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केरल में मदरसा टीचर को मिली 187 साल की सज़ा, क्या है वजह?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से बीबीसी हिंदी के लिए
केरल में कन्नूर की एक पोक्सो अदालत ने एक मदरसा टीचर को 13 साल की किशोरी पर यौन हमले के आरोप में 187 साल की सज़ा सुनाई है.
ये मामला 2020 से 2022 के बीच का है, जब भारत कोविड महामारी से गुज़र रहा था.
इस छात्रा से बार-बार रेप का मामला तब सामने आया जब 41 वर्षीय अभियुक्त मुहम्मद रफ़ी पहले से ही 2018 में दस साल की एक और बच्ची पर किए गए यौन हमले के आरोप में जेल की सज़ा काट रहा था.
केरल में मदरसा टीचर को मिली इतनी लंबी सज़ा चर्चा का विषय बनी हुई है.
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क्यों मिली इतनी लंबी सज़ा
मदरसा टीचर को जिस मामले में 187 साल की सज़ा सुनाई गई है उस पर बात करते हुए सरकारी वकील शेरिमोल जोस ने बीबीसी हिंदी को बताया, '' जब इस बच्ची पर यौन हमला हुआ था उस वक़्त वो 13 साल की थी. उस दौरान छात्रा के माता-पिता ने उसके व्यवहार में बदलाव देखा था. वो पढ़ाई में पिछड़ रही थी. माता-पिता उसे काउंसलर के पास ले गए. वहां उसने बताया कि टीचर ने उस पर यौन हमला किया है.''
शेरिमोल जोस से जब पूछा गया कि टीचर को इतनी लंबी सज़ा क्यों सुनाई गई तो उन्होंने कहा, '' इतनी लंबी सज़ा इसलिए सुनाई गई है क्योंकि उन्होंने ये अपराध एक से अधिक बार किया है.''
शेरिमोल जोस ने इतनी लंबी सज़ा के बारे में समझाते हुए बताया -
- पोक्सो एक्ट के सेक्शन 5 (टी) के तहत पचास साल की जेल और पांच लाख रुपये जुर्माने की सज़ा दी गई है. इस एक्ट के तहत नाबालिगों पर 'पैनेट्रेटिव यौन हमले' में सज़ा दी जाती है.
- पोक्सो एक्ट के सेक्शन 5 (एफ) के तहत (टीचर के तौर पर भरोसा तोड़ने के लिए) 35 साल की जेल और एक लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई गई. सेक्शन 5 (एल) के तहत दोबारा यौन हमला करने के आरोप में भी 35 साल के जेल की सज़ा और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है.
- पोक्सो कानून के सेक्शन 3 (ए) के तहत और सेक्शन 3 (डी) ( ओरल सेक्स) के तहत 20-20 साल की जेल और 50-50 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई गई है.
- आईपीसी की धारा 376 (3) ( 16 साल से कम उम्र की लड़की के साथ रेप) के तहत 25 साल की जेल और एक लाख रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई गई है.
- दो साल की सज़ा आईपीसी की धारा 506 (2) (आपराधिक धमकी) के तहत सुनाई गई है.
शेरिमोल जोस ने कहा,'' ये सारी सज़ा एक साथ चलेगी. इसका मतलब ये हुआ कि रफ़ी को 50 साल तक जेल में रहना होगा.''
क्या है पूरा मामला?
जोस ने कहा कि रफ़ी छात्रा को धमकी देकर अपने क्लासरूम से लगे दूसरे क्लासरूम में ले जाते थे और वहां उसके साथ रेप करते थे. उन्होंने कहा कि इसका मतलब ये कि कोविड के दौरान गैर अधिकृत तौर पर क्लासरूम में पढ़ाई कराई जा रही थी.
जोस ने बताया कि नाबालिग छात्राओं पर यौन हमला करने के वक़्त रफ़ी शादीशुदा थे.
उन्होंने कहा,'' इन घटनाओं के बाद रफ़ी की पत्नी ने उनसे तलाक ले लिया.''
रफ़ी इस फ़ैसले को चुनौती देंगे या नहीं उस पर उनके वकील से कोई टिप्पणी नहीं मिल सकी है.
उनके ख़िलाफ़ ये फैसला कन्नूर ज़िले के तालिपाराम्बा के फास्ट ट्रैक के कोर्ट के जज आर राजेश ने सुनाया है.
बीबीसी हिंदी ने बचाव पक्ष के वकील से मैसेज और फोन के जरिये संपर्क किया था. लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया है. जवाब आने पर उसे इस स्टोरी में जोड़ा जाएगा.
इतनी लंबी सज़ा पर क़ानूनी विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
वैसे 187 साल की लंबी सज़ा ने क़ानूनी मामलों से जुड़े विशेषज्ञों और वकीलों को अचरज में डाल दिया है क्योंकि भारतीय क़ानून (आईपीसी और भारतीय न्याय संहिता) में इतनी लंबी सज़ा का प्रावधान नहीं है.
इस मामले में बात करते हुए कर्नाटक के पूर्व सरकारी वकील बीटी वेंकटेश ने बीबीसी हिंदी को बताया,'' आमतौर पर रेप और दोबारा इस अपराध को करने वालों को ताउम्र जेल की सज़ा मिलती है. कोर्ट ऐसे अपराधियों को मौत की सज़ा भी दे सकता है. लेकिन भारत अमेरिका नहीं है. अमेरिका में किसी व्यक्ति को उसके जीवनकाल से भी ज्यादा सजा देने की परंपरा है.''
उत्तरी मालाबार का ये दूसरा मामला है जब अपराधी को साधारण उम्र कैद और उसके बाद के जीवन के लिए भी सज़ा दी गई है.
इससे पहले एक पोक्सो अदालत ने एक पादरी रोबिन वडाक्कमचेरी ( 48 साल) को 60 साल की सज़ा सुनाई थी.
पादरी ने 2016 में एक 16 साल की लड़की के साथ रेप किया था जब वो चर्च के लिए डेटा एंट्री कर रही थीं. ये स्कूल वायनाड जिले के एक चर्च की ओर से चलाया जा रहा था. बाद में उस लड़की ने एक स्थानीय अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया था.
रेप सर्वाइवर ने वयस्क होने पर एक याचिका दायर कर रोबिन से शादी की अनुमति मांगी थी. तब तक रोबिन चर्च से हटा दिए गए थे. उसकी याचिका रोबिन की याचिका के बाद दायर की गई थी. रोबिन ने इसमें लड़की से शादी करने की इच्छा जताई थी.
ये आवेदन इसलिए दिया गया था क्योंकि बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलाने के समय में पिता के नाम की जरूरत थी. लड़की भी चाहती थी कि पादरी की सज़ा निलंबित कर दी जाए ताकि वो उनके साथ शादी कर सके.
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा लेकिन उसने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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