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वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप: बड़े मुकाबलों में क्यों पिट जाती है टीम इंडिया?
विमल कुमार
वरिष्ठ पत्रकार, लंदन के ओवल मैदान से
तो आखिरकार वही हुआ जिसका हर किसी को डर था. एक असंभव सी जीत का सपना लेकर मैच के आखिरी दिन टीम इंडिया की बल्लेबाज़ी ताश के पत्तों की तरह ऐसी बिखरी जिससे 1990 के दशक वाली कमज़ोर भारतीय टीमों की यादें ज़ेहन में दोबारा ताजा हो गई.
जीतना तो दूर की बात, टीम इंडिया मैच को दूसरे सत्र तक भी ले जाने में नाकाम रही और विराट कोहली जैसे दिग्गज बल्लेबाज़ एक बार फिर से दुनिया के सबसे बड़े प्लेटफॉर्म पर नाकाम हुए.
अगर टीम इंडिया ने पिछले एक दशक में कोई भी आईसीसी ट्रॉफी नहीं जीती है तो इसमें एक बड़ी वजह कोहली जैसे बल्लेबाज़ का हर अहम नॉक-ऑउट मैचों में नाकाम होना है.
लेकिन, टीम इंडिया के पूर्व विकेटकीपर और बीबीसी के लिए कामेंटेटर की भूमिका निभाने वाले दीपदास गुप्ता से हमारी ओवल के बाहर मुलाकात हुई और उनसे कोहली और रोहित की नाकामी के बारें में सवाल किया तो उन्होंने दिग्गजों का बचाव किया.
उन्होंने कहा “ देखिये, मैं भी आपकी तरह हार के बाद बेहद भावुक हो गया हूं, निराश हूं और फैन्स की तकलीफ को भी समझता हूं लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इन खिलाड़ियों ने लंबे समय से अमूमन हर सीरीज़ में शानदार खेल दिखाया है तब वो इस मुकाम पर पहुंचे है. इसलिए हमें अपनी आलोचना में संयम दिखाना होगा."
पहले दिन के खराब खेल ने भारत का 'खेल' बिगाड़ा
दासगुप्ता से बात-चीत करने के बाद ये लेखक टीम इंडिया के कप्तान की प्रेस कांफ्रेस में पहुंचता है और सीधे एक तीखा सवाल दागता है. क्या बड़े मुकाबलों में टीम इंडिया खुलकर नहीं खेल पाती है?
क्या उन पर ज़रुरत से ज़्यादा उम्मीदों का दबाव आ जाता है. रोहित ने अपने चिर-परिचित अंदाज में छोटी सी मुस्कान बिखेरी और कहा कि वो भी हार से निराश हैं लेकिन उन्होंने 444 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए खुलकर ही बल्लेबाज़ी की वकालत की.
रोहित का कहना था उन्होंने खुद को और हर बल्लेबाज़ को कहा था कि वो बिना भय के अपने शॉट्स खेलें.
टीम इंडिया ने पहले दिन बेहद खराब खेल दिखाया जिसके चलते संभवत: उन्हें वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप से हाथ धोना पड़ा.
मैच के पांचवें दिन भी एक बार फिर से टीम इंडिया की तरफ कोई ज़ोरदार वापसी की झलक नहीं दिखी.
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान पैट कमिंस से प्रेस कांफ्रेस में इस लेखक ने पूछा कि क्या उनको कभी भी ऐसा लगा कि टीम इंडिया इस लक्ष्य का पीछा कर भी सकती है ? जब कोहली लय में बल्लेबाज़ी कर रहे थे तब उन्हें चिंता हुई?
कमिंस ने भी रोहित की ही तरह सवाल पर छोटी सी मुस्कान बिखेरी और बिना किसी हिचक के कहा,'' कतई नहीं.''
कमिंस का मानना था कि उनकी टीम को एहसास था कि जैसे नई गेंद ली जाएगी , टीम इंडिया के लिए परेशानी बढ़ेगी.
क्या कोहली, क्या पुजारा...कोई भी नहीं चला?
बहरहाल, इस हार ने एक बार फिर से टीम इंडिया के टेस्ट क्रिकेट में टॉप ऑर्डर की नाकामी को बुरी तरह से एक्सपोज़ कर दिया है. क्या कोहली, क्या पुजारा और क्या कोई और बल्लेबाज़, हर कोई लगातार नाकाम ही होता दिख रहा है.
इस टीम के आठ खिलाड़ी 33 साल के हो चुके हैं और ऐसे में इन सबका दो साल बाद फिर से वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में खेलते दिखना बेहद मुश्किल लगता है.
इन आठ सीनियर्स में से अगले दो साल कितने रह पाएंगे, उस दबाव का संकेत कप्तान रोहित ने रविवार को ही कर दिया.
रोहित का कहना था कि घरेलू क्रिकेट में कई खिलाड़ी अच्छा कर रहे हैं और अब वक्त आ गया है कि ये फैसला लिया जाए कि अगले बार वर्ल्ड कप फाइनल में टीम इंडिया किस तरह की क्रिकेट खेलना चाहती है और कहां खेलना चाहती है.
मतलब, ये कि फाइनल कहां होगा और उसी के मुताबिक टीम को अगले दो साल तैयारी करनी होगी.
रोहित ने हार के बाद बहाने ढूंढने की कोशिश तो नहीं कि लेकिन उन्होंने कहा कि आदर्श स्थिति में इतने बड़े मुकाबले का फैसला तीन मैचों की सीरज़ से होना चाहिए.
रोहित ने मैच से पहले भी इस लेखक को ये बात कही थी. रोहित को ये अंदाज़ा था कि शायद तैयारियां काफी नहीं थी.
आईपीएल की बजाय वर्ल्ड कप जीतने पर ध्यान देने की जरूरत
वक्त आ गया है कि बीसीसीआई भी अपनी प्राथमिकता सूची में आईपीएल की बजाय वर्ल्ड कप जीतने को अहमियत दे.
आईपीएल पाइनल के ठीक एक हफ्ते बाद ऐसे निर्णायक मुकाबले में और वो भी बिलकुल एक अलग फॉर्मेट में उतरना औऱ वो भी इंग्लैंड जैसे देश में जहां कम से कम 10-15 दिन पिच और मौसम से खुद को अभ्यस्त कराने में बीत जाते हैं.
रोहित ने तो बॉर्डर-गावस्कर सीरीज़ के समय से ही कई सलाह दी थी लेकिन उनकी बातों को नज़रअंदाज़ ही किया गया.
कप्तान के तौर पर सार्वजनिक तौर पर रोहित जितना कह सकते हैं उन्होंने कहा. लेकिन कोच राहुल द्रविड़ लगातार चुप्पी बनाए हुए हैं.
आने वाले महीनों में द्रविड़ से भी कड़े सवाल पूछे जाय़ेंगे. सवाल तो ये भी उठेंगे कि अगर टीम के लिए तैयारी के लिए पर्याप्त समय चाहिए तो कोच ने खिलाड़ियों की इस बात को बोर्ड तक क्यों नहीं पहुंचाया?
कोहली पर उठ रहे सवाल
अक्सर कहा जाता है कि हर कामयाबी के लिए एक पिता मिल जाता है लेकिन नाकामी अनाथ होती है.
लेकिन, लंदन के ओवल में इसके विपरीत बात हुई. टीम इंडिया की इस नाकामी में भविष्य के सुपरस्टार शुभमन गिल का बल्ला खामोश रहा तो कप्तान और ओपनर के तौर पर रोहित पर भी सवाल उठे.
पुजारा भी अप्रैल से इंग्लैंड में मौजूद थे लेकिन नतीजा ढाक के वही तीन पात. कोहली के बारें में इतनी चर्चा होती है लेकिन टेस्ट क्रिकेट की चौथी पारी में उनसे कीमती रन नहीं बना पाना उनकी महानता की संपूर्णता पर बड़ा सवाल करती है.
लेकिन कोहली के कोच राजकुमार शर्मा से जब इस लेखक की मुलाकात ओवल के बाहर हुई तो उन्होंने कहा.''आप सभी को ये समझने की ज़रुरत है कि मुझसे, आपसे या फिर फैन्स से ज्यादा निराश खुद कोहली हैं. ये ठीक है कि कोहली इस मैच में दूसरी पारी में एक चूक कर बैठे लेकिन ये क्रिकेट का हिस्सा है.''
हार से टीम इंडिया पर दबाव और बढ़ा
बहरहाल, फैन्स हों या पूर्व खिलाड़ी या फिर आलोचक वो टीम इंडिया की इस नाकामी को क्रिकेट का महज हिस्सा मानकर भूलने वाले नहीं है.
इस नाकामी ने छह महीने बाद भारत में ही होने वाले वन-डे वर्ल्ड कप से ठीक पहले टीम इंडिया के खिलाड़ियों पर और दबाव बढ़ा दिया है.
जैसे जैसे हफ्ते बीतेंगे, ये दबाव और बढ़ता जाएगा औऱ हर कोई उन्हें फिर से ये याद दिलाएगा कि महेंद्र सिंह धोनी के दौर में आईसीसी ट्रॉफी जीतना कितना सहज़ था. लेकिन उसके बाद से बस हर कोई तरसता ही दिख रहा है.
दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड को आईसीसी ट्रॉफी के मामले में ये तुलानत्मक गरीबी काफी दर्द पहुंचाएगी.
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