दर्शन सोलंकी केस: कैंपस में जातिगत भेदभाव होने पर प्रतिष्ठित संस्थान क्या करते हैं?

- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
12 फ़रवरी को दोपहर 12.20 बजे दर्शन सोलंकी ने अपने पिता से वीडियो कॉल पर बात की. दर्शन आईआईटी बॉम्बे में बीटेक पहले साल के छात्र थे. रविवार को किये गए इस कॉल में दर्शन ने अपने परिवार को बताया कि एग्ज़ाम ख़त्म हो गए हैं तो वह दोस्तों के साथ जूहू चौपाटी और गेटवे ऑफ़ इंडिया घूमने जाएंगे.
गुजरात के अहमदाबाद में रहने वाले दर्शन के पिता रमेशभाई सोलंकी 14 फ़रवरी को बेटे को लेने मुंबई जाने वाले थे लेकिन परिवार को किए गए अपने आख़िरी फ़ोन के लगभग एक घंटे बाद दर्शन ने खुदकुशी कर ली.
दर्शन सोलंकी के पिता रमेशभाई सोलंकी पेशे से प्लमर है, यानी बाथरूम और नल ठीक करने का काम करते हैं. वह बताते हैं- "पहले तो वो नेवी में जाना चाहता था लेकिन फिर 11वीं में उस पर केमिकल साइंस पढ़ने का जुनून सवार हुआ और उसे आईआईटी बॉम्बे ही जाना था, वहां पढ़ना उसका सपना था लेकिन हमें क्या पता था उसका सपना उसकी जान लेगा."
एक 18 साल का लड़का जो तीन महीने पहले अपने सपने को जीने देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेजों में शुमार आईआईटी बॉम्बे आया, उसके लिए ज़िंदगी कुछ महीनों में ही इतनी मुश्किल हो गई कि उसने इसे खत्म कर देना आसान समझा. अपनी मौत के पीछे दर्शन ने कोई ख़त तो नहीं छोड़ा लेकिन उसने अपनी बहन को बीते महीने मकर संक्रांति पर ये ज़रूर बताया था कि "आईआईटी में वह जिस जाति से आता है उसके कारण उसे परेशान किया जाता है."

आईआईटी बॉम्बे में दर्शन के बैचमेट ने नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी से बात की. उसने कहा- "दर्शन ने एक बार कहा था कि घर में वो सबका लाडला है, अब तो उसके रिश्तेदार, भाई बहन सब उसकी ख़ूब तारीफ़ भी करते हैं. लेकिन यहां उसे लोग पसंद नहीं करते."
दर्शन को जानने वाले एक छात्र ने हमें बताया, "दर्शन के रूममेट ने उससे बात करनी बंद कर दी थी, हास्टल के विंग में भी लोगों का रवैया उसके लिए बहुत ठीक नहीं था. वो इससे बहुत परेशान था. इसकी शिकायत उसने अपने मेंटर से भी की थी जिसके बाद उसके विंग का माहौल उसके लिए और भी बुरा हो गया."
आईआईटी बॉम्बे का बयान
14 फरवरी को आईआईटी बॉम्बे प्रशासन ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया कि "मीडिया रिपोर्ट्स में ये कहना कि जातीय भेदभाव के कारण छात्र की मौत हुई ये गलत है. जब मामले की जांच चल रही है तो इस तरह की टिप्पणी करना गलत है. छात्र ने भेदभाव झेला है इस तरह के कोई संकेत अब तक नहीं मिले हैं."
इसके बाद 18 फरवरी को आईआईटी के डायरेक्टर्स की ओर से एक इंटरनल ईमेल किया गया और कहा गया कि पवई पुलिस इस खुदकुशी की जांच कर रही है और इसके साथ ही आईआईटी बॉम्बे ने भी इस मामले की जांच के लिए कमेटी का गठन किया है. प्रोफ़ेसर नंद किशोर इस कमेटी की अध्यक्षता करेंगे.
बीबीसी को दिए गए लिखित जवाब में आईआईटी बॉम्बे ने कहा है कि "प्रशासन कैंपस में किसी भी तरह के भेदभाव के सख़्त खिलाफ़ है. बेहतरी की बहुत गुजांइश है ताकि इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटना फिर ना हो. हम छात्रों को ये समझाते हैं कि वह जेईई परीक्षा की रैंक से जुड़े सवाल ना पूछें."
"पहले साल में छात्रों को टीचिंग असिस्टेंट देते हैं, जो कैंपस के सिस्टम को बेहतर तरीके से समझते हैं और नए छात्रों की मदद करते हैं. एकेडमिक मेंटर छात्रों को दिए जाते हैं जो छात्रों को एकेडमिक सपोर्ट देने का काम करता है. पहले साल में छात्रों को अंग्रेज़ी की कक्षा दी जाती है. छात्रों के लिए 24 घंटे काउंसलिंग की सुविधा है.
प्रशासन ने बताया है कि "इस मामले की जांच के लिए आईआईटी प्रशासन ने एक कमेटी का गठन किया है जो इन तरह के मामलों के जानकार हैं." लेकिन ये कमेटी कब तक रिपोर्ट सौंपेगी? इस सवाल पर आईआईटी ने हमें कोई जवाब नहीं दिया.
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आईआईटी बॉम्बे में एक पीएचडी के छात्र ने नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, "जब छात्र यहां आते हैं तो यहां किसी तरह का सपोर्ट सिस्टम उन्हें नहीं मिलता. सब कुछ शुरू होता है किसी छात्र से उसकी जेईई परीक्षा में रैंकिंग जानने से, फिर जब रैंकिंग का पता चलता है तो उसे ये महसूस कराया जाता है कि वह यहां आने के लायक नहीं था लेकिन उसे रिज़र्वेशन के कारण यहां उनके बीच बैठने का मौका मिला.
"उनमें मेरिट नहीं है, वो कॉम्पटिटीव नहीं हैं. कम उम्र में जब बच्चे घर से बाहर आते हैं तो उन्हें लगने लगता है कि मुझमें क्या कमी है, ये लोग मुझे अपने ग्रुप का हिस्सा क्यों नहीं बनाते. धीरे-धीरे उनकी पहचान ही उनका डर बन जाती है.
"डर अपनी पहचान ज़ाहिर करने का, क्योंकि इसके कई परिणाम भुगतने पड़ते हैं, जब मैं परिणाम की बात करता हूं तो मेरा मतलब है कि आईआईटी में 96 फ़ीसदी फैकेल्टी सवर्ण हैं, सवर्ण छात्रों की तादाद ज़्यादा है. और ये संस्थान का व्यवहार तय करता है."

'एससी एसटी सेल एक खोखली व्यवस्था है'
आईआईटी बॉम्बे में साल 2017 में एक एससी-एसटी सेल बनाई गई, संस्थान की वेबसाइट पर बताया गया है कि अगर किसी छात्र को जाति के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है तो वह इस सेल के पास आएं और अपनी शिकायत दर्ज कराएं. लेकिन कई छात्रों ने बीबीसी से बताया कि ये एक "खोखली व्यवस्था" है. इस सेल के "पास ना ही कोई शक्तियां हैं और ना ही इसके काम करने के तरीके कहीं आपको लिखित मिलेंगे."
आंबेडकर स्टूडेंट्स कलेक्टिव के सदस्य और आईआईटी बॉम्बे से पीएचडी कर रहे स्वप्निल गेदाम कहते हैं कि "यहां का एससी-एसटी सेल कितना बेहतर है ये इस बात से समझा जा सकता है कि उन्हें दर्शन की खुदकुशी की ख़बर एक स्थानीय अख़बार के ज़रिए मिली. जबकि होना तो ये चाहिए था कि इस सेल को सबसे पहले दर्शन की खुदकुशी की जानकारी होनी चाहिए थी."
"आईआईटी एक ऐसी जगह है जहां विरोध प्रदर्शन कर पाना और इसे बनाए रखना किसी भी यूनिवर्सिटी से ज़्यादा मुश्किल है. जब हम लोग दर्शन के लिए शोक मार्च कर रहे थे तो बाकी छात्रों की क्लास भी चल रही थी. ऐसा लग रहा था मानो कुछ हुआ ही नहीं. कोई हमारे बीच से चला गया है और कैंपस में देख कर ऐसा लगता है जैसे सब ठीक है."
आईआईटी बॉम्बे के आंबेडकर पेरियार फूले स्टूडेंट सर्किल ने दर्शन की खुदकुशी को "संस्थानिक हत्या" बताया है. इस संगठन का आरोप है कि बीते कई सालों से कैंपस में इस तरह के मामले पर प्रशासन कोई एक्शन नहीं लेता.
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लोकसभा में केंद्र सरकार की ओर से दिए गए एक सवाल के जवाब में सामने आया कि देश में आईआईटी और आईआईएम संस्थानों में साल 2014 से 2021 के बीच 122 खुदकुशी के मामले सामने आए. जिसमें 24 छात्र एससी यानी अनुसूचित जाति और 41 छात्र ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग से थे, वहीं तीन छात्र एसटी यानी अनुसूचित जनजाति थे. ऐसे समझिए कि आत्महत्या करने वाले कुल 122 में से 68 छात्र रिज़र्व कैटेगरी से आते थे.

स्वप्निल एक उदाहरण दे कर कहते हैं कि "दर्शन की मौत के बाद एक व्हाट्सएप ग्रुप में बातें हो रही थीं उसका मैं आपको उदाहरण देता हूं. एक चैट में कहा गया - एबिलिटी की बात है, जेईई में 150 नंबर लाकर केमिकल मिले और 80 नंबर लाकर सीएस और केमिकल मिल जाए तो कुछ तो अंतर है. जब अनूसूचित जाति से आने वाले एक लड़के की मौत हुई है तब ऐसी बातें ग्रुप पर करना, इस मैसेज को उस जाति से आने वाले अन्य बच्चे पढ़ेंगे उनके बीच आखिर किस तरह का संदेश जाएगा. क्या वो कभी अपनी जातीय पहचान को लेकर सहज हो पाएंगे."

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अनिकेत अम्बोरे के मामले में आईआईटी बॉम्बे ने क्या किया था?
अनिकेत अम्बोरे के मामले में आईआईटी बॉम्बे ने क्या किया था?
साल 2014 में आईआईटी बॉम्बे में ही इलेक्ट्रिकल इंजीनरियंग के छात्र अनिकेत अम्बोरे ने आत्महत्या की थी, वह अनुसूचित जाति से आते थे. अम्बोरे के परिजनों ने जब इस जातिगत भेदभाव के आरोप की लिखित शिकायत आईआईटी बॉम्बे के डायरेक्टर से की थी, तो इस मामले में तीन सदस्यों की कमेटी बनाई गई. साल 2015 में इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी और आईआईटी की ओर से इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया.
लेकिन साल 2019 में इंडियन एक्सप्रेस ने इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर एक ख़बर छापी और कहा कि तीन सदस्यों की इस रिपोर्ट में लिखा था, "अंकित अम्बोरे की मुश्किलों के पीछे जाति आधारित व्यवहार वजह नहीं थी बल्कि जांच में सामने आया है कि वह खुद के अंतर्द्वंद्व से जूझ रहे थे."
आंबेडकर, पेरियार, फूले स्टडी सर्कल यानी एपीपीएसी के आईआईटी बॉम्बे इकाई के एक सदस्य नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, "ये अंतर्द्वंद्व कहां ये आया, कमेटी इस बात की जांच क्यों नहीं करतीं? जो कमेटी अनिकेत अम्बोरे के मामले में बनाई गई और जो कमेटी दर्शन के आत्महत्या की जांच के लिए प्रोफ़ेसर नंद किशोर की अध्यक्षता में बनाई जा रही है, वो आखिर किस पहलू पर जांच कर रही हैं? किस तरह के सबूत जुटाए जा रहे हैं? ये कभी सार्वजनिक नहीं होता."
"इस कमेटी में एक भी स्वतंत्र आवाज़ नहीं होती, कोई बाहर का सदस्य शामिल नहीं होता. दो एससी या एसटी छात्र लिए जाते हैं लेकिन छात्रों की आवाज़ को प्रोफ़ेसर के लिए प्रभावित कर देना कितना आसान है ये बताने की ज़रूरत नहीं है. सब कुछ तो भूल जाइए, दर्शन सोलंकी के मामले में एडमिनिस्ट्रेशन की कमेटी में एक भी सोशल साइंस विभाग का सदस्य शामिल नहीं है जबकि संस्थान में ये विभाग है, जाति पर काम करने वाले प्रोफ़ेसर और रिसर्च के छात्र हैं."

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अनिकेत अम्बोरे बीटेक चौथे साल के छात्र थे और खुदकुशी करने से 15 दिन पहले उन्होंने अपने परिजनों से कहा था कि वह जेईई की परीक्षा दोबारा देना चाहते हैं और ज़्यादा नंबर लाकर जनरल कैटेगरी से दाखिला लेना चाहते हैं.
एपीपीएसी के सदस्य कहते हैं कि "कमेटी का ये कहना कि अनिकेत अम्बोरे ने अपने भीतर के द्वंद के कारण आत्महत्या कर ली शर्मनाक है, क्योंकि उन्हें ये पता लगाना चाहिए था कि आखिर चौथे साल में आकर किसी छात्र को दोबारा जेईई की परीक्षा देने का ख्याल क्यों आया? किस तरह की परिस्थिति में इंसान ये सोच सकता है कि उसे अपने जीवन के चार साल भूलकर फिर से पहले साल से सब कुछ शुरू करना है.
कैंपस में जाति के आधार पर भेदभाव की कहानी सिर्फ़ आईआईटी, आईआईएम तक सीमित नहीं है लेकिन इन समुदाय से आने वाले आईआईटी और आईआईएम के छात्र बताते हैं कि "बाकी जगहों पर इस पर थोड़ी बात हो जाती है, लेकिन इन संस्थानों में इस बारे में बात करना या कॉलेज प्रशासन का इसे एक समस्या मानने से इनकार कर देना, हमारे लिए और मुश्किल बनाता है."

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'विदेशों में भी पीछा नहीं छोड़ती जाति'
जाति के नाम पर किसी को शर्मिंदा करने का सिलसिला देश के बाहर भी दलित छात्रों और पिछड़ों का पीछा नहीं छोड़ता.
याशिका दत्त न्यूयॉर्क में रहती हैं, पेशे से पत्रकार हैं, उन्होंने अपनी जातीय पहचान पर एक संस्मरण 'कमिंग आउट एज़ दलित' लिखा.
बीबीसी से बात करते हुए वह कहती हैं, "कोटा स्टूडेंट कहना, किसी की सारी उपलब्धि को ये कहकर ख़ारिज करना कि वह संविधान से मिले अधिकार का इस्तेमाल करके आया है तो उसमें मेरिट नहीं है, उसने सवर्ण समुदाय की सीट खा ली. ये ऐसी चीज़ है कि धीरे-धीरे उस जाति से आने वाले के भीतर शर्म भर देती है. कॉलेज का पहला दिन होता है और सीनियर खुले आम पूछते हैं 'कोटा स्टूडेंट' कौन है इनमें से. जातिगत भेदभाव शैक्षणिक संस्थानो में खुलेआम होते हैं."
"मैं भंगी समाज से आती हूं और इसे तो लोग आम बोलचाल में ही गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं. मैं जब स्कूल में थी तो मेरे माता-पिता ने मुझसे कहा था कि किसी भी हालत में लोगों को अपनी जाति मत पता चलने देना. वो मुझे हर वो चीज़ देते थे जो उनके बस में थी लेकिन एक बात जो मेरी मां को हमेशा पता थी कि वह बदल नहीं सकती वह थी मेरी जाति से जुड़ी मेरी पहचान."
"जाति के नाम से शर्मसार इस हद तक किया जाता है कि आप संस्थान से पास होने के बाद भी खुद की जाति को अपनी पहचान का हिस्सा बनाने में शर्म करने लगते हैं."
लेकिन अमेरिका में जातिगत का भेदभाव होते हैं?
याशिका कहती हैं कि "ये अमेरिका में भी आ चुका है. भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका में सबसे तेज़ी से फलने-फूलने वाला समुदाय है और यहां दफ़्तरों में, कॉलेज में भारतीय काम करते हैं, प्रोफ़ेसर हैं और वहां कई बार पिछड़ी और अनुसूचित जाति से आने वाले लोगों के लिए कहा जाता है- ये कोटा ले-लेकर यहां भी आ गए."
अमेरिका के सिएटल की सिटी काउंसलर क्षमा सावंत ने जातीय भेदभाव पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पेश किया गया. जिसे मंगलवार को पारित किया गया. सिएटल पहला अमेरिकी शहर बन गया है जहां जाति आधारित भेदभाव को प्रतिबंधित कर दिया गया है.
ये कानून इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सिएटल में लगभग सभी बड़ी कंपनियों का आफ़िस हैं, और क़ानून के लागू होने से राज्य में सभी कंपनियों के दफ़्तरों पर जातिगत भेदभाव पर रोक लगेगी. सिएटल में बड़ी तादाद में दक्षिणी एशियाई लोग रहते हैं और इस प्रस्ताव का पारित होना ऐतिहासिक माना जा रहा है.
'सम्मान के साथ मौत का भी ना मिलना'
दर्शन सोलंकी की मौत के बाद 12 फ़रवरी की शाम को 6 बजकर 40 मिनट पर आईआईटी बॉम्बे के डायरेक्टर की ओर से एक इमेल सभी छात्रों को भेजा गया लेकिन इस इमेल में दर्शन सोलंकी का नाम लिखने की जगह उन्हें बस 'बीटेक फर्स्ट ईयर स्टूडेंट' कहा गया.
स्वप्निल गेदाम कहते हैं, "पहले मुझे लगा कि यह मेल करने का एक तरीका है जिसमें जिसकी मौत होती है उसका नाम नहीं लिखा जाता, लेकिन फिर मैंने पुराने इमेल देखे और इससे पहले जिन छात्रों के साथ कुछ अनहोनी हुई उनके नाम मेल में लिखे गए थे."
"मतलब मरने के बाद भी किसी के नाम को लोगों से छुपाया जाए इससे ज्यादा तौहीन क्या हो सकती है, आप किसी की सम्मानजनक मौत का भी अधिकार उससे छीन ले रहे हैं.
बीबीसी से पांच आईआईटी बॉम्बे के छात्रों ने बताया कि जब पहली बार शोक मार्च निकाला गया तो कई लोगों को ये भी नहीं पता था कि जिसने आत्महत्या की उसका नाम क्या है.
जब छात्रों ने इस बात पर नाराज़गी जताई तो 12 फरवरी की देर रात साढ़े ग्यारह बजे प्रशासन की ओर से एक और मेल आया जिसमें दर्शन सोलंकी का नाम लिखा गया था.
एम्स: जहां एससी,एसटी छात्रों को बार-बार फेल होना पड़ता है
बीते साल दिल्ली स्थित देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज एम्स को लेकर आई संसदीय कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि पक्षपातपूर्ण रवैये और भेदभाव के कारण एम्स से एमबीबीएस करने वाले एससी, एसटी छात्रों को बार-बार परीक्षा में फेल किया जाता है.
बीजेपी नेता किरीट प्रेमभाई सोलंकी की अध्यक्षता में बनी एससी-एसटी वेलफेयर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में ये भी कहा था कि दलित और आदिवासी समुदाय से आने वाले लोगों को फैकेल्टी में नौकरी पाने के दौरान भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
सिर्फ़ आईआईटी में रिसर्च के लिए कितने लोग पिछड़ी, अनुसूचित जाति और जनजाति से चुने जाते हैं, उसे लेकर जो तस्वीर आंकड़े पेश कर रहे हैं उन्हें ज़रा समझिए.

रोहित वेमुला और दर्शन सोलंकी: दो सपने जिन्हें देखा गया लेकिन जिया नहीं जा सका
रोहित वेमुला और दर्शन सोलंकी: दो सपने जिन्हें देखा गया लेकिन जिया नहीं जा सका
1948 में देश की आज़ादी के एक साल बाद छुआछूत को ख़त्म कर दिया गया, ये दस्तावेज़ों से तो मिटाया गया लेकिन इसे समाज से नहीं हटाया जा सका.
हर दिन देश की अलग-अलग जगहों से जातिगत भेदभाव, हिंसा और अत्याचार की तस्वीरें सामने आती रहती हैं.
साल 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी में पीएचडी छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या से पहले लिखे गए अपने आखिरी ख़त में लिखा था- मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था कार्ल सेगन की तरह , लेकिन आखिर में बस ये चिट्ठी ही है जो मैं लिख रहा हूं. मेरा पैदा होना ही एक दुर्भाग्य रहा.

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लगभग छह साल बाद दर्शन ने आत्महत्या की और 18 साल के इस बच्चे ने अपनी पीछे कोई आखिरी चिट्ठी नहीं छोड़ी.
उनके पिता रामेशभाई सोलंकी कहते हैं, "खूब पढ़ता था मेरा बेटा. वो सहता बहुत था, उसकी बचपन से आदत थी सब कुछ दबा कर अपने अंदर रखने की. लेकिन मेरे बच्चे को आखिर कितना सताया होगा कि उसने मर जाना बेहतर समझा. मेरा दर्शन गया, मुझे वो नहीं मिल सकता लेकिन मैं लड़ूंगा कि किसी कॉलेज में कोई और दर्शन ना बने...बस यही मेरी लड़ाई है."
स्वप्निल गेदाम बताते हैं कि "यहां जाति को लेकर क्या माहौल है, ये ऐसे समझिए कि 17 जनवरी को हम रोहित वेमुला की मौत की बरसी पर आपस में एक बैठक करना चाहते थे, कोई बाहर से आमंत्रित नहीं था, लेकिन हमें उसके लिए इजाज़त नहीं मिली.
सिक्योरिटी ने हमें तय जगह पर मिलने नहीं दिया लेकिन यहां सरस्वती पूजा होती है, शिवाजी महाराज की जयंती का आयोजन होता है तो उसमें कभी किसी तरह के सिक्योरिटी के सवाल नहीं आते."
रोहित वेमुला और दर्शन सोलंकी दोनों ने सपने देखे- लेकिन दोनों ही अपने सपने को जी नहीं पाए.

महत्वपूर्ण जानकारी-
मानसिक समस्याओं का इलाज दवा और थेरेपी से संभव है. इसके लिए आपको मनोचिकित्सक से मदद लेनी चाहिए, आप इन हेल्पलाइन से भी संपर्क कर सकते हैं-
समाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय की हेल्पलाइन- 1800-599-0019 (13 भाषाओं में उपलब्ध)
इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यमून बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज-9868396824, 9868396841, 011-22574820
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