भारत की बो भाषा बचाने का संघर्ष और ये कैसे हो गई विलुप्त

प्रोफ़ेसर अब्बी और बोआ
इमेज कैप्शन, 2009 में प्रोफ़ेसर अब्बी (दाएं) अस्पताल में भर्ती बोआ सीनियर (बीच में) से मिलने गई थीं.
    • Author, नताशा फर्नांडीस
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

बोआ सीनियर की मौत एक पूरी प्राचीन भाषा की भी मौत थी. बोआ अंडमान द्वीप समूह में बोली जाने वाली बो भाषा की अंतिम व्यक्ति थीं. हज़ारों साल पुरानी इस भाषा का इस्तेमाल अंडमान द्वीपों में रहने वाली जनजातियां करती थीं.

एक भाषाविद के रूप में प्रोफ़ेसर अनविता अब्बी ने कई साल तक बोआ से इस भाषा को ​सीखने कोशिश की लेकिन 2010 में बोआ सीनियर की मौत हो गई.

बीबीसी से बात करते हुए प्रोफ़ेसर अब्बी कहती हैं कि बोआ सीनियर अपनी मौत के साथ "कुछ अनमोल चीज़" भी ले गईं. वह कहती हैं कि "यह भाषा अलग बोली जाती थी, यह अन्य भाषाओं के संपर्क में नहीं आई थी."

प्रोफे़सर अब्बी बताती हैं कि सबसे पुरानी भाषाओं में शुमार की जाने वाली यह भाषा मेरे लिए सोने की खान थी.

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'हमारी भाषा को मत भूलना'

बोआ सीनियर

इमेज स्रोत, Alok Das

इमेज कैप्शन, बोआ सीनियर अंडमान द्वीप समूह के स्ट्रेट द्वीप पर रहती थीं.

प्रोफे़सर अब्बी बताती हैं कि बोआ सीनियर की आवाज़ को रिकॉर्ड करने वाली पहली और अख़िरी शख्स थीं. बोआ सीनियर ने रिकॉर्डिंग में हिंदी में कहा था कि "हमारी भाषा को मत भूलना."

प्रोफ़ेसर अब्बी बो सहित दुनिया की प्राचीन भाषाओं का दस्तावेज़ तैयार कर रही थीं. बोआ सीनियर की मृत्यु से पहले वो बो भाषा का दस्तावेज़ तैयार करने के लिए अडंमान द्वीप समूह पहुंची थीं.

उन्होंने इस कार्य को एक शब्दकोश के रूप में प्रकाशित कराया जो कि बोआ सीनियर की मौत के एक साल बाद सामने आया लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था.

शुरुआत में बोआ सीनियर प्रोफे़सर अब्बी से बातचीत करने को भी तैयार नहीं थीं.

साल 2004 में हिंद महासागर में आए विनाशकारी सुनामी ने बोआ सीनियर के समुदाय को बहुत नुकसान पहुंचाया था. यह सभी लोग एक राहत शिविर में चले गए थे.

प्रोफ़ेसर अब्बी याद करती हैं कि 'समुदाय के लोगों ने अपने घर खो दिए थे. कोई भी डेटा इकट्ठा करना मुश्किल था. इस स्थिति में मैं वहां गई और उनसे पूछा...क्या आप यह कह सकती हैं? यह आप कैसे कह सकती हैं? आप हमारे लिए एक गाना गा सकती हैं. यह बहुत ही अजीब स्थिति थी.'

पक्षियों को पूर्वज मानते हैं अंडमान के निवासी

खाना बनाने के लिए सब्जियों को साफ करते हुए बोआ सीनियर
इमेज कैप्शन, दशकों तक बोआ सीनियर ही बो भाषा बोलने वाले एकमात्र व्यक्ति थीं.

समय बीतने के साथ बोआ सीनियर धीरे-धीरे उनके साथ खुलती गईं.

प्रोफ़ेसर अब्बी कहती हैं, " मैंने उनके समुदाय के साथ स्ट्रेट द्वीप के जंगलों में कई हफ़्ते और महीने बिताए."

वह बताती हैं कि अपने माता-पिता और पति की मृत्यु के बाद बोआ सीनियर 40 साल तक बो भाषा बोलने वाली आख़िरी व्यक्ति रह गई थीं.

"उन्होंने अपने पति को खो दिया था और बच्चे थे नहीं. वह अक्सर अकेली रहती थीं. उन्हें लोगों से बातचीत करने के लिए हिंदी का अंडमानी संस्करण सीखना पड़ा. अकेलापन कम करने के लिए बोआ सीनियर अक्सर गाती और पक्षियों से बातें करती रहती थीं."

"मैंने एक बार उनसे पूछा कि वह पक्षियों से क्यों बात करती हैं, तब उन्होंने कहा 'वे हमारे पूर्वज हैं, वे दुनिया के एकमात्र प्राणी हैं जो मुझे समझते हैं'."

अंडमानी लोग पक्षियों को अपना पूर्वज मानते हैं इसलिए वह न तो पक्षियों का शिकार करते हैं और न ही उन्हें खाते हैं.

दोस्ती में बदल गया मेल-मिलाप

लकड़ी की कलाकृति बनाते हुए बोआ सीनियर
इमेज कैप्शन, लकड़ी की कलाकृति बनाते हुए बोआ सीनियर

कई वर्षों के मेल मिलाप के बाद उनका रिश्ता दोस्ती में बदल गया.

प्रोफे़सर अब्बी दिल्ली में रहती थीं लेकिन वह बराबर स्ट्रेट आईलैंड की यात्राएं करती थीं.

प्रोफ़ेसर अब्बी ने कहा, "उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि मैं एक गंभीर शख्स हूं. मेरे स्ट्रेट आईलैंड पर आने से वह बहुत खुश होती थीं. वे मेरा हाथ पकड़ लेती थीं और मुझे जाने नहीं देती थीं."

"ऐसा इसलिए था ​क्योंकि उन्हें लगता था कि जब तक मैं द्वीप पर रहती हूं तो हर कोई दिखावा करने के लिए इस ग्रेट अंडमानी भाषा को बोलकर यह दिखाने की कोशिश करता है कि वे भाषा को जानते हैं और जब मैं वहां से आ जाती थी तो वह फिर से हिंदी बोलना शुरू कर देते हैं."

अंतिम दिनों में काफ़ी खराब हो गया था बोआ का स्वास्थ्य

शब्दकोष के साथ प्रोफेसर अब्बी
इमेज कैप्शन, प्रोफे़सर अब्बी ने 2011 में ग्रेट अंडमानी भाषा का शब्दकोष प्रकाशित किया.
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अंतिम दिनों में बोआ का स्वास्थ्य काफ़ी ख़राब हो गया था. प्रोफे़सर अब्बी को भी यह एहसास हो गया था कि वह अब बो बोलने वाले अंतिम व्यक्ति और अपने मित्र को खोने जा रही हैं.

"वे बीमार थीं. उन्हें बहुत खांसी आ रही थी. मैं उनसे फ़ोन पर बात करना चाहती थी लेकिन वे बात नहीं कर पा रही थीं."

फिर समुदाय के एक सदस्य ने बोआ सीनियर की मौत की बुरी ख़बर प्रोफ़ेसर अब्बी को बताई.

वो कहती हैं, "इसने मुझे पूरी तरह से हिलाकर रख दिया. यह जिस समय हुआ उस समय मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी."

प्रोफ़ेसर अब्बी मरती हुई भाषा को पुनर्जीवित करने के अपने प्रयासों में "असहाय" हो गईं. छह साल के शोध के बाद उन्होंने अंडमान द्वीप समूह में इस्तेमाल की जाने वाली बो सहित चार लुप्तप्राय जनजातीय भाषाओं का अपना पहला शब्दकोश संकलित किया. इसे 2011 में प्रकाशित किया गया.

प्रोफ़ेसर अब्बी कहती हैं, "मैं भाषाओं की मूक दर्शक थी, भाषण के रूप एक के बाद एक शब्द मेरी आँखों के सामने चल रहे थे और मैं कुछ भी करने में सक्षम नहीं थी."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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