महाराजा दलीप सिंह जिनकी दोस्ती क्वीन विक्टोरिया से थी

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- Author, गगन सभरवाल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
ब्रिटेन में इन दिनों पंजाब के अंतिम सिख शासक महाराजा दलीप सिंह के जीवन को दर्शाने वाली प्रदर्शनी चल रही है.
दलीप सिंह पंजाब में सिख साम्राज्य की स्थापना करने वाले महाराजा रणजीत सिंह के सबसे छोटे बेटे थे. अपने पिता और भाइयों की मौत के बाद दलीप सिंह पांच साल की उम्र में ही पंजाब के शासक बन गए थे. हालांकि ब्रिटिशों ने जब 1849 में पंजाब पर क़ब्ज़ा जमाया तो उनका साम्राज्य छिन गया.
15 साल की उम्र में वे इंग्लैड चले गए और पूरा जीवन वहीं गुज़ारा. कुछ समय बीतने के बाद उनकी ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया से अच्छी दोस्ती भी हुई.
नॉरिच के अर्काइव सेंटर में चल रही प्रदर्शनी में दोनों की दोस्ती की झलक भी मिलती है.
ब्रिटेन के इतिहासकार और कला संग्रहकर्ता पीटर बेंस कहते हैं, "प्रदर्शनी में मेरी पसंदीदा चीज़ों में एक जर्नल भी शामिल है, जिस पर क्वीन विक्टोरिया का हस्ताक्षर है. इस पर लिखा है- महाराजा दलीप सिंह को उनकी प्यारी दोस्त विक्टोरिया की ओर से, विंडसर कासल, मार्च 1868. पंजाब के पूर्व राजा से दोस्ती की यह बहुत निजी स्वीकारोक्ति जैसा है."
बेंस ने भी इस प्रदर्शनी के लिए अपने निजी संग्रह से दलीप सिंह से जुड़ी चीज़ें दी हैं. वे कहते हैं कि पहली बार इन ऐतिहासिक चीज़ों को आम लोगों के सामने प्रदर्शित किया गया है. वे उम्मीद जताते हैं, "मुझे इन चीज़ों की तलाश करते हुए जितना आनंद मिला था, उतना ही आनंद दर्शकों को इसे देख कर मिलेगा."

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ब्रिटेन में दलीप सिंह का जीवन
इस प्रदर्शनी में विभिन्न कलाकृतियों के माध्यम से, दलीप सिंह के आकर्षक जीवन को दर्शाया गया है. युवावस्था में उनका साम्राज्य छिन गया था, उनकी मां को जेल में डाल दिया गया था और उन्हें सेना के डॉक्टर सर जॉन स्पेंसर लोगिन और उनकी पत्नी की देखरेख में रखा गया था.
जीवन के ऐसे दौर में दलीप सिंह की दिलचस्पी ईसाई धर्म के प्रति हुई. प्रदर्शनी से पता चलता है कि 1850 में उनके एक सहायक ने उन्हें बाइबिल की प्रति भेंट की थी. इसके साथ एक मखमली जैकेट को भी इसमें शामिल किया गया है.
दलीप सिंह ब्रिटेन तत्कालीन प्रिंस ऑफ़ वेल्स- बाद में किंग एडवर्ड सप्तम- के साथ शिकार खेलने जाते थे, प्रदर्शनी में शिकार के दौरान इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों को भी रखा गया है. इसके अलावा उनके फ़ोटोग्राफ्स और पत्र भी प्रदर्शनी में शामिल किए गए हैं.
दलीप सिंह की शादी 1864 में एक जर्मन बैंकर की बेटी बाम्बा मूलर से हुई थी. इसके बाद उन्होंने सफ़क के ग्रामीण इलाके में एक आलीशन इमारत एल्वेडेन हॉल को रिहाइश बनाया.
इन दोनों के छह बच्चे हुए. प्रदर्शनी में उनकी बेटी राजकुमारी कैथरीन, राजकुमारी बाम्बा और राजकुमारी सोफ़िया के पहने हुए कपड़े भी शामिल किए गए हैं. राजकुमारी बाम्बा और राजकुमारी सोफ़िया ब्रिटेन की जानमानी ऐक्टिविस्ट थीं जिन्होंने 1900 की शुरुआत में महिलाओं के लिए मतदान के अधिकार की मांग की थी.
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फ़्रेडरिक दलीप सिंह
प्रदर्शनी में एक सैन्य पोशाक और दलीप सिंह के दूसरे बेटे राजकुमार फ़्रेडरिक दलीप सिंह के सामानों को भी जगह दी गई है.
पीटर बेंस पिछले 25 साल से भी ज़्यादा समय से दलीप सिंह और उनके परिवार से संबंधित कलाकृतियों पर शोध एवं संग्रह कर रहे थे.
उन्होंने बताया, "मैं अपने यूनिवर्सिटी कैंपस के सिख छात्रों के समूह के साथ नॉरफ़ॉक आया था. जब हम यहां यात्रा कर रहे थे तब मैंने ज़ोर देकर कहा था कि ऐल्वेडन में हमें महाराजा दलीप सिंह की क़ब्र पर रुकना है." हालांकि तब बेंस ख़ुद भी ना तो दलीप सिंह और ना ही उनकी विरासत के बारे में ज़्यादा जानते थे.
हालांकि जब वे दलीप सिंह की क़ब्र पर पहुंचे तो वहां एक बुज़ुर्ग महिला ने उन्होंने दलीप सिंह और उनके परिवार को समर्पित संग्रहालय के बारे में बताया. खोजबीन के बाद बेंस को पता चला कि वह 'एनशिइंट हाउस म्यूज़ियम' जो 15वीं शताब्दी में ट्यूडर हाउस था और उसे फ़्रेडरिक दलीप सिंह ने 1921 में ख़रीदकर एक संग्रहालय का रूप दिया था.

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कैसे जुटाई गई जानकारी
तीन साल बाद उन्होंने संग्रहालय को अपनी कलाकृतियों और ऐतिहासिक चीज़ों के साथ लोगों को समर्पित कर दिया. बेंस ने जब इस संग्रहालय के क्यूरेटर से परिवार पर किताबों के बारे में पूछा था तो उन्हें बताया गया कि 'दलीप सिंह पर तो किताबें हैं, लेकिन उनके बच्चों पर कुछ नहीं है.'
दलीप सिंह के बारे में और ज़्यादा जानकारी जुटाने के लिए बेंस ने अख़बारों में विज्ञापनों की सिरीज़ चलाई. इन विज्ञापनों में स्थानीय लोगों से दलीप सिंह के बच्चों के बारे में जानकारी शेयर करने की अपील की जाती थी.
छह महीनों में बेंस को 300 से ज़्यादा पत्र प्राप्त हुए जिसमें लोगों ने बताया कि वे परिवार के किसी एक सदस्य को जानते हैं या फिर उनसे संबंधित कोई कलाकृति या सामग्री है.
बेंस कहते हैं, "मैंने इन लोगों को रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया. उनकी बातों को लिखना शुरू किया. इसके अलावा कलाकृतियों को एकत्रित करना शुरू किया, कुछ लोगों ने मुफ़्त में दिए तो कुछ ख़रीदना भी पड़ा."
बेंस ने उम्मीद जताई है कि यह प्रदर्शनी भारतीय मूल के युवाओं को उनके इतिहास से जोड़ने में कामयाब होगी. आगामी 22 अक्टूबर को दलीप सिंह की 129वीं जयंती है.
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