कोरोना महामारी के दौरान मोदी सरकार की बनाई आर्थिक टास्क फ़ोर्स थी लापता

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इमेज कैप्शन, कोरोना महामारी के दौरान बड़े पैमाने पर प्रवासी मज़दूरों ने पलायन किया
    • Author, जुगल आर पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

“कोविड संकट एटम बम की तबाही जैसा है. जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में लोगों को उबरने में कितने साल लगे थे? उसी तरह से कोविड संकट समाप्त होने के बाद भी मेरे जैसे कारोबारी अभी भी उससे उबरने में लगे हैं.”

ये कहना है 63 साल के मोहन सुरेश का, जो फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो एंड स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज (एफआईएसएमई) के अध्यक्ष रह चुके हैं. इस फेडरेशन में 700 से ज़्यादा एसोसिएशन शामिल हैं. सुरेश मैन्युफेक्चरिंग फर्म टेक्नोस्पार्क चलाते हैं, जिसका मुख्यालय बेंगलुरु में है.

उनकी कंपनी के ब्रोशर के पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वो तस्वीर है जिसमें वे 12वीं सदी के समाज सुधारक बसवेश्वर की प्रतिमा का लंदन में अनावरण कर रहे हैं. ये प्रतिमा इनकी ही कंपनी ने बनाई थी, जिसका दावा है कि वह भारत की नंबर एक इंडस्ट्रियल ग्रेनाइट सिस्टम मैन्युफेक्चरर है.

लेकिन आज उनकी कंपनी के बैंक खाते से लेन-देन पर रोक लगी हुई है. सुरेश के मुताबिक, बैंक ने उनके खाते को नॉन परफॉर्मिंग असेट घोषित कर दिया है.

जब हम उनकी फैक्ट्री में उनसे मिले तो उन्होंने कहा, “हमारी मुश्किलों पर किसी का ध्यान नहीं है. लघु एवं मध्यम कुटीर उद्योग धंधों में करीब 30 प्रतिशत की हालत ख़राब है. कई बंद हो चुके हैं. मैं प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से अनुरोध कर रहा हूं कि हमारे ऊपर ध्यान दिया जाए.”

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इमेज कैप्शन, मोहन सुरेश की फैक्ट्री की तस्वीर

मुंबई में जब हम उदित कुमार (बदला हुआ नाम) से मिले तो रात के आठ बज चुके थे. वे अपने काम से घर लौटे ही थे. कोविड संकट से पहले उदित कुमार एक बार एवं रेस्टोरेंट के मालिक थे लेकिन अब उनके पास फुटपाथ पर एक छोटी सी जगह है, जहां वो आमलेट बेचते हैं.

उन्होंने बताया, “मेरी ये स्थिति इसलिए हो गई क्योंकि कोविड संकट के दौरान आम लोगों और कारोबारियों की मदद के लिए जो नीतियां बनाई गईं उसका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं था. मेरे यहां 12 लोग काम करते थे. लेकिन किसी बैंक ने मेरी मदद नहीं की. क्यों? मुझे कहा गया कि मैं किराए की जगह पर काम कर रहा हूं इसलिए मैं किसी मदद की पात्रता नहीं रखता. मुझे काफी महंगे दर पर लोन लेना पड़ा लेकिन कोविड संकट की दूसरी लहर के बाद मैं इसे भी जारी नहीं रख पाया.”

फेडरेशन ऑफ कर्नाटक चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (केएफसीसीआई) के अध्यक्ष रमेश चंद्र लोहाटी बताते हैं कि कोविड संकट के समय सरकार ने साथ दिया लेकिन “2022 के बाद ऐसी कोशिशें लगभग बंद हो गईं जबकि अभी भी एक चौथाई फर्म संकट से उबरने की कोशिश कर रहे हैं.”

सुरेश, उदित और दूसरों का यह हाल क्यों है?

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देशभर में लॉकडाउन की घोषणा से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त मंत्री के नेतृत्व में कोविड-19 इकोनॉमिक रेस्पांस टास्क फ़ोर्स के गठन की घोषणा कर दी थी. यह घोषणा 19 मार्च, 2020 को की गई थी.

उन्होंने टॉस्क फोर्स के गठन की घोषणा करते हुए कहा था, “आने वाले दिनों में यह टॉस्क फोर्स, सभी साझेदारों के साथ नियमित बातचीत और फीडबैक के अधार पर सभी परिस्थितियों का आकलन करते हुए फ़ैसले लेगी ताकि आर्थिक मुश्किलों को कम से कम करने के लिए सभी क़दम कारगर ढंग से उठाए जा सकें.”

बीबीसी की पड़ताल में, ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता है जिससे ज़ाहिर हो कि इस टॉस्क फोर्स ने कोई क़दम उठाया हो, या फिर सरकार को सलाह दी हो या फिर कोई एक रिपोर्ट ही जारी की हो. इस टास्क फोर्स का गठन क्यों किया गया था, यह प्रधानमंत्री के बयान से स्पष्ट है.

इस टॉस्क फोर्स की गैर मौजूदगी ने कोविड संकट के ख़िलाफ़ भारत की कोशिशों एवं इसके आज तक मौजूद प्रभावों को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है.

सूचना का अधिकार, 2005 के तहत बीबीसी ने प्रधानमंत्री कार्यालय से 2020 से लेकर 2023 तक के बीच की निम्नांकित जानकारी मांगी:

  • टॉस्क फोर्स की बैठकों के विवरण, इस बैठक की तिथि और इसमें शामिल लोगों के नाम
  • टॉस्क फोर्स के संदर्भ से जुड़ी शर्तें
  • टॉस्क फोर्स की ओर से पेश की गई अंतिम रिपोर्ट
  • क्या टॉस्क फोर्स ने सरकार को देशव्यापी लॉकडाउन लगाने की सलाह दी थी?
  • लॉकडाउन से पहले और बाद में, सरकार की नीतियों को लेकर टॉस्क फोर्स की अनुशंसाएं क्या क्या रहीं?

इन सवालों से जुड़े आवेदनों को प्रधानमंत्री कार्यालय ने वित्त मंत्रालय के पास भेजा.

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सूचना के अधिकार से जुड़े आंकड़ों से पता चलता है कि ये आवेदन वित्त सचिव और व्यय सचिव, डॉ. टीवी सोमनाथन और दूसरे मंत्रालयों को भेजा गया.

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इसके बाद, वित्त मंत्रालय से हमें जवाब मिला कि उन्हें टॉस्क फोर्स के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

हमने इसके बाद फिर से आवदेन और याचिकाएं दी. एक अपील के जवाब में वित्त मंत्रालय ने दोहराया कि आप जो जानकारी मांग रहे हैं, इसके जवाब में हमारे पास कोई जानकारी नहीं है.

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हमने इस दौरान प्रधानमंत्री के टॉस्क फोर्स की बैठकों में शामिल होने की जानकारी भी मांगी, हमें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई.

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टॉस्क फोर्स के गठन की घोषणा के बाद इससे संबंधित कुछ संदर्भ जानकारी बीबीसी को मिली है. 24 मार्च को वित्त मंत्री ने कहा, “टॉस्क फोर्स की कई स्तरों पर वाली संरचना पहले से ही अपना काम कर रही है. छोटे-छोटे समूहों से हमें इनपुट मिल रहा है. हर इनपुट की संबंधित विभाग के साथ विस्तृत समीक्षा की जा रही है और आर्थिक पैकेज पर काम किया जा रहा है.”

2021 में बीबीसी की एक पड़ताल में हमलोगों ने देखा था कि किस तरह से अहम साझेदारों, यानी भारतीय रिज़र्व बैंक, वित्त मंत्रालय, लघु एवं मध्यम कुटीर उद्योग विभाग, श्रम और रोज़गार मंत्रालय और नीति आयोग से बिना किसी सलाह मशविरे के देश भर में लॉकडाउन लगाया गया था.

कोविड संकट के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े फ़ैसले किस तरह लिए जा रहे थे?

प्रोफेसर आशिमा गोयल, 2020 में प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य थीं. वह बताती हैं, “मैं टास्क फ़ोर्स में शामिल नहीं थी. इसलिए मैं उस पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे सकती हूं. लेकिन आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य के तौर पर हम लोगों ने ईमेल और आमने सामने की बैठकों में अपने इनपुट दिए हैं. हमारी नियमित तौर पर बैठकें होती थीं. मेरा ख्याल है कि शुरुआती प्रतिक्रिया के बाद जब सरकार को लगा कि कोविड संकट लंबा चलेगा तो सरकार ने विभिन्न उद्यमियों और विशेषज्ञ समूहों से बातचीत शुरू कर दी और उनके विचार जानने शुरू किए. मुझे लगता है कि हमलोगों ने जो नीतियां अपना वो समग्र तौर पर कारगर रहीं.”

भारत के पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने तब प्रधानमंत्री मोदी से अपील की थी कि वे अपने आर्थिक सलाहकारों को बर्ख़ास्त करके, नयी टीम चुनें.

उन्होंने मुझसे कहा, “मुझे नहीं मालूम कि घोषणा के बाद टास्क फ़ोर्स का क्या हुआ. लेकिन मैं देख पा रहा हूं कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह नाकाम रही. उसके उपाय किसी काम के नहीं थे. सरकार पूरी तरह से तैयार नहीं थी.”

उन्होंने दावा किया, “लघु एवं मध्यम कुटीर उद्योग में हज़ारों फर्म कोविड के बाद बंद हो गए. इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही रही है कि सरकार इन्हें पैसा मुहैया नहीं करा सकी और इसके चलते बड़ी संख्या में नौकरियां गईं.”

सरकार ने मार्च, 2022 में इस सेक्टर से जुड़ी योजनाओं की घोषणा करते हुए स्वीकार किया था कि लघु एवं मध्यम कुटीर उद्योग क्षेत्र की नौकरियां जाने संबंधित आंकड़े मौजूद नहीं हैं.

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'क्या हम आत्महत्या कर लें'

बैंगलोर में सुरेखा मोहन अपने पति के साथ टेक्नो स्पार्क में काम करती हैं. जिस बैंक से उन्होंने पैसा उठाया है, उनसे हुई हाल की बातचीत को याद करते हुए सुरेखा कहती हैं, “हमें गर्व है कि लॉकडाउन में भी हमने अपने कर्मचारियों का वेतन नहीं रोका था. आज बैंकों को कोविड संकट के बारे में पता है, इसके बाद रूस यूक्रेन के युद्ध शुरू हो गया जिससे हमारे कारोबार पर असर पड़ा है. लेकिन बैंक अपने लोन के लिए चिंतित हैं. हम अपने कारोबार में पैसा लगाने के बदले ब्याज चुका रहे हैं. काम चालू रखने के लिए निजी फंड का इस्तेमाल करना पड़ रहा है. लेकिन ये कब तक चलेगा? मैंने बैंक से पूछा है कि क्या वे चाहते हैं कि हमलोग आत्महत्या कर लें?”

उनका ये सवाल एक ख़तरनाक ट्रेंड की ओर संकेत करता है, आंकड़े भी जिसकी तस्दीक करते हैं. भारत में कोविड संकट के दौरान आत्महत्या की दर तेज़ी से बढ़ी है. सरकारी आंकड़ों के आकलन से बीबीसी को पता चलता है कि बेरोज़गारी, ग़रीबी और करियर संबंधी आर्थिक समस्याओं के चलते आत्महत्या की दर बढ़ी है.

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सरकार की कोई तैयारी नहीं थी- आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन

टास्क फ़ोर्स के कामकाज से कोविड संकट से उबरने में क्या अंतर आया, ये पूछे जाने पर भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर और जाने माने अर्थशास्त्री डॉ. रघुराम राजन कहते हैं, “मुझे लगता है कि इससे विभिन्न कार्यों की लागत और फ़ायदों के बारे में व्यापक दृष्टिकोण मिलता है. सरकार व्यापक समझ के आधार पर निर्णय ले सकती थी. पीछे मुड़कर देखने पर पता चलता है कि वास्तविकता यह थी कि ऐसे कई क्षेत्र थे जिन पर सरकार ने पूरी तरह से विचार नहीं किया था."

"उदाहरण के लिए प्रवासियों मज़दूरों पर पड़ने वाला प्रभाव. बेहद कम समय की सूचना पर लगाए गए लॉकडाउन और उसे जारी रखने ने भी आर्थिक गतिविधियों को भारी रूप से बाधित किया. इस तरह के फ़ैसले से क्या परिणाम होंगे, इसके लिए कोई तैयारी नहीं की गई थी. इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस फ़ैसले से पहले क्या सोचा गया, क्या विचार-विमर्श किया गया था."

रघुराम राजन के मुताबिक एक जांच से पता चल पाएगा कि क्या कारगर रहा और क्या कारगर नहीं रहा. सरकार के अपने आंकड़ों से पता चलता है कि जीडीपी दर को कितना नुकसान हुआ था. 2020-21 की पहली तिमाही के दौरान करीब 23.9 प्रतिशत की गिरावट हुई थी जबकि पूरे साल 6.6 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली थी.

कोविड संकट के चलते अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए सरकार ने कहा कि वह बिना किसी देरी के 'हर क्षेत्र और हर व्यक्ति तक पहुंची'.

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सरकार ने जो क़दम उठाए उनमें से कुछ निम्न हैं:

मोदी सरकार ने कमजोर वर्गों को सीमित अवधि के लिए नकद और मुफ्त अनाज के साथ-साथ डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की सुविधा दी. इसके अलावा ऋण गारंटी के साथ साथ कारोबारियों के लिए ऋण तक आसान पहुंच सहित कई सुविधाएं दी गईं.

सरकार ने जो घोषणाएं की थीं, उसमें ईएमआई की किस्तों में छूट के साथ साथ कर में रियायत भी दी गई थी. इस दौरान राज्य सरकारों की उधार सीमा भी बढ़ा दी गई थी.

2021 में वार्षिक बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार का राहत पैकेज 'पांच मिनी बजट' जितना है.

मोदी सरकार का आर्थिक संदेश अब 2024 और 2029 के पांच साल को लक्षित कर रहा है. हाल ही में, प्रधानमंत्री मोदी ने इसे रेखांकित किया, "अगले पांच साल के दौरान भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरेगा."

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के अनुसार, भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 2020 से वापसी करते हुए 9.7 प्रतिशत तक बढ़ गई और फिर 7.8 प्रतिशत पर आ गई है.

वर्तमान में, यह 6.8 प्रतिशत आंकी गई है. भारत की विकास दर की विश्व बैंक ने एक चेतावनी के साथ सराहना की है. इसमें कहा गया है, "दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत में सबसे तेज़ विकास दर रहने का अनुमान है, लेकिन कोविड संकट के बाद इसकी वापसी की दर धीमी रहने की उम्मीद है."

वीडियो कैप्शन, कोरोना के दौर में जिस टास्क फ़ोर्स का ऐलान हुआ, वो कहां है?

स्थायी रहेगा प्रभाव

टेक्नोस्पार्क के मोहन सुरेश के मुताबिक सरकार ने कोविड संकट के दौरान जो किया उससे ज़ाहिर होता है कि उसे ज़मीनी स्तर से सही फ़ीडबैक नहीं मिला था.

मुंबई के स्ट्रीट-फूड विक्रेता उदित कुमार भी इससे सहमत हैं. वे कहते हैं, "एक अच्छी तरह से काम करने वाली टास्क फ़ोर्स ने सरकार को सही इनपुट दिया होता तो संभवतः मेरे पास अभी भी मेरा बार और रेस्तरां होता. मैं एक ऐसा व्यक्ति हूं जो केवल हवाई यात्रा करता था. आज, मैं केवल ट्रेन का ख़र्च उठा सकता हूं, वह भी तब जब मैं समय निकाल पाउं. इससे आपको पता चलेगा कि मेरे जीवन में क्या अंतर आ गया है."

एक टास्क फ़ोर्स की गैरमौजूदगी में, जिसे साझेदारों के इनपुट के साथ काम करना था, अब तक अर्थव्यवस्था में वापसी की दर क्या रही है?

प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य प्रोफेसर गोयल ने याद करते हुए कहा, "उस समय, हमें नीति निर्माताओं और नीति बनाने वाली संस्था के रूप में बहुत दबाव का सामना करना पड़ा कि भारत को वही करना चाहिए जो अमेरिका कर रहा था, यानी हर किसी को बैंक के माध्यम से फंड देना. छोटे उद्योग को फंड देना लेकिन आप जानते थे कि इससे भारी घाटा होगा. वैसे ही हुआ और हमारा घाटा बढ़ गया."

उन्होंने कहा, "यह दुनिया भर में माना जाता है कि भारतीय मैक्रो नीति ने इस समय अच्छा प्रदर्शन किया है, और अर्थव्यवस्था को उच्चतम विकास दर हासिल करने में मदद की है और महंगाई दर को भी काबू में रखा. इसलिए मुझे लगता है कि नीतियों का मूल्यांकन करने का सबसे बुद्धिमान तरीका परिणामों को देखना होगा. यदि परिणाम अच्छे हैं, तो इसका मतलब है कि कुछ इनपुट अवश्य मिले होंगे."

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हालांकि डॉ. रघुराम राजन की राय अलग है.

वह कहते हैं, "अगर हम छह प्रतिशत (2016 से) की विकास दर को बनाए रखते तो हम जो विकास करते और आज जो विकास हुआ है, उसके बीच काफी अंतर है. अंतर केवल विकास के बारे में नहीं है, यह सकल घरेलू उत्पाद के स्तर के बारे में है - हम कितना कम सकल घरेलू उत्पाद का उत्पादन करते हैं क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था लगातार नहीं बढ़ रही है. साथ ही, क्या मौजूदा विकास दर उसकी भरपाई करने के लिए पर्याप्त है जो हमने खोया है? नहीं. क्या यह हमें एक समृद्ध देश बनाने के लिए पर्याप्त है? इस दर से हमें बहुत लंबा समय लगेगा."

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि, 'भारत में रोज़गार की स्थिति ख़राब बनी हुई है.'

लंबी अवधि वाले रुझानों पर टिप्पणी करते हुए, इसमें कहा गया है, "2000-19 के दौरान, कम उत्पादकता वाले कृषि क्षेत्र से अपेक्षाकृत उच्च उत्पादकता वाले गैर-कृषि क्षेत्रों की तरफ़ रोज़गार के अवसरों में बदलाव हुआ था. हालांकि यह बाद में धीमा हो गया और फिर 2019 और 2022 के बीच स्थिति पूरी तरह उलट हो गई. इसकी वजह दूसरे काम धंधों का नहीं मिलना माना जा सकता है. यह कोविड संकट के बाद आर्थिक मंदी के चलते भी हुआ है. इसलिए लोग कृषि क्षेत्र में काम तलाशने को मज़बूर हुए."

युवाओं में बेरोज़गारी की दर के सवाल पर, यह कहता है, "शिक्षा के स्तर में वृद्धि हुई है. अब स्नातक की डिग्री या उससे ज़्यादा डिग्री वाले पुरुष ज़्यादा बेरोज़गार हैं और पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज़्यादा बेरोज़गारी है."

मैंने सुरेखा से पूछा, आप प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री से क्या कहना चाहेंगी?

उन्होंने कहा, "हम अपना ऋण चुकाने से नहीं भाग रहे हैं. हमें ज़िंदा रहने दें. अगर हम विकास करेंगे तभी अर्थव्यवस्था बढ़ेगी और देश बढ़ेगा."

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