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सुदर्शन न्यूज़: सिविल सेवा में मुसलमानों की भर्ती वाले प्रोग्राम पर दिल्ली हाई कोर्ट ने लगाई रोक
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक हिंदी टीवी न्यूज़ चैनल पर सिविल सेवाओं में मुसलमानों के चयन पर सवाल उठाने वाले एक कार्यक्रम के प्रसारण पर रोक लगा दी है.
दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश नवीन चावला ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस कार्यक्रम के प्रसारण के ख़िलाफ़ स्टे ऑर्डर जारी कर दिया.
अदालत में सुनवाई के दौरान केंद्रीय सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय ने कहा कि उन्हें सुदर्शन न्यूज़ पार 28 अगस्त को रात आठ बजे प्रसारित होने वाले प्रोग्राम के बारे में कई शिकायतें मिली हैं और मंत्रालय ने न्यूज़ चैनल को नोटिस जारी कर इसपर जवाब माँगा है.
इस पर अदालत ने कहा कि अगली सुनवाई (सात सितंबर) तक कार्यक्रम बिंदास बोल के प्रसारण पर रोक लगाई जाती है.
हालाँकि आदेश आने के बाद चैनल के एडिटर सुरेश चव्हानके ने कहा कि उन्हें कोई नोटिस नहीं मिली है और प्रोग्राम पहले से तय कार्यक्रम के तहत रात आठ बजे प्रसारित किया जाएगा.
हालाँकि बाद में उन्होंने दावा किया कि प्रोग्राम से कुछ मिनट पहले उन्हें आदेश की कॉपी मिल गई है इसलिए वो इसका प्रसारण स्थगित कर रहे हैं.
इस कार्यक्रम का टीज़र आने के बाद कई नौकरशाहों और उनके संगठनों ने इसपर आपत्ति जताते हुए इसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की थी.
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश की सराहना करते हुए ट्वीट किया है कि 'उच्च अदालतें अब सुप्रीम कोर्ट को रास्ता दिखा रही हैं.
क्या है मामला
सुदर्शन न्यूज़ नाम के इस न्यूज़ चैनल ने मंगलवार को एक टीज़र जारी किया था जिसमें चैनल के संपादक ने ये दावा किया था कि 28 अगस्त को प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम में 'कार्यपालिका के सबसे बड़े पदों पर मुस्लिम घुसपैठ का पर्दाफ़ाश' किया जाएगा.
टीज़र आने बाद से ही सोशल मीडिया पर इसे लेकर आलोचना शुरू हो गई थी. गुरूवार को भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के संगठन ने इसकी निंदा करते हुए इसे 'ग़ैर-ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता' क़रार दिया.
पुलिस सुधार को लेकर काम करने वाले एक स्वतंत्र थिंक टैंक इंडियन पुलिस फ़ाउंडेशन ने भी इसे 'अल्पसंख्यक उम्मीदवारों के आईएएस और आईपीएस बनने के बारे में एक हेट स्टोरी' क़रार देते हुए उम्मीद जताई थी कि ब्रॉडस्काटिंग स्टैंडर्ड ऑथोरिटी, यूपी पुलिस और संबंद्ध सरकारी संस्थाएँ इसके विरूद्ध सख़्त कार्रवाई करेंगे.
हालाँकि, सुदर्शन न्यूज़ के संपादक सुरेश चव्हानके ने आईपीएस एसोसिएशन की प्रतिक्रिया पर अफ़सोस जताते हुए कहा कि 'उन्होंने बिना मुद्दे को समझे इसे कुछ और रूप दे दिया है'. उन्होंने संगठन को इस कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण दिया था.
राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला ने इस कार्यक्रम के बारे में दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी.
पूनावाला ने साथ ही इस बारे में न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन (एनबीए) के अध्यक्ष रजत शर्मा को एक पत्र लिख उनसे इस कार्यक्रम का प्रसारण रूकवाने और सुदर्शन न्यूज़ तथा इसके संपादक के विरूद्ध क़ानूनी कार्रवाई करने का अनुरोध किया था.
दिल्ली की जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के शिक्षकों के संगठन ने भी एक बयान जारी कर यूनिवर्सिटी प्रशासन से इस बारे में अवमानना का मामला दायर करवाने का अनुरोध किया था.
आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने की आलोचना
छत्तीसगढ़ के आईपीएस अधिकारी आरके विज ने इस कार्यक्रम के टीज़र पर प्रतिक्रिया करते हुए इसे 'घृणित' और 'निंदनीय' बताया और कहा कि वो इस बारे में 'क़ानूनी विकल्पों पर ग़ौर कर रहे हैं'.
छत्तीसगढ़ काडर के आईएएस अधिकारी अवनीश शरण ने भी इस शो पर प्रतिक्रिया करते हुए लिखा कि 'इसे बनाने वाले से इस कथित पर्दाफ़ाश के स्रोत और उसकी विश्वसनीयता के बारे में पूछा जाना चाहिए'.
पुड्डुचेरी में तैनान आईपीएस अधिकारी निहारिका भट्ट ने लिखा, "धर्म के आधार पर अफ़सरों की निष्ठा पर सवाल उठाना ना केवल हास्यापस्द है बल्कि इसपर सख़्त क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. हम सब पहले भारतीय हैं."
हरियाणा के आईएएस अधिकारी प्रभजोत सिंह ने लिखा, "पुलिस इस शख़्स को गिरफ़्तार क्यों नहीं करती और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट या अल्पसंख्यक आयोग या यूपीएससी इस पर स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेते? ट्विटर इंडिया कृपया कार्रवाई करे और इस एकाउंट को सस्पेंड करे. ये हेट स्पीच है."
बिहार में पूर्णिया के ज़िलाधिकारी राहुल कुमार ने लिखा, "ये बोलने की आज़ादी नहीं है. ये ज़हर है और संवैधानिक संस्थाओं की आत्मा के विरूद्ध है. मैं ट्विटर इंडिया से इस एकाउंट के विरूद्ध कार्रवाई करने का अनुरोध करता हूँ."
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी एनआईए में कार्यरत आईपीएस अधिकारी राकेश बलवल ने लिखा, "हम सिविल सेवा अधिकारियों के लिए एकमात्र पहचान जो कोई अर्थ रखती है, वो है भारत का राष्ट्र ध्वज."
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