साइकिल रिपेयरिंग, बुनकरी और सब्ज़ी बेचकर गुज़ारा करते यूपी के मदरसों के मॉडर्न टीचर

    • Author, अनंत झणाणें
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक मार्च, 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में कहा था, "पूरी खुशहाली और समग्र विकास तभी संभव है, जब आप यह देखें कि मुस्लिम युवाओं के एक हाथ में कुरान शरीफ है तो दूसरे हाथ में कंप्यूटर है."

उन्होंने कहा था कि आज सबसे ज़्यादा ज़रूरत इस बात की है कि हमारे युवा एक तरफ मानवीय इस्लाम से जुड़े हों और दूसरी तरफ आधुनिक विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकें.

वहीं इस साल के शुरू में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दूरदर्शन को एक इंटरव्यू दिया था. इसमें उन्होंने मदरसों में मॉडर्न एजुकेशन पर ज़ोर दिया था. उनका कहना था, "हम लोगों को तय करना होगा कि हम अपनी वर्तमान पीढ़ी को कहां ले जाना चाहते हैं."

उन्होंने कहा था, "कितने मौलवी और मुंशी चाहिए आपको? कितने मुतवल्ली चाहिए? आपकी परंपरागत शिक्षा केवल आपको वो देगी. क्यों नहीं आधुनिक मानी जानी चाहिए? क्या उसे अच्छा नागरिक बनाने, एपीजे अब्दुल कलाम बनने का अधिकार उस नौजवान के लिए नहीं है जो मदरसे में पढ़ रहा है? अगर उसको विज्ञान के बारे में, गणित के बारे में, कंप्यूटर के बारे में शिक्षा देने के किसी अभियान को सरकार चलती है तो उसका विरोध क्यों?"

उत्तर प्रदेश के सरकारी मदरसों के हज़ारों मॉडर्न टीचर्स पर आधुनिक शिक्षा देने का ज़िम्मा है. लेकिन ये मॉडर्न मदरसा टीचर पिछले साढ़े छह साल से केंद्र सरकार से मिलने वाले वेतन का इंतज़ार कर रहे हैं. अब वो गुज़ारा करने के लिए साइकिल रिपेयरिंग, फ़ूड डिलीवरी, बुनकरी, सब्ज़ी बेचने, ज़रदोज़ी के काम और ट्यूशन पढ़ाने को मजबूर हैं.

धिक्कारता है हमारा ज़मीर...

संत कबीर नगर के इम्तियाज़ अहमद दिन के पांच घंटे मदरसे में बच्चों को विज्ञान पढ़ाते हैं.

वो कहते हैं, "मैं दो बजे तक मदरसे में पढ़ाता हूं. उसके बाद मैं साइकिल की दुकान पर नौकरी करता हूं. छह साल से केंद्र सरकार से 12 हजार रुपये का वेतन नहीं मिला है."

इम्तियाज़ कहते हैं, "आदमी को एक तारीख़ को वेतन नहीं मिलता है तो दूसरी तारीख़ तक वह परेशान हो जाता है. पिछले छह साल से हम बिना वेतन के कैसे अपना गुज़ारा कर रहे, ये हमीं लोग जानते हैं."

बात करते हुए इम्तियाज़ की आंखों से आंसू झरने लगते हैं. आंसू पोछते हुए वो कहते हैं, "मैं एक साल से अपने बच्चों की स्कूल की फीस नहीं दे पा रहा हूं. अपने बच्चों को कैसे पढ़ाऊंगा? पंचर बना कर किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं. कई बार धरना दिया गया, ज्ञापन दिए गए. मिलता है तो बस आश्वासन और वो भूल जाते हैं. हमारा ज़मीर तो हमें धिक्कारता है, लेकिन क्या करें हार मान गए हैं. सरकार हम लोगों के लिए कुछ नहीं कर रही है."

साइकिल मरम्मत करके इम्तियाज़ दिन में क़रीब 100 रुपये कमा लेते हैं. राज्य सरकार हर महीने दो-तीन हज़ार रुपये देने की कोशिश करती है. इम्तियाज़ कहते हैं, "वो भी पांच महीने से नहीं आ रहा है."

सरकार से गुहार लगते हुए वो कहते हैं, "हम चाहते हैं कि सरकार हमें हमारा बकाया वेतन दे और आगे से हमारी जो भी तनख्वाह है, वो समय से मिले."

वो कहते हैं, "अभी तो हम लोग बस आश्वासन पर लोग जी रहे हैं."

कपड़े बुनने को मजबूर मॉडर्न टीचर

अमीर अशरफ़ बनारस के एक मदरसे में 11 साल से हिंदी और साइंस पढ़ा रहे हैं.

मदरसे में पढ़ाई ख़त्म होने के बाद वो पास ही के पावर लूम में बनारसी साड़ी बुनने पहुंच जाते हैं.

वो कहते हैं, "हम लोग पारंपरिक बुनकर हैं, जब मैं मॉडर्न टीचर बना बहुत खुशी हुई. लेकिन 2017 से जब केंद्र सरकार से मिलने वाली तनख्वाह पूरी तरह से रोक दी गई तो मैं फिर वापस अपने बुनकर पेशे में चला आया."

जब बनारसी साड़ी का काम मंदा पड़ जाता है तो अशरफ़ गारा-मिट्टी का काम करने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

वो कहते हैं, "अगर मेरी तनख्वाह नियमित आती तो मैं भी अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचता. कभी-कभी तो ऐसा होता है कि बच्चों को दूध पिलाने के लिए भी पैसे नहीं रहते हैं. बच्चों की हालत देखकर मुझे मज़दूर बनाना पड़ा. आख़िर कहीं न कहीं से पैसे का इंतज़ाम करना ही पड़ेगा."

कौन पढ़ने जाता है मदरसे में

इस साल जून में भोपाल में भाजपा के कार्यकर्ता सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पसमांदा मुसलमानों के पिछड़ेपन का मुद्दा उठाया था.

उन्होंने कहा था, "जो पसमांदा मुसलमान भाई-बहन हैं उनका तो जीना भी मुश्किल हो गया है. वो तो तबाह हो गए हैं, उनको कोई फ़ायदा नहीं मिला. वो कष्ट में गुज़ारा करते हैं. उनकी आवाज़ सुनाने को कोई तैयार नहीं है. जो पसमांदा मुसलमान हैं, उन्हें आज भी बराबरी का हक़ नहीं मिलता है. उन्हें नीच और अछूत समझा जाता है."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं को बताया था कि पार्टी की 'सबका साथ, सबका विकास' की नीति के तहत पसमांदा मुसलमानों को सरकार की योजनाओं से जोड़ने का काम हुआ है.

बनारस के एक मदरसे के मॉडर्न टीचर विनोद मौर्य कहते हैं, "यह सरकार जिस पसमांदा समाज की बात करती है. उसी पसमांदा समाज के बच्चे मदरसों में पढ़ रहे हैं. हम उनको मुख्यधारा में लाने का काम कर रहे हैं लेकिन हमें पिछले साढ़े पांच साल से वेतन नहीं मिल रहा है. इससे हमारी स्थिति बद से बदतर हो चुकी है."

उत्तर प्रदेश का मदरसा शिक्षा बोर्ड ख़ुद मानता है कि मदरसों में पढ़ने वाले 95 फीसदी बच्चे पसमांदा समाज से हैं.

पसमांदा शब्द उर्दू-फारसी का है. इसका अर्थ होता है पीछे छूटे या नीचे धकेल दिए गए लोग. अपने पारंपरिक पेशों की वजह से यह मुसलमान समाज में पिछड़ चुके हैं.

एक अनुमान के मुताबिक़ भारत की कुल आबादी में क़रीब 15 फ़ीसदी मुसलमान हैं. इनमें से क़रीब 80 फ़ीसदी पसमांदा मुसलमान हैं.

मदरसों में 40 फीसदी मॉडर्न टीचर्स ग़ैर मुस्लिम

शमा शुक्ल गोरखपुर के एक मदरसे में मॉडर्न टीचर हैं. वो कहती हैं कि मदरसों में हर मज़हब के टीचर मॉडर्न सब्जेक्ट्स पढ़ाते हैं.

शमा शुक्ल के मुताबिक़, "40 फीसदी तो हिंदू टीचर पढ़ाते हैं."

उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के मुताबिक़ भी तकरीबन 40 फीसदी मॉडर्न टीचर्स ग़ैर मुस्लिम हैं.

शमा शुक्ल बताती हैं कि "तनख्वाह ना मिलने के वजह से वो सिलाई कर गुज़ारा करती हैं. लेकिन, हम कुछ और कर भी नहीं कर सकते हैं. अगर हम नौकरी छोड़ेंगे लोग पूछेंगे की नौकरी क्यों छोड़ दी. वो यह भी कह सकते हैं की हमें नौकरी से निकाल दिया गया है. सब को तो सब चीज़ें पता नहीं होती हैं. इसलिए बेइज़्ज़ती लगती है."

आर्थिक तंगी के बावजूद शमा शुक्ल बड़ी उम्मीद के साथ बच्चों को पढ़ाने के लिए अपने मदरसे में पहुंच जाती हैं. वो कहती हैं, "उम्मीद है कि एक दिन बकाया ज़रूर मिलेगा. अगर हम पढ़ाने नहीं आएंगे तो जो माता-पिता अपने बच्चों को भेज रहे हैं, हम उन्हें क्या जवाब देंगे?"

कब से शुरू हुई मदरसों में आधुनिक शिक्षा

केंद्र सरकार ने मदरसों में अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा देने वाली योजना 1993 में शुरू की थी. इसके तहत मदरसों में मॉडर्न टीचर्स की नियुक्ति की गई.

मॉडर्न टीचर्स बताते हैं कि यह योजना प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने काफी असरदार तरीक़े से चलाई. सरकार ने समय-समय मॉडर्न टीचर्स का वेतन भी बढ़ाया.

मदरसों में मॉडर्न टीचर्स के ज़रिए आधुनिक शिक्षा देने की योजना मूलतः केंद्र सरकार की है. उत्तर प्रदेश मॉडर्न टीचर्स एकता संघ के मुताबिक़:-

  • प्रदेश के 7442 मान्यता प्राप्त मदरसों में मॉडर्न सब्जेक्ट्स पढ़ा रहे 21,546 टीचर्स को पिछले पांच साल से अधिक समय से केंद्र सरकार से उनका वेतन नहीं मिला है.
  • स्कीम के तहत पोस्ट ग्रैजुएट शिक्षकों को 12 हज़ार और ग्रैजुएट शिक्षकों को छह हज़ार रुपये का वेतन मिलता है.
  • इस वेतन का 60 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार देती है और 40 फीसदी राज्य सरकार देती है.
  • मॉडर्न टीचर्स एकता संघ के मुताबिक केंद्र सरकार से मिलने वाला 60 प्रतिशत वेतन रुका हुआ है, इसलिए राज्य सरकार से मिलने वाला वेतन का 40 प्रतिशत हिस्सा भी नहीं मिल पा रहा है.
  • इन 21 हज़ार से ज़्यादा टीचर्स का बकाया वेतन अब बढ़कर 1762 करोड़ रुपये से भी अधिक हो गया है.

आती-जाती चिट्ठियां

उत्तर प्रदेश मॉडर्न टीचर्स एकता संघ के मुताबिक़, वेतन ना जारी होने की एक वजह यह है कि इस योजना को 2021 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को स्थानांतरित कर दिया गया था.

अभी भी राज्य और केंद्र सरकार में उस फंड को रिलीज़ कराने के लिए पत्राचार जारी है.

अखिलेश यादव के कार्यकाल में इस वेतन के अलावा पोस्ट ग्रैजुएट शिक्षकों को 3000 रुपये और ग्रेजुएट शिक्षकों को 2000 रुपये का अतिरिक्त वेतन मिलना शुरू हुआ.

इसे यूपी सरकार बीच-बीच में शिक्षकों को देने की कोशिश करती है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2021 में केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी थी. इसमें उन्होंने मॉडर्न मदरसा टीचर्स का पैसा ना रिलीज़ होने से उनकी आर्थिक स्थिति को काफी दयनीय बताया था.

क्या कहना है मदरसा शिक्षा बोर्ड का

उत्तर प्रदेश के मदरसा शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन डॉ. इफ्तिखार अहमद जावेद कहते हैं कि उन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मॉडर्न टीचर्स का वेतन देने के लिए पत्र लिखा है, लेकिन अबतक कोई जवाब नहीं आया है.

वो कहते हैं कि शिक्षकों की मांगों से जुड़ा एक पत्र वो फिर लिखेंगे.

वो बताते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ख़ुद वेतन दिलाने की कोशिश की है. शिक्षकों के साथ हमारी हमदर्दी है.

वो कहते हैं, "हम चाहेंगे के उन्हें उनका बकाया मिले और मॉडर्न एजुकेशन की स्कीम सही से चले ताकि प्रधानमंत्री के एक हाथ में कुरान और एक हाथ में कंप्यूटर के सपने को पूरा किया जा सके."

निराश हैं लेकिन उम्मीद नहीं छोड़ी है

मोहम्मद आज़म गोरखपुर के एक मदरसे में 28 साल से मॉडर्न टीचर के रूप में पढा रहे थे. लेकिन वो साढ़े छह साल तक तनख्वाह का इंतज़ार करते-करते निराश हो गए.

वो कहते हैं, "मैं काफी हताश और निराश हो गया था. ऐसे में मैंने तीन महीने पहले अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया."

उन्होंने कुछ प्राइवेट स्कूलों में अपनी सीवी भेजी है. लेकिन उन्हें अभी तक उन्हें नई नौकरी नहीं मिली है.

अब वो घर-घर जाकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर गुज़ारा करते हैं. इस तरह वो हर महीने ज़्यादा से ज़्यादा दस हज़ार रुपये कमा पाते हैं.

वो पूछते हैं, "उत्तर प्रदेश में तो डबल इंजन की सरकार है, इसके बाद भी यह योजना सही से क्यों नहीं चल पा रही है."

उन्हीं के साथ मदरसे में पढ़ने वाले नावेद कहते हैं, "जब मॉडर्न टीचर्स की रीढ़ की हड्डी ही टूटने वाली है तो वो शिक्षक मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को कैसे मुख्यधारा में जोड़ेगा?"

नावेद कहते हैं, "हममें निराशा तो बहुत है, लेकिन इस निराशा के साथ एक आशा भी है कि शायद सरकार हमारी बात सुन ले, हमारे दुखों को समझ ले और हमें हमारा पैसा दे दे. निराश तो बहुत होते हैं लेकिन बल हमें इस बात से मिलता है कि हम लोग गरीब बच्चों को शिक्षा देकर उन्हें मुख्यधारा में जोड़ने का काम करना है."

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