उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत: परिसीमन से किसे फ़ायदा, किसे नुक़सान? समझिए पूरी बात

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दक्षिण भारत के पांच राज्यों- आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और तमिलनाडु में लोकसभा की कुल 129 सीटें हैं. जबकि उत्तर भारत के सिर्फ़ दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में मिलाकर 120 लोकसभा सीटें है.
लोकसभा सीटों की 'असमानता' का यह मुद्दा दक्षिण भारत की राजनीति में नया नहीं है. लेकिन जैसे-जैसे साल 2026 क़रीब आ रहा है, दक्षिण भारत के नेता केंद्र सरकार पर 'भेदभाव' का आरोप लगाते हुए हमलावर हैं. बुधवार को इन आरोपों पर केंद्र गृह मंत्री अमित शाह ने बयान दिया.
अमित शाह ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में कहा, "मोदी सरकार ने लोकसभा में स्पष्ट किया है कि परिसीमन के बाद प्रो-रेटा (आनुपातिक आधार) के हिसाब से दक्षिण के एक भी राज्य का एक भी सीट (लोकसभा) कम नहीं होगा."
इस दौरान अमित शाह के निशाने पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन थे.
25 फ़रवरी को तमिलनाडु मंत्रिमंडल की बैठक हुई. इसके बाद सीएम स्टालिन ने मीडिया को संबोधित किया था.
"परिसीमन के नाम पर दक्षिण के राज्यों के ऊपर तलवार लटक रही है", मीडिया से बातचीत में ये स्टालिन के शुरुआती शब्द थे. उनका कहना था परिसीमन राजनीतिक चाल है और इससे संसद में दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा.
स्टालिन ने कहा, "अगर देश भर में मौजूदा आबादी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का बंटवारा किया जाए तो ऐसी स्थिति होगी कि तमिलनाडु को 8 लोकसभा सीटें गंवानी पड़ेंगी. इसका मतलब है कि तमिलनाडु में अब 39 सांसद नहीं रहेंगे. वहां सिर्फ़ 31 सांसद रह जाएंगे."
अब स्टालिन ने पांच मार्च को राज्य की राजनीतिक पार्टियों की सर्वदलीय बैठक बुलाई है.
तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के अन्नामलाई ने इसे सीएम स्टालिन का ड्रामा बताया है. मीडिया से बातचीत में अन्नामलाई ने कहा, "स्टालिन जी हर दिन एक नया झूठ बोलते हैं. सर्वदलीय बैठक बुलाकर एमके स्टालिन ड्रामा कर रहे हैं. किसने कहा कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होगा?"

दक्षिण भारत के राज्यों की चिंताएं
राष्ट्रीय स्तर पर जब भी परिसीमन की चर्चा होती है तो राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या और जनसंख्या का ज़िक्र होता है. आख़िरी बार साल 2011 में जनगणना हुई थी. हर दस साल पर होने वाली जनगणना 2021 में होनी थी लेकिन इसे लगातार टाला जा रहा है.
अपने भाषण में अमित शाह ने कहा है कि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण आनुपातिक आधार (प्रो रेटा) पर किया जाएगा और सीटों की बढ़ोत्तरी में दक्षिणी के राज्यों को उचित हिस्सा मिलेगा.
प्रो रेटा या आनुपातिक आधार शब्द का इस्तेमाल किसी भी चीज़ के समान वितरण के लिए किया जाता है.
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने गृह मंत्री के आश्वासन को भ्रमित करने वाला बताया है.
डीएमके सांसद ए. राजा ने कहा, "इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया है कि आनुपातिक आधार (प्रो रेटा) मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या पर होगा या जनसंख्या के आधार पर. अगर संसद सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी है तो यह संसद सदस्यों की वर्तमान संख्या के आधार पर होनी चाहिए."
ए. राजा की बात को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने भी दोहराया है.
तमिलनाडु समेत दक्षिण के राज्यों की शिकायत रहती है कि उन्हें केंद्र सरकार की जनसंख्या नियंत्रण नीति को सही से लागू करने और आकांक्षित लक्ष्यों को हासिल करने की 'सज़ा' दी जाती है.
कर्नाटक में कांग्रेस नेता और मंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा, "अगर सिर्फ़ जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है तो दक्षिण के लोगों को अच्छे नागरिक होने की सज़ा दी जाएगी."
संविधान के अनुच्छेद 81(2) में कहा गया है कि किसी राज्य की जनसंख्या और उस राज्य के संसद सदस्यों की संख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों के लिए समान होगा. इसलिए अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में ज़्यादा सांसद हैं और कम जनसंख्या वाले राज्यों में कम सांसद हैं.
भारत में की गई आख़िरी जनगणना 2011 के मुताबिक़, केवल पांच राज्य - उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश - मिलकर भारत की आधी जनसंख्या या 48.6 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं.
इसलिए, यदि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई जाएं तो भारत की आधी लोकसभा सीटें इन पांच राज्यों में होंगी. इन राज्यों की तुलना में दक्षिण के राज्य सीटों के लिहाज से पीछे रहेंगे क्योंकि वहां जनसंख्या कम है.
पिछले साल अक्तूबर में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के सदस्य और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने राज्य की घटती प्रजनन दर को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी और लोगों से ज़्यादा बच्चा पैदा करने की बात कही थी.
इसके दो दिन बाद तमिलनाडु के सीएम एम के स्टालिन भी ये पूछने लगे कि हमें 16 बच्चे पैदा करने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए?
तब इन दोनों नेताओं के बयानों को आगामी परिसीमन से जोड़कर देखा गया था.

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अभी परिसीमन की चर्चा क्यों?
परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसे हर बार जनगणना के बाद किया जाता है. जनगणना के बाद ही पता चलता है कि निर्वाचन क्षेत्र की आबादी कितनी है और इसके आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों (लोकसभा और विधानसभा) में बदलाव किया जाता है.
इसके लिए परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है. अब तक भारत में चार बार- 1952, 1963, 1973 और 2002 में आयोग का गठन किया जा चुका है.
इस आयोग को संविधान द्वारा शक्तियां और स्वायत्तता प्रदान की गई हैं. उनके लिए गए निर्णयों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.
1952 में कुल 489 लोकसभा सीटें थीं और 1973 में सीटों की संख्या 543 हो गई. साल 1976 में इंदिरा गांधी ने 42वें संशोधन के ज़रिए परिसीमन पर 25 साल के लिए रोक लगा दी थी.
इसके बाद 2001 में जनगणना हुई और 2002 में परिसीमन आयोग का गठन हुआ. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 84वां संशोधन कर इस 25 साल के लिए टाल दिया था.
भारतीय निर्वाचन आयोग की वेबसाइट के अनुसार, साल 2001 के संविधान संशोधन के अनुसार लोकसभा सदस्यों की संख्या 2026 के बाद ही बढ़ाई जा सकती है.
अगर जनगणना हमेशा की तरह होती तो 2026 के बाद अगली जनगणना 2031 में आयोजित की जाती.
चूंकि 2021 में जनगणना नहीं हुई, इसलिए संभावना है कि जनगणना 2026 के बाद की जा सकती है और उसके आधार पर अगले कुछ सालों में निर्वाचन क्षेत्रों का पुनः निर्धारण किया जा सकता है.

परिसीमन से किसे फ़ायदा या नुक़सान?
अतीत में कुछ मौक़ों पर संसद में सीटों की संख्या बढ़ने के संकेत मिले हैं.
जब नए संसद भवन की घोषणा की थी तब कहा गया था कि भविष्य को ध्यान में रखते हुए, नई संसद का निर्माण अतिरिक्त सीटों के साथ किया जाएगा. इसलिए लोकसभा में 888 सीटें और राज्य सभा में 384 सीटों की व्यवस्था की गई है.
भारतीय संसद के नए भवन का उद्घाटन समारोह 28 मई, 2023 को आयोजित किया गया. तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, "भविष्य में हम संसद की कुल सीटों और सांसदों की संख्या में वृद्धि देखेंगे. इसलिए, नई संसद का निर्माण समय की मांग थी."
2019 में शोधकर्ता मिलन वैष्णव और जेमी हिंटसन ने 'भारत में प्रतिनिधित्व का उभरता संकट' शीर्षक से एक लेख लिखा था.
इस लेख में बताया गया था कि अगर लोकसभा सीटों की संख्या नहीं बदलती है तो 2026 में तमिलनाडु में 31 सीटें, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मिलाकर 34 सीटें और केरल में 12 सीटें होंगी. इसके उलट उत्तर प्रदेश में 91 सीटें, बिहार में 50 सीटें, राजस्थान में 31 सीटें और मध्य प्रदेश में 33 सीटें होंगी.
इसका मतलब यह है कि मौजूदा सीटों की तुलना में जहां दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल को 24 सीटों का नुक़सान होगा. वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान को कुल मिलाकर 31 सीटें ज़्यादा मिलेंगी.
लेख के मुताबिक़, अगर सीटों की संख्या जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में बांटी जाती है तो लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़कर 848 हो जाएगी.
इसके बाद उत्तर प्रदेश में 143, बिहार में 79, मध्य प्रदेश में 52 और पश्चिम बंगाल में 60 सीटें होंगी. वहीं, तमिलनाडु में 49, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 54 और केरल में 20 सीटें होंगी.
यानी जनसंख्या के आधार पर दक्षिण के राज्यों में सीटें बढ़ेंगी लेकिन उत्तर भारत की तुलना में ये आधी से भी कम होंगी.

क्या है समाधान?
साल 2022 में पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी 'द हिंदू' के लिए लिखे लेख में परिसीमन की चुनौतियों और समाधान का ज़िक्र किया है.
गोपाल कृष्ण गांधी का कहना है कि फिलहाल भारत के सामने दो विकल्प हैं.
पहला: हम एक बार फिर जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में आगे बढ़ें. इस बार किसी निश्चित अवधि तक नहीं बल्कि तब तक जब सभी राज्य जनसंख्या स्थिरीकरण हासिल नहीं कर लेते.
दूसरा: विशेषज्ञों की मदद से यूरोपीय संसद के लिए गणितीय रूप से तैयार 'कैंब्रिज कॉम्प्रोमाइज' की तर्ज पर एक मॉडल तैयार करें. हालांकि, यह विकल्प पूरी तरह से भारत पर लागू नहीं हो सकता है लेकिन इसका अध्ययन किया जा सकता है.
भारत की परिस्थितियों को देखते हुए गांधी पहले वाले विकल्प को ज़्यादा प्रभावी मानते हैं.
नॉर्थ वर्सेस साउथ: इंडियाज ग्रेट डिवाइड किताब के लेखक नीलकांतन आर. एस. का कहना है कि फिलहाल इस समस्या का कोई समाधान नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में नीलकांतन कहते हैं, "अगर हम निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या अपरिवर्तित रखते हैं, तो उत्तरी राज्यों से यह कहने जैसा होगा कि 'अपनी गलतियों का फल भोगो'. यदि हम जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़ाते हैं, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा. इसलिए इस समस्या का कोई समाधान नहीं है."
नीलकांतन का मानना है कि इस मुद्दे को अलग तरीके से देखा जाना चाहिए. उनका कहना है, "केंद्र सरकार की शक्तियों में भारी कटौती की जानी चाहिए. ज़्यादातर फ़ैसले राज्य और पंचायत स्तर पर लिए जाने चाहिए. तभी केंद्रीकृत शक्ति का महत्व कम होगा. मौजूदा माहौल में ऐसा करना ही स्थायी समाधान हो सकता है."
हालांकि, संविधान में फिलहाल जनसंख्या के अनुपात में निर्वाचन क्षेत्र का प्रावधान है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















