जब लुधियाना के कारोबारी ने वियना में फंसे यहूदियों को भारत में दी नई ज़िंदगी

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- Author, सुधा जी तिलक
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ के लिए
"मैं तुम्हें एक राज़ की बात बताती हूं. तुम्हारे नाना ने यहूदी परिवारों को नाज़ियों से बचाने में मदद की थी."
अपनी मां से ये सुनने के बाद विनय गुप्ता अपने नाना के अतीत की खोज में निकल पड़े. लेकिन जो कहानी सामने आई, वह कल्पना से कहीं ज़्यादा रोमांचक और प्रेरणादायक थी.
यह एक भारतीय व्यवसायी की बहादुरी की वह दास्तान थी, जिसे ज़्यादा लोग नहीं जानते. यूरोप के सबसे कठिन दौर में, इस भारतीय ने अजनबियों को बचाने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगा दी.
भारत लौटने के बाद, कुंदनलाल नाम के इस व्यक्ति ने यहूदियों को रोज़गार देने के लिए व्यवसाय शुरू किया और उनके लिए घर भी बनवाए.
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दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत के बाद ब्रिटिश शासन ने कुंदनलाल को 'दुश्मन' घोषित कर नजरबंद कर दिया था. लुधियाना के एक ग़रीब लड़के से लेकर यूरोप में यहूदी जान बचाने वाले कारोबारी तक उनका जीवन किसी महाकाव्य से कम नहीं था.
13 साल की उम्र में शादी, लकड़ी, नमक, बैलगाड़ी के पहिए और लैब उपकरण बेचने से लेकर कपड़ों और माचिस की फैक्ट्री तक का सफ़र तय करने वाले कुंदनलाल ने लाहौर में पढ़ाई की.
कुंदनलाल 22 साल की उम्र में कॉलोनियल सिविल सर्विस में भर्ती हुए. लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन और व्यवसाय में योगदान देने के लिए उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी.
उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से हाथ मिलाया और यूरोप जाते वक्त अभिनेत्री देविका रानी से भी मुलाकात की.
विनय गुप्ता ने 'अ रेस्क्यू इन वियना' नामक किताब में अपने नाना के इस साहसिक अभियान की कहानी दर्ज की है, जिसे पारिवारिक पत्रों और यहूदी सर्वाइवर्स के इंटरव्यू के ज़रिए लिखा गया है.
साल 1938 में ऑस्ट्रिया पर हिटलर के कब्जे के बाद कुंदनलाल ने कुछ यहूदियों को भारत में चुपचाप नौकरी की पेशकश की, ताकि उन्हें 'लाइफ सेविंग वीज़ा' मिल सके. उन्होंने इन परिवारों को रोज़गार दिया और भारत में उनके लिए घर बनवाए.
कुंदनलाल ने पाँच परिवारों को बचाया

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30 साल के यहूदी वकील फ्रिट्ज वाइस बीमारी का बहाना बनाकर वियना के एक अस्पताल में छिपे थे. उसी दौरान, अपनी बीमारी का इलाज कराने वहां पहुंचे भारतीय व्यवसायी कुंदनलाल से उनकी मुलाकात हुई.
नाज़ियों ने वाइस को अपने घर के बाहर सड़क साफ़ करने के लिए मजबूर किया था. इसके बाद कुंदनलाल ने उन्हें एक नई ज़िंदगी की राह दिखाई. उन्होंने वाइस को 'कुंदन एजेंसीज़' नाम की एक काल्पनिक कंपनी में नौकरी का प्रस्ताव दिया. इसके कारण उन्हें भारत का वीज़ा मिल गया.
अगले कुछ महीनों में वे और लोगों से मिले. कुंदनलाल ने अख़बारों में विज्ञापन देकर ऐसे कुशल कामगारों की तलाश शुरू की, जो भारत में बसने को तैयार हों. वाचस्लर, लॉश, शैफ्रानेक और रेटर जैसे लोगों ने उनका साथ दिया.
इसके बाद लकड़ी का काम करने वाले अल्फ्रेड वाचस्लर कुंदनलाल से मिले. वाचस्लर अपनी गर्भवती पत्नी को जांच के लिए अस्पताल लाए थे. कुंदनलाल ने उन्हें फर्नीचर उद्योग में भविष्य और भारत में बसने का वादा किया. जनवरी 1938 से फरवरी 1939 के बीच उनका परिवार भारत पहुंचने वाले पहले यहूदी परिवारों में शामिल था.
टेक्सटाइल टेक्नीशियन हैंस लॉश भी कुंदनलाल के संपर्क में आए. उन्हें लुधियाना की एक काल्पनिक 'कुंदन क्लॉथ मिल्स' में मैनेजर पद की पेशकश की गई, जिसमें आवास, लाभ में हिस्सेदारी और सुरक्षित यात्रा शामिल थी. लॉश ने भारत में नई शुरुआत की.
फिर बारी आई अल्फ्रेड शैफ्रानेक की जो एक प्लाईवुड फैक्ट्री चलाते थे. उन्होंने भारत में सबसे आधुनिक प्लाईवुड यूनिट की स्थापना में कुंदनलाल का साथ दिया. उनके मैकेनिक भाई सिगफ्राइड सहित पूरा परिवार भारत पहुंच गया.
सीगमंड रेटर मशीन टूल्स व्यवसाय में थे. वो पहले व्यक्ति थे जिनसे कुंदनलाल ने संपर्क किया. नाज़ियों के दौर में उनका कारोबार बंद हो गया था. कुंदनलाल ने उन्हें भारत लाकर दोबारा व्यवसाय शुरू करने में मदद की.
इन सभी प्रयासों की शुरुआत वियना के एक अस्पताल के बिस्तर से हुई, जहां डायबिटीज़ और बवासीर से जूझ रहे 45 वर्षीय कुंदनलाल इलाज के लिए पहुंचे थे. 1938 में सर्जरी के बाद वे लूसी और अल्फ्रेड वाचस्लर से मिले. इनसे बातचीत में उन्हें यहूदी विरोधी हिंसा की गंभीरता का अहसास हुआ.
कुंदनलाल ने सभी को नौकरी की गारंटी दी और भारत आने के लिए आवश्यक वीज़ा दिलाने में मदद की.
विनय गुप्ता लिखते हैं, "इन परिवारों के लिए कुंदनलाल की योजना का एक ख़ास पहलू यह था कि उन्होंने इसे सीक्रेट बनाकर रखा. उन्होंने अपनी मंशा या योजना किसी भी भारतीय या ब्रिटिश अधिकारी को नहीं बताई. उनके परिवार को भी इसकी जानकारी तब मिली जब वे कई महीने बाद घर लौटे."
यहूदी परिवारों को लुधियाना में हुई दिक्कतें

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अक्तूबर 1938 में हैंस लॉश कुंदनलाल की मदद से लुधियाना पहुंचने वाले पहले व्यक्ति बने. गुप्ता लिखते हैं कि उनका स्वागत कुंदनलाल के घर में किया गया. लेकिन लुधियाना में उन्हें सुकून नहीं मिला. कुछ ही हफ्तों बाद वे मुंबई चले गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे.
फ्रिट्ज़ वीस तो सिर्फ़ दो महीने ही लुधियाना में रहे. उनके लिए बनाई गई काल्पनिक कंपनी 'कुंदन एजेंसीज़' कभी काम नहीं कर पाई. वे जल्द ही मुंबई चले गए और फ्लोरिंग का काम शुरू किया. 1947 में वे इंग्लैंड चले गए.
गुप्ता लिखते हैं कि इन लोगों के चले जाने के बावजूद कुंदनलाल को कोई नाराज़गी नहीं थी. वे लिखते हैं, "मेरी आंटी ने बताया कि इसके उलट, कुंदनलाल को इस बात का मलाल था कि वे वियना जैसी जीवनशैली और सामाजिक माहौल उन्हें नहीं दे पाए. उन्हें लगता था कि अगर ऐसा कर पाते, तो शायद वे यहीं रुक जाते."
हालांकि सभी कहानियों का अंत ऐसा नहीं हुआ.
अल्फ्रेड और लूसी वाचस्लर अपने नवजात बेटे के साथ समुद्र, रेल और सड़क के रास्ते लुधियाना पहुंचे थे. वे कुंदनलाल के दिए एक बड़े से घर में रहने लगे.
अल्फ्रेड ने फर्नीचर की एक वर्कशॉप शुरू की. स्थानीय सिख मज़दूरों की मदद से उन्होंने सुंदर डाइनिंग सेट तैयार किए, जिनमें से एक आज भी विनय गुप्ता के परिवार के पास है.
मार्च 1939 में अल्फ्रेड शैफ्रानेक, उनके भाई सिगफ्राइड और उनके परिवार भी ऑस्ट्रिया से लुधियाना पहुंचे. उन्होंने भारत की सबसे पुरानी प्लाईवुड फैक्ट्रियों में से एक की शुरुआत की.
गुप्ता लिखते हैं, "काम बेहद कठिन था. उन्हें पंजाब की गर्मी का अंदाज़ा नहीं था. अकेलापन साफ़ झलकता था, खासकर महिलाओं के लिए, जो ज़्यादातर घरेलू जीवन तक ही सीमित थीं."
जैसे-जैसे महीने बीतते गए, शुरुआती राहत की जगह बोरियत ने ले ली. पुरुष लंबे समय तक काम में व्यस्त रहते थे, जबकि महिलाएं भाषा और सामाजिक अलगाव के कारण घरेलू ज़िम्मेदारियों तक सिमटकर रह गईं.
सितंबर 1939 में हिटलर ने पोलैंड पर हमला किया और कुछ ही दिन बाद ब्रिटेन ने जर्मनी के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी. इसके साथ ही भारत को भी युद्ध में शामिल कर लिया गया. इस युद्ध में 25 लाख से ज़्यादा भारतीय शामिल हुए, जिनमें से 87,000 लौट नहीं सके.
1940 तक ब्रिटिश नीतियों के तहत यहां रह रहे सभी जर्मन नागरिकों (चाहे वे यहूदी हों या नहीं ) को नजरबंदी शिविरों में भेजा जाने लगा.
वाचस्लर और शैफ्रानेक परिवारों को पुणे के पास पुरंदर नजरबंदी शिविर में स्थानांतरित कर दिया गया. वहां उन्हें मिट्टी के तेल के लैंप और न्यूनतम सुविधाओं वाली खाली बैरकों में रहना पड़ा.
आज भी चल रहा है कुंदनलाल का खोला स्कूल

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पुरंदर नजरबंदी शिविर 1946 में, युद्ध खत्म होने के लगभग एक साल बाद बंद हो गया.
1948 में अल्फ्रेड वाचस्लर के एक चचेरे भाई ने अमेरिका का शरणार्थी वीज़ा दिलाने में मदद की. उसी साल अक्टूबर में भारत से रवाना हुआ और फिर कभी नहीं लौटा.
बेंगलुरु में एक सफल कारोबार चलाने के बाद शैफ्रानेक परिवार 1947 में ऑस्ट्रेलिया चला गया.
किताब पर शोध के दौरान विनय गुप्ता की मुलाकात एलेक्स वाचस्लर से हुई. उनके पिता अल्फ्रेड ने वह टेबल बनवाई थी जिसका इस्तेमाल कुंदनलाल अपने छोटे ऑफिस में करते थे. अल्फ्रेड का निधन 1973 में हुआ.
गुप्ता लिखते हैं, "दस साल की उम्र से अमेरिका में रहने और अब अस्सी की उम्र पार करने के बावजूद एलेक्स वाचस्लर आज भी भारत में बिताए अपने बचपन को याद करते हैं. वे भारतीय रेस्तरां में खाना खाते हैं, भारतीयों से मिलकर खुश होते हैं और अपने उर्दू से लोगों को हैरान करते हैं."
लुधियाना लौटकर कुंदनलाल ने अपनी बेटियों के लिए घर में ही एक स्कूल शुरू किया. यह आगे चलकर पंजाब के सबसे पुराने स्कूलों में से एक बना. आज भी इस स्कूल में 900 छात्र-छात्राएं पढ़ रही हैं.
कुंदनलाल की पत्नी सरस्वती की 1965 में छत से गिरने के कारण मौत हो गई. उनके पांच बच्चे थे, जिनमें चार बेटियां थीं. पत्नी की मौत के एक साल बाद, 73 वर्ष की उम्र में कुंदनलाल का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया.
गुप्ता लिखते हैं, "कुंदनलाल के लिए 'निष्क्रिय दर्शक' बने रहना किसी अभिशाप से कम नहीं था. अगर उन्हें कोई समस्या दिखती या कोई ऐसा व्यक्ति जिससे मदद की ज़रूरत हो, तो वे बिना हिचक कदम उठाते थे. उन्हें इससे फ़र्क नहीं पड़ता था कि चुनौती कितनी बड़ी है."
यह शब्द उस शख़्स की विरासत को बख़ूबी दर्शाते हैं, जिसकी पहचान केवल एक कारोबारी नहीं, बल्कि करुणा और साहस से भरे व्यक्ति के रूप में थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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