बिहार के डालमियानगर में रोहतास इंडस्ट्रीज़ के पूर्व कर्मियों को क्या घर ख़ाली करने होंगे?

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार के रोहतास ज़िले के डालमियानगर में एक टाउनशिप को ख़ाली कराये जाने का मुद्दा पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में है.
इस टाउनशिप में रहने वाले रोहतास इंडस्ट्रीज़ के पूर्व कर्मचारियों और उनके परिजन राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट से ‘इच्छा मृत्यु’ की गुहार तक लगा रहे हैं.
इस मुद्दे को लेकर लोग सड़कों पर उतर आए हैं और हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा भी उन्होंने खटखटाया है और बीते 29 अगस्त सर्वोच्च न्यायालय ने फौरी राहत देते हुए 11 सितंबर तक बेदखली पर रोक लगा दी है.
कोर्ट ने कहा कि क्वॉर्टरों की नीलामी ऐसे हो कि रोहतास इंडस्ट्रीज़ के पूर्व कर्मियों और परिजनों को हटाए बग़ैर नीलामी की प्रक्रिया शुरू हो सके.
पहले पटना हाई कोर्ट ने इन क्वॉर्टरों में रहने वाले पूर्व कर्मचारियों को ख़ाली करने और फिर नीलामी में आने का आदेश दिया था.

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‘कहाँ जाएं?’
डालमियानगर की महादलित बस्ती में रहने वाले 86 साल के गंगा दयाल राम रोहतास इंडस्ट्रीज़ में सफ़ाई कर्मी थे.
वो कहते हैं, “कहाँ जाऊंगा, मर जाऊँगा. सोचा है कि मार देंगे तो मर जाऊँगा. अब मरने का समय आ ही गया है. जाऊँगा कहां? शक्ति है ही नहीं. कहीं चल-फिर भी नहीं सकता, घर-द्वार सब छूट ही गया है. कहाँ जाऊँगा?”
तो वहीं 73 साल की कलावती देवी, जिनके पति यहीं पोस्टमैन हुआ करते थे, कहती हैं, “मैं तो ख़ुद ही विधवा हूँ. पति के चले जाने के बाद पेंशन से किसी तरह गुजारा चल रहा है. यहीं बाल-बच्चे हुए और नाती-पोते भी, तो अब कहां जाएँ? उम्मीद थी कि उद्योग शुरू होता तो बेटे लग जाते लेकिन अब क्वॉर्टर से भी हटाने की बात आ रही. हमारा तो गाँव-घर भी छूट गया.”

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ये दोनों बुज़ुर्ग बिहार के रोहतास ज़िले के अंतर्गत ‘डालमियानगर क्वॉर्टर’ में दशकों से रहते आ रहे हैं और ‘पटना हाई कोर्ट’ के हालिया आदेश के बाद इनके सामने ऐसा संकट आन पड़ा है कि वे जाएँ तो जाएँ कहां?
इस आदेश के बाद यहाँ के लोग हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं तो वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट से ‘इच्छा मृत्यु’ की गुहार लगा रहे हैं.
गंगा दयाल राम जहां ‘रोहतास इंडस्ट्रीज़’ में बतौर सफ़ाईकर्मी काम करने वाले तीसरी पीढ़ी के सदस्य हैं.
कलावती देवी अपने पोस्ट मास्टर पति ‘मरहूम मदन मोहन प्रसाद’ से शादी के बाद यहाँ रहने आईं थीं. वहीं इन क्वॉर्टरों में रहने वाले कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें अपनी उम्र का भी सही-सही अंदाज़ा नहीं है.
उदाहरण के लिए वॉर्ड नंबर 9 के महादलित बस्ती में रहने वाली सुंदरी देवी कहती हैं, “हम क्या कहें? इतने सालों तक तो डालमियानगर में शौचालय साफ़ करती रही और आज यहाँ से हटने के लिए कहा जा रहा है. हम तो हरिजन लोग हैं. हमारे पास तो और कहीं ठिकाना भी नहीं. अब सरकार ही देखे कि हमें कैसे रखेगी.”

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पटना हाई कोर्ट के आदेश के बाद मचा हंगामा
रोहतास इंडस्ट्रीज़ के बंद होने और लिक्विडेशन में जाने के बाद से ही इससे जुड़े रहे अलग-अलग समूह कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते रहे हैं.
चाहे वो लेबर यूनियन हों या फिर कर्मचारियों के स्वतंत्र समूह. कभी आदेश उनके पक्ष में रहे तो कभी ख़िलाफ़.
जैसे पटना हाई कोर्ट के हालिया आदेश के हिसाब से अव्वल तो इन क्वॉर्टरों में वैध तरीक़े से रहने वाले लोगों को भी बाहर निकलना होगा और फिर वे इनकी नीलामी में शामिल हो सकते हैं.
कोर्ट आदेश के अनुसार, उन्हें नीलामी की प्रक्रिया में वरीयता मिलेगी लेकिन कोर्ट के इस आदेश ने जहां यहाँ के रहवासियों के लिए असमंजस की स्थिति उत्पन्न कर दी है, वहीं भूमाफ़िया की भी नज़र है.
अस्सी साल के प्रभु दयाल पांडे यहीं पैदा हुए और बाद के दिनों में रोहतास इंडस्ट्रीज़ के साथ जुड़कर काम करते रहे. वो लेबर यूनियन के नेता भी रहे.
प्रभु दयाल पांडे कहते हैं, “हमारा दुर्भाग्य है कि इंडस्ट्री बंद हो गई. पहले मेरे पिता और बाद के दिनों में मैंने इसी में काम किया लेकिन अब बुरे समय में हम कहां जाएँगे? शरीर से भी लाचार हैं, लकवा मार दिया है. कोई हमें पूछता भी नहीं.”
वह कहते हैं, “आज कोर्ट भी हमें नज़रअंदाज़ कर रहा जबकि कोर्ट ने ही वन मैन कमिशन (वर्मा आयोग) बनाया. उसमें कहा गया कि इंडस्ट्री के कर्मचारियों को 95,000 रुपये प्रति डिसमिल के दर से मकान दिए जाएँगे.”
“लेकिन तब से अब तक 15 साल हो गए. आज कोर्ट उस बात से भी इनकार कर रहा है और उसे कॉमर्शियल दर से बेचने की बातें कह रहा है. ऐसे में यह कैसे संभव है कि इंडस्ट्री के ग़रीब कर्मचारी उन क्वॉर्टरों की नीलामी में शामिल हो पाएँगे?”

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पाँच साल पहले पहुँची बिजली
यहाँ के एक अन्य निवासी विनय पाठक ने बीबीसी के कहा, “मैं माननीय सुप्रीम कोर्ट का हवाला देना चाहता हूँ, जिसके आदेश और लंबे संघर्ष के बाद हमें बिजली जैसी मूलभूत सुविधा साल 2018 में मिली और आज हम मज़ाक़ से बनकर रह गए हैं.''
"यह कहां से उचित है कि चार दशकों से कहीं रह रहे लोग घरों से बाहर निकलकर नीलामी में शामिल होंगे. मेरी राय में तो हम यहाँ के किराएदार हैं. हम कोर्ट और लिक्विडेशन अधिकारी द्वारा निर्धारित दर का भुगतान करते हैं तो हम किराएदार ही तो हुए फिर यह अवैध क़ब्ज़े की बात कहां से आ रही?"
पाठक कहते हैं, ''हमें एनओसी भी कंपनी की ओर से ही मिली और यह कहां से उचित है कि चार दशकों से कहीं रह रहे लोगों को आवास ख़ाली करने के बाद नीलामी की प्रक्रिया में शामिल होना पड़े? इसके अलावा देश के टेनेंट एक्ट के हिसाब से यदि मालिक किसी संपत्ति को बेचना चाहे तो पहला हक़ तो हमारा ही होना चाहिए या नहीं?"
रोहतास इंडस्ट्रीज़ के लिक्विडेशन प्रभारी ए.आर. वर्मा ने बीबीसी को बताया, "कोर्ट ने तो उन्हें अवैध माना है. हमने तो उन्हें बिजली के कनेक्शन से लेकर और दूसरी चीजों के लिए एनओसी जारी किया. इस बीच अप्रैल-मई महीने से वहाँ नल-जल योजना भी पहुँच रहा है. कोर्ट के कहने पर ही रेंट कमिटी बनी. लोग रेंट भी दे रहे हैं."

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क्वार्टर खाली कराए जाने पर क्या कह रहे समापक अधिकारी?
बीबीसी ने पटना हाई कोर्ट से सम्बद्ध सहायक कम्पनी रजिस्ट्रार सह सहायक शासकीय समापक मोहित कुमार से बातचीत की.
क्वार्टरों को खाली कराए जाने के सवाल पर मोहित कुमार कहते हैं, ''अभी जो यह हालिया गतिविधि है, तो उसका आधार अक्टूबर 2022 में माननीय उच्च न्यायालय का एक आदेश है. इस आदेश में 1471 क्वार्टरों को ख़ाली कराए जाने की बात की गई है. उसी संदर्भ में अलग-अलग याचिकाकर्ता डिविज़न बेंच में अप्रोच किए थे और उसी के आधार पर हमने की गई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश की.''
रोहतास इंडस्ट्रीज़ के पूर्व कर्मियों और परिजनों की ओर से बकाया धनराशि और पीढ़ियों से रहने के सवाल पर वो बोले- ''जहां तक वर्करों के बकाया की बात है तो ऑफिशियली सारे पेमेंट कर दिए गए हैं. रही बात पीढ़ियों से वहाँ रहने की तो इस मुद्दे पर मैं कमेंट नहीं कर पाऊँगा. हमारा ऑफिस पटना हाई कोर्ट के ऑर्डर पर ही ऐक्शन लेता है.''

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ज़ाहिर तौर पर कोर्ट के पूर्व के आदेशों और हालिया आदेशों में विरोधाभास तो ज़रूर हैं और कंपनी कोर्ट ने रोहतास इंडस्ट्रीज़ के ही पूर्व कर्मियों के आवासीय मामले में अलग-अलग फ़ैसले दिए हैं.
जैसे साल 2007 में कोर्ट की डबल बेंच ने कुछ मामलों की सुनवाई की थी और नीलामी लेने में असफल होने की स्थिति में आवासों से बाहर किए जाने की बात कही थी. तब 30 लोगों को इसका फ़ायदा मिला था.
इसके अलावा लोगों के सवाल यह भी हैं कि क्या दशकों से कहीं रह रहे लोगों को यूँ ही कहीं से हटने के लिए कहा जा सकता है?
अगर किन्हीं को हटना ही पड़े तो क्या उनका पुनर्वास नहीं किया जाएगा? लोग अपनी बात की मज़बूती के लिए देश के भीतर विस्थापन से जुड़े ऐसे ही कुछ मामले और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र करते हैं.
शहर के ही निवासी संजय सिंह ‘बाला’ कहते हैं, “हम कोई लक़ीर के फ़क़ीर नहीं हैं. हम चीज़ों को समझते हैं कि जब कंपनी लिक्विडेशन में चली गई है तो उसे लिक्विडेट तो होना है लेकिन इसकी प्रक्रिया क्या होगी? क्या किसी ऐसी चीज़ को लिक्विडेट नहीं किया जा सकता था कि आम जन को परेशानी न होती.”
“आज की तारीख़ में भी कंपनी के पास पचासों बीघे ओपन लैंड हैं तो क्या उसे लिक्विडेट नहीं किया जा सकता था? न्यायालय के हालिया आदेश में कुछ बातें तो ज़रूर हैं कि जिनका ख़्याल नहीं रखा गया. पूर्व के आदेश में ही न्यायालय ने यह कहा था कि क्वॉर्टर में रहते हुए लोग नीलामी में जा सकते हैं और यहाँ मामला उससे उलट है.”

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लिक्विडेशन में पहली देनदारी मज़दूरों की
लिक्विडेशन में कंपनियों का वैधानिक अस्तित्व समाप्त हो जाता है. जैसा कि रोहतास इंडस्ट्री के साथ भी हुआ.
इसमें कंपनी की संपत्तियों को बेचकर प्राप्त धन से बैंक, कर्मचारियों और अन्य बकायादारों को भुगतान किया जाता है और बची हुई राशि को शेयरधारकों के बीच वितरित किया जाता है.
रोहतास इंडस्ट्रीज़ से जुड़े मसलों पर लंबे समय से रिपोर्टिंग करते रहे डिहरी ऑन सोन के वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र मिश्र कहते हैं, “जब भी कोई कंपनी लिक्विडेशन में जाती है तो पहली देनदारी मज़दूरों की होती है."
उनके अनुसार, "दूसरी देनदारी सरकार और सप्लायरों की होती है और फिर मालिक के देनदारी की बात होती है. तो अब कंपनी को बेचकर सबका भुगतान करना ही है. ”
वे आगे कहते हैं, “कंपनी बेचकर भुगतान की बात ठीक है लेकिन मज़दूरों का भी बकाया है. जैसे ग्रैच्युटी और काम के भी कुछ पैसे बाक़ी हैं."
"इसी में हाई कोर्ट ने क्वॉर्टर ख़ाली करने का भी आदेश दे दिया है. तो इस वजह से वहाँ रह रहे पूर्व कर्मियों और परिजनों के सामने बड़ी समस्या आ गई है. अब तो सबकी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से है.”

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रोहतास इंडस्ट्रीज़ में लिक्विडेशन प्रभारी की भूमिका निभा रहे एनके वर्मा ने बातचीत में स्वीकार किया कि लोगों का बकाया कंपनी पर है.
हालाँकि यह कहानी उतनी भी सपाट नहीं है, जितनी अब तक दिखाई दे रही है, क्योंकि रोहतास इंडस्ट्रीज़ के बंद होने और बाद के सालों में लिक्विडेशन में जाने के बाद से ही इसकी प्रॉपर्टी पर भूमाफियाओं की भी नज़र है.
डेहरी ऑन सोन के सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता शिव गांधी कहते हैं, “भूमाफ़ियाओं के लिए इससे बेहतर ज़मीन और लोकेशन क्या होगा. वे तो सिंडिकेट बनाकर यहाँ प्रॉपर्टी ख़रीदते हैं. जैसे 502 एकड़ के एक रकबे को उन्होंने महज़ 17 करोड़ में ख़रीद लिया. तो वे निश्चित तौर पर इस जुगत में लगे हैं कि यहाँ से लोग किसी तरह हटें.”

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क्या कहते हैं स्थानीय सांसद और सत्तारूढ़ दल के नेता?
सत्तारूढ़ जदयू के ज़िलाध्यक्ष अजय कुशवाहा ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर गुहार लगाई है. वे स्थानीय जनों समर्थन में एक मार्च में भी शामिल हुए थे.
कोर्ट के आदेश को लेकर बीबीसी से वो कहते हैं, “डालमियानगर आवासीय कॉलोनी में रह रहे लोगों की संख्या 20,000 से अधिक होगी लेकिन क्या उन्हें ऐसे ही बाहर निकलकर नीलामी में जाना होगा. यह तो ठीक नहीं प्रतीत होता."
"इनमें तो कई ग़रीब और भूमिहीन भी हैं तो इस संदर्भ में हम बिहार सरकार के संबंधित मंत्री से भी मुलाक़ात करने जाने वाले हैं और कंपनी के पास तो अभी भी इतनी ज़मीन पड़ी है कि वो उसे बेचकर घाटे की भरपाई कर सकती है.”
स्थानीय सांसद (काराकाट लोकसभा प्रतिनिधि) महाबली सिंह ने कहा, “हम चाहते हैं कि यहाँ दशकों से रह रहे लोगों को उनका हक़ मिल जाए लेकिन अब कोर्ट के आदेश पर क्या कहा जा सकता है. हमारी तो यही उम्मीद है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट यहाँ दशकों से रह रहे लोगों के पक्ष में फ़ैसला सुनाएगा.”

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रोहतास इंडस्ट्रीज का इतिहास और क्यों ख़ास थी ये जगह?
एक दौर ऐसा भी था, जब 1984 से पहले पूरे देश भर से लोग बिहार के इस शहर में आकर काम किया करते थे.
इस टाउनशिप में रहना और काम करना लोगों के लिए सौभाग्य की बात हुआ करती थी.
सुदूर दक्षिण से लेकर बंगाल के लोग यहाँ की फ़ैक्ट्रियों में काम किया करते और उनके परिवार यहीं रहते.
‘डेहरी ऑन सोन’ यानी सोन नद की दहलीज़ पर साल 1933 में स्थापित इस इंडस्ट्रीज़ के तहत चलने वाली अलग-अलग फैक्ट्रियों का उद्घाटन कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस और बाबू राजेंद्र प्रसाद ने किया था.
इस टाउनशिप ने आज़ादी के आंदोलन में अहम भूमिका अदा की. यहीं से भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार की शुरुआत हुई. यहां कभी 20 से अधिक फैक्ट्रियां थीं.
मगर जहां से कभी लाखों लोगों के घर चलते थे आज वो जगह खंडहर में तब्दील हो चुकी है.
जो कोशिशें की गईं, वो काफी नहीं थीं. आज बिहार के लोगों का दूसरे राज्यों में नौकरी की तलाश में जाना पड़ता है.
रोहतास इंडस्ट्रीज़ के बारे में वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र मिश्र कहते हैं, ''इस टाउनशिप की रौनक का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि यहाँ देश का पहला वीमेन रात्रि कॉलेज चलता था. उस समय 3,000 से अधिक बच्चियाँ यहाँ पढ़ने जाया करती थीं. रही बात रोहतास इंडस्ट्रीज़ के चमक-धमक की तो वो कुछ ऐसा दौर था कि यहाँ कभी रात नहीं हुआ करती थी. तीन शिफ़्ट में फैक्ट्री चला करतीं. कामगारों के आने-जाने के लिए इंडस्ट्रीज़ की रेल चला करती लेकिन आज यह एक भूतिया शहर में बदलता जा रहा. क्वार्टरों के ख़ाली कराए जाने के बाद तो और भी सबकुछ ख़त्म हो जाएगा.''
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