अवनि लेखरा: टोक्यो के बाद पेरिस में भी गोल्ड पर साधा निशाना

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अवनि लेखरा ने पेरिस पैरालंपिक में महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफ़ल स्टैंडिंग एस 1 स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीत लिया है.
अवनि आख़िरी राउंड से पहले कोरियाई शूटर युनरी ली से 0.8 से पिछड़ रही थीं. लेकिन कोरियाई शूटर का आखिरी शॉट सिर्फ़ 6.8 प्वाइंट हासिल कर सका. जबकि अवनि ने 10.5 का स्कोर किया.
इस शानदार प्रदर्शन के साथ अवनि ने कुल 249.7 प्वाइंट हासिल किया जबकि युनरी ली ने 246.8 प्वाइंट के साथ पिछड़ गईं.
अवनि ने लगातार दूसरे ओलंपिक में इस इवेंट में गोल्ड मेडल हासिल किया है. इससे पहले टोक्यो पैरालंपिक में उन्होंने इसी स्पर्धा का गोल्ड मेडल जीता था.
अवनि बीबीसी की इंडियन स्पोर्ट्स वुमन ऑफ़ द ईयर 2022 की नॉमिनी रह चुकी हैं.
'बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर' का मक़सद है भारतीय महिला खिलाड़ियों और उनकी उपलब्धियों को सम्मानित करना, महिला खिलाड़ियों की चुनौतियों पर चर्चा करना और उनकी सुनी-अनसुनी कहानियों को दुनिया के सामने लेकर आना.
टोक्यो ओलंपिक में करिश्मा करते हुए अवनि पैरालंपिक खेलों में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट बनीं थीं. उन्होंने पेरिस ओलंपिक में अपनी गोल्डन कामयाबी को दोहराया है.

दुर्घटना के बाद चैंपियन बनने की कहानी

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मूलतः जयपुर शहर की रहने वाली अवनि ने क़ानून की पढ़ाई की है. साल 2012 में एक कार दुर्घटना के बाद से वे स्पाइनल कॉर्ड (रीढ़ की हड्डी) से जुड़ी तकलीफ़ का सामना कर रही हैं.
इसके बाद वो व्हीलचेयर के सहारे ही चल पाती थीं लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और शूटिंग में अपनी किस्मत आज़माई जहां उन्होंने लगातार सफलताएं हासिल कीं.
साल 2015 में जयपुर शहर में ही शूटिंग से उनका जुड़ाव हुआ और जगतपुरा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में उन्होंने प्रैक्टिस शुरू की.
अवनि के पिता ये चाहते थे कि वो खेलों में दिलचस्पी लें. शुरू में अवनि ने शूटिंग और तीरंदाज़ी दोनों में ही हाथ आज़माया. उन्हें शूटिंग में ज़्यादा दिलचस्पी महसूस हुई. अभिनव बिंद्रा की किताब से उन्हें काफी प्रेरणा मिली और वो आगे बढ़ती गईं.
दिलचस्प ये है कि जयपुर के जिस शूटिंग रेंज पर वो जाती थीं वहाँ विकलांग खिलाड़ियों के लिए रैंप तक नहीं था. वो रैंप उन्होंने ख़ुद लगवाया.
शुरू-शुरू में उन्हें और उनके माता-पिता को ये भी नहीं मालूम था कि पैरा शूटर्स के लिए जो ख़ास किस्म के उपकरण चाहिए वो कैसे और कहाँ से मिलेंगे.
व्हीलचेयर ने अवनि को चलने-फिरने से भले रोक दिया हो लेकिन उनके सपनों की उड़ान को नहीं.
'सहानुभूति नहीं, अवसर चाहिए'

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साल 2020 में कोरोना महामारी को लेकर उन्होंने कहा था कि इस वजह से न केवल उनकी शूटिंग की ट्रेनिंग प्रभावित हुई थी बल्कि फिज़ियोथेरेपी के रूटीन सेशन पर कोरोना का असर पड़ा था.
तब उन्होंने कहा था, "स्पाइनल कॉर्ड की तकलीफ़ के कारण मैं कमर से नीचे के हिस्से में कुछ महसूस नहीं कर सकती हूं. लेकिन फिर भी मुझे हर दिन अपने पैर की कसरत करनी पड़ती है."
"मेरी एक फ़िजियोथेरेपिस्ट हुआ करती थीं जो हर रोज़ घर आकर मेरे पैर की एक्सरसाइज़ कराती थीं. मेरी फ़िजियोथेरेपिस्ट को जयपुर शहर पार करके मेरे पास आना होता था."
"उनके बाद मेरे अभिभावकों ने मेरी मदद की और वे जो कर सकते थे, उन्होंने किया. शूटिंग की ट्रेनिंग मैं घर पर नहीं कर सकती थी. मैंने बिना गोलियों की प्रैक्टिस शुरू की."
इस मुश्किल के बाद भी उन्होंने पहले टोक्यो ओलंपिक और फिर पेरिस ओलंपिक में गोल्ड मेडल हासिक कर इतिहास बनाया है.
अवनि ने बीबीसी से अपनी बातचीत में बताया था, "विकलांग खिलाड़ियों को किसी की सहानूभूति नहीं चाहिए. लोगों को लगता है कि हम व्हीलचेयर पर बैठकर खेलते हैं तो हमारे लिए आसान होता होगा. मैं बस ये कहना चाहती हूँ कि हम भी सामान्य खिलाड़ियों की तरह उतनी ही मेहनत करते हैं. हमें भी समान मौके मिलने चाहिए."
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