बिहार चुनाव: क्या नीतीश कुमार के महादलित टोले में जाने से बदली लोगों की ज़िंदगी?

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, चिलबिली पंचायत से
"गाड़ी से उतरे और बृजनंदन रविदास से झंडा फहरवा के थोड़ी देर भाषण देकर चले गए. एक भी लेडीज़ से बात नहीं किए. वो बात करते तो हम उनको बताते कि हमें क्या चाहिए."
बिहार की राजधानी पटना से सटे चिलबिली गांव की एक बहुत छोटी सी श्रृंगार दुकान में जुटी तक़रीबन पंद्रह महिलाओं में से रेखा देवी की आवाज़ सबसे स्पष्ट और तेज थी.
अपने घर में शौचालय से महरूम रेखा देवी 15 अगस्त 2016 का ज़िक्र कर रही थीं जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके महादलित टोले में झंडा फहराने आए थे.
पटना ज़िले के 23 प्रखंडों में से एक फुलवारी-शरीफ़ की चिलबिली पंचायत में मुख्यमंत्री साल 2015 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद आए थे.

सब ढकोसला था
रेखा देवी ने मंच पर 70 साल के बृजनंदन रविदास को झंडा फहराते देखा और अपने टोले के कायाकल्प हो जाने के सपने बुन लिए थे.
वो बताती है, "बहुत दिन तक नींद नहीं पड़ी थी. इतना मजमा पहली बार देखे थे. लेकिन अब तो लगता है कि सब ढकोसला था. ना रोज़गार मिला, ना डॉक्टर और ना ही शौचालय."
ऐसा नहीं कि नाउम्मीदी सिर्फ़ रेखा देवी के हाथ आई. वो तो इस टोले मे पसरी हुई है. सविता देवी साल 2016 में 33 साल की उम्र में विधवा हो गई थीं. वजह थी कि उनके पति शैलेन्द्र कुमार को समय रहते इलाज नहीं मिला.
चार बच्चों की मां सविता, जीविका योजना के ज़रिए मिली एक छोटी सी दुकान चलाकर अपना गुज़ारा कर रही हैं. रोज़ाना बमुश्किल 50 रुपये कमाने वाली सविता बताती हैं, "नवंबर में बीमार पड़े. सर्दी लगकर बुखार आया. पहले तो गांव के ही झोलाछाप डॉक्टर को दिखाया लेकिन जब बात बिगड़ी तो 7 किलोमीटर दूर वाल्मीचक मोड़ स्थित अस्पताल ले गए. गांव का अस्पताल कभी खुला ही नहीं. तो ना इलाज मिला - ना दवाई."
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मुख्यमंत्री की घोषणाएं
15 अगस्त 2016 को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक़, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस पंचायत में नया उप-स्वास्थ्य केन्द्र भवन, आंगनबाड़ी केन्द्र और सामुदायिक भवन के निर्माण कराए जाने की घोषणा की. वहीं उन्होने चिलबिली पंचायत में बारहवीं तक का स्कूल खोलने की भी घोषणा की.
उस दिन नीतीश कुमार ने चिलबिली के महादलित टोले में सामाजिक सुरक्षा पेंशन, बिहार राज्य नि:शक्तता पेंशन, कन्या सुरक्षा योजना सहित कई योजनाओं के लाभार्थियों को टोकन के तौर पर स्वीकृति भी दी थी. बता दें राज्य में स्वाधीनता दिवस पर महादलित टोलों में झंडा फहराने का कार्यक्रम होता है जिसमें टोले का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति मुख्यमंत्री के सामने झंडा फहराता है.

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ज़मीन पर क्या हुआ
मुख्यमंत्री की घोषणाओं के ठीक चार साल बाद, चिलबिली में उप-स्वास्थ्य केन्द्र के ठीक सामने अब पीले रंग की 'आयुष्मान भारत' की चटक बिल्डिंग तैयार हो गई है.
लेकिन इसकी बदहाली की कहानी बदस्तूर जारी है. आयुष्मान भारत की बिल्डिंग पर ताला लटका है और खिड़की के शीशे टूटे हुए हैं.
नाथू रविदास ने बीबीसी को बताया, "पहले जो स्वास्थ्य उपकेन्द्र था उसमें 1975 तक डॉक्टर भी बैठते थे लेकिन फिर धीरे धीरे सिर्फ़ एएनएम और चपरासी ही यहां रह गए. अब तो आयुष्मान भारत में सिर्फ़ एएनएम आती है और वो महीने में तीन चार बार सिर्फ़ टीकाकरण के लिए आती है."
बीबीसी ने जब यहां पदस्थापित एएनएम विमला देवी से संपर्क किया तो उन्होने बताया, "कोरोना के चलते उनकी तैनाती किसी दूसरी जगह की गई है." लेकिन टोले वालों की शिकायत थी कि आयुष्मान भारत केन्द्र महीने में कुछ ही दिन खुलता है.
चिलबिली में सामुदायिक भवन तो साल 2018 में ही बनकर तैयार हो गया था लेकिन उसकी चाबी टोले वालों को नहीं दी गई. नतीजा ये हुआ कि सामुदायिक भवन के गेट पर ताला लगा होने के बावजूद लोग दीवार फांदकर अंदर बैठकर ताश खेलते या ऊंघते दिखते हैं.
वार्ड के 20 साल से पार्षद रमेश चन्द्र आज़ाद ने बीबीसी से कहा, "ये चाबी विकास मित्र या पार्षद को मिलनी चाहिए जो नहीं दी गई. बाकी आंगनबाड़ी केन्द्र अभी बन रहा है और नल-जल की योजना पर काम हो रहा है."

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8 किलोमीटर दूर है पीएचसी, टूटी सड़कें
चिलबिली के महादलित टोले की मुख्य सड़क से दूरी 1 किलोमीटर से अधिक है. उबड़-खाबड़ सड़क, किसी अच्छे-भले स्वस्थ आदमी को भी बीमार बना सकती है.
आयुष्मान भारत की इमारत से इलाज नहीं मिलने के चलते गांव वालों के लिए सबसे निकटस्थ प्राइमरी हेल्थ सेंटर, फुलवारी शरीफ़ है, जो यहां से 8 किलोमीटर दूर है.
18 साल की सरिता कुमारी 5 महीने की गर्भवती हैं. ये उसका दूसरा बच्चा है लेकिन अब तक उसने किसी डॉक्टर से परामर्श नहीं लिया है.
दुबली पतली सी इस लड़की ने मुझसे कहा, "क्या कर सकते हैं? पति का काम बंद है, पैसे हाथ में नहीं हैं. गांव में सरकारी डॉक्टर बैठते नहीं हैं. खाने को भी ठीक से नहीं मिल रहा है. सरकार से बस इतनी ही मदद है कि आशा आकर इंजेक्शन लगा देती हैं. जब आठवां महीना लगेगा, तब अस्पताल जाएंगे."
टोले के लोग बताते है कि मुख्यमंत्री के 2016 में आने से पहले रोड को 'अस्थायी तौर पर' ठीक किया गया था लेकिन उसके बाद कभी रोड ठीक करने का काम नहीं हुआ.

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'पनसोखा' शौचालय हुए बेकार
2016 में मुख्यमंत्री के आने के बाद यहां महादलित टोले में शौचालय बनवाए गए. कुछ शौचालय पनसोखा (दो ईटों को कुछ दूरी पर रखकर बनाए जाते हैं) तो कुछ बिना पानी की सप्लाई और मैला टंकी वाले. ये दोनों ही तरह के शौचालय अब बेकार हो गए हैं.
तारा देवी, देवलक्ष्मी देवी, गुडिया देवी, सुमंती देवी समेत दर्जनों महिलाओं ने बीबीसी से बताया, "ये शौचालय कुछ ही दिन चले. उसके बाद ये बेकार हो गए. अब हम लोगों को फिर से डब्बा लेकर खेत में जाना पड़ता है. चूंकि अभी खेतों में घुटने से ऊपर तक का पानी लगा है, इसलिए हम लोग रोड पर जाते हैं."
वहीं टोले के जिन घरों में लोगों ने ख़ुद के पैसे लगाकर शौचालय बनवा लिया, उनको अब तक सरकार से मिलने वाला 12 हज़ार का अनुदान नहीं मिला है. रिंकू देवी और नीलम देवी कहती है, "चक्कर लगाते लगाते थक गए हैं बाबू के, पैसा ही नहीं मिला. हम ग़रीबों के साथ सरकार को बेईमानी नहीं करनी चाहिए."

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नौजवान कहते हैं - कोई काम नहीं यहां
रूबी कुमारी इस टोले की पहली मैट्रिक पास लड़की हैं. वो अब अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री ले रही हैं. उसका 9 लोगों का परिवार मज़दूरी करके दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करता है.
निराश रूबी बीबीसी से कहती हैं, "पहले सरकार साइकिल और पोशाक के पैसे दी थी तो लगता था कि नौकरी भी देगी पढ़ाई लिखाई करने पर, लेकिन अब कोई उम्मीद नहीं."
वहीं इस टोले का रतीश दिल्ली में चूड़ी से जुड़े कारोबार में मज़दूरी करता है. कोरोना के वक्त से वो अपने गांव चिलबिली में है. मैं जब उससे मिली तो वेअपने दोस्त रिंकू के साथ मछली पकड़ रहा था.
वो बताते हैं, "यहां कोई काम नहीं है. काम के लिए फिर दिल्ली वापस जाना ही होगा."

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चुनाव को लेकर कोई उत्साह नहीं
इस महादलित टोले में 4500 की आबादी रहती है जिसमें 700 ही वोटर हैं. रविदास उपजाति की आबादी यहां सबसे ज़्यादा है. बिहार में दलित राजनीति को लेकर चल रही सरगर्मियों के बीच, इस टोले में वोट को लेकर कोई उत्साह नहीं. टोले की चानो देवी कहती है, "नेता आएगा, वोट लेगा और गायब हो जाएगा. तो वोट के बारे में क्यो सोंचे?"
राज्य महादलित आयोग के अंतिम अध्यक्ष हुलेश मांझी है. उनका कार्यकाल 17 मई 2016 को ख़त्म हुआ जिसके बाद सरकार ने आयोग में अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की.
हुलेश कहते है, "मुख्यमंत्री को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, ज़िम्मेदारी तो अधिकारियों की है जो जाति आधारित भेदभाव से ऊपर ही नहीं उठ पा रहे हैं. नतीजा है कि सरकार की अच्छी और प्रभावी योजनाएं लोगों को लाभ नहीं पहुंचा पा रही है."

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मुसहर समाज
राज्य में महादलितों की आबादी तकरीबन 16 फ़ीसदी है. मुसहर समाज महादलितों में भी सबसे ज़्यादा हाशिए पर है. साल 1952 में किराय मुसहर ने सोशलिस्ट पार्टी से मधेपुरा से चुनाव लड़ा और जीता था. उसके बाद मिसरी सदा, नवल किशोर भारती, जीतन राम मांझी, भगवती देवी इस समुदाय से प्रभावशाली नेता के तौर पर सामने आए. लेकिन इस समुदाय के जीवन में कोई महत्वपूर्ण और व्यापक बदलाव ला पाने में असफल रहे.
फादर टी निशांत 'मुसहर्स': ए नोबलपीपल, ए रीसाइलेन्ट क्लचर के लेखक हैं.
वो कहते है, "पूरे महादलित समाज में परिवर्तन की गति बहुत धीमी है. साथ ही महादलित समाज से आए पुराने नेता, अपने समाज के बारे में कोई नीतिगत हस्तक्षेप कर पाने में सफल ना भी रहे हों, लेकिन वो अपने समाज के बारे में सोचते थे. लेकिन अभी के महादलित समुदाय के नेता सिर्फ़ अपने बारे में सोचते है."
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