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निमिषा प्रिया की मौत की सज़ा का दिन टलवाने वाले मौलवी कौन हैं?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
यमन में भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की मौत की सज़ा के दिन को टाल दिया गया है. इस ख़बर के सामने आने के बाद 94 साल के कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार के नाम की चर्चा है.
निमिषा प्रिया को मौत की सज़ा से बचाने के लिए ज़रूरी है कि यमनी शख़्स तलाल अब्दो महदी का परिवार उन्हें माफ़ कर दे. निमिषा, तलाल अब्दो महदी की हत्या की दोषी क़रार दी गई हैं.
निमिषा प्रिया को बचाने के अभियान में लगी 'सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल एक्शन काउंसिल' ने मंगलवार को बताया था कि सोमवार, 14 जुलाई को केरल के बेहद सम्मानित और प्रभावशाली मुस्लिम धर्मगुरु माने जाने वाले ग्रैंड मुफ़्ती एपी अबूबकर मुसलियार ने 'यमन के कुछ शेख़ों' से निमिषा प्रिया मामले को लेकर बात की.
सुप्रीम कोर्ट के वकील और काउंसिल के सदस्य सुभाष चंद्रा ने बीबीसी हिंदी को बताया था, "सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल एक्शन काउंसिल के सदस्यों ने ग्रैंड मुफ़्ती से मुलाक़ात की थी, जिसके बाद उन्होंने वहां (यमन) कुछ प्रभावशाली शेख़ों से बात की."
चंद्रा ने कहा, "हमें बताया गया है कि एक बैठक बुलाई गई है जिसमें मृतक के कुछ रिश्तेदारों सहित प्रभावशाली लोग भी मौजूद रहेंगे."
16 जुलाई को निमिषा प्रिया को मौत की सज़ा दी जानी थी और सिर्फ़ 48 घंटे पहले कंथापुरम या मुसलियार के दख़ल से पीड़ित परिवार से बातचीत में गति आई है.
कौन हैं मुसलियार?
मुसलियार को अनौपचारिक तौर पर भारत के 'ग्रैंड मुफ़्ती' की उपाधि भी दी गई है, उनको सुन्नी सूफ़ीवाद और शिक्षा में योगदान के लिए जाना जाता है. हालांकि महिलाओं पर दिए गए उनके बयानों की भी कई बार निंदा हो चुकी है.
केरल यूनिवर्सिटी के इस्लामिक हिस्ट्री के प्रोफ़ेसर अशरफ़ कडक्कल बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "अपने अनुयायियों के बीच उनकी बहुत इज़्ज़त है. कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि उनके पास जादुई शक्तियां हैं."
"वह बरेलवी संप्रदाय से आते हैं. सूफ़ी सम्मेलन में उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मानित कर चुके हैं. लेकिन महिलाओं को लेकर उनके रवैये की बेहद आलोचना होती रही है."
सांस्कृतिक और राजनीतिक विश्लेषक शाहजहां मदापत बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "आपने पूछा कि उन्हें क्या चीज़ एक ताक़तवर नेता बनाती है. मेरा जवाब है कि अगर भारत में कोई भी चंद्रास्वामी से मुक़ाबला कर सकता है तो वह यह आदमी हैं. वह भी उसी तरह हैं. राजनीतिक और सामाजिक तौर पर बेहद अच्छी तरह जुड़े हुए हैं. वह एक पूरे खिलाड़ी हैं."
शाहजहां मदापत ने जिन तांत्रिक चंद्रास्वामी का ज़िक्र किया उनकी 90 के दशक में भारतीय राजनेताओं के बीच तूती बोलती थी. उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव के बहुत क़रीब माना जाता था. इस वजह से उस दौर में चंद्रास्वामी का रुतबा काफ़ी ऊँचा था. कई राजनेता उनके दरबार में हाज़िरी लगाने जाते थे.
निमिषा प्रिया के मामले में उनके दख़ल के बावजूद महिलाओं को लेकर उनके विचारों की चर्चाएं हैं. लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर ख़दीजा मुमताज़ उनकी तारीफ़ करते हुए बीबीसी हिंदी से कहती हैं, "जब सारी कोशिशें नाकाम हो गईं तो वह उनके लिए कुछ कर सके. मुझे इस बात की ख़ुशी हुई."
मुसलियार ने आख़िर क्या किया?
मुसलियार ने अपनी पुरानी दोस्ती और यमन में सूफ़ी परंपरा 'बा अलावी तरीक़ा' के प्रमुख शेख़ हबीब उमर बिन हाफ़िज़ के साथ पुराने संपर्क का इस्तेमाल तलाल महदी के परिवार से जुड़ने में किया.
शेख़ हबीब उमर यमन में स्थित धार्मिक संस्था 'दार उल मुस्तफ़ा' के संस्थापक हैं, जहां केरल समेत दुनियाभर से लोग पढ़ने आते हैं. शेख़ हबीब उमर युद्ध में शामिल समूहों के साथ-साथ यमन के सभी गुटों या समूहों के साथ बेहद अच्छे से जुड़े हुए हैं.
मुसलियार के प्रवक्ता ने बीबीसी हिंदी से कहा, "उनका यह हस्तक्षेप पूरी तरह से मानवीय आधार पर था. उन्होंने उन्हें सिर्फ़ यह बताया कि शरिया क़ानून में ऐसा प्रावधान है कि ब्लड मनी देकर इंसान को बिना शर्त माफ़ी दी जा सकती है. उनकी कोशिशें बीते शुक्रवार से शुरू हुई थीं."
मुसलियार से बात नहीं हो सकी है.
शेख़ हबीब उमर केरल आ चुके हैं जब वह मलप्पुरम में नॉलेज सिटी की एक मस्जिद और मादीन सादात अकेडमी के उद्घाटन में शामिल हुए थे. नॉलेज सिटी को मुसलियार के बेटे ने स्थापित किया है.
मौलवी मुसलियार कैसे चर्चित हुए?
इस्लामिक हलकों में मुसलियार तब चर्चा में आए जब उन्होंने 1926 में बनी सुन्नी संस्था 'समस्त केरल जमायतुल उलेमा' से अलग होकर नया रास्ता चुना. 1986 तक यह संस्था एकजुट रही, लेकिन फिर विचारधारा में मतभेद उभरने लगे.
प्रोफ़ेसर अशरफ़ बताते हैं, "मुसलियार उस कट्टरपंथी सलफ़ी आंदोलन के ख़िलाफ़ थे, जो मानता था कि मुसलमानों को अंग्रेज़ी नहीं सीखनी चाहिए क्योंकि यह 'नरक की भाषा' है या मलयालम इसलिए नहीं सीखनी चाहिए क्योंकि यह 'नायर समुदाय की भाषा' है. वे महिलाओं की शिक्षा के भी ख़िलाफ़ थे. मुसलियार ने इन सबके ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाया."
उन्होंने विदेशों से आए चंदे से शिक्षण संस्थानों को बनाने पर ध्यान केंद्रित किया. अशरफ़ कहते हैं, "कम से कम 40 फ़ीसदी सुन्नी मुसलमान मुसलियार के साथ खड़े रहे. पारंपरिक रूप से सुन्नी संगठन इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के साथ था, जो यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट का हिस्सा है. लेकिन मुसलियार ने 'दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है' वाली नीति अपनाई और सीपीएम का समर्थन किया. इस वजह से लोग उन्हें 'अरिवल सुन्नी' कहने लगे. मलयालम में हंसिया को अरिवल कहते हैं, जो सीपीएम का चुनाव चिह्न है."
वह एपी सुन्नी गुट के समस्त केरल जमायतुल उलेमा के महासचिव हैं.
प्रोफ़ेसर अशरफ़ की तरह ही शाहजहां मदापत शिक्षण संस्थानों को बनाने में उनके योगदान को स्वीकार करते हैं.
शाहजहां कहते हैं, "केरल में उनकी बड़ी फ़ॉलोइंग है क्योंकि वह बेहतरीन आयोजक हैं, लेकिन महिलाओं और इंटर-इस्लामिक कोऑपरेशन को लेकर उनके विचार बेहद पुराने हैं. उन्होंने एक बार कहा था कि सलफ़ी हलक़े के शख़्स से तो सलाम भी नहीं करना चाहिए."
महिलाओं पर विवादित बयान
मुसलमानों के लिए एक से अधिक पत्नी रखने को ज़रूरी बताने वाले उनके बयान की डॉक्टर मुमताज़ निंदा करती हैं.
वह कहती हैं, "उन्होंने कहा था कि पुरुषों की दूसरी पत्नी होनी चाहिए ताकि पहली पत्नी के पीरियड्स के दौरान पुरुष अपनी ज़रूरतों को पूरा कर सकें. उनके महिलाओं पर ऐसे चिंताजनक विचार हैं. हमें उनकी आलोचना करनी ही पड़ी. उनकी टिप्पणियां बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं."
इन सबके बावजूद डॉक्टर मुमताज़ कहती हैं कि "हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि उन्होंने निमिषा प्रिया के मामले में अपने व्यापक संपर्कों का इस्तेमाल किया, बिना यह देखे कि वह ग़ैर-मुस्लिम हैं."
इसके साथ ही मौलवी मुसलियार ने 26/11 मुंबई हमलों के बाद मुसलमानों के एक बड़े महासम्मेलन को आयोजित करने में भी सक्रिय भूमिका निभाई. इस महासम्मेलन का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को यह संदेश देना था कि "आतंकवाद इस्लाम में हराम है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.