डर के साये में शंकर बिगहा का दलित टोला

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
डेढ़ दशक पहले 1999 में बिहार के जहानाबाद इलाक़े में जाड़े की एक रात दलित समुदाय के 22 लोगों की हत्या कर दी गई थी.
लेकिन शंकर बिगहा गाँव में उस रात हुए हत्याकांड के लिए किसी को सज़ा नहीं हो सकी.
तेरह जनवरी, 2014 को जहानाबाद ज़िला अदालत ने सभी 24 अभियुक्तों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया.
डर से मुकरे गवाह
रात के अंधेरे में शंकर बिगहा गांव ख़ामोशी में डूबा हुआ है. सर्दी की ऐसी ही एक रात के अंधेरे में 1999 में इस गांव के दलितों की हत्या कर दी गई थी.

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अदालत के सभी अभियुक्तों को रिहा कर दिए जाने के बाद दलित समुदाय अब दहशत में है. यह डर उनकी बातचीत में झलकता है.
भैरों राजवंशी की पत्नी और दो बच्चों सहित उनके परिवार के पांच लोग इस हत्याकांड में मार डाले गए थे. भैरों उसके चश्मदीद गवाह थे.
इस मामले के सरकारी वकील रहे अरविंद कुमार दास कहते हैं, "घटना की सूचना देने वाले के साथ सभी गवाह अदालत में पुलिस को दिए अपने बयान से मुकर गए. इसी के आधार पर अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया."
चश्मदीद गवाह भैरो राजवंशी ने अभियुक्तों की पहचान करने से इनकार क्यों कर दिया?
भैरों के अनुसार, "प्रशासन से सुरक्षा नहीं मिलने के कारण हमने डर से ऐसा कहा."
उस दहशत भरी रात को याद करते हुए वह कहते हैं, "ख़बर सुनने के बाद मन में डर बैठ गया है कि वैसी ही घटना कहीं फिर न हो जाए."
रोज़ी-रोटी की समस्या

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एक दूसरे गवाह रामप्रसाद पासवान का कहना था, "गोली लगने के बाद मैं गिर गया था तो किसी को पहचानता कैसे?"
गांव के पूर्वी टोले की जिस गली में सोलह साल पहले नरसंहार हुआ था, उसी गली में 25 साल के मनोज कुमार से मुलाक़ात हुई.
उन्हें अफ़सोस है कि गवाहों के मुकर जाने से अभियुक्तों को छोड़ दिया गया. उन्हें लगता है कि गवाहों के मुकरने की वजह कुछ दूसरी हैं.
वह कहते हैं कि दलित समुदाय के लोग असुरक्षित महसूस करते हैं. उनके लिए रोज़ी-रोटी की समस्या ज़्यादा भयानक है.
'इंसाफ़ मिला'

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इस हत्याकांड के ज़्यादातर अभियुक्त शंकर बिगहा से पूरब में बमुश्किल एक किलोमीटर दूर घोबी बिगहा गांव के रहने वाले सवर्ण जाति के लोग थे.
कौशल किशोर शर्मा अपने दो भाइयों के साथ इस मामले में अभियुक्त बनाए गए थे. उन्हें अदालत के फ़ैसले पर संतोष है.
वह कहते हैं, "हमें अदालत पर भरोसा था और वहां से न्याय मिला. हम बेवजह राजनीतिक कारणों से फंसाए गए थे."
बरी हुए एक दूसरे अभियुक्त अमरेंद्र शर्मा के अनुसार घटना वाली रात वे गुजरात के सूरत शहर में थे. जहां वह एक निजी कंपनी में काम करते थे.
'लोकतंत्र की विफलता'

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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की बिहार इकाई इस हत्याकांड के ख़िलाफ़ आंदोलन का नेतृत्व करती रही है. पार्टी के राज्य सचिव कुणाल इस फ़ैसले को न्याय का संहार क़रार देते हैं.
वह कहते हैं, "गवाहों में विश्वास भरना सरकार और पुलिस प्रशासन की ज़िम्मेवारी है जिसमें वे पूरी तरह से विफल रहे हैं."
पटना में अनुग्रह नारायण सिंह सामाजिक अध्ययन संस्थान के निदेशक डाक्टर डीएम दिवाकर का कहना है कि अभियुक्तों का छूट जाना लोकतंत्र और न्यायिक व्यवस्था की विफलता का सबूत है.

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दिवाकर के अनुसार, "सरकार और न्यायालय अगर ग़रीब के पक्ष में खड़े नहीं होते तो लोकतंत्र में लोगों का विश्वास कम होता जाएगा. और यह बहुत भयावह स्थिति होगी."
नरसंहार के बाद शंकर बिगहा गांव को सड़क से जोड़ दिया गया था. लेकिन गांव को अब भी बिजली का इंतज़ार है. बिहार में बीते तीन सालों के दौरान यह पांचवां फ़ैसला है जब नरसंहारों के सभी अभियुक्तों को बरी किया गया है.
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