने ख़रीद ली.

जो दो कुर्सियां नीलाम हुई हैं, वो बम्बई (मौजूदा दौर की मुंबई) में 1850 के आसपास बनाई गई थीं. एडवर्ड गिनीज़ के दलीप सिंह की संपत्ति ख़रीदने के बाद ये कुर्सियां वहीं रहीं, यानी एडवर्ड के कब्ज़े में चली गईं.

ओलंपिया ऑक्शन्स के अनुसार, ये कुर्सियां गहरे रंग की बॉम्बे ब्लैकवुड (एक प्रकार की लकड़ी) से बनी हैं और इनमें भारतीय डिज़ाइन और अकेंथस की पत्तियों के डिज़ाइन बने हैं.

निकोलस शॉ का कहना है, "ये कुर्सियां ​​महाराजा दलीप सिंह की बेहतरीन शिल्पकला को दिखाती है, जिसमें उनकी भारतीय विरासत के साथ-साथ अंग्रेज़ी समाज का भी असर है.''

इन कुर्सियों की ख़ासियत

महाराजा दलीप सिंह की कुर्सियां

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एल्वेडेन एस्टेट से अलग होने के बाद, 40 सालों से अधिक समय में पहली बार इन कुर्सियों की नीलामी की गई है.

जिस "बॉम्बे ब्लैकवुड" से ये कुर्सियां बनी हैं, उस शब्द का इस्तेमाल 1840 के दशक के विक्टोरियन मॉडल के अनुसार, बने विस्तृत नक्काशीदार डिज़ाइन वाले फ़र्नीचर के लिए किया जाता था.

इन कुर्सियों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी मुख्य रूप से ब्लैकवुड थी, जिसे बॉम्बे के मीडो स्ट्रीट और उसके आसपास की लकड़ी फैक्ट्रियों के लिए मालाबार तट से लाया जाता था.

इस फर्नीचर की शैली मुख्य रूप से रोकोको रिवाइवल है. ये 18वीं सदी के फ्रांस में राजा लुई पंद्रहवें के दौर के फर्नीचर से प्रेरित नक्काशी है.

ये दोनों कुर्सियां क्रिस्टीज़ ने 1984 में अर्ल ऑफ़ इवेग की ओर से एल्वेडेन एस्टेट के हिस्से के रूप में बेची थीं.

ये उस बिक्री में शामिल भारतीय फ़र्नीचर के कुछ उदाहरणों में से एक थीं.

माना जाता है कि ये कुर्सियां दलीप सिंह के निधन के बाद, घर में बची कुछ वस्तुओं में शामिल थीं.

वीडियो कैप्शन, पंजाब के आख़िरी सिख महाराजा दलीप सिंह का ब्रिटेन से रिश्ता

महाराजा दलीप सिंह के जीवन पर आधारित बीबीसी की एक पुरानी रिपोर्ट के कुछ अंश यहां पढ़िए-

सिख साम्राज्य के अंतिम महाराजा

दलीप सिंह का जन्म 1838 में सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह के घर हुआ था.

उनके जन्म के अगले वर्ष उनके पिता की मृत्यु के बाद पंजाब में गृह युद्ध और अशांति फैल गई.

पांच साल की उम्र में दलीप सिंह को शेर-ए-पंजाब की गद्दी पर बिठा दिया गया जबकि असल में शासन की बागडोर उनकी मां और मामा के हाथों में थी.

गृह युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा था बल्कि ये और भी भयंकर होता गया. जब सिखों और अंग्रेजों के बीच दूसरा युद्ध छिड़ा, तो यह अपने चरम पर था. अंग्रेजों ने पंजाब पर कब्ज़ा करने की पूरी तैयारी कर रखी थी.

1849 में पंजाब को ब्रिटिश भारत में मिला लिया गया और महाराजा दलीप सिंह को गद्दी से उतार दिया गया.

वे सिख साम्राज्य के अंतिम महाराजा थे. दलीप सिंह, अपनी मां महारानी जिंद कौर से भी अलग हो गए थे. उनकी मां को क़ैद कर लिया गया था.

दलीप सिंह

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इमेज कैप्शन, पांच साल की उम्र में दलीप सिंह को शेर-ए-पंजाब की गद्दी पर बिठाया गया.

मई 1854 में उन्हें इंग्लैंड लाया गया और महारानी विक्टोरिया से मिलवाया गया. पहली मुलाक़ात में ही महारानी विक्टोरिया को दलीप सिंह पसंद आ गए.

धीरे-धीरे वह रानी के क़रीबी मित्र बन गये और उन्हें अपने पद के साथ 'सम्मान' भी मिलने लगा.

निजी जीवन में वे एक ब्रिटिश सामंत बन चुके थे जबकि सार्वजनिक रूप से वे अब भी खुद को एक भारतीय राजकुमार के रूप में प्रस्तुत करते थे.

इंग्लैंड में उन्हें ब्लैक प्रिंस के नाम से जाना जाता था.

1861 में उनके अलग होने के 13 साल बाद, वे अपनी बुजुर्ग मां महारानी जिंद कौर से फिर मिले. इसके बाद जिंद कौर ने दो साल अपने बेटे के साथ ब्रिटेन में बिताए.

इससे पहले, माँ और बेटे ने एक-दूसरे को पत्र भी लिखे थे. इनमें से दो पत्र ब्रिटिश लाइब्रेरी में रखे हुए हैं.

दो साल बाद, जिंद कौर का निधन हो गया.

दलीप सिंह ने बंबा मुलर से शादी की, जो मिस्र के काहिरा में पैदा हुई थीं. ईसाई मूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी. दलीप सिंह और बम्बा के छह बच्चे थे और वे सुफ़ोक के सुदूर इलाके़ एल्वेडेन हॉल में रहने चले गए.

पेरिस में हुई मौत

दलीप सिंह और उनकी मां

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इमेज कैप्शन, दलीप सिंह और उनकी मां ने एकदूसरे को जो चिट्ठियां लिखीं उनमें से कुछ ब्रिटिश लाइब्रेरी में रखी हुई हैं.
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कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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समाप्त

1870 के दशक में महाराजा आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे.

उनके लिए छह बच्चों का पालन-पोषण करना और ब्रिटिश सरकार से मिलने वाली पेंशन पर जीवन जीना मुश्किल हो रहा था. वे भारी कर्ज में डूब गए थे.

उन्होंने ब्रिटिश सरकार से भारत में अपनी ज़मीन और संपत्ति की मांग शुरू कर दी. उन्होंने यह भी दावा किया कि पंजाब पर बेईमानी से कब्ज़ा किया गया है.

उन्होंने भारत में अपनी ज़मीन के बदले मुआवजे की मांग करते हुए सरकार को अनगिनत पत्र लिखे. लेकिन इसका उन्हें कोई फायदा नहीं मिला.

मार्च 1886 के आख़िरी दिनों में उन्होंने अपने जीवन का सबसे साहसी कदम उठाया. वे अपने परिवार के साथ भारत के लिए रवाना हुए.

उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कहा कि वे फिर से सिख धर्म को स्थापित करेंगे और ज़मीन का अपना हिस्सा फिर हासिल करेंगे.

ब्रिटिश सरकार इस संभावित विद्रोह के ख़तरे को टालना चाहती थी. भारत आते हुए महाराजा दलीप सिंह का जहाज़ जब अदन पहुंचा, तो उन्हें हिरासत में ले लिया गया.

उन्हें नज़रबंद कर दिया गया और उनका परिवार ब्रिटेन लौट गया.

दलीप सिंह सिख भी बन गए. लेकिन अपने जीवन के आख़िरी वक्त में को भटकते रहे और ब्रिटिश जासूसों की निगरानी में रहे.

अक्टूबर 1893 में पेरिस में, 55 साल की उम्र में पंजाब के आख़िरी महाराजा का बेहद ग़रीबी में निधन हो गया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.