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फ़ेयर एंड लवली: त्वचा को नहीं, दुनिया को फ़ेयर बनाइएः नज़रिया
- Author, मनीषा पांडेय
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
"द वर्ल्ड इज़ नॉट फ़ेयर, यू बी फ़ेयर."
कुछ डेढ़ दशक पहले एक अंग्रेज़ी अख़बार में छपे एक पन्ने के फ़ेयरनेस क्रीम के विज्ञापन की ये टैगलाइन थी. एक अनफ़ेयर दुनिया में कम से कम आपकी त्वचा तो फ़ेयर हो ही सकती है.
दुनिया अनफ़ेयर हो और चमड़ी का रंग फ़ेयर न हो तो क्या होता है, ये हमने हाल में अमरीका के मिनिसोटा में होते देखा, जिसने दुनिया के सबसे ताक़तवर देश के रंगभेद और नस्लभेद की कलई खोल दी.
उस घटना के ठीक एक महीने बाद 25 जून को ब्रिटिश-डच मल्टीनेशनल कंपनी यूनीलीवर ने अपने स्किन केयर प्रोडक्ट्स में से फ़ेयर, फ़ेयरनेस, व्हाइट, व्हाइटनिंग, लाइट, लाइटनिंग जैसे शब्दों को हटाने का फ़ैसला किया है. कंपनी के इस फ़ैसने के बाद अब फ़ेयर एंड लवली क्रीम के नाम में से भी फ़ेयर शब्द हट जाएगा.
क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ है? क्रीम की टैगलाइन बदल रही है. अब बात त्वचा नहीं, दुनिया को थोड़ा और फ़ेयर बनाने की है.
चलिए अब थोड़ा अतीत में चलते हैं. सांवले लोगों के देश में गोरेपन की इस ख़ब्त का इतिहास कितना पुराना है. जितने साल इस देश को आज़ादी पाए हुए, उससे बस कुछ 27 साल कम हुए हमें अपनी चमड़ी को गोरा बनाने की क्रीम लगाते हुए.
आज से 45 साल पहले 1975 में हिंदुस्तान यूनीलीवर ने पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप की सांवली लड़कियों की त्वचा को गोरा बनाने का अचूक नुस्ख़ा बताकर फ़ेयर एंड लवली नाम की क्रीम बाज़ार में उतारी थी. तब से लेकर अब तक औरतों की जाने कितनी पीढ़ियां क्रीम लगाते जवान हुईं और उम्र की ढलान की ओर बढ़ चलीं, लेकिन उनका सांवला रंग नहीं बदला और न गोरे होने की उम्मीद.
हालांकि कंपनी ने अब भी उम्मीद बेचना बंद नहीं किया था. औरतों से आजिज़ आई तो मर्दों को भी गोरा बनाने की क्रीम बेचने लगी- फ़ेयर एंड हैंडसम. मानो फ़ेयर न हुआ तो हैंडसम ही क्या.
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बदलती सोच, बदलता बाज़ार
मर्दों का तो ख़ाली मुंह ही गोरा किया था, औरतों को बोला कि ये कांख के कालेपन के लिए भी क्रीम लगाओ, घुटने, कोहनी के कालेपन के लिए अलग क्रीम लगाओ, यहां तक कि प्राइवेट पार्ट तक को गोरा बनाने की क्रीम बाज़ार में आ गई.
45 साल से गोरापन बेच रही कंपनी नहीं बदली थी, हालांकि इस बीच कुछ और चीज़ें ज़रूर बदल गईं.
जैसे लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिल गया, विशाखा गाइडलाइंस आ गईं, औरतों के हक़-हुक़ूक़, बराबरी की बात करने वाले नए क़ानून आ गए. कॉलेज और दफ़्तरों का जेंडर अनुपात सुधरने लगा, बड़ी संख्या में लड़कियां नौकरी करने, पैसा कमाने और अपना घर बनाने लगीं.
इक्वल पे, विमेन राइट्स वगैरह रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दाल-भात की तरह इस्तेमाल होने वाले शब्द हो गए. और तो और, औरतों के हिस्से में इतनी आत्मनिर्भरता, इतना पैसा और इतना स्वाभिमान आया कि कुछ हिरोइनों ने फ़ेयरनेस क्रीम का विज्ञापन और उसके लिए मिल रहे दो करोड़ रुपए को भी लात मार दी.
कंपनी को तो 45 साल बाद समझ आया, इस देश की लड़कियों को पिछले एक दशक से ये बात कुछ-कुछ समझ आनी शुरू हो गई थी कि क्रीम लगाकर गोरा बनने से लड़की न पायलट बन जाती है, न रेस में अव्वल आती है. उसके लिए मेहनत करनी होती है.
हालांकि शादी के बाज़ार में आज भी गोरी लड़की की माँग टॉप पर है. अख़बारों में छपा शादी का हर विज्ञापन कुछ भी चाहने से पहले गोरी, सुंदर लड़की चाह रहा है, लेकिन सुकून की बात ये है कि ऐसा चाहने वाले मर्दों को अब लड़कियां चाहने से इनकार कर रही हैं.
और जब लड़कियां इतनी बदल रही हैं तो कंपनियां इतना तो बदल ही सकती हैं कि अपनी क्रीम से फ़ेयर जैसा अनफ़ेयर शब्द हटा दें. पता नहीं ये समझना टेढ़ा है या आसान कि बाज़ार लड़कियों को बदल रहा है या लड़कियां बाज़ार को.
महज़ एक दशक पहले जो विज्ञापन औरतों को पति की शर्ट में ज़्यादा सफ़ेदी लाने के नुस्ख़े बताते थे, अब पूछ रहे हैं, कपड़े धोना सिर्फ़ औरतों का काम क्यों है. टैगलाइन है- "शेयर द लोड."
नया बाज़ार
कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि अगर आप किसी पूंजीपति को लटकाना चाहें तो वो आपको रस्सी बेच देगा.
इसका इससे बेहतर उदाहरण क्या होगा कि कोरोना वायरस को पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लिए अभी चार महीना भी नहीं गुज़रा कि अमरीका के फ्लोरिडा में 'कोविड एसेंशियल स्टोर' भी खुल गया है. जल्द ही पूरी दुनिया के शॉपिंग मॉल्स में 'कोविड एसेंशियल' नाम का एक स्टोर होगा, जो दावा करेगा कि उसके पास हर वो चीज़ है, जो इस ख़तरनाक वायरस से हमारी रक्षा कर सकती है. और तो और, इस स्टोर में बिक रहे मास्क पर ये भी लिखा हुआ है- "ब्लैक लाइफ़ मैटर्स."
इसलिए ये मानना थोड़ा मुश्किल है कि पिछले 45 सालों से गोरे होने का भ्रम बेच रही कंपनी के लिए सांवलेपन की शर्म में घुल रही लड़कियों का जीवन सचमुच मायने रखता है. क्योंकि असली सवाल तो अब भी यही है कि क्या गोरा रंग हमेशा से हमारी इच्छा, हमारी ज़रूरत थी? क्या गोरे रंग वाली लड़किया हमेशा ही ज़्यादा प्यार पातीं, ज़्यादा आदर से देखी जाती थीं? ये सवाल इसलिए क्योंकि हमारे प्राचीन साहित्य की नायिका तो गोरी नहीं है.
वाल्मीकि रामायण में सीता के सौंदर्य का बखान करते हुए वाल्मीकि लिखते हैं कि वह श्याम वर्ण की है. कालिदास की तो समस्त नायिकाएं श्याम वर्णा रूपसी हैं, चाहे वह अभिज्ञान शाकुंतलम की शकुंतला हो या मेघदूत की यक्षिणी या कुमारसंभव की पार्वती. भवभूति के 'उत्तर रामचरित' की सीता का रंग भी सांवला है. वात्स्यायन के 'कामसू्त्र' की नायिकाएं सांवली देह वाली हैं.
सांवले रंग पर सवाल क्यों
फिर ये कब और कैसे हुआ कि सांवली नायिकाओं के देश में सांवली देह वाली लड़कियां शर्म और डर में डूब गईं?
ताराशंकर बंदोपाध्याय की कहानी की सांवली बहू की तरह तमाम सांवली स्त्रियों के हिस्से में अपमान और तिरस्कार आया. दरवाज़े से बारात इसलिए लौट गई कि दुल्हन सांवली थी.
मेडिकल कॉलेज में टॉप करने वाली लड़की ने फांसी लगाकर आत्महत्या इसलिए कर ली क्योंकि वो अपने सांवले रंग पर शर्मिंदा थी. हमारे पड़ोस में बड़ी बहन को देखने आए तिवारी जी उसकी 7 साल छोटी बहन को पसंद कर गए क्योंकि वो गोरी थी. उस घटना को 10 बरस हुए, सांवली बहन की अभी तक शादी नहीं हुई है.
सांवले लोगों के देश में 45 साल से गोरा बनाने की क्रीम बेचने वाली कंपनियां अब तक यही शर्मिंदगी और अपमान बेच रही थीं. क्रीम लगाकर एक दिन गोरा हो जाने और फिर ज़्यादा प्यार, ज़्यादा इज़्ज़त, ज़्यादा सफलता पाने का भ्रम.
अच्छा है, यह भ्रम टूटा है. फ़ेयर शब्द हटाने जैसे एक छोटे से क़दम ने ये तो बता ही दिया कि ये बात कितनी अनफ़ेयर थी.
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