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अयोध्या में राम मंदिर के पास से मस्जिद हटाने का एग्रीमेंट, क्या है पूरा मामला
- Author, अनंत झणाणें
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से
अयोध्या में निर्माणाधीन राम मंदिर के परिसर के पास ही एक छोटी-सी मस्जिद है जिसका नाम 'बद्र मस्जिद' है.
सरकारी भूलेख में इसका प्लॉट नंबर 609 है.
राम पथ के निर्माण में इस मस्जिद का कुछ हिस्सा सरकार पहले से ही कानूनी तौर पर अपने कब्ज़े में ले चुकी है.
लेकिन अब इस मस्जिद को स्थानांतरित करने का एक एग्रीमेंट सामने आया है.
बीबीसी को मिले इस एग्रीमेंट में लिखा है कि यह एग्रीमेंट बद्र मस्जिद के 'मुतवल्ली' रईस अहमद और राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय के बीच हुआ है.
क्या कहता है एग्रीमेंट
बीबीसी को इस एग्रीमेंट की कॉपी रईस अहमद से मिली है जो इस एग्रीमेंट के मुताबिक़ बद्र मस्जिद के मुतवल्ली है.
एग्रीमेंट के मुताबिक़, "भूमि संख्या 609 में यह मस्जिद थी. इसका 45 वर्ग मीटर हिस्सा राम पथ के विस्तार के लिए लिया जा चुका है."
मस्जिद को स्थानांतरित करने के कारणों के बारे में एग्रीमेंट लिखा है, "मस्जिद पुरानी होने और उसके जीर्णोद्धार के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था न हो पाने के कारण जीर्ण-शीर्ण स्थिति में पहुँच रही है."
एग्रीमेंट कहता है, "अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण की वजह से तीर्थ यात्रियों की संख्या में बहुत वृद्धि हो चुकी है, जिसकी वजह से आवागमन बाधित रहता है. मस्जिद में आने वाले नमाज़ियों को परेशानी और असुविधा होती है. मस्जिद अयोध्या रेलवे स्टेशन और क्षीरेश्वर नाथ मंदिर के पास है, और इस वजह से सुरक्षा के नाम पर पाबंदियां भी लगा दी जाती हैं."
इस एग्रीमेंट में मस्जिद को स्थानांतरित करने के लिए नमाज़ियों से सहमति के बारे में लिखा है, "मुतवल्ली रईस अहमद ने वक्फ बोर्ड के ज़िम्मेदार अधिकारियों और मस्जिद में आने वाले स्थानीय मुसलमानों से विचार-विमर्श करके सर्वसम्मति से यह तय पाया कि मस्जिद को किसी उचित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया जाए, और बद्र नाम से नई मस्जिद बना दी जाए ताकि मस्जिद में आने वाले नमाज़ियों को कोई असुविधा या ज़लालत महसूस ना हो."
एग्रीमेंट में लिखा है कि चम्पत राय "राम जन्भूमि तीर्थ क्षेत्र की ज़रूरतों के लिए मस्जिद बद्र की ज़मीन को खरीदने के लिए इच्छुक हैं और उन्होंने इस सम्बन्ध में बहुत ही सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में आस-पड़ोस के ज़िम्मेदार मुस्लिम धर्म के लोगों से बात की है, जिससे भविष्य में किसी प्रकार के सांप्रदायिक विवाद की आशंका ना रह जाए."
एग्रीमेंट कहता है कि रईस अहमद ने, "30 लाख रुपए में मस्जिद बद्र को स्थानांतरित करने का करार किया है."
इसमें यह भी लिखा हैं कि, "क्योंकि ज़मीन वक़्फ़ संपत्ति है और सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के रजिस्टर में वक़्फ़ संपत्ति के रूप में अंकित है, इस कारण वक़्फ़ बोर्ड की अनुमति लेना ज़रूरी है."
एग्रीमेंट में मस्जिद को स्थानांतरित करने के लिए छह महीने की समय-सीमा रखी गई है और रईस अहमद हो 15 लाख रुपये एडवांस दिए गए हैं. एग्रीमेंट के हिसाब से रईस को छह महीने में मस्जिद को शिफ्ट करके सेल डीड को मंदिर ट्रस्ट के पक्ष में जारी करना होगा और ज़मीन का कब्ज़ा दिलाना होगा.
कौन कर रहा है विरोध
मोहम्मद आज़म कादरी अयोध्या के अंजुमन मुहाफ़िज़ मकाबीर-मसाजिद कमेटी के महासचिव हैं. यह संस्था मकबरों और मस्जिदों की हिफ़ाज़त के लिए काम करती है.
वो कहते हैं कि अयोध्या की जितनी वक़्फ़ जायदादें हैं, चाहे वो मस्जिद, कब्रिस्तान, मज़ार या दरगाह हों, इन सबकी देखरेख, इन सब पर कोई कब्ज़ा न कर पाए, उनकी भूमि को कोई हानि न पहुंचा पाए, उनसे कोई छेड़छाड़ न हो, या कोई उन्हें बेचे नहीं, यह सारी जिम्मेदारी इस समिति की है.
वो कहते हैं कि नजूल रिकॉर्ड के हिसाब से अयोध्या में 101 मस्जिद और 185 कब्रिस्तान हैं. आज़म कादरी कहते हैं कि समिति बद्र मस्जिद को स्थानांतरित करने के एग्रीमेंट के ख़िलाफ़ है.
वो बद्र मस्जिद के वक़्फ़ संपत्ति होने के सुबूत के तौर पर कई दस्तावेज़ दिखाते हैं. यही दस्तावेज़ उन्होंने अयोध्या के डीएम और राम जन्मभूमि थाने के एसएचओ को दी गई लिखित शिकायतों के साथ सौंपे हैं.
आज़म कादरी कहते हैं कि रईस अहमद बद्र मस्जिद के मुतवल्ली नहीं हैं और उन्हें मस्जिद की ज़मीन के संबंध में राम मंदिर ट्रस्ट से एग्रीमेंट करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है.
जब सितम्बर में समिति की एक बैठक में ऐसे करार के बारे में पता चला तो उन्होंने रजिस्ट्री ऑफिस से एग्रीमेंट की कॉपी निकलवाई.
मोहम्मद आज़म कादरी कहते हैं, "वकीलों से इसकी जानकारी ली गई, और उन्होंने राय दी कि यह एग्रीमेंट कानूनन ग़लत है. वक्फ एक्ट के तहत वक्फ प्रॉपर्टी ना तो बेची जा सकती है, ना खरीदी जा सकती है, और ना ही उसका स्थानांतरण किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में यह तय हो चुका है."
आज़म कादरी कहते हैं, "सन 1902 से नजूल के खसरे नंबर पर मस्जिद "वक़्फ़" दर्ज है और सरकारी गैज़ेट नंबर 1282 में दर्ज है. तो इस हिसाब से कोई व्यक्ति इसका मालिक नहीं है, ये वक़्फ़ की ज़मीन है."
मोहम्मद आज़म कादरी कहते हैं कि अयोध्या के ज़िला अधिकारी वक़्फ़ सर्वे आयुक्त होते हैं और वक्फ के इंचार्ज होते हैं, इसलिए उनको भी अंजुमन मुहाफ़िज़ मकाबीर मसाजिद कमेटी ने लिखित में जानकारी दी है.
तो क्या यह एग्रीमेंट एक सरकारी दस्तावेज़ है? इस बारे में आज़म कादरी कहते हैं, "यह दो लोगों का मामला नहीं है, सरकारी रजिस्ट्री हुई है. और उस पर ई-स्टाम्प लगे हुए हैं. यह सरकारी दस्तावेज़ में आ चुके हैं. सरकारी दस्तावेज़ों में उसका (मस्जिद का) कोई मालिक भी नहीं है."
बद्र मस्जिद को स्थानांतरित करने के लिए नमाज़ियों की सहमति के बारे में वो कहते हैं, "जो सहमति ली गई थी वो सड़क को चौड़ा करने के लिए ली गई थी. जिन लोगों ने सहमति दी भी, वो लोग कह रहे हैं कि यह गलत हो रहा है. पूरा एक इलाका सहमति दे दे, फिर भी मस्जिद ट्रांसफर नहीं हो सकती है."
मुतवल्ली के अधिकारों को चुनौती
मोहम्मद आज़म कादरी मांग करते हैं इसमें जिसने भी गैर-कानूनी काम किया है, "उस पर करवाई होनी चाहिए."
एग्रीमेंट में करार करने वाले रईस अहमद को मुतवल्ली बताया गया है. इस बारे में आज़म कादरी कहते हैं, "उन्हें (रईस को) किसी ने अधिकृत नहीं किया है. वो मस्जिद के सिर्फ और सिर्फ नमाज़ी हैं. उस मस्जिद के ना तो वो मुतवल्ली हैं, और अगर मुतवल्ली भी होते, तब भी उन्हें एग्रीमेंट करने का अधिकार नहीं था."
आज़म कादरी पूछते हैं, "अगर वो मुतवल्ली हैं तो मुतवल्ली का पेपर दिखा दें? मुतवल्ली सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड से बनता है."
एग्रीमेंट में यह भी लिखा है कि नमाज़ियों को किसी तरह की असुविधा का सामना न करना ना पड़े इसलिए मस्जिद को स्थानांतरित करना चाहिए. इस बारे में आज़म कादरी कहते हैं, "इन्होंने जितने भी तर्क लिखे हुए हैं वो गलत हैं."
वो पूछते हैं, "एक मस्जिद के एवज़ में 100 मस्जिद भी बना दें तो कोई मतलब नहीं है. एक बार जहाँ अगर कोई मस्जिद है, वो क़यामत तक मस्जिद है."
रईस अहमद का पक्ष
एग्रीमेंट में रईस अहमद को बद्र मस्जिद का मुतवल्ली बताया गया है लेकिन बीबीसी के पूछने पर रईस अहमद अपने आपको बद्र मस्जिद का केयरटेकर बताते हैं.
रईस अहमद ने कैमरे पर इंटरव्यू देने से मना करते हैं लेकिन उन्होंने बीबीसी को अपनी इजाज़त से एक ऑडियो इंटरव्यू दिया. वे कहते हैं, "हम केयरटेकर हैं, मुतवल्ली नहीं हैं. देखरेख करते हैं. लिखित में मुतवल्ली नहीं हैं."
जब हमने उनसे पूछा कि एग्रीमेंट में और अन्य दस्तवेज़ों में उन्हें मुतवल्ली बताया गया है तो रईस कहते हैं, "करारनामे में लिखा गया है, ठीक है. जो देखरेख करता है वही मुतवल्ली कहलाता है. उसका कोई अपॉइंटमेंट नहीं होता है. मोहल्ले वाले जो नाम लिख कर देते हैं, वही नाम हो जाता है."
रईस अहमद कहते हैं कि बद्र मस्जिद को स्थानांतरित करने की चर्चा इस साल जुलाई की आखिरी हफ्ते में शुरू हुई. और इस सिलसिले में उनकी चंपत राय से तकरीबन 6 से 7 बार मुलाकात हुई.
मस्जिद को स्थानांतरित करने के पीछे की अपनी मंशा के बारे में रईस कहते हैं, "हमने नमाज़ियों से बातचीत की तो नमाज़ियों ने कहा कि ठीक है. नमाज़ियों से जब बात हुई तो हमने सहमति पत्र पर हस्ताक्षर भी लिए. फिर उसके बाद ट्रस्ट के (मंदिर ट्रस्ट के) लोगों से बातचीत हुई."
"उन्होंने कहा कि आप आधा पैसा ले लीजिए, और ज़मीन लेकर अपना काम शुरू कर दीजिए और जब वो तैयार हो जायेगा, तब यह खाली हो जाएगा. सारा मलबा हटाने और ख़ाली ज़मीन छोड़ने की बात हुई थी."
रईस अहमद कहते हैं कि सरकार के प्रस्तावित प्लान के हिसाब से पांजी टोला मोहल्ला ख़त्म होने जा रहा है. बद्र मस्जिद इसी मोहल्ले में है.
अनुमति नहीं मिली तो बिक्री रद्द?
रईस अहमद इस 'सरकारी प्लान' से जुड़ा कोई दस्तावेज़ नहीं दिखाते हैं लेकिन कहते हैं, "क्योंकि राम जन्म भूमि मंदिर से फ्रंट पर है यह, तो यह वे ये पूरा हिस्सा एकदम साफ़ चाहते हैं. बद्र मस्जिद को स्थानांतरित करने का प्रस्ताव उन्हीं की तरफ से (राम मंदिर ट्रस्ट) से आया था, फिर हमारे लोग तैयार हुए."
बीबीसी ने पूछा कि क्या चंपत राय की तरफ से मस्जिद को स्थानांतरित करने की पेशकश हुई, और बाद में लोगों से सहमति ली गई तो, तो रईस अहमद ने जवाब दिया, "जी".
बद्र मस्जिद को स्थानांतरित करने के प्रस्ताव के बारे में रईस अहमद कहते हैं, "समझ लीजिए कि बहुत सारे लोग विरोध में भी हैं, बहुत सारे लोग पक्ष में भी हैं. लेकिन हमने तो लगभग-लगभग विरोध ही दिखाई दे रहा है. अगर डीएम साहब हमें बनाने की इजाज़त देंगे तो काम होगा. नहीं तो सेल डीड कैंसिल हो जाएगा."
फिर रईस अहमद अयोध्या के डीएम को दिए गए तीन अक्टूबर का पत्र दिखते हैं, जिसमें वो डीएम से मस्जिद को स्थानांतरित करने की इजाज़त मांग रहे हैं.
अयोध्या की अंजुमन मुहाफ़िज़ मकाबीर मसाजिद कमेटी के मस्जिद को स्थानांतरित करने के विरोध के बारे में रईस अहमद कहते हैं, "नहीं हो सकता है तो डीएम साहब इसे कैंसिल कर देंगे. हम ही लोग तो संपत्ति देते हैं वक़्फ़ में. और वहां से यहां आकर (नए प्लॉट पर) तो यह भी वक़्फ़ संपत्ति हो जाएगी. इसको (स्थानांतरित मस्जिद) को भी हम लोग वक़्फ़ संपत्ति घोषित करेंगे. यह अपनी (निजी) संपत्ति थोड़ी न रह जाएगी."
रुक गया मस्जिद का निर्माण कार्य
रईस अहमद हमें उनके घर के दाहिने ओर का प्लॉट दिखते हैं और कहते हैं कि इसी ज़मीन पर वो बद्र मस्जिद को शिफ्ट करना चाहते थे. प्लॉट पर खुदे हुए गड्ढों में सरिये लगे दिखाई दे रहे हैं लेकिन विरोध के बाद अब वहां निर्माण का काम रुक गया है.
तो क्या रईस अहमद अब भी चाहते हैं कि मस्जिद को स्थानांतरित किया जाए?
वो कहते हैं, "अब मेरे चाहने से नहीं, मैंने जो चाहा वो किया. अब डीएम साहब चाहेंगे तो होगा, वरना नहीं होगा. जो लोग विरोध कर रहे हैं वो हमारी मस्जिद में आने वाले लोग नहीं हैं. वो बाहर के लोग है. मैंने सहमति (नमाज़ियों की सहमति) मस्जिद में बैठकर ली है. हमारी मस्जिद में जो लोग आए हैं उन्होंने दस्तखत किया है और वो मोहल्ले के नमाज़ी हैं."
इक़बाल अंसारी अपने वालिद साहब हाशिम अंसारी की तरह बाबरी मस्जिद के मुकदमे में मुद्दई थे. वो और उनका परिवार बद्र मस्जिद से चंद मीटर दूर सड़क पार करके रहता है.
बद्र मस्जिद को वो अपने मोहल्ले की मस्जिद बताते हैं. वो कहते हैं कि उनके चाचा कासिम अंसारी बद्र मस्जिद के आखिरी मुतवल्ली थे और उनके गुज़र जाने के बाद इस मस्जिद का कोई मुतवल्ली नहीं बना है.
इक़बाल अंसारी कहते हैं कि मस्जिद की देखरेख, "हम ही लोग करते थे. और आज भी मस्जिद का वाटर टैक्स और बिजली का बिल हमारे वालिद साहब हाशिम अंसारी के नाम से आता है."
मस्जिद के एग्रीमेंट के बारे में इक़बाल अंसारी कहते हैं, "शिफ्टिंग का मामला था, उसे रोक दिया गया है. अयोध्या में लोगों को तकलीफ है. रईस (अहमद) साहब की गलती है कि इन्होंने पहले सरकार से कोई परमिशन नहीं ली. इस बात को लेकर वो रुकी हुई है. सरकार को मस्जिद की ज़मीन की जितनी ज़रुरत थी (राम पथ चौड़ी करने के लिए) वो ले ली गई है."
एग्रीमेंट के बाद अब इक़बाल अंसारी कहते हैं, "इसमें जो सही हो, गलत हो, सकरार उसका फैसला खुद कर दे. हम तो यह चाहते हैं कि यह राजनीति में ना आए और वो ही बेहतर है."
रईस अहमद के नई जगह पर मस्जिद निर्माण शुरू करने के बारे में इक़बाल अंसारी कहते हैं, "इन्होंने नक्शा पास नहीं कराया और काम शुरू कर दिया. और अब उस पर रुकावट आ गई है."
चंपत राय का क्या कहना है
बद्र मस्जिद को स्थानांतरित करने का एग्रीमेंट रईस अहमद और राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के बीच में हुआ.
26 अक्टूबर को अयोध्या के कारसेवकपुरम में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीबीसी ने चंपत राय से पूछा, "क्या बद्र मस्जिद को स्थानांतरित करने के लिए रईस अहमद और आपके बीच कोई करार हुआ है?" तो चंपत राय ने कहा, "सुनिए, इस समय केवल 22 जनवरी (राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के बारे में बात होगी), उसके अलावा कुछ नहीं."
बीबीसी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में फिर पूछने की कोशिश कि लेकिन चंपत राय ने सवाल पूरा नहीं होने दिया और हाथ दिखाते हुए इस मुद्दे पर सवाल पूछने से रोक दिया.
बाद में बीबीसी ने एक बार फिर उनसे बद्र मस्जिद के एग्रीमेंट से जुड़े सवाल पूछने के कोशिश की और कहा कि अगर हमने चंपत राय से उनका पक्ष जानने की कोशिश की तो हम उनके हवाले से क्या लिख सकते हैं?
तो चंपत राय ने कहा, "जो बोलना था, मैंने बोल दिया."
दरअसल जब ऑडियो रिकॉर्डिंग नहीं हो रही थी तो चंपत राय ने बीबीसी से कहा कि, "जो भी हुआ सही हुआ." एक बार फिर बीबीसी ने उनसे पूछा, "क्या हम उसमें सिर्फ इतना लिख सकते हैं कि जो भी हुआ सही हुआ है, और आपका यह मानना है?"
चंपत राय ने जवाब दिया, "जो हुआ सही हुआ. मस्जिद और मुस्लिम समाज की भलाई में हुआ."
बीबीसी ने अपना सवाल (ऑडियो पर) फिर से दोहराया और कहा, "तो हम कह सकते हैं कि हमने आपसे पूछने की कोशिश की और आपने कहा यह ..."
(सवाल पूरा होने से पहले चम्पत राय फिर बोल पड़ते हैं)
चंपत राय: "जो कुछ हुआ भलाई में हुआ. समाज की भलाई में, मुस्लिम समाज की भलाई में और मस्जिद की भलाई में हुआ."
अंत में बीबीसी ने चम्पत राय से बद्र मस्जिद के मुद्दे पर विस्तार से बात करने के लिए समय माँगा तो उन्होंने समय देने से इनकार कर दिया.
क्या कहना है सरकारी अधिकारियों का
बीबीसी ने अंजुमन मुहाफ़िज़ मसाजिद मकाबिर कमेटी की शिकायत से जुड़ी जानकारी लेने के लिए थाने के एसएचओ मणिशंकर तिवारी से मुलाकात की.
कैमरे पर इंटरव्यू देने से उन्होंने मना किया और सिर्फ इतना बताया कि उन्हें कमेटी की शिकायत मिली है और उसकी जांच जल रही है.
बीबीसी ने अयोध्या के डीएम से भी बात करने की कोशिश की.
अंजुमन मुहाफ़िज़ मसाजिद मकाबिर कमेटी के मुताबिक़ अयोध्या के डीएम ज़िले के सहायक सर्वे वक्फ आयुक्त होते हैं और इस तरह के मामले उनके अधिकार क्षेत्र में आते है.
डीएम नीतीश कुमार ने सिर्फ इतना कहा कि यह मामला "हमसे संबंधित नहीं है. मामला दो प्राइवेट (निजी) पार्टियों के बीच है तो उनसे बात करिए, जिस एग्रीमेंट की आप बात कर रहे हैं वो सरकारी आदमी ने नहीं किया है."
मोहल्ले वालों का क्या कहना है?
शालिग्राम पांडेय पांजी टोला के निवासी हैं और बद्र मस्जिद से तीन-चार घर छोड़ कर रहते हैं.
वो अपने-आपको अयोध्या का पैतृक निवासी बताते हैं और कहते हैं कि उनके पूर्वज भी अयोध्या के निवासी थे. उनकी उम्र 55 साल हो गई है और उनके पूर्वज भी इस मस्जिद को देखते आ रहे हैं.
वो कहते हैं, "भाजपा का नारा था- सबका साथ, सबका विकास, यहाँ के नागरिक वही चाहते हैं. हम लोग चाहते हैं कि अयोध्या में जितने धार्मिक स्थान हैं वो बने रहें. हिंदुओं के धार्मिक स्थान भी बने रहें और भाईचारा और एकता बनी रहे. किसी के धर्म की हानि नहीं होनी चाहिए."
शालिग्राम पांडेय के घर से कुछ कदम दूरी पर जमील अहमद अपने परिवार के साथ रहते है. वो अपने आप को बद्र मस्जिद का नमाज़ी बताते हैं. वे बद्र मस्जिद को वो "पूरे मोहल्ले की मस्जिद" बताते हैं.
जमील अहमद के मुताबिक पांजी टोला में तकरीबन 10 मुस्लिम परिवार हैं.
मस्जिद के एग्रीमेंट के बारे में वो कहते हैं, "रईस साहब को ज़िम्मेदारी दी गई थी मस्जिद के लिए तो उन्होंने किसी से एग्रीमेंट कर लिया है."
वो कहते हैं कि कुछ लोगों में आम सहमति सिर्फ इस बात को लेकर थी कि रईस अहमद मस्जिद की देखरेख करें. "लेकिन उन्होंने कैसा एग्रीमेंट कर लिया यह तो अभी पता नहीं. हम चाहते हैं कि इस मस्जिद को यहाँ से न ले जाएँ. मस्जिद हमारे मोहल्ले की पहचान है."
क्या कहना है वक़्फ़ बोर्ड का?
बद्र मस्जिद से जुड़े एग्रीमेंट में लिखा था कि क्योंकि बद्र मस्जिद सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के रजिस्टर में वक़्फ़ संपत्ति के रूप में अंकित है तो उसे स्थानांतरित करने के लिए सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड की अनुमति लेना आवश्यक है.
बीबीसी ने उत्तर प्रदेश के सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन ज़ुफर अहमद फ़ारूक़ी से बद्र मस्जिद से जुड़े एग्रीमेंट के बारे में उनकी राय जानने की कोशिश की लेकिन उनसे फ़ोन पे संपर्क नहीं हो सका. जब बीबीसी की टीम लखनऊ स्थित वक़्फ़ बोर्ड के दफ्तर पहुँची तो वहां पर पता चला की चेयरमैन फ़ारूक़ी 11 नवंबर तक छुट्टी पर हैं.
बीबीसी ने उनकी गैर-मौजूदगी में एक्टिंग चेयरमैन नईम-उर-रहमान से मुलाकात की लेकिन उन्होंने इस मामले पर सिर्फ इतना कहा कि वक़्फ़ बोर्ड को अयोध्या की बद्र मस्जिद के एग्रीमेंट की जानकारी मिली है. लेकिन क्योंकि वो कार्यवाहक चेयरमैन हैं तो वो सिर्फ रूटीन काम ही देख रहे हैं. और इस मामले पर बोर्ड का पक्ष सिर्फ चेयरमैन ही दे सकते हैं.
बीबीसी ने सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के मामले देखने वाले वकील पुनीत गुप्ता से भी बात की. हाई कोर्ट में वक़्फ़ बोर्ड के मामलों की पैरवी करने वाले पुनीत गुप्ता ने कहा कि बद्र मस्जिद के एग्रीमेंट के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है तो वो उसके बारे में कुछ कह नहीं सकते हैं.
बीबीसी ने वक़्फ़ से जुड़े कानून के बारे में पुनीत गुप्ता से समझना चाहा तो उन्होंने बिना बद्र मस्जिद पर और उससे जुड़े एग्रीमेंट पर टिप्पणी किए कहा, "पहले वक़्फ़ एक्ट में 2013 तक यह प्रावधान था कि वक्फ बोर्ड की अनुमति से वक्फ संपत्ति को ट्रांसफर और एक्सचेंज किया जा सकता है."
"लेकिन 2013 में एक्ट में संशोधन करते हुए संसद ने वक्फ संपत्ति के एक्सचेंज और सेल के लिए किसी भी तरह की अनुमति देने की वक्फ बोर्ड की शक्तियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है. मेरी जानकारी में कानून के अनुसार, वक्फ बोर्ड या मस्जिद का मुतवल्ली, उनके पास वक्फ संपत्ति को किसी भी तरह से स्थानांतरित करने का कोई अधिकार नहीं है."
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