बेलछी हत्याकांड के बाद क्या दलितों के लिए न्याय का दरवाज़ा पूरी तरह खुल पाया?

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बेलछी से लौटकर, बीबीसी हिंदी के लिए
दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा के दर्ज इतिहास को पलटेंगे तो एक पैटर्न समझ में आता है.
उस पैटर्न में ये साफ़ नजर आता है कि ज़्यादातर मामलों में न्याय प्रणाली इन वारदातों में जाति को हिंसा का आधार बताने में कतराती रही और अगर वो साबित हो भी गया तो भी सबूतों के अभाव में कोई गुनाहगार साबित नहीं हुआ.
बिहार में बेलछी हत्याकांड इस हिसाब से ऐतिहासिक मामला है. भारत के इतिहास में आज तक ऐसा नहीं हुआ है, जो बेलछी हत्याकांड में हुआ.
हाल में छपी किताब 'कास्ट प्राइड – बैटल्स फॉर इक्वालिटी इन हिंदू इंडिया' में पहली बार इस हत्याकांड से संबंधित वैसे तथ्य समाने आए हैं जिसने बताया कि बेलछी पहला और अब तक का इकलौता मामला है जिसमें दलित हत्या के मुजरिम को फांसी की सज़ा हुई.
बेलछी ने संसद और दलगत राजनीति से अलग सांसदों की एकजुटता की भी मिसाल कायम की.
सवाल ये है कि लगभग पांच दशक पहले जो मिसाल कायम हुई वो कैसे संभव हुई और उसने दलितों के लिए न्याय की ज़मीन कितनी तैयार की?

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27 मई, 1977 के दिन को याद करते हुए बेलछी हत्याकांड के एक मात्र जीवित मुद्दई और प्रत्यक्षदर्शी 81 साल के जानकी पासवान कहते हैं, “मामला मतभेद का था कि हम बड़े कि तुम बड़े. खेत के पटवन और एक कट्ठा ज़मीन को लेकर विवाद शुरू हुआ."
"गोहार (बाहरी लोग) बुला लिए गए. लोगों को भागने का मौक़ा नहीं मिला. घेरकर मार दिया गया. महावीर महतो (मुख्य अभियुक्त) ने सोचा कि ताक़त से ज़मीन ले लेंगे.”
जानकी पासवान के परिवार के चार लोग इस हत्याकांड में मारे गए थे. एक 12 वर्षीय विक्षिप्त बच्चे समेत 11 लोगों की दिनदहाड़े हत्या हुई थी.
आठ दलित जो दुसाध जाति के थे और बाक़ी तीन सोनार जाति के लोगों की हत्या की गई थी. लोगों को पहले गोलियों से भूना गया और बाद में रस्से से बांधकर आग में झोंक दिया गया था.
जानकी पासवान के अनुसार, “देखने वाली बात तो यह है कि वो (महावीर महतो) भी बे-शक्ति हो गए और हम भी. कोई शक्ति काम नहीं किया. आज दुख तो दोनों को है. न राज हुआ न राज हो सकता है. राज तो यही हुआ कि मार दिया. जला दिया लेकिन राज रहा कहां?”

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बेलछी हत्याकांड और राजनीतिक भूचाल
साल 1977 की घटना और उस दौर की ओर पलटकर देखें तो तब बिहार समेत कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था.
केंद्र की सत्ता से कांग्रेस पहली बार बेदख़ल हुई थी. आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव में ख़ुद इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी चुनाव हार गए थे. जनता पार्टी की सरकार बनी थी.
मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री चुने गए थे. तब ये घटना घटी थी.
बेलछी हत्याकांड की आवाज़ देश की संसद में गूंजने लगी. तब सीपीआई नेत्री और तमिलनाडु के कोयंबटूर लोकसभा की प्रतिनिधि पार्वती कृष्णन ‘बेलछी’ पर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव लेकर आई थीं.
मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से उन्होंने बेलछी हत्याकांड को जातीय अत्याचार क़रार दिया था तो वहीं तत्कालीन गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने इस हत्याकांड में जाति की भूमिका को नकार दिया था.
उनके हिसाब से यह मामला जातीय संघर्ष नहीं बल्कि दो गुटों में आपसी वर्चस्व का था.
वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिट्टा ने अपनी किताब 'कास्ट प्राइड – बैटल्स फॉर इक्वालिटी इन हिंदू इंडिया' में पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट नेता चौधरी चरण सिंह के बयान को दर्ज किया है.
चौधरी चरण सिंह ने कहा था, "इस घटना में जाति और सांप्रदाय का कोई एंगल नहीं है. प्रेस के एक हिस्से में जिस तरह से लिखा जा रहा, वैसा जातीय उत्पीड़न का भी मामला नहीं है."
पार्वती कृष्णन ने तब गृह मंत्री के बयान का विरोध करते हुए कहा था कि 'गृह मंत्री बिहार सरकार की पकाई हुई रिपोर्ट पर भरोसा कर रहे हैं.'
उन्होंने इस मामले में न्यायाकि जांच आयोग के गठन की मांग भी की थी, जिसे सरकार ने नज़रअंदाज़ कर दिया था.

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जब चौधरी चरण सिंह को स्टैंड बदलना पड़ा
लेकिन इस हत्याकांड का इतना विरोध हुआ कि चौधरी चरण सिंह को अपना स्टैंड बदलना पड़ा और उन्होंने आठ सदस्यीय सांसदों की फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग कमेटी का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता उत्तर प्रदेश के नेता राम धन को सौंपी गई थी.
इसमें रामविलास पासवान को भी शामिल किया गया था जो उसी दुसाध जाति से थे जिस जाति से आठ लोग इस हत्याकांड में मारे गए थे.
इस समिति ने दो जुलाई, 1977 को बेलछी का दौरा किया और रिपोर्ट फ़ाइल की.
संसदीय इतिहास में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस हत्याकांड की जांच की मांग करने की बात को भी काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है. ये एक अनोखी मिसाल थी.
14 जुलाई को प्रकाशित रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर लिखा गया था कि 'यह नरसंहार एकतरफ़ा था, जिसमें आठ दलितों को मार दिया गया.'
रिपोर्ट के अनुसार, "वे भूमिहीन मज़दूर थे, जो बंटाई पर खेती करते थे. इन लोगों की हत्या कुर्मी जाति के महाबीर महतो और उनके लोगों ने की थी."
"ये पक्के घरों में रहने वाले दबंग किसान थे. मारे गए दलित इन दबंग लोगों का विरोध करते थे. ये आपसी रंजिश का मामला नहीं बल्कि जातीय हिंसा का मामला है."
इस मामले में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे जो इस तरह की जातीय हिंसा के मामलों में अक्सर संदेह के घेरे में आती है.

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हाथी पर चढ़कर जब इंदिरा गांधी पहुंचीं बेलछी
बीबीसी से बात करते हुए मनोज कहते हैं, "किसी भी दूसरे जातिगत जुल्म की तुलना में बेलछी को ज़्यादा सुर्ख़ियाँ मिलीं. ऐसा आंशिक रूप से इसकी टाइमिंग के कारण हुआ. ये घटना उस समय हुई, जब कांग्रेस ने पहली बार केंद्र में अपनी सत्ता गँवाई थी."
"जनता पार्टी सरकार के उस दावे ने दलित सांसदों के बीच आक्रोश पैदा कर दिया, जिसमें कहा गया कि बेलछी का नरसंहार एक गैंगवार थी न कि जातिगत अत्याचार."
"लेकिन बाद में जनता पार्टी की सरकार को माफ़ी मांगनी पड़ी और इसकी वजह थी इन दलित सांसदों की अभूतपूर्व फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग."
"इसके बाद इंदिरा गांधी हाथी पर चढ़कर बेलछी पहुँचीं और इसने जन-मानस को काफ़ी प्रभावित किया. आख़िरकार बेलछी अत्याचार का ऐसा पहला और आख़िरी मामला बना, जिसमें दलितों के एक हत्यारे को फाँसी हुई.”
इंदिरा गांधी की पीड़ित दलित परिवारों से मिलने ट्रैक्टर, हाथी और दुरूह रास्तों पर चलकर जाने की ज़िद को लोकतांत्रिक राजनीति में मास्टरस्ट्रोक माना जाता है.
जिस हिदीं पट्टी में कांग्रेस बुरी तरह पिछड़ गई थी, इस एक वाक़ये ने ग़रीबों के दिलों में कांग्रेस के लिए दोबारा जगह बनाने में मदद की.

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जातीय हिंसा से जाति ग़ायब, मारे गए लोग लेकिन गुनाहगार ग़ायब
बेलछी हत्याकांड के मुख्य अभियुक्त महावीर महतो और परशुराम धानुक कुर्मी जाति के थे. दोनों को मौत की सज़ा हुई और दूसरे 14 अभियुक्तों को उम्रक़ैद की सज़ा मिली.
बेलछी हत्याकांड में न्याय का फ़ैसला करने वाले न्यायाधीश उदय सिन्हा अधिवक्ताओं के साथ मौक़ा-ए-वारदात पर ख़ुद गए थे और घटनास्थल पर जाकर इसकी पड़ताल की थी.
मनोज मिट्टा ने अपनी किताब में लिखा है, “जब महावीर महतो और परशुराम धानुक को अंततः फाँसी की सज़ा हुई तो उनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की गई. तब रिट याचिका को टेलीग्राम से भेजा गया था."
"उन दिनों सुप्रीम कोर्ट में ग्रीष्म अवकाश चल रहा था. जस्टिस ए. वरदराजन ने तब टेलीग्राम को ही रिट याचिका माना था. फाँसी की तय तारीख़ से दो दिन पहले (23 मई 1983) उन्हें स्टे मिल गया था."
"बाद के दिनों में तब के मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ और तीन अन्य न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले में प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की. यह सुनवाई 23 सितंबर 1983 को हुई, और इस मामले में दायर की गई रिट याचिका को ख़ारिज कर दिया गया."
"महावीर महतो और परशुराम धानुक को नौ नवंबर 1983 के दिन भागलपुर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी गई."

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बिहार में जातीय हिंसा का दौर
बेलछी हत्याकांड के बाद भी बिहार में कई बार भयानक जातीय हिंसा देखने को मिली है.
ये 90 का दौर था जब सामाजिक न्याय की गुहार लगाते कई सरकारें सत्ता की डोर थामे थीं फिर भी 1996 में बथानी टोला में 20 लोगों की हत्या हुई. जिसमें ज़्यादातर दलित और कुछ मुसलमान थे.
1997 में लक्ष्मणपुर बाथे जिसमें 58 दलित मारे गए. पूरे देश में अबतक का सबसे बड़े दलित हत्या कांड को तत्कालीन राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय शर्म कहा.
1997 में मुंबई के रमाबाई नगर में 10 दलितों को मुंबई पुलिस ने मारा.
1999 में बिहार के शंकर बिगहा में 23 दलितों की हत्या रणवीर सेना ने की.
2002 में हरियाणा के झज्जर में भीड़ ने 5 दलितों की पीट पीट कर हत्या कर दी और 2006 में महाराष्ट्र के खैरलांजी में एक दलित परिवार के 4 लोगों की भीड़ ने हत्या कर दी.
बथानी टोला हो या फिर शंकर बिगहा - इनमें तमाम अभियुक्त बारी-बारी से छूटते चले गए.

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बिहार के भीतर जातीय हिंसा की ज़मीन पर वंचितों की आवाज़ उठाने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) ने अहम भूमिक निभाई है.
बेलछी हत्याकांड जैसे अपवाद को छोड़ दें तो जातीय हिंसा के मामलों में दोषियों को सज़ा नहीं मिली.
इसकी वजह के बारे में भाकपा (माले) के राज्य सचिव कुणाल कहते हैं कि न्यायालयों पर ग़रीब को न्याय दिलाने का कोई दबाव नहीं होता है.
वो कहते हैं, “हम ऐसे मामले या लड़ाई को सिर्फ़ कोर्ट के हिसाब-किताब से नहीं देखते. असल में जब तक ग़रीबों की माँग मज़दूरी या बसने-खेती करने के लिए ज़मीन भर की थी तब तक ‘सामंती शासन व्यवस्था’ को कोई ख़तरा नहीं था."
"लेकिन जब ग़रीब हमारी पार्टी के नेतृत्व में संगठित होने लगे तो वे एक राजनीतिक ताक़त के रूप में भी उभर रहे थे. उनके मुद्दे भले ही इज़्ज़त, ज़मीन और मज़दूरी के थे लेकिन मसला सिर्फ़ आर्थिकी का नहीं था."
"वे सामाजिक और राजनीतिक तौर पर भी उभर रहे थे, तो उसे दबाने के लिए उस दौर में निजी सेनाएँ जैसे ‘रणवीर सेना’ बनाई गई और उन्हें राजनीतिक संरक्षण भी मिला.”

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बेलछी के साथ ही बिहार के अलग-अलग हिस्से में हुए जातीय हिंसा के मामले और जातियों के भीतर सामंतवाद और वर्चस्व के सवाल पर कुणाल कहते हैं, “जातियों के भीतर सामंतवाद और जातीय वर्चस्व की संरचना को देखने पर हम पाते हैं कि जातियाँ भी किन्हीं दबंग के नेतृत्व में ही संगठित होती हैं, जैसे यदि भूमिहार जाति के दबंग और ज़मींदार नहीं होते तो रणवीर सेना कैसे चलती?"
वो कहते हैं, "हमारे देश में जातीय वर्चस्व भी सामंतों के नेतृत्व में ही देखने को मिलता है और ऐसे तत्व अगड़ी के साथ ही पिछड़ी कही जानी वाली जातियों में भी देखने को मिलते हैं. जैसे ‘भूमि सेना, लोरिक सेना और किसान संघ’ के उदय को कैसे देखा जाए?"
"तो जो समाज में पिछड़ी जातियों के भीतर भी एक नवधनाढ्य हिस्सा पैदा लिया है तो उसने भी सामाजिक वर्चस्व के लिए ग़रीबों का दमन किया. इन सब की यही कोशिशें रहीं कि ग़रीबों की राजनीतिक और सामाजिक दावेदारी को रोका जाए.”

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मनोज मिट्टा इसके पीछे व्यवस्था के ढांचे में दलितों के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह को दोषी बताते हैं.
उनके अनुसार, ”दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा के मामले में समानता के संवैधानिक मूल्यों और भेदभाव को ख़त्म करने को लेकर बयानबाज़ी के बावजूद दलितों के ख़िलाफ़ सामूहिक हिंसा के लिए खुली छूट, व्यवस्था के पूर्वाग्रह को दिखाती है.
"ऐसे गंभीर मामलों में कथित हत्यारों को छोड़ने के लिए अदालतों की ओर से तर्क देने का एक पैटर्न रहा है."
बहरहाल बिहार में एससी/एसटी एक्ट के तहत भी अभियुक्तों को सज़ा देने का मामला संतोषजनक नहीं कहा जा सकता.
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बिहार पुलिस के आँकड़ों के हवाले से लिखा था कि एससी/एसटी एक्ट के तहत साल 2020 में अधिकतम 7,574 मामले दर्ज हुए, 2018 में 7125 मामले और साल 2017 में 6826 मामले दर्ज हुए.
लेकिन साल 2011 से लेकर 2021 के बीच कुल 44,150 मामलों में से सिर्फ़ 872 मामलों में दोष साबित हुई. मतलब सिर्फ़ 8 फ़ीसदी मामलों में सज़ा हुई.

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जातीय अस्मिता की लड़ाई या वर्ग संघर्ष?
बिहार के भीतर बेलछी से लेकर दूसरे दलित नरसंहारों को लेकर एक बात अक्सर उठती रही है कि इन्हें जातीय हिंसा कहा जाए या नहीं? क्या यह जातीय अस्मिता की लड़ाई थी?
इस सवाल पर जाने माने समाजशास्त्री प्रोफेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, “बिहार के भीतर जातीय नरसंहार कहे जाने वाले मामलों को सामंतों और मज़दूरों की लड़ाई के तौर पर देखना ही उचित होगा. मूल लड़ाई ज़मीन को लेकर रही है."
"लोग इन्हें अलग-अलग चश्मे से देखते ज़रूर हैं. टुकड़ों में देखने पर चीजें अलग-अलग दिखाई देती हैं, जैसे कहीं पानी पटवन के लिए तो कहीं उठने-बैठने को लेकर लड़ाइयां हो गईं लेकिन विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि यह वर्ग संघर्ष ही था.”
प्रोफ़ेसर दिवाकर 'बेलछी', 'लक्ष्मणपुर बाथे' और 'बथानी टोला' जैसे हत्याकांडों में जाति और वर्ग की भूमिका के सवाल पर कहते हैं, “इन सारे मामलों में एक चीज़ कॉमन है कि लड़ाई ज़मीन को लेकर हुई."
"बिहार के भीतर जाति और वर्ग को एक क्रम में देखने की कोशिशें होती हैं. कई लोगों ने इस पर लिखा भी है. जैसे जिनके पास आमतौर पर अधिकांश ज़मीन है वो अगड़े हैं लेकिन जहां पर ज़मीन अगड़ों के बजाय पिछड़ों के पास है या फिर दलितों के पास है, तो वे भी वैसा ही बर्ताव कर रहे."
वो कहते हैं, "इन्हें जोड़कर देखने पर हम पाते हैं कि जाति और वर्ग एक-दूसरे में समाहित हो जाते हैं.”

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सामाजिक न्याय के इतिहास में दर्ज आज का बेलछी
इस घटना के एक मात्र जीवित मुद्दई जानकी पासवान की अंतिम इच्छा यही है कि उनके गांव में एक हाई स्कूल बन जाए. गाँव की दलित परिवार की लड़कियों को पढ़ने के लिए तीन किलोमीटर दूर न जाना पड़े.
बेलछी हत्याकांड में बिहार सरकार ने पीड़ित परिवारों के लिए मुआवज़े के तौर पर ज़मीन (दो एकड़) की घोषणा की थी, लेकिन वो ज़मीन भी ग़ैर मजरूआ (जो जोती-बोई न गई हो) थी.
जानकी पासवान समेत दूसरे पीड़ित परिवारों को मुआवजे के तौर पर ज़मीन मिली ज़रूर लेकिन बाद के दिनों में उसी ज़मीन से होते हुए गाँव की सड़क निकली और बाक़ी का अधिकांश हिस्सा नदी की उड़ाही में चला गया.
कविंदर पासवान ने उस हत्याकांड में अपने बड़े भाई (राजाराम पासवान) को खोया था. उन्हें भी तब मुआवज़े के तौर पर दो एकड़ ज़मीन मिली थी, लेकिन आज की तारीख में सिर्फ़ पाँच-छ: धुर में बना घर ही बचा है.
पति-पत्नी जीवनयापन के लिए मज़दूरी करने पर विवश हैं. जो ज़मीन सड़क और नदी उड़ाही में गई उसके बदले कहीं और ज़मीन नहीं मिली. सरकार ने बाद के दिनों में कोई सुध नहीं ली.
जानकी पासवान कहते हैं, “न्याय मिला. जिस दरोगा को उन लोगों ने मिला लिया था उनकी नौकरी चली गई और बाढ़ के दरोगा को निलंबित कर दिया गया."
"दो लोगों को फाँसी हुई और सबको उम्रक़ैद. हमको कुछ इनाम-बख्शीश देकर बदलना भी चाहे लेकिन हमने कहा कि अब और कैसा समय आएगा? हम नहीं झुके. हम मान लिए थे कि धन दौलत जाए या जान. हम छोड़ेंगे नहीं. जहां तक जाति की बात है वो समाज की सच्चाई है.”

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दलितों के प्रति हिंसा के मामले और सज़ा का ब्योरा
1968: भीड़ द्वारा दलितों को निशाना बनाकर हिंसा करने की पहली घटना मद्रास राज्य में दर्ज की गई थी. जब किलवेनमणि में 42 लोगों को ज़िंदा जला दिया गया था. मारे गए लोगों में ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे थे.
1973: मद्रास हाई कोर्ट ने किलवेनमणि नरसंहार मामले के सभी अभियुक्तों को सारे आरोपों से ये कहते हुए बरी कर दिया कि उनमें से ज़्यादातर ‘अमीर लोग’ हैं और ऐसे में ‘इस बात पर विश्वास करना मुश्किल है कि वो ख़ुद घटनास्थल पर गए होंगे और लोगों के घरों में आग लगाई होगी.’
1977: बेलछी में एक भीड़ ने 11 लोगों की हत्या कर दी, जिनमें आठ दलित भी शामिल थे. मोरारजी देसाई की सरकार ने इसे जातीय ज़ुल्म के बजाय गिरोहों की लड़ाई का नतीजा साबित करने की कोशिश की. लेकिन, दलित सांसदों की एक समिति ने बेलछी का दौरा करने के बाद सरकार के इस दावे को चुनौती दी.
1982: बेलछी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दो सज़ायाफ़्ता लोगों की फांसी की सज़ा बरक़रार रखी थी.
1983: बेलछी कांड के दोषी महाबीर महतो को फांसी दिया जाना पहली और इकलौती घटना थी, जब दलितों की हत्या के किसी दोषी को न्यायिक रूप से मौत की सज़ा दी गई थी.
1990: सुप्रीम कोर्ट ने 1968 के किलवेनमणि हत्याकांड के सभी अभियुक्तों को बरी किए जाने के फ़ैसले को बरक़रार रखा, जबकि सर्वोच्च अदालत को बेइरादा तरीक़े से इस बात का पता चल गया था कि मद्रास हाई कोर्ट ने अभियुक्तों पर लगे हत्या के आरोपों को जान-बूझकर दबा दिया था.
1991: आंध्र प्रदेश के टिसुंदर में आठ दलितों की हत्या कर दी गई. जिसके बाद 1989 में बने SC-ST एक्ट के तहत पहली बार इन हत्याओं के मुक़दमे की सुनवाई के लिए विशेष अदालत का गठन कया गया था.
1996: बिहार के भूमिहारों के हथियारबंद गिरोह रणवीर सेना ने बथानी टोला में 20 लोगों की हत्या कर दी थी. मारे गए ज़्यादातर लोग दलित थे और कुछ मुसलमान भी थे. जिनकी हत्या हुई उनमें से एक को छोड़कर बाक़ी सब महिलाएं और बच्चे थे. रणवीर सेना द्वारा की गई हत्याओं के सिलसिले की ये पहली कड़ी थी.
1997: बिहार के लक्ष्मणपुर बाथे में रणवीर सेना ने 58 दलितों की हत्या कर दी. देश में किसी भी जगह जातीय नरसंहार की ये सबसे बड़ी वारदात थी. जिसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ की घटना क़रार दिया था.
1997: बड़े शहरों में दलितों की सामूहिक हत्या का पहला मामला मुंबई में देखने को मिला था, जब पुलिस ने रमाबाई नगर में 10 लोगों की उस समय गोली मारकर हत्या कर दी थी, जब वो आंबेडकर की मूर्ति को अपवित्र किए जाने के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.

1998: रमाबाई नगर की घटना की न्यायिक जांच में पता चला था कि सब-इंस्पेक्टर मनोहर क़दम ने प्रदर्शनकारियों पर बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोली चलाने का हुक्म दिया था, जिसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी.
1999: रणवीर सेना ने बिहार के शंकरबिघा में 23 दलितों का नरसंहार किया और पुलिस ने FIR में 24 लोगों को आरोपी बनाया.
2002: हरियाणा के झज्जर में एक भीड़ ने, गोकशी के शक में पुलिस चौकी में घुसकर पांच दलितों की पीट-पीटकर हत्या की. मौक़े पर मौजूद पुलिसबल ने न तो भीड़ के शिकार हुए लोगों को बचाने की कोशिश की और न ही इस घटना के ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की.
2006: महाराष्ट्र के खैरलांजी में भीड़ ने एक दलित परिवार के चार सदस्यों को उनके घर से घसीटकर बाहर निकाला और पीट-पीटकर मार डाला. इसमें एक बुज़ुर्ग मां और किशोर उम्र बेटी भी शामिल थी. बाद में पास की नहर से जो पहला शव निकाला गया था, वो 17 साल की प्रियंका का था. उसके बदन पर चोट के निशान थे और कोई कपड़ा नहीं था. इस मामले की आधिकारिक जांच में पाया गया था कि ‘अपराध और सुबूतों को दबाने की एक गहरी साज़िश रची गई थी.’
2009: रमाबाई नगर फ़ायरिंग केस में ट्रायल कोर्ट ने सब-इंस्पेक्टर मोहनदास क़दम को ‘ग़ैर इरादतन हत्या का दोषी’ ठहराते हुए उम्र-क़ैद की सज़ा सुनाई थी. बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसको फ़ौरन ही ज़मानत पर रिहा कर दिया था.
2010: झज्जर में पीट-पीटकर हत्या के मामले मे कोई जातीय एंगल होने की बात से इनकार करते हुए, ट्रायल कोर्ट ने सात लोगों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी. अदालत ने कहा था कि अभियुक्तों को तो, ‘पीड़ितों की जाति के बारे में जानकारी तक नहीं थी.’
2012: बथानी टोला हत्याकांड के मामले में पटना हाई कोर्ट ने सभी उन 23 अभियुक्तों को बरी कर दिया, जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था. इनमें वो तीन आरोपी भी शामिल थे, जिन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई थी.
2013: लक्ष्मणपुर बाथे हत्याकांड केस में पटना हाई कोर्ट ने सभी 26 अभियुक्तों को बरी कर दिया. इनमें वो 16 आरोपी भी शामिल थे, जिन्हें निचली अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी.
2014: 1991 के टिसुंदर हत्याकांड मामले में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने उन सभी 53 अभियुक्तों को बरी कर दिया, जिन्हें निचली अदालत ने सज़ा सुनाई गई थी. हाई कोर्ट ने ये भी कहा था कि आरोपियों की रिहाई पर कोई ‘जश्न या विरोध प्रदर्शन न हो’.
2015: शंकरबिघा हत्याकांड में सारे 50 सरकारी गवाह बारी बारी से अपने बयान से मुकर गए, जिसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 24 अभियुक्तों को ठोस सबूत के अभाव में बरी कर दिया.
2019: खैरलांजी में दलितों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आठ अभियुक्तों की उम्र क़ैद की सज़ा को बहाल रखा. लेकिन सर्वोच्च अदालत ने दलित परिवार की हत्या के पीछे जातिगत द्वेष की बात को ख़ारिज कर दिया.
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