न्यूज़क्लिक मामला: भारत में प्रेस की आज़ादी को लेकर चिंता और सवाल, क्या पत्रकार हैं 'सॉफ़्ट टारगेट'?

    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बीते मंगलवार न्यूज़ पोर्टल 'न्यूज़क्लिक' से जुड़े पत्रकारों के घरों पर दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल की छापेमारी और दो लोगों की गिरफ़्तारी के बाद भारत में 'प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंता' फिर से उभर आई हैं.

बुधवार को न्यूज़क्लिक के संस्थापक और प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ और मानव संसाधन विभाग के प्रमुख अमित चक्रवर्ती को सात दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया. इन दोनों को ग़ैरक़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धाराओं के तहत गिरफ़्तार किया गया है.

यूएपीए एक आतंकवाद-विरोधी क़ानून है और इसके तहत गिरफ़्तारी होने पर ज़मानत मिलना बेहद मुश्किल है.

इस साल अगस्त में न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में न्यूज़क्लिक वेबसाइट पर आरोप लगाए गए थे कि चीन का प्रॉपेगैंडा फैलाने के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के क़रीबी और अमेरिकी करोड़पति ने उन्हें फंडिंग की.

न्यूयॉर्क टाइम्स बीबीसी हिंदी को दिए बयान में अपना पक्ष रखा है. अख़बार ने कहा है कि...

"स्वतंत्र पत्रकारिता करते हुए तथ्य आपका रास्ता तय करते हैं. हमारी जांच अंदरूनी दस्तावेज़ों, कॉरपोरेट एवं नॉनप्रोफिट टैक्स फाइलिंग से जुड़े कागज़ात, और श्री सिंघम से जुड़े समूहों के दो दर्जन से अधिक पूर्व कर्मचारियों के साक्षात्कारों पर आधारित थी. इस जांच में ये सामने आया कि वह (सिंघम) वो चीनी सरकार की मीडिया हितों के साथ निकटता से काम करते हैं और दुनिया भर में चीन के हित में प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए आर्थिक मदद देते हैं.

हालांकि, हमारी जांच इस समूह के चीनी हितों से जुड़े कुछ असहज करने वाले सच सामने ला सकती है लेकिन ये भी स्वीकार्य नहीं है कि कोई सरकार पत्रकारों की आवाज़ दबाने के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता का इस्तेमाल करे. हमें अपनी रिपोर्ट की सटीकता पर विश्वास है और हम अपनी रिपोर्ट पर अडिग हैं."

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और दिल्ली पुलिस का इकोनॉमिक ऑफेंसिस विंग पहले से ही न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच कर रहे थे. न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ ने इन मामलों में कार्रवाई के ख़िलाफ़ अदालत से अंतरिम रोक प्राप्त कर ली थी.

तो इस बात की भी चर्चा हो रही है कि क्या न्यूज़क्लिक से जुड़े पत्रकारों के ख़िलाफ़ यूएपीए की धाराएं इसीलिए लगाई गई हैं ताकि गिरफ़्तारी के बाद वो ज़मानत पर आसानी से छूट न सकें?

यूएपीए को लेकर चिंता

न्यूज़क्लिक मामले में यूएपीए की धाराएं लगाने पर भारतीय मीडिया जगत में हलचल है.

एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छपने की शर्त पर कहा, "यूएपीए जैसे कठोर क़ानून होने ही नहीं चाहिए थे. ये ऐसे क़ानून थे जिनका इस्तेमाल हर सरकार ने किया है और कुछ सरकारों ने इनका इस्तेमाल दूसरों की तुलना में ज़यादा किया है. आपको अपने ही देश में अपने नागरिकों के ख़िलाफ़ इतने सारे कानूनों की ज़रुरत क्यों है? आतंकवादियों, जबरन वसूली करने वालों, हत्यारों, या राज्य के दुश्मनों से निपटने के लिए हमारे पास देश में पर्याप्त क़ानून हैं. तो आपको कठोर क़ानून क्यों लाते रहना पड़ता है?"

कई पत्रकारों का कहना है कि जिस वक़्त यूएपीए क़ानून लाया गया था उस वक़्त सिविल सोसाइटी इसे लेकर चिंतित थी और पत्रकार इसके ख़िलाफ़ लिख रहे थे.

"हम जानते थे कि इन क़ानूनों का इस्तेमाल निर्दोषों के ख़िलाफ़ किया जा सकता है. इन क़ानूनों का इस्तेमाल अक्सर आतंकवादियों पर नहीं बल्कि आम लोगों पर किया जाता है क्योंकि आतंकवादियों से निपटने के लिए पहले से ही पर्याप्त क़ानून मौजूद हैं. इन क़ानूनों का इस्तेमाल सरकारें हमेशा अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ करती हैं."

एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक़, "सभी सरकारें संदेशवाहक को नियंत्रित करना पसंद करती हैं. कुछ इसे अधिक क्रूरता के साथ करते हैं, कुछ कम क्रूरता से. लेकिन कोई भी सरकार आलोचना या स्वतंत्र मीडिया को पसंद नहीं करती, भले ही वे खुद को लोकतंत्र कहती हो. मीडिया का गला घोंट दिया गया है और वह खुद का गला घोंटने की इजाज़त दे रही है. दोनों ही बातें हैं. अगर हम नहीं उठे और हम खड़े नहीं हुए तो ये और भी बदतर हो जायेगा. चाहे सत्ता में कोई भी हो, यह बदतर होता जाएगा."

वरिष्ठ पत्रकार ज्योति मल्होत्रा कहती हैं कि अगर पत्रकार ग़लत हैं और अगर सरकार को लगता है कि उन्होंने कोई खबर ठीक से नहीं की तो सरकार को उस ख़बर का खंडन करना चाहिए. "लेकिन आतंकवाद विरोधी क़ानून के तहत पत्रकारों को बंद करना सरासर गलत है."

वो कहती हैं, "मोदी सरकार पत्रकारों को गिरफ़्तार करना और डरना चाहती है. और हम ये पूछना चाहते हैं कि क्या वजह है कि आप पत्रकारों को आतंकवाद-विरोधी क़ानून के तहत बंद कर रहे हैं. क्या भारत में पत्रकार अब आतंकवादी बन गए हैं? और अगर सरकार हमें आतंकवादी समझती है तो हमें ये बताये कि हमने क्या ऐसा लिखा है जिससे आपको लगता है कि हम आतंकवादी बन गए हैं."

ज्योति मल्होत्रा के मुताबिक़ प्रेस के साथ इस तरह का सुलूक नहीं किया जा सकता.

वे कहती हैं, "एक तरफ तो आप इमरजेंसी की बात करके प्रेस की आज़ादी के लिए हमेशा खड़े रहने की बात करते हैं, दूसरी तरफ आप इस तरह की गिरफ्तारियां करते हैं."

वो कहती हैं कि संविधान में जो बुनियादी मौलिक अधिकार हैं उनमें से एक मौलिक अधिकार अभिव्यक्ति की आज़ादी है और भारत के नागरिकों को पत्रकारों के साथ जुड़ जाना चाहिए. अपनी आवाज़ उठानी चाहिए और कहना चाहिए कि ये जो हो रहा है वो ग़लत हो रहा है.

'मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिश'

ख़बरों के मुताबिक न्यूज़क्लिक से जुड़े कुल 46 लोगों से दिल्ली-एनसीआर और मुंबई में 50 से अधिक जगहों पर पूछताछ की गई और उनके डिजिटल उपकरणों को ज़ब्त कर लिए गए. न्यूज़क्लिक के दिल्ली स्थित कार्यालय को भी सील कर दिया गया है.

ये कहा जा रहा है कि मंगलवार को की गई पुलिस कार्रवाई 17 अगस्त को ईडी के इनपुट के आधार पर दर्ज की गई एक एफआईआर पर आधारित थी जिसमें न्यूज़क्लिक पर अमेरिका के रास्ते चीन से अवैध धन हासिल करने का आरोप लगाया गया था.

न्यूज़क्लिक पर हुई पुलिस की कार्रवाई पर भारत के मीडिया जगत से कड़ी प्रतिक्रियाएं आई हैं.

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक बयान जारी कर चिंता जताई और कहा कि "ये छापे मीडिया पर लगाम लगाने की एक और कोशिश है".

गिल्ड ने कहा, "हालाँकि हम मानते हैं कि अगर वास्तविक अपराध हुए हैं तो क़ानून को अपना काम करना चाहिए लेकिन उचित प्रक्रिया का पालन करना होगा. विशिष्ट अपराधों की जांच में कठोर क़ानूनों की छाया के तहत डराने-धमकाने का माहौल नहीं बनना चाहिए, न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति और आलोचनात्मक आवाज़ों को उठाने पर रोक लगनी चाहिए."

एडिटर्स गिल्ड ने ये भी कहा कि "हम सरकार को एक सक्रिय लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया के महत्व की याद दिलाते हैं, और यह सुनिश्चित करने का आग्रह करते हैं कि चौथे स्तंभ का सम्मान, पोषण और सुरक्षा की जाए".

'सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकार निशाने पर'

इसी तरह फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स (एफएमपी) ने एक बयान में कहा कि हालाँकि सरकार का चुनिंदा पत्रकारों और मीडिया संगठनों को परेशान करने का रिकॉर्ड है लेकिन मंगलवार को "जिस मनमानी और अपारदर्शी तरीके से छापे मारे गए" वह भारत में मीडिया की स्वतंत्रता की स्थिति को गंभीर बनाता है.

एफएमपी ने कहा, "इस संबंध में कठोर यूएपीए को लागू करने से पहले से कहीं अधिक भयावह प्रभाव पड़ेगा. इसके अलावा सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों और प्रेस संगठनों को चुनिंदा तरीके से निशाना बनाना उस देश पर ख़राब असर डालता है जो "लोकतंत्र की जननी" होने का दावा करता है."

साथ ही एफएमपी ने ये भी कहा कि सरकार संवैधानिक और नैतिक रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि उसके कार्यों से भय का माहौल न बने जो मीडिया को सत्ता के सामने सच बोलने से रोकता है.

डिजीपब न्यूज़ इंडिया फाउंडेशन ने अपने बयान में कहा कि न्यूज़ प्रोफेशनल्स और टिप्पणीकारों के ख़िलाफ़ पुलिस की यह समन्वित कार्रवाई स्पष्ट रूप से उचित प्रक्रिया और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है.

डिजीपब ने कहा,"इसने सरकार के मनमाने और डराने-धमकाने वाले व्यवहार को एक अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया है. भारत प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर अन्य रैंकिंग में नीचे की ओर जा रहा है और मीडिया के खिलाफ भारत सरकार का युद्ध दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर एक धब्बा है."

प्रेस की आज़ादी: भारत की लगातार गिरती साख

वैश्विक मीडिया निगरानी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की मई 2023 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक़ विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की रैंकिंग 180 देशों में से 161वें स्थान पर खिसक गई. साल 2002 में भारत इस लिस्ट में 150वें पायदान पर था.

आरएसएफ ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत में सभी मुख्यधारा मीडिया अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़रीबी अमीर व्यापारियों के स्वामित्व में हैं.

रिपोर्ट में कहा गया था कि "मोदी के पास समर्थकों की एक फौज है जो सरकार की आलोचना करने वाली सभी ऑनलाइन रिपोर्टिंग पर नज़र रखते हैं और स्रोतों के ख़िलाफ़ भयानक उत्पीड़न अभियान चलाते हैं". आरएसएफ रिपोर्ट ने कहा था, "अत्याधिक दबाव के इन दो रूपों के बीच फंसकर कई पत्रकार, व्यवहार में, ख़ुद को सेंसर करने के लिए मजबूर होते हैं".

कार्रवाई पर क्यों उठे सवाल?

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई का कहना है कि पत्रकार सॉफ़्ट टारगेट (जिन पर निशाना लगाना आसान हो) हैं, खासतौर पर वे जो छोटे न्यूज़ पोर्टल्स से आते हैं. "उनके पास वह सुरक्षा नहीं है जो बड़े संगठनों में मौजूद लोगों के पास है."

इंडिया टुडे चैनल पर एक चर्चा के दौरान सरदेसाई ने कहा कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के बयान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि क़ानून की उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए लेकिन सरकार को पत्रकारों को आपराधिक रूप से डराने-धमकाने के लिए कठोर कानूनों का उपयोग नहीं करना चाहिए.

सरदेसाई ने कहा, "कोई यह नहीं कह रहा कि पत्रकार क़ानून से ऊपर हैं. लेकिन साथ ही आपको यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जब आप जाते हैं और पत्रकारों पर छापा मारते हैं और उन्हें हिरासत में लेते हैं, तो आप यूएपीए जैसे आपराधिक क़ानूनों का इस्तेमाल किसी विच हंट के लिए नहीं कर रहे हैं."

उन्होंने कहा कि अगर विच हंट की जा रही है तो आगे चलकर भयावह प्रभाव हो सकते हैं.

सरदेसाई के मुताबिक़, "अगर न्यूज़क्लिक के लिए काम करने वाले जूनियर कर्मचारियों को सिर्फ इसलिए हिरासत में लिया जा रहा है क्योंकि आप मानते हैं कि न्यूज़क्लिक को चीनी धन मिल रहा है, तो यह एक बहुत ही ख़तरनाक मिसाल कायम कर रहा है. इससे बिल्कुल गलत संदेश जा रहा है. और ऐसे समय में जब प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक की बात आती है तो भारत काफ़ी निचले पायदान पर है. कुछ गंभीर सवाल हैं जिनका जवाब सरकार को देना ही होगा. आप क़ानून की प्रक्रिया का पालन करना चाहते हैं, कृपया करें. लेकिन कृपया इसे आपके पास मौजूद ठोस जानकारी पर करें और उस जानकारी को सार्वजनिक डोमेन में डालें."

राजदीप सरदेसाई ने कहा कि न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ मनी लॉन्डरिंग का मामला 2021 से चल रहा है. "और अब आप एक पीएमएलए को अधिक कठोर और ख़तरनाक यूएपीए में बदल रहे हैं."

डिजिटल उपकरणों की ज़ब्ती को लेकर चिंताएं

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़ न्यूज़क्लिक से जुड़े जिन 46 लोगों से पूछताछ की गई है उन सभी के डिजिटल उपकरणों को ज़ब्त कर लिया गया है.

फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स के मुताबिक़ ये बात परेशान करने वाली है कि पत्रकारों के डेटा और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को मनमाने तरीक़े से ज़ब्त किया गया और उन्हें क्लोन प्रतियां, हैश वैल्यू और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी गई जो साक्ष्यों की अखंडता सुनिश्चित करने और पत्रकारों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी हैं.

पिछले साल फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स ने पत्रकारों के डिजिटल उपकरणों को खंगालने और ज़ब्त करने के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. उनका कहना था कि इन उपकरणों में निजी डेटा होता है और उन्हें ज़ब्त कर लेना निजता के अधिकार के ख़िलाफ़ है.

डिजिपब का कहना है कि शीर्ष अदालत ने मौलिक अधिकारों के अनुरूप तलाशी और ज़ब्ती के लिए क़ानून और दिशानिर्देश की मांग वाली याचिका के बारे में केंद्र को सूचित किया है. ये मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

'आज़ाद मीडिया लोकतंत्र के लिए ज़रूरी'

पिछले कुछ वर्षों में 'दैनिक भास्कर', 'न्यूज़लांड्री', 'द कश्मीर वाला' और 'द वायर' जैसे मीडिया संगठनों पर सरकारी एजेंसियों की छापेमारी के बाद ये बात लगातार उठती रही है कि क्या भारत में लोकतंत्र का दमन हो रहा है.

विपक्षी राजनीतिक पार्टियों के हाल में बने इंडिया गठबंधन का कहना है कि सरकार और उसके विचारधारा से जुड़े संगठनों दोनों ने सत्ता के सामने सच बोलने वाले व्यक्तिगत पत्रकारों के खिलाफ प्रतिशोध का सहारा लिया है.

एक बयान में इंडियागठबंधन ने कहा, "भाजपा सरकार की बलपूर्वक कार्रवाइयां हमेशा केवल उन मीडिया संगठनों और पत्रकारों के खिलाफ होती हैं जो सत्ता के सामने सच बोलते हैं. विडंबना यह है कि जब देश में नफरत और विभाजन को भड़काने वाले पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने की बात आती है तो भाजपा सरकार पंगु हो जाती है."

मंगलवार को न्यूज़क्लिक पर हुई कार्रवाई के बाद कांग्रेस पार्टी ने कहा, "पीएम मोदी डरे हुए हैं, घबराए हुए हैं. खासतौर से उन लोगों से जो उनकी विफलताओं पर, उनकी नाकामियों पर उनसे सवाल पूछते हैं. वो विपक्ष के नेता हों या फिर पत्रकार, सच बोलने वालों को प्रताड़ित किया जाएगा. आज फिर से पत्रकारों पर छापेमारी इसी बात का प्रमाण है.

एक वरिष्ठ पत्रकार ने हमसे नाम न छपने की शर्त पर बात की.

उन्होंने कहा, "अगर हम कहते हैं कि हम एक लोकतंत्र हैं तो एक आज़ाद मीडिया इस बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है. अगर आप मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना चाहते हैं, आलोचना पसंद नहीं करते हैं और लगातार मीडिया को कटघरे में खड़ा करते हैं तो आपको लोकतंत्र पर भी एक नज़र डालनी होगी और देखना होगा कि क्या लोकतंत्र उसी तरह काम कर रहा है जैसा उसे करना चाहिए."

इस पत्रकार के मुताबिक़ मीडिया की भी नैतिक जिम्मेदारियां हैं और "हम न तो अपनी ज़िम्मेदारियाँ दिखा रहे हैं और न ही हमें वह आज़ादी मिल रही है जिसकी हमें ज़रूरत है".

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि भारत में मीडिया का एक वर्ग ज़िम्मेदारी से काम नहीं कर रहा. और मीडिया का एक वर्ग ऐसा भी है जिसकी लगातार आलोचना हो रही है. तो हम थोड़ी उलझन में हैं."

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