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अश्विन को टेस्ट चैंपियनशिप से बाहर रखने के फ़ैसले पर अब भी क्यों उठ रहे हैं सवाल
विधांशु कुमार
बीबीसी हिंदी के लिए
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (डब्ल्यूटीसी) के फ़ाइनल का सबको बेसब्री से इंतज़ार था.
उम्मीद थी कि टेस्ट क्रिकेट के दो दिग्गज टीमों के बीच ये मैच करीबी और रोमांचक मुकाबला होगा. लेकिन इंग्लैंड के द ओवल में खेले गए इस मैच में भारत को ऑस्ट्रेलिया से निराशाजनक हार का सामना करना पड़ा.
स्टार खिलाड़ियों से सुसज्जित भारतीय टीम को 209 रन की भारी हार का सामना करना पड़ा.
इस हार की कई कारणों में एक रहा भारत के सबसे अनुभवी स्पिन गेंदबाजों में से एक रवि अश्विन को प्लेइंग इलेवन से बाहर रखना. इस फ़ैसले पर कई पूर्व क्रिकेटर्स और खेल के प्रशंसक हैरान रह गए थे.
मैच के दौरान कमेंट्री बॉक्स में इस फैसले पर खूब चर्चा हुई और मैच के बाद भी ये एक ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है कि आखिर क्यों टेस्ट के नंबर एक गेंदबाज़ अश्विन को टीम में जगह नहीं मिली.
अश्विन ने इस मुद्दे पर पहले तो चुप्पी साधी रही लेकिन अब इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपना दिल खोल के रख दिया.
अपना पक्ष रखते हुए अश्विन ने अख़बार को बताया कि विदेशी पिचों में उनकी बोलिंग पिछले कुछ सालों में शानदार रही है.
उन्होंने अख़बार को बताया, “2018-19 के बाद से विदेशों मे मेरी गेंदबाजी शानदार रही है और मैं टीम के लिए गेम जीतने में कामयाब रहा हूं."
"अगर मैं इसे एक कप्तान या कोच के नज़रिए से देखूं तो शायद उनके बचाव में ये कहा जा सकता है कि आखिरी बार जब हम इंग्लैंड में थे, तब 2-2 टेस्ट ड्रा रहा था और उन्हें लगा होगा कि इंग्लैंड में 4 पेसर और 1 स्पिनर एक अच्छा कॉम्बिनेशन है. फाइनल में जाने के लिए उन्होंने यही सोचा होगा.”
अश्विन की इस दलील में दो मुख्य सवाल छुपे हुए हैं
पहला, क्या विदेशी पिचों पर शानदार प्रदर्शन के बावजूद उन्हें नज़रअंदाज़ करना चाहिए था?
और दूसरा, क्या टीम के अंतिम 11 खिलाड़ियों को उनकी दक्षता के आधार पर चुनना चाहिए या फिर कंडिंशंस को देखकर?
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अश्विन का रिकॉर्ड
रविचंद्रन अश्विन ने अब तक 36 टेस्ट मैच विदेशी धरती पर खेले हैं जिनमें उन्होंने 32 की औसत से 133 विकेट लिए है.
वहीं उनके पूरे करियर के टेस्ट मैचों की बात करें तो अब तक 92 मैचों में उन्होंने 23.93 की औसत से 474 विकेट लिए हैं और अनिल कुंबले के बाद भारत की ओर सर्वाधिक टेस्ट विकेट लेने वाले खिलाड़ी हैं.
इस साल अश्विन ज़बरदस्त फॉर्म में थे और उन्होंने 4 टेस्ट मैचों में 17.28 की औसत से 25 सफलताएं हासिल की थी.
साल की शुरुआत में जब ऑस्ट्रेलिया ने बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के लिए भारत का दौरा किया था तब अश्विन प्लेयर ऑफ द सीरीज थे जिसमें उन्होंने चार मैचों में 25 विकेट लिए थे.
चैंपियनशिप का फाइनल इंग्लैंड में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेला जा रहा था जिनके विरुद्ध उनका रिकार्ड शानदार रहा है.
उनके खिलाफ 22 मैचों में अश्विन ने 28.36 की औसत से 114 विकेट झटके हैं.
इंग्लैंड में भी उनका प्रदर्शन बुरा नहीं कहा जा सकता – यहां पर 7 मैचों में उन्होंने 28.11 की औसत से 18 विकेट लिए हैं.
अश्विन टेस्ट क्रिकेट में भारत के सबसे बड़े मैच-विनर्स में एक हैं और बड़े मैचो में वो हमेशा अच्छा करते आए हैं.
ऐसे में इस बेहतरीन स्पिनर का ना चुने जाना भारतीय टीम के लिए प्रतिकूल प्रभाव छोड़ गया.
चयन में ग़लती
अगर अश्विन की मानें कि कोच और मैनेजमेंट 4 पेसर और एक स्पिनर का कॉम्बिनेशन बना रहे थे तो उनके सामने अश्विन और जडेजा में एक को चुनना था.
टेस्ट क्रिकेट में जडेजा के विकेट अश्विन से लगभग 200 कम हैं और विदेशी ज़मीन पर भी उन्होंने अश्विन से कम सफलताएं हासिल की है.
जाडेजा ने भारत से बाहर 23 टेस्ट मैचों में 34 की औसत से 69 विकेट लिए हैं. शायद उनके पक्ष में उनकी बेहतर बैटिंग जाती है.
टीम की सोच शायद ये थी कि टेस्ट मैच बोलर्स ही जिताते हैं.
वैसे भी अगर टीम को बैटिंग मज़बूत करनी थी तो दोनों को खिलाकर विकेटकीपर भरत की जगह इशान किशन को टीम में जगह मिल सकती थी.
यहां भी टीम मैनेजमेंट के सामने चुनने का मौका था – दो वर्ल्ड क्लास स्पिनर्स में दोनों को खिलाया जाए और दो कम अनुभवी कीपर्स में शायद टेस्ट में दोनों में थोड़ा कम आंके जाने वाले किशन को खिलाया जाए?
क्या श्रीकर भरत को खिलाने के लिए अश्विन को ड्रॉप करना बेहतर फैसला था?
इसको इस तरह से भी देख सकते हैं - अश्विन भारत के नम्बर वन गेंदबाज हैं तो क्या स्पिन को कम मदद देने वाली पिचों पर उनकी जगह नहीं बनती?
क्या भारत में खेलने आते वक्त ऑस्ट्रेलिया ने डेनिस लिली को या वेस्ट इंडीज़ ने अपनी पेस बैट्री को टीम से बाहर कर दिया क्योंकि भारत में पेस से ज्यादा स्पिन को मदद मिलती है?
सच्चाई यह है कि चैंपियन टीमें अपनी स्ट्रेंथ पर खेलेती है ना कि जोड़-तोड़ से टीमें बनाती है.
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अश्विन की ज़बरदस्त खेल-भावना
डब्ल्यूटीसी फाइनल में अनदेखी के बाद पूर्व खिलाड़ियों से मिले समर्थन से अश्विन खुश है लेकिन उन्हें ये मलाल भी है कि भारत को आईसीसी खिताब हासिल करने में मदद करने के मौके से वो चूक गए.
टीम में नहीं चुने जाने के बावजूद अश्विन ने टीम-भावना का बढ़िया उदाहरण दिया.
उन्होंने कहा कि वो 2 दिन पहले ही जान गए थे कि उन्हें नहीं चुना जाएगा इसलिए उसके बाद उनकी सोच यही थी किस तरह टीम के 11 खिलाड़ियों की मदद की जाए ताकि भारत ये वर्ल्ड चैंपियनशिप जीत जाए, आखिर टीम को यहां तक पंहुचाने में अश्विन का बड़ा हाथ था.
अक्सर बीती हुई घटनाओं को बाद में देखा जाए तो उनपर बेहतर फैसले लिए जा सकते हैं.
अश्विन के मसले पर भी यही कहा जा सकता है कि उन्हें टीम में ले लेना बेहतर फैसला साबित होता.
लेकिन भारतीय टीम के पास बड़ा मुद्दा ये भी है कि टीम एक बदलाव के दौर से गुज़र रही है.
लगभग तीन साल बाद होने वाली टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल तक टीम के कई खिलाड़ी जैसे पुजारा, रहाणे, उमेश यादव, मोहम्मद शमी जैसे खिलाड़ी शायद ही अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से जुड़े रहे हों.
इन खिलाड़ियों के विकल्प के बार में अभी से बातें शुरु हो चुकी है. ये भी कहा जा रहा है कि आने वाले वेस्टइंडीज़ की सिरीज़ में पुजारा की जगह यशस्वी जायसवाल को टीम में रखा जा सकता है.
इसी तरह तेज़ गेंदबाजों के विकल्प की जोरशोर से तलाश चल रही है. स्पिन डिपाटर्मेंट में भी अश्विन और जडेजा युवा खिलाड़ी नहीं रह गए हैं.
लेकिन चयनकर्ताओं को यो सोचना होगा कि क्या इनके आसपास के भी विकल्प मौजूद है?
इस वक्त भारत में टी20 या वनडे मैचों के लिए उपयुक्त स्पिनर्स तो मिल जाएंगे लेकिन टेस्ट क्रिकेट में लंबे स्पेल्स डालकर, चालाकी, सूझबूझ और धीरज के साथ विकेट निकालने वाले स्पिनर्स नज़र ही नहीं आते हैं.
ऐसे में जब तक फिटनेस इजाज़त दे, अश्विन और जाडेजा भारतीय टीम में नजर आते रहेंगे.
आने वाली सिरीज़ों में सेलेकटर्स को ये फ़ैसला करना पड़ेगा कि विदेशी धरती पर भी क्या ये दो स्पिनर्स एक साथ नहीं खेल सकते?
और अगर एक को ही चुनना है तो किसे चुनेंगे – बेहतर स्पिनर को या बेहतर बल्लेबाज़ को?
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