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'काला रंग ख़ूबसूरत है' - केरल की ब्यूरोक्रेट की पोस्ट से छिड़ी बहस, क्या है मामला?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, बेंगलुरु से
स्किन कलर को लेकर भेदभाव का सामना करने के बारे में केरल की मुख्य सचिव सारदा मुरलीधरन के अप्रत्याशित बयान पर चारों ओर हैरानी व्यक्त की जा रही है.
इस बारे में सोशल मीडिया पर की गई अपनी पोस्ट को उन्होंने पहले तो डिलीट कर दिया था पर बाद में फिर से री-पोस्ट किया.
लोगों को सबसे ज़्यादा हैरानी ये हो रही है कि एक शीर्ष अधिकारी को भी स्किन कलर को लेकर भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
मुरलीधरन ने अपनी पोस्ट में लिखा, "मुख्य सचिव के रूप में अपने कार्यकाल पर कल मैंने एक दिलचस्प टिप्पणी सुनी कि यह कार्यकाल उतना ही काला था जितना मेरे पति का सफ़ेद. हम्म्म! मुझे अपने कालेपन को स्वीकार करने की ज़रूरत है."
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1990 बैच की अफ़सर मुरलीधरन ने सितंबर 2024 में राज्य की मुख्य सचिव का कार्यभार संभाला था. उनसे पहले इस पद पर उनके पति वी. वेणु थे.
मुरलीधरन को ग़रीबी उन्मूलन और महिला सशक्तिकरण, आजीविका मिशन, ग्राम पंचायत विकास योजनाओं, अनुसूचित जाति विकास, ग्रामीण विकास और उच्च शिक्षा से जुड़ी परियोजनाओं को लागू करने में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए जाना जाता है.
वह नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ैशन टेक्नोलॉजी की डायरेक्टर जनरल भी रही हैं.
एक वरिष्ठ टिप्पणीकार एमजी राधाकृष्णन ने बीबीसी हिंदी से कहा, "उन्हें बहुत रेडिकल विचारों या मुखर टिप्पणियों के लिए नहीं जाना जाता है. वह आम तौर पर बहुत अनुशासित और मृदुभाषी हैं. यह कुछ ऐसा है जिससे उन्हें बहुत गहरे तौर पर धक्का लगा है. किसी ने सफ़ेद (क़ाबिलियत से जोड़कर) बनाम काला (नाक़ाबिलियत से जोड़कर) के विशेषण का इस्तेमाल किया. इससे उन्हें वाक़ई धक्का पहुंचा होगा."
सारदा मुरलीधरन ने क्या लिखा है
पहले अपनी पोस्ट को डिलीट करने के बाद फिर से री-पोस्ट करते हुए सारदा मुरलीधरन ने लिखाः
"मुख्य सचिव के रूप में कार्यकाल पर कल मैंने एक दिलचस्प टिप्पणी सुनी कि यह (कार्यकाल) उतना ही काला था जितना मेरे पति का सफ़ेद. हम्म्म! मुझे अपने कालेपन को स्वीकार करने की ज़रूरत है.
यही पोस्ट मैंने आज सुबह लिखी थी और फिर इसे डिलीट कर दिया क्योंकि प्रतिक्रियाओं की झड़ी से मैं घबरा गई थी. मैं इसे फिर से री-पोस्ट कर रही हूं क्योंकि कुछ शुभचिंतकों ने कहा कि कुछ ऐसी बातें हैं जिन पर चर्चा की जानी चाहिए. मैं सहमत हूं. तो चलिए फिर से बात करते हैं.
मैं इस ख़ास बात को क्यों कहना चाहती थी? मैं आहत हुई थी, हां. लेकिन पिछले सात महीनों में मेरे पूर्ववर्ती (जोकि उनके पति भी हैं) के साथ तुलना का सिलसिला लगातार जारी रहा और मैं इसकी काफ़ी आदी हो चुकी हूँ.
यह काले होने का लेबल चस्पा किए जाने के बारे में था (जिसमें महिला होने की बात छिपी हुई थी), जैसे कि यह कोई शर्म की बात हो... काला सिर्फ़ एक रंग नहीं है, बल्कि काला कभी अच्छा नहीं करता, काला एक वर्ग से जुड़ी समस्या है, एक हृदयहीन निरंकुशता है, गहरा अंधकार है.
लेकिन काले रंग को क्यों बदनाम किया जाना चाहिए? काला रंग ब्रह्मांड का सर्वव्यापी सत्य है. काला रंग ऐसा है जो किसी भी चीज़ को अवशोषित कर सकता है और मानव सभ्यता के लिए ज्ञात ऊर्जा का सबसे शक्तिशाली प्रवाह है. यह ऐसा रंग है जो हर जगह काम करता है, ऑफ़िस में ड्रेस कोड हो, शाम को पहनने वाले कपड़े की चमक हो, काजल का सार हो, बारिश का वादा हो.
जब मैं चार साल की थी, मैंने अपनी मां से पूछा था कि क्या वह मुझे फिर से गर्भ में रख सकती हैं और काले से गोरा और खूबसूरत बना सकती हैं?
मैंने 50 सालों से इस नैरेटिव के नीचे दबा हुआ जीवन बिताया कि काला न होना अच्छा होता है. और इस नैरेटिव को मानती रही कि काले रंग में सुंदरता या मूल्य नहीं है, कि गोरी चमड़ी आकर्षित करती है. और बढ़िया दिमाग, वह सबकुछ जो बढ़िया है, अच्छा और संपूर्ण है, वह गोरे रंग से संबंधित है. और यह अहसास कि मैं वैसा न होने से कुछ कमतर थी- जिसकी भरपाई किसी न किसी तरह करनी थी.
अपने बचपन तक यही मानती रही. अपनी ब्लैक विरासत का महिमांडन किसने किया. किसने वहां सुंदरता देखी, जहां मुझे नहीं दिखती थी. किसने सोचा कि काला, शानदार रंग था. किसने मुझे यह देखने में मदद की...
कि काला रंग सुंदर है.
कि काला रंग भव्य है.
कि मैं काले रंग को पसंद करती हूं."
इस पोस्ट पर चर्चा होने के बाद सारदा मुरलीधरन ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया कि स्किन कलर पर उनकी टिप्पणी असल में मजाहिया लहज़े में की गई थी.
उन्होंने एएनआई को बताया, "काले रंग के साथ क्या दिक़्कत है? क्या यह सच्चाई न होकर महज़ धारणा अधिक नहीं है? यह स्वीकार करना अहम है कि कालापन ऐसी चीज है जो मूल्यवान और सुंदर है. मुझे लगता है कि यह मेरे लिए सबसे सही समय है कि मैं इसे लेकर रक्षात्मक महसूस न करूं कि मैं एक महिला हूं या मैं ब्लैक हूं. समय आ गया है कि मैं इन दोनों चीजों को स्वीकार करूं और मजबूती के साथ सामने आऊं."
"मेरे मजबूती से आने से हो सकता है कि यह उन लोगों के लिए मददगार हो जो असुरक्षा और अक्षमता के ऐसे ही अहसास से गुजर रहे हों, ताकि वे महसूस कर सकें कि हमारा मूल्य है और हमें किसी बाहरी मान्यता की ज़रूरत नहीं है."
पोस्ट पर कैसी प्रतिक्रियाएं आईं
मुरलीधरन की सोशल मीडिया पोस्ट पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं.
कर्नाटक के एडिशनल चीफ़ सेक्रेटरी के रूप में रिटायर हुए के जयराज ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मैंने अपने पूरे करियर में इस तरह की कोई बात ना देखी और ना सुनी है. यह एक अपवाद है. उनका कुछ अलग अनुभव रहा होगा."
लेकिन रंग और कई अन्य कारणों को लेकर भेदभाव आज भी समाज की सच्चाई बना हुआ है.
'फ़ीयरलेस फ्रीडम' क़िताब की लेखिका और नारीवादी कार्यकर्ता कविता कृष्णन ने बीबीसी दिनभर पॉडकास्ट में इस मुद्दे पर बात की.
उन्होंने कहा, "भारत में रंग के मुद्दे का संबंध अंग्रेज़ों या आज़ादी से नहीं बल्कि जाति से ज़्यादा है. ये माना जाता है कि जिनका रंग ज़्यादा काला है, काले की तरफ़ है, वो एक तरह से मेहनत करने वाला वर्ग है. उसमें जो सबसे उत्पीड़ित लोग हैं, दलित हैं, उनका रंग वैसा होता है और जो अभिजात वर्ग है उसका रंग सफ़ेद होता है."
"ख़ासकर महिलाओं को उनके रंग के हिसाब से देखा जाना, ये चलता आ रहा है और ये सामान्य है. इसके ख़िलाफ़ समाज में जो आंदोलन होना चाहिए था, वो नहीं हुआ है."
कविता कृष्णन के मुताबिक़ ये भेदभाव महिलाओं की आपस में जो एकता है उसको तोड़ने के लिए है.
उन्होंने कहा, "ये संदेश दिया जाता है कि अगर आपका रंग सफ़ेद है तो आपको ज़्यादा प्रिविलेज मिलेगी, रंग सफ़ेद करने के लिए आप फ़ेयरनेस क्रीम लगाइये. जब मैं युवा थी तब टीवी में विज्ञापन दिखता था जिसमें एक युवा लड़की को रिसेप्शनिस्ट की नौकरी नहीं मिल रही थी क्योंकि उसका रंग साफ़ नहीं था."
"ये व्यक्ति के भीतर एक आत्मविश्वास की कमी पैदा करता है, आप ख़ुद को टुकड़ों में बंटा महसूस करते हैं. कमतर महसूस कराने का ये तरीका है, अगर रंग नहीं तो कुछ और है. शरीर की बनावट या फिर बालों या वज़न के आधार पर अलग नज़रिए से देखा जाता है. इस सबके पीछे महिलाओं को चीज़ की तरह देखने की सोच है और ये ऐसे हावी हो जाती है कि महिलाएं भी ख़ुद को एक चीज़ के रूप में ही देखने लगती है."
क्या यह उनके रंग से जुड़ा कोई मुद्दा है या इस पर इसलिए सबसे अधिक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है कि वह एक महिला हैं और बहुत से लोग महिला बॉस को पसंद नहीं करते.
तिरुवअनंतपुरम में सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट स्टडीज़ में फ़ेमिनिस्ट रिसर्चर और प्रोफ़ेसर जे. देविका से बीबीसी हिंदी ने यही सवाल किया.
वो कहती हैं, "दोनों ही बात हो सकती है. दोनों के साथ धारणाएं जुड़ी हैं. काले रंग की महिलाओं को कम सक्षम माना जाता है. जबकि गोरे पुरुषों को अधिक सक्षम माना जाता है."
लेकिन देविका यह भी कहती हैं, "अगर आप वाक़ई ब्लैक की गरिमा देखना चाहते हैं, तो आप आशा वर्करों के संघर्ष स्थल पर तिरुअनंतपुरम आएं. आप केरल की उन कोविड वॉरियर्स के चेहरे देखें. सूरज की रोशनी में झुलसे हुए, धूल भरी आंधी से सूखे, पसीने से लथपथ लेकिन दृढ़ संकल्प से चमकते हुए उनके चेहरे देखिए. कोई लिपस्टिक नहीं, कोई मेकअप नहीं, कोई तड़क-भड़क नहीं. इस प्रदर्शन में रंगभेद उनकी चिंताओं से कोसो दूर दिखता है."
देविका केरल में आशा वर्करों के आंदोलन की ओर इशारा कर रही हैं.
गौरतलब है कि केरल में आशा कार्यकर्ता वेतन वृद्धि की मांग कर रही हैं. सरकार ने वादा किया था लेकिन अभी तक इसे पूरा नहीं किया है.
राधाकृष्णन ने देविका के साथ सहमति जताई कि जैसा खुद मुरलीधरन कहती हैं, "कलर सबसे आगे है और फिर वह एक महिला भी हैं. लेकिन यह भारतीय संस्कृति में कोई नई बात नहीं है. केरल इससे अलग नहीं है. गोरों का ग़ुलाम रहते हुए, हमने रंग को शक्ति, दबदबे, बर्चस्व और उस हर चीज़ से जोड़ा है जो अच्छा है. रंगभेद राष्ट्रीय धारणा है."
उन्होंने ये भी कहा, "आम तौर पर इस तरह के शीर्ष पद पर रहने वाला व्यक्ति इस पर बात नहीं करता. अगर आप ध्यान दें, तो पता चलेगा कि इस तरह के शीर्ष पदों पर रहने वाले अधिकांश लोग आम तौर पर ऊंची जाति से संबंधित होते हैं. यह बहुत कम होता है कि हम पिछड़े समुदायों या अल्पसंख्यकों से आने वाले लोगों को इन पदों पर देखें. अगर वे ऐसी बात करते भी हैं तो खुलकर नहीं करेंगे."
मुरलीधरन को जानने वाली मोहिनियट्टम नृत्यांगना नीना प्रसाद ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मैं उन्हें जानती हूं और मैं कुछ हद तक अधिकार से कह सकती है वह रंगभेद के बारे में खुद को लेकर बात नहीं कर रही हैं. वह भारतीय समाज की एक गहरी समस्या के मूल्यवान पहलू को उठा रही हैं. हमें नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने वंचित तबकों के बीच काम किया है. हम हमेशा एक महिला के रूप में उनकी सादगी और गरिमा के लिए उनका सम्मान करते हैं."
तिरुअनंतपुरम के सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर लिखा, "आवाज़ उठाने के लिए शाबाश, सारदा. और बहुत ख़ूबसूरती से लिखा गया!"
क्या इस पर कोई कार्रवाई हो सकती है?
नाम न ज़ाहिर करते हुए केरल के एक आईएएस अफ़सर ने बीबीसी हिंदी से कहा, "इस पोस्ट के पीछे क्या वजह थी, इस सवाल का जवाब ढूंढने की ज़रूरत है. क्या एक नागरिक होने या एक नौकरशाह होने के रूप में उनके अधिकारों का उल्लंघन हुआ? उन्हें इस बारे में बताना होगा. क्या यह हानिकारक टिप्पणी थी?"
एक अन्य अधिकारी ने कहा, "पोस्ट से ऐसा लगता है कि यह एक विचार है. हममें से कुछ लोग पोस्ट में की गई शिकायत को समझ पाने में अक्षम हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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