भारत ने पैरालंपिक में ओलंपिक से ज़्यादा पदक कैसे जीते?

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- Author, जाह्नवी मुले
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
6 सितंबर, 2024 को भारत ने पेरिस पैरालंपिक में अपना 27वां पदक जीता. पैरालंपिक खेलों में ये देश का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.
ये भारतीय खेल प्रेमियों के लिए ख़ुशी और गर्व की बात है. लेकिन इसके साथ ही कई लोग इस सफलता से हैरान भी हैं.
ऐसा इसलिए क्योंकि पैरालंपिक खेलों के कुछ दिन पहले हुए ओलंपिक खेलों में भारत का प्रदर्शन इस तरह का नहीं था.
भारत ने 110 खिलाड़ियों का दल ओलंपिक खेलों के लिए भेजा था. इसके बावजूद भारत एक रजत और पांच कांस्य पदक यानी कुल 6 पदक ही जीत सका. इसके अलावा छह खिलाड़ियों ने चौथा स्थान हासिल किया था.
पैरालंपिक खेलों में भारत की तरफ़ से 84 खिलाड़ी गए थे और इन खिलाड़ियों ने ओलंपिक से चार गुणा ज़्यादा पदक हासिल किए हैं.
ये कहानी सिर्फ़ भारत की ही नहीं है. ब्रिटेन, यूक्रेन और नाइजीरिया जैसे देशों के साथ भी ऐसा ही हुआ है.


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ऐसे में कई लोग हैरान हैं कि कुछ देशों ने ओलंपिक के मुक़ाबले पैरालंपिक खेलों में बेहतर प्रदर्शन कैसे किया है?
वैसे तो ये जान लेना चाहिए कि दोनों इवेंट की तुलना सही नहीं होगी. क्योंकि दोनों ही इवेंट में प्रतियोगिताओं का स्तर अलग-अलग होता है. साथ ही इसमें हिस्सा लेने वाले खिलाड़ियों की मानसिक और शारीरिक क्षमता भी अलग-अलग होती है.
ऐसा कहा जाता है कि एक तरफ़ जहां ओलंपिक किसी खिलाड़ी के शारीरिक स्तर की परीक्षा होता है या एक इंसान का शरीर कितनी क्षमता रखता है उसका परीक्षण करता है.
वहीं पैरालंपिक, किसी शख़्स के दृढ़ संकल्प और साहस का परीक्षण करता है.
अब ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों में पदक हासिल करने में ऐसा अंतर क्यों है? इसके पीछे कई कारण हैं, साथ ही आंकड़े भी अपनी कहानी ख़ुद बयां करते हैं.

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मेडल ज़्यादा, कम्पटीशन कम
सबसे पहली बात तो ये है कि पैरालंपिक में ओलंपिक की तुलना में ज़्यादा मेडल दिए जाते हैं और कम देश इसमें हिस्सा लेते हैं.
पेरिस ओलंपिक में 204 टीमों ने कुल 32 खेलों में 329 स्वर्ण पदकों के लिए हिस्सा लिया. जबकि पैरालंपिक में 170 टीमें 22 खेलों में 549 स्वर्ण पदकों के लिए हिस्सा ले रही हैं.

ऐसे में स्वाभाविक तौर पर पैरालंपिक में पदक जीतने की संभावना अधिक होती है और जो देश दोनों में ही यानी पैरालंपिक और ओलंपिक में हिस्सा लेते हैं, उनके लिए पैरालंपिक में ज़्यादा पदक जीतने की संभावना होती है.
उदाहरण के तौर पर चीन को देखते हैं. टोक्यो ओलंपिक में चीन ने 89 पदक हासिल किए वहीं टोक्यो पैरालंपिक में चीन के खाते में 207 पदक आए.
ब्रिटेन ने टोक्यो ओलंपिक में 64 पदक तो दो हफ़्ते बाद हुए पैरालंपिक में 124 पदक हासिल किए थे.
भारत ने टोक्यो ओलंपिक में 7 पदक और पैरालंपिक में 19 पदक हासिल किए थे.
पेरिस में भी पदक तालिका में कुछ ऐसे ही रुझान दिख रहे हैं.
वहीं कुछ ऐसे देश हैं जो ओलंपिक की पदक तालिका में आगे थे और पैरालंपिक में पीछे नज़र आ रहे हैं, इन देशों में अमेरिका और जापान जैसे देश शामिल हैं.
लेकिन नाइजीरिया, यूक्रेन और भारत जैसे देशों ने पैरालंपिक में बेहतर प्रदर्शन किया है.
इसके पीछे ये कारण नज़र आ रहे हैं.
स्वास्थ्य सुविधाएं
कई स्टडीज़ से पता चला है कि ओलंपिक प्रदर्शन का सीधा संबंध किसी देश की जनसंख्या और जीडीपी से हो सकता है.
ऐसे में ये तो नहीं कहा जा सकता है कि अमीर देशों को सबसे ज़्यादा पदक मिलते हैं लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ओलंपिक की पदक तालिका में टॉप-10 में शामिल देश अपेक्षाकृत अमीर होते हैं.
पैरालंपिक के मामले में दो चीज़ें जो पैसे से ज़्यादा निर्णायक हैं वो हैं देश की स्वास्थ्य सुविधाएं और विकलांगता के प्रति रवैया.
कुछ लोग ये भी तर्क देते हैं कि यही वजह है कि पैरालंपिक में ब्रिटेन का प्रदर्शन अमेरिका की तुलना में बेहतर है.
भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं में असमानता है. लेकिन इसके बावजूद दुनिया के कई दूसरे देशों की तुलना में यहां तक कि अमेरिका की तुलना में भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं अपेक्षाकृत सस्ती हैं.
इसका मतलब ये है कि न केवल पैरा-एथलीट बल्कि भारत में किसी भी विकलांग व्यक्ति को ज़रूरी चिकित्सा उपचार मिलने की अधिक संभावना होती है.

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पैरा-स्पोर्ट्स कल्चर
चीन और ब्राज़ील की तरह ही भारत एक बड़ी आबादी वाला देश है, इसका मतलब है कि यहां पर अलग-अलग पैरा-खेलों के लिए खिलाड़ियों की भी बड़ी संख्या है. लेकिन बड़ी संख्या होने पर भी हर बार ऐसा नहीं होता कि प्रदर्शन बेहतर ही हो.
ये निर्भर करता है देश की संस्कृति पर कि वहां समाज में विकलांग लोगों के प्रति नज़रिया क्या है. भारत इसके लिए एक अच्छा उदाहरण है.
कई देशों में विकलांग लोगों को अपमानित किया जाता है या उनके साथ दया का व्यवहार दिखाया जाता है. वहां विकलांग खिलाड़ियों को खिलाड़ी तक नहीं माना जाता.
इस मामले में भारत कोई अपवाद नहीं था. लेकिन हाल के दिनों में सामाजिक स्तर पर और खेलों के नज़रिए से भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है.
ये कहा जा सकता है कि पैरालंपिक में भारत के प्रदर्शन में यही नज़रिया झलका है.
पिछले दो दशकों में पैरा-स्पोर्ट्स को लेकर जागरूकता बढ़ी है. इसलिए केंद्र और राज्य स्तर पर खिलाड़ियों के फंड में भी इज़ाफ़ा हुआ है.
2010 में देश में राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हुआ था, उसके बाद से खेल मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने वाले नियमित और पैरा-एथलीट खिलाड़ियों को दिए जाने वाले नक़द पुरस्कार की क़ीमत को बराबर कर दिया.
इस मामले में हरियाणा काफ़ी आगे है. हरियाणा सरकार ने पैरा-स्पोर्ट्स के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं.
इस बार जो 84 खिलाड़ियों की टीम पेरिस पैरालंपिक में हिस्सा लेने पहुंची थी, उसमें से 23 खिलाड़ी सिर्फ इसी राज्य से थे.
हरियाणा ने पैरा-एथलीटों को भारी पुरस्कार, सरकारी नौकरियां और सम्मान देकर इन खेलों को बढ़ावा दिया है और इससे आम लोगों के बीच पैरा-स्पोर्ट्स को प्रतिष्ठा मिली है.
सौरभ दुग्गल ने बीबीसी पंजाबी में छपे अपने एक लेख में बताया है कि कैसे कई राज्य पैरा-स्पोर्ट्स में हरियाणा के नक्शेकदम पर चल रहे हैं.

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खिलाड़ियों में जागरूकता
जैसे-जैसे देश में पैरा-स्पोर्ट्स की जागरूकता बढ़ रही है, ज़्यादा से ज़्यादा खिलाड़ी भी बढ़ रहे हैं.
व्हीलचेयर-क्रिकेटर राहुल रामगुड़े कहते हैं कि खिलाड़ियों की इसमें अहम भूमिका रही है.
वो कहते हैं, ''शारीरिक अक्षमताओं का सामना करने वाला शख़्स इससे बाहर आकर अपनी आज़ाद पहचान बनाने का इच्छुक होता है. वो कुछ करना चाहता है. अगर उन्हें खेलने का मौका दिया जाए तो वो अपना सब कुछ देने को तैयार होते हैं. इतना ही नहीं, अब तो कई पैरा-एथलीट खुद दूसरों की मदद और मार्गदर्शन के लिए आगे आ रहे हैं.''
राहुल और उनके साथी भी व्हीलचेयर क्रिकेट को देश में बढ़ावा देने के लिए काम करते हैं.
साथ ही पहचान का भी मुद्दा भी अहम है. दरअसल, पैरालंपिक के खिलाड़ी,ओलंपिक के खिलाड़ियों की तुलना में कम सुर्ख़ियों में रहते हैं. इसका मतलब ये है कि उनके ऊपर अपेक्षाओं का दबाव कम होता है.
लेकिन पैरा-खिलाड़ियों में ज़िंदगी में कुछ अलग करने और मेडल जीतने की भूख़ ज़्यादा होती है, जो उन्हें प्रेरित करती रहती है.

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अभी भी लंबा सफर बाकी है...
हालांकि, देश में पैरा-स्पोर्ट्स को लेकर नज़रिया बदला है लेकिन अब भी बहुत कुछ करना बाकी है, सब कुछ इतना आसान नहीं है और खिलाड़ियों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
राइफ़ल शूटर अवनि लेखरा ने टोक्यो और पेरिस दोनों पैरालंपिक इवेंट में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता है. लेकिन जिस रेंज में वो अभ्यास किया करती थीं, वहां लंबे समय तक व्हीलचेयर के लिए कोई रैंप या रास्ता ही नहीं था.
बाद में अवनि की कोशिशों के बाद यहां रैंप बनाया गया.
राहुल रामगुड़े कहते हैं कि ये कोई एक जगह की कहानी नहीं है, देश के कई स्टेडियम, प्रैक्टिस ग्राउंड, जिम यहां तक कि शौचालयों की हालत भी यही है.
अवनि की उपलब्धियों को बताते हुए यही बात भारतीय नेशनल शूटिंग कोच सुमा शिरूर ने भी कही थी.
सुमा ने कहा था, ''पेरिस के बाद, अवनि के सफर में अगला कदम ये था कि वो थोड़ा और आज़ाद तरीके से जी सकें. लेकिन हमारे देश में ये आसान नहीं है क्योंकि हमारे सिस्टम में चीज़ें पैरा-फ्रेंडली नहीं हैं, न ही हमारे पास सार्वजनिक स्थल हैं जो व्हीलचेयर-फ्रेंडली हों. इस तरह से ये कठिन है. लेकिन ज़िंदगी में वो और आज़ाद होना चाहेंगी.''
पैरालंपिक में भारत की सफलता से ये सबसे अहम सीख है. अगर देश को सफलता को बरकरार रखना है तो इस दिशा में लगातार काम करना होगा और खेलों तक पहुंच को अधिक सुलभ बनाना होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















