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लीबिया में रह रहीं सूडान की महिलाओं की ख़ौफ़नाक आपबीती
- Author, अमीरा महाध्बी
- पदनाम, बीबीसी अरबी
(इस रिपोर्ट के कुछ हिस्से आपको विचलित कर सकते हैं)
"हम डर के साये में रहते हैं," लायला फोन पर धीमी आवाज़ में बताती हैं ताकि कोई उनकी बात न सुन सके.
पिछले साल की शुरुआत में लायला अपने पति और छह बच्चों के साथ सूडान छोड़कर भाग गई थीं और अब लीबिया में रह रही हैं.
सभी सूडानी महिलाओं, जिन्होंने लीबिया में तस्करी के अपने अनुभवों के बारे में बीबीसी से बात की, उनकी पहचान को सुरक्षित रखने के लिए उनके नाम बदल दिए गए हैं.
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लीबिया में कम नहीं हुईं मुश्किलें
लायला सहमी आवाज़ में बताती हैं कि कैसे साल 2023 में शुरू हुए हिंसक गृह युद्ध के दौरान सूडान स्थित ओमदुरमैन में उनके घर पर छापा मारा गया था.
उनका परिवार सबसे पहले मिस्र गया था, फिर उन्होंने तस्करों को 350 डॉलर (लगभग 29,000 रुपये) दिए ताकि वे उन्हें लीबिया ले जा सकें. उन्हें बताया गया था कि लीबिया में उनकी ज़िंदगी बेहतर होगी और वहाँ उन्हें सफ़ाई और होटल से जुड़ी नौकरियां मिलेंगी.
लेकिन लायला ने बताया, जैसे ही उन्होंने सीमा पार की, तस्करों ने उन्हें बंधक बना लिया. तस्करों ने उन्हें पीटा और अधिक पैसों की मांग की.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "मेरे बेटे को बार-बार पीटा गया, जिससे उसे इलाज की ज़रूरत पड़ी."
तीन दिन बाद, तस्करों ने बिना कोई कारण बताए उन्हें रिहा कर दिया.
लायला को लगा कि लीबिया में उनकी नई ज़िंदगी बेहतर होने लगी थी, क्योंकि उनका परिवार लीबिया के पश्चिमी हिस्से में आ गया था. उन्होंने वहां एक कमरा किराए पर लिया और काम करना शुरू कर दिया. लेकिन एक दिन उनके पति काम की तलाश में घर से बाहर गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे.
इसके बाद, लायला की नौकरी के ज़रिए उनसे जान-पहचान वाले एक आदमी ने उनकी 19 साल की बेटी का बलात्कार किया. लायला बताती हैं, "उसने मेरी बेटी से कहा कि अगर उसने किसी को इसके बारे में बताया तो वो उसकी छोटी बहन का भी बलात्कार करेगा."
वो धीमी आवाज़ में इस डर से बताती हैं कि अगर मकान मालकिन को इन धमकियों के बारे में पता चल गया तो उनका परिवार मकान से बेदख़ल कर दिया जाएगा.
लायला कहती हैं कि उनका परिवार अब लीबिया में फँस गया है. उनके पास तस्करों को पैसे देने के लिए कुछ भी नहीं बचा है और युद्धग्रस्त सूडान वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं है.
वो कहती हैं, "हमारे पास खाने का सामान बहुत कम बचा हुआ है. मेरा बेटा घर से बाहर जाने में डरता है क्योंकि दूसरे बच्चे अक्सर उसे पीटते हैं और उसके काले रंग को लेकर उसका मज़ाक बनाते हैं. मुझे लगता है, मैं धीरे-धीरे अपना मानसिक संतुलन खो रही हूं."
सूडान गृह-युद्ध
2023 में सूडान के अर्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फ़ोर्सेज़ (आरएसएफ़) और सेना के बीच युद्ध शुरू हुआ था. तब से लाखों लोग सूडान छोड़कर भाग गए हैं.
2021 में इन दोनों पक्षों ने मिलकर सूडान की सत्ता का तख़्तापलट किया था लेकिन उनके कमांडरों के बीच सत्ता संघर्ष ने देश को गृह युद्ध में धकेल दिया.
एक करोड़ 20 लाख से अधिक लोग अपने घरों से बेघर हो गए हैं और सूडान के पांच इलाक़ों में अकाल फैल चुका है. विशेषज्ञों के मुताबिक़, दो करोड़ 46 लाख लोग, यानी सूडान की लगभग आधी आबादी को खाने के सामान की तत्काल आवश्यकता है.
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी का कहना है कि अब लीबिया में दो लाख 10 हज़ार से अधिक सूडानी शरणार्थी हैं.
बीबीसी ने उन पाँच सूडानी परिवारों से बात की, जो पहले मिस्र गए थे, जहाँ उन्हें नस्लवाद और हिंसा का सामना करना पड़ा. जिसके बाद उन्होंने अधिक सुरक्षा और नौकरी के बेहतर अवसर के लिए लीबिया का रुख़ किया.
हमने इन परिवारों से लीबिया में प्रवासन और शरणार्थियों के मुद्दों पर काम करने वाले एक शोधकर्ता के ज़रिए संपर्क किया.
सलमा की आपबीती
सलमा ने बीबीसी को बताया कि वो सूडान के गृह युद्ध शुरू होने से पहले ही मिस्र के काहिरा में अपने पति और तीन बच्चों के साथ रह रही थीं.
लेकिन जैसे-जैसे बड़ी संख्या में शरणार्थी मिस्र आने लगे, वहां प्रवासियों के लिए हालात ख़राब होते गए.
सलमा कहती हैं, उन्होंने लीबिया जाने का फ़ैसला किया लेकिन वहाँ पहुँचने पर पता चला कि वहां के हालात नर्क से भी बदतर थे.
जैसे ही उनका परिवार सीमा पार कर गया, उन्हें तस्करों की तरफ़ से चलाए जा रहे एक गोदाम में रखा गया.
उसके बाद तस्करों ने उनसे पैसों की मांग की. वो पहले ही सीमा पार मिस्र की तरफ़ के तस्करों को पैसे दे चुकी थीं, लेकिन वो पैसा कभी उन तक पहुंचा ही नहीं था.
उनका परिवार लगभग दो महीने तक गोदाम में रहा. एक समय ऐसा भी आया जब सलमा को उनके पति से अलग कर महिलाओं और बच्चों के लिए बने एक कमरे में ले जाया गया.
वो बताती हैं कि यहां पैसों की मांग के लिए उनके और उनके दो बड़े बच्चों पर कई तरह की बर्बरताएं की गईं.
उन्होंने बताया, "हमारे शरीर पर उनके कोड़ों के निशान थे. वो मेरी बेटी को पीटते थे और मेरी आंखों के सामने मेरे बेटे के हाथों को जलते हुए तंदूर में डाल देते थे."
"कभी-कभी मैं सोचती थी कि काश हम सब एक साथ मर जाते क्योंकि कोई और रास्ता नहीं सूझता था."
सलमा बताती हैं कि इस घटना का उनके बेटे और बेटी पर गहरा मानसिक असर पड़ा है और तब से उनकी सेहत पर बुरा प्रभाव दिखने लगा है. इसके बाद वो धीरे से बोलने लगती हैं.
वो बताती हैं, "वो मुझे एक अलग कमरे में ले जाते थे, जिसे 'रेप रूम' कहते थे. वहां हर बार अलग-अलग पुरुष होते थे और मैं उनमें से किसी एक का बच्चा अपनी कोख में लिए हुए थी."
आखिरकार, उन्होंने मिस्र में एक दोस्त के ज़रिए कुछ पैसे जुटाए और तस्करों ने उनके परिवार को छोड़ दिया.
बाद में, सलमा कहती हैं कि एक डॉक्टर ने उन्हें बताया कि अब गर्भपात के लिए बहुत देर हो चुकी है. जब उनके पति को पता चला कि वो गर्भवती हैं, तो उन्होंने सलमा और उनके बच्चों को छोड़ दिया.
इसके बाद, उनका परिवार सड़क पर सोने लगा और कूड़ेदानों से बचा-खुचा खाना खाकर और भीख मांगकर गुजारा करने लगा.
कुछ समय के लिए उन्होंने उत्तर-पश्चिमी लीबिया के एक सुदूर खेत में शरण ली, जहां वे पूरा दिन बिना खाए, या कभी-कभी बहुत कम खाकर बिताते थे. प्यास बुझाने के लिए वे पास के एक कुएं का गंदा पानी पीते थे.
सलमा फोन पर बात करते हुए कहती हैं, "मेरा दिल बहुत दुखता है, जब मेरा बड़ा बेटा कहता है कि वो भूख से मर रहा है." इस दौरान, उनकी गोद में रोते हुए बच्चे की आवाज़ भी सुनाई देती है.
वो कहती हैं, "वो बहुत भूखा है, लेकिन मेरे पास उसे खिलाने के लिए कुछ भी नहीं है, यहां तक कि मेरे स्तनों में इतना दूध भी नहीं है कि मैं उसे अपना दूध पिला सकूं."
जमिला और हना
जमिला एक सूडानी महिला हैं, जिनकी उम्र लगभग 45 साल है. उन्होंने भी सूडानी समुदाय में फैली ख़बरों पर भरोसा किया था कि लीबिया में उनके लिए एक बेहतर जीवन मिल सकता है.
उन्होंने 2014 में सूडान के पश्चिमी क्षेत्र दारफुर में हुई अशांति से भागकर मिस्र में कई साल बिताए और 2023 के अंत में वो लीबिया चली गईं.
वो बताती हैं कि तब से उनकी बेटियों के साथ बार-बार बलात्कार हो चुका है. पहली बार जब ऐसा हुआ, तब उनकी बेटियां 19 और 20 साल की थीं.
वो बीबीसी को बताती हैं, "जब मैं बीमार थी, मैंने अपनी दोनों बेटियों को सफाई के काम के लिए भेजा था. जब वे रात को घर लौटीं, तो गंदगी और खून से लथपथ थीं. चार मर्दों ने उनके साथ बलात्कार किया, जब तक कि उनमें से एक बेहोश नहीं हो गई."
जमिला कहती हैं कि उनके साथ भी बलात्कार हुआ और उन्हें एक आदमी ने, जो उनसे काफी छोटा था, हफ्तों तक बंधक बनाकर रखा. उसने उन्हें अपने घर की सफाई की नौकरी ऑफ़र की थी.
वो याद करते हुए कहती हैं, "वो मुझे 'घिनौनी काली' महिला कहकर अपमानित करता था. उसने मेरा बलात्कार किया और कहा, 'औरतें इसी काम के लिए बनी हैं.'"
जमिला कहती हैं, "यहां के बच्चे भी हमारे साथ बुरा व्यवहार करते हैं. वे हमें जानवरों और जादूगरों के रूप में देखते हैं. वे हमारे काले और अफ्रीकी होने पर हमारा अपमान करते हैं. क्या वे ख़ुद अफ्रीकी नहीं हैं?"
जब जमिला की बेटियों के साथ पहली बार बलात्कार हुआ, तो वो उन्हें अस्पताल ले गईं और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. लेकिन जब पुलिस अधिकारी को ये पता चला कि वे शरणार्थी हैं, तो जमिला कहती हैं कि उसने रिपोर्ट रद्द कर दी और उन्हें चेतावनी दी कि अगर आधिकारिक तौर पर शिकायत दर्ज की गई, तो उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा.
ये घटना लीबिया के पश्चिमी क्षेत्र की है.
लीबिया ने 1951 के रिफ़्यूजी कन्वेंशन या उनकी स्थिति से संबंधित 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. वो शरणार्थियों और राजनीतिक शरण मांगने वालों को 'अवैध प्रवासी' मानता है.
लीबिया वो देश है जो दो हिस्सों में बंटा हुआ है और उसके हर हिस्से को अलग-अलग सरकार चला रही है.
लेकिन मानवाधिकार समूह लीबिया क्राइम्स वॉच के मुताबिक़, देश के पूर्वी हिस्से में प्रवासियों के लिए हालात आसान हैं. क्योंकि वहां पर प्रवासी बिना हिरासत के ख़तरे के आधिकारिक तौर पर शिकायतें दर्ज करा सकते हैं. उन्हें ज्यादा आसानी से स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकती हैं.
हालांकि, तस्करों की तरफ़ से चलाए जा रहे अनौपचारिक केंद्रों में यौन हिंसा आम है, लेकिन मानवाधिकार समूह के अनुसार, लीबिया के पश्चिमी हिस्से में स्थित आधिकारिक हिरासत केंद्रों में भी ऐसे शोषण के सबूत मिले हैं.
हना, एक सूडानी महिला हैं, जो अपने बच्चों का पेट भरने के लिए कूड़ेदानों से प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठा करती है, बताती हैं कि उन्हें पश्चिमी लीबिया में अगवा कर लिया गया था. उन्हें एक जंगल में ले जाया गया और बंदूक की नोक पर एक समूह ने उनका बलात्कार किया.
अगले दिन हमलावर उन्हें राज्य की ओर से चलाए जाने वाले स्टेबिलिटी सपोर्ट अथॉरिटी (एसएसए) में ले गए थे. हना को किसी ने नहीं बताया कि उन्हें क्यों हिरासत में लिया गया था.
हना बीबीसी को बताती हैं, "मेरे सामने युवाओं और लड़कों को पीटा जाता था और पूरी तरह कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया जाता था.''
"मैं वहां कई दिनों तक रही. मैं अपनी प्लास्टिक की चप्पलों पर सिर रखकर जमीन पर सोती थी. घंटों मिन्नतें करने के बाद मुझे शौचालय जाने की अनुमति दी जाती थी. बार-बार मेरे सिर पर मारा जाता था."
लीबिया में पहली भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
अन्य अफ्रीकी देशों से आए प्रवासियों के साथ लीबिया में दुर्व्यवहार की कई घटनाएं पहले भी सामने आई हैं.
लीबिया यूरोप की ओर जाना वाला रास्तों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. हालांकि बीबीसी ने जिन महिलाओं से बात की, उनमें से किसी की भी वहां जाने की योजना नहीं थी..
साल 2022 में, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने लीबिया की एसएसए (स्टेबिलिटी सपोर्ट अथॉरिटी) पर कई आरोप लगाए थे.
इन आरोपों में ग़ैर-क़ानूनी हत्याएं, मनमाने तरीक़े से हिरासत में लेने, प्रवासियों और शरणार्थियों की गिरफ़्तारी शामिल है.
इसके अलावा यातना देने, जबरन श्रम कराने और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत मानवाधिकार उल्लंघन और अपराध के आरोप भी शामिल हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि लीबिया की राजधानी त्रिपोली में गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने एमनेस्टी को बताया कि मंत्रालय एसएसए पर नज़र नहीं रखता क्योंकि ये प्रधानमंत्री अब्दुल हामिद देबिबेह को रिपोर्ट करता है.
प्रधानमंत्री के कार्यालय ने हमारी ओर से इस पर पूछे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है.
लीबिया क्राइम्स वॉच ने बीबीसी को बताया है कि सरकारी प्रवासी हिरासत केंद्रों में प्रवासियों के साथ व्यवस्थित तौर पर यौन उत्पीड़न होता है. इन केंद्रों में त्रिपोली का कुख्यात अबू सलीम जेल भी शामिल है.
2023 की एक रिपोर्ट में, मेडसिन्स सैन्स फ़्रंटियर (एमएसएफ़) ने कहा कि अबू सलीम जेल में "यौन और शारीरिक उत्पीड़न की रिपोर्ट बढ़ रही हैं, जिसमें व्यवस्थित तौर पर पहने गए कपड़ों की तलाशी और बलात्कार शामिल हैं."
त्रिपोली में आंतरिक मामलों के मंत्री और अवैध आप्रवास को रोकने के लिए लेकर बनाए गए विभाग ने हमारे सवालों का जवाब नहीं दिया.
सलमा अब खेत छोड़कर पास के एक अन्य परिवार के साथ एक नए कमरे में रह रही हैं, लेकिन वो और उनका परिवार अभी भी बेदख़ली और उत्पीड़न के ख़तरे का सामना कर रहा है.
वो कहती हैं कि जो कुछ भी उनके साथ हुआ उसकी वजह से वो अब घर वापस नहीं जा सकतीं.
वो कहती हैं, "वो कहेंगे कि मैंने परिवार की इज़्ज़त पर दाग लगा दिया है. मुझे ये भी नहीं पता कि वो मेरे शव को भी स्वीकार करेंगे या नहीं. काश, मुझे पता होता कि यहां मेरे लिए क्या इंतज़ार कर रहा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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