बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर: भारतीय महिला को राष्ट्रीय टीम का कोच न बनाने पर प्रीतम सिवाच ने क्या कहा

बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ द ईयर

गुरुवार को दिल्ली में बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ द ईयर के पाँचवें संस्करण के लिए नामांकन की घोषणा हुई है.

इसके लिए गोल्फ़र अदिति अशोक, निशानेबाज़ मनु भाकर और अवनि लेखरा को नामांकन मिला है. उनके अलावा क्रिकेटर स्मृति मंधाना और पहलवान विनेश फोगाट को भी इस नामांकन में जगह मिली है. यह पुरस्कार साल 2024 में भारतीय खिलाड़ियों के अहम योगदान के लिए दिया जाएगा.

इस दौरान खेल पत्रकारों ने वहां मौजूद द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित कोच प्रीतम सिवाच और पेरिस पैरालंपिक में ब्रॉन्ज़ जीतने वाली पैरा एथलीट सिमरन शर्मा से सवाल भी पूछे.

प्रीतम सिवाच ने अपने ही देश की महिला कोच पर भरोसे की कमी की बात कही और इसपर नाख़ुशी जताई. उन्होंने कहा कि अभी भी बहुत से लोग भारतीय महिला कोच की क्षमताओं पर संदेह रखते हैं.

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बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ द ईयरके लिए नॉमिनेशन हासिल करने वालीं खिलाड़ियों को अब वोटिंग की प्रक्रिया से होकर गुज़रना होगा. इसके लिए लोग भारतीय समय के मुताबिक़ शुक्रवार 31 जनवरी रात 11:30 बजे तक वोटिंग कर सकते हैं.

विजेता की घोषणा नई दिल्ली में एक ख़ास समारोह में सोमवार, 17 फ़रवरी को की जाएगी.

बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ द ईयर के पाँचवें संस्करण को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी हुई.

महिला कोच की कमी पर क्या बोलीं प्रीतम सिवाच?

प्रीतम सिवाच को साल 2021 में दोणाचार्य अवॉर्ड मिला था

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खेल पत्रकार शारदा उगरा ने प्रीतम सिवाच से पूछा कि वह इकलौती महिला द्रोणाचार्य अवॉर्ड विजेता हैं, उन्हें क्या लगता है कि महिला कोच की कितनी ज़रूरत है खेल में और कमी क्यों है? क्या महिला कोच को लेकर स्थिति बदली है?

इस पर प्रीतम सिवाच ने कहा, "अच्छा सवाल है, पुरुषों को बुरा नहीं लगना चाहिए. हमारे समाज और हिंदुस्तान में, मैं जो देखती हूं. कि यहां पर पुरुषों की प्रधानता है."

उन्होंने कहा, " कहते हैं कि महिलाएं बहुत आगे चली गई हैं लेकिन मैंने अपने क्षेत्र में देखा है बहुत सारे पत्रकार हैं जिन्होंने मुझे खेलते हुए देखा है, मेरा सारा करियर देखा है."

"मैंने अपनी ज़िंदगी खेल में लगाई है. पहले 20 साल खेलने में लगाए और आगे के 20 साल कोचिंग में लगाए."

"आज भी मुझे द्रोणाचार्य अवॉर्ड मिलने के बाद भी ये नहीं सोचते कि क्या एक महिला भारतीय टीम की कोच हो सकती है.

उनका इतना कॉन्फ़िडेंस आजतक नहीं बना है. बाहर वाली गोरी को लेकर आ जाएंगे कि ये कोचिंग कर सकती हैं लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा नहीं हुआ है.

ये बहुत बड़ी सच्चाई है. ऐसा सोचते हैं, ख़ासकर कोचिंग में, हमारे प्लेयर्स बैठे हैं वो बता सकते हैं. जबकि हमें भरोसा करना चाहिए. जब हम नीचे से खिलाड़ी बनाकर हिंदुस्तान के लिए तैयार कर के दे रहे हैं, तो क्या हम ऊपर काम नहीं कर सकते.

तो फिर हमें भरोसा बनाना होगा. जब ये अवॉर्ड मिलते थे तो मैंने दो साल अपना नाम भेजा, तो पूछा जाने लगा कि महिला को ये अवॉर्ड मिल सकता है क्या?

तभी मेरे मन ये सवाल आया कि महिला को क्यों नहीं मिल सकता? मैं लेकर दिखाऊंगी. मैंने चुनौती स्वीकार की. मैं चाहती हूं हर महिला को काम करना चाहिए.

बहुत सारी महिलाएं तो ये सोचकर पीछे हट जाती हैं कि छोड़ो ये तो आगे ही नहीं बढ़ने देते. जब तक हम आगे नहीं आएंगे और लड़ाई नहीं करेंगे अपने लिए, तो हमें नहीं मिल पाएगा.

तो मैंने बहुत लड़ाई लड़ी है और सबको लड़नी चाहिए और महिलाओं को आगे आना चाहिए कोचिंग में आना चाहिए और हर चीज़ में आना चाहिए."

रिपोर्टर्स ने पूछे कौन से सवाल

सिमरन अपने पति के साथ
इमेज कैप्शन, सिमरन अपने पति के साथ

पति की सफ़लता के पीछे पत्नी का हाथ होता है, लेकिन पत्नी की सफलता के पीछे भी पति का हाथ होता है. आपके पति जो आर्मी में हैं, उन्होंने भी आपको ट्रेन किया है. ये जो प्रक्रिया रही है साथ में ट्रेनिंग करने की, ये प्रक्रिया कैसे और कब शुरू हुई?- कृति शर्मा, वेबदुनिया

सिमरन: साल 2017 में जब हमारी शादी हुई थी तब उन्होंने (मेरे पति ने) सवाल पूछा था कि ज़िंदगी में क्या करना है. तो मैंने कहा था कि मैं अपनी टीशर्ट पर इंडिया लिखा हुआ देखना चाहती हूं. मैंने तो हवाबाज़ी में कहा था. उन्होंने कहा कि इसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी.

मुझे नहीं पता था कि लड़के इतने सीरियस होते हैं. मेरे आसपास कोई था नहीं इतना सीरियस. शादी के अगले दिन कहा कि तैयार हो जाओ जिम जाना है.

पैरा एथलीट सिमरन शर्मा का बयान

मेरे हाथों में मेहंदी लगी हुई थी और मैं ट्रैक सूट में वापस आई और जब वापस आई तो मुंह दिखाई के लिए आए लोगों ने पूछा कि बहू कहां हैं? मैंने कहा कि मैं ही हूं जी. तो संघर्ष वहीं से शुरू हुआ था.

मेरी सास के ऊपर लोग टूट पड़े कि, कैसे कपड़े पहनती है? पता नहीं चलता कि बेटी कौन है बहू कौन है? तेरी बहू न्यारी है क्या जो घूंघट नहीं करेगी?

तो इन्होंने कहा कि मेरी तो पत्नी न्यारी ही है और जब ये ओलंपिक में जाएगी और शॉर्ट्स पहनकर दौड़ेगी तो क्या तुम देखोगी नहीं?

मैं हंसने लगी तो पूछा कि क्यों हंस रही हो? तो मैंने कहा कि तुम बात ही ओलंपिक की कर रहे हो मुझे तो पसीने आते हैं टीवी पर देखकर. तो इन्होंने कहा कि तुम नहीं कर सकती लेकिन मैं तुमसे करवा दूंगा.

मैं उस वक्त इतनी ताक़तवर नहीं थी लेकिन वो (मेरे पति) उस वक्त तैयार थे ये करवाने के लिए.

शादी के बाद दो-तीन साल बहुत मुश्किल निकले. उनके पास एक प्लॉट था जो उन्होंने बेच दिया क्योंकि प्रोफ़ेशनल स्पोर्ट्स में खर्च आता है.

हॉकी कोच प्रीतम सिवाच का बयान

कोच प्रीतम सिवाच ने अपनी स्पोर्ट्स जर्नी पर क्या बताया

बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ द ईयर

प्रीतम जब आप खेली थीं कॉमनवेल्थ में तब आपका बेटा 7 महीने का था, तो अभी वो खेल रहा है या आपने कहा कि बैठ जा सिर्फ़ मैं ही खेलूंगी?- नॉरेस प्रीतम, खेल पत्रकार

प्रीतम सिवाच: मेरे दोनों बच्चे हॉकी इंडिया लीग में खेल रहे हैं और सोनीपत में, मैं जहां कोचिंग देती हूं वहां के 11 बच्चे भी खेल रहे हैं.

जैसा इन्होंने (सिमरन ने) भी बताया, हमारी बहुत मिलती-जुलती कहानी है.

सिमरन तो आज की हैं मेरी कहानी तो 20-25 साल पहले की है. बहुत मुश्किलें आई थीं. ये सब चीज़ें आती हैं, लेकिन हमें इससे लड़ना है.

लोगों को जागरूक करना है समाज में. ऐसे ही मैंने सोचा था कि टीम बनाऊं. जितना संघर्ष मैंने किया, उम्मीद करती हूँ लड़कियां न करें. मेरे अंदर भी जुनून था. अच्छी बात है कि अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित हो गई और द्रोणाचार्य भी मिल गया.

सोचा कि इतने साल खेले समाज को वापस देना चाहिए. तो मैं 20 साल से कोचिंग दे रही हूं. मैं इकलौती महिला हूं हॉकी में जिसे द्रोणाचार्य अवॉर्ड मिला है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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