बिहार: कटिहार 'गोलीकांड' में दो लोगों की मौत को लेकर पुलिस के दावे पर क्यों उठ रहे सवाल?

    • Author, विष्णु नारायण
    • पदनाम, कटिहार के बारसोई से, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार के कटिहार ज़िले का बारसोई प्रखंड बीते तीन दिन से सुर्ख़ियों में है.

बारसोई प्रखंड कार्यालय पर बीती 26 जुलाई (बुधवार) के दिन नियमित बिजली सप्लाई की मांग को लेकर प्रदर्शन के दौरान स्थिति बेकाबू हो गई.

पुलिस प्रशासन ने हालात काबू करने के लिए गोली चलाई और फ़ायरिंग में दो लोगों की मौत हो गई जबकि एक अन्य शख़्स घायल हो गया.

ज़िला प्रशासन की ओर से जो जानकारी मुहैया करायी गई है, उसके मुताबिक प्रखंड परिसर में प्रदर्शन कर रहे लोग जब उग्र हो गए और नज़दीक के ही बारसोई पावर सब स्टेशन में तोड़फोड़ करने लगे. इस उग्र भीड़ पर क़ाबू पाने के लिए पुलिस ने फ़ायरिंग की.

पुलिस प्रशासन के भी आला अधिकारियों ने शुरुआती बातचीत में माना कि पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलियाँ चलाईं. हालांकि अब वे इस वाक़ये के दौरान किसी अपराधी की ओर से गोली चलाने की बात भी कर रहे हैं.

28 जुलाई की शाम पुलिस अधीक्षक जितेंद्र कुमार और ज़िलाधिकारी रवि प्रकाश की ओर से जारी किए सीसीटीवी फ़ुटेज ने 'बारसोई गोलीकांड' में एक नया ट्विस्ट ला दिया है.

बारसोई अनुमंडल कार्यालय परिसर का सीसीटीवी फ़ुटेज जारी करते हुए पुलिस अधीक्षक और ज़िलाधिकारी ने दावा किया है कि इस घटना को पूरे सुनियोजित तरीक़े से अंज़ाम दिया गया.

प्रेस कांफ्रेंस में दोनों अधिकारी ने कहा, "असामाजिक तत्व बारसोई के माहौल को ख़राब करना चाहते थे. पुलिस ने पावर सब स्टेशन के अंदर उग्र भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आत्मरक्षा में गोली ज़रूर चलाई थी, लेकिन सोनू और नियाज़ की बॉडी अनुमंडल कार्यालय की बिल्डिंग के आगे मिली थी. पावर सब स्टेशन और अनुमंडल कार्यालय के बीच की दूरी लगभग 200 मीटर है और पुलिस के हथियार का रेंज़ इतना नहीं होता."

मृतक के परिवार ने उठाए सवाल

फ़ायरिंग की इस घटना में 23 साल के सोनू साह और 33 साल के ख़ुर्शीद की मौत हुई है जबकि नियाज़ घायल हैं.

इनके रिश्तेदारों में स्थानीय पुलिस प्रशासन के ख़िलाफ़ आक्रोश दिखता है. नियाज़ को इलाज के लिए सिलीगुड़ी ले जाया गया है और उनकी स्थिति ख़तरे से बाहर बतायी गई.

मृतक सोनू के बड़े भाई मोनू बारसोई पावर सब स्टेशन में बतौर एजेंट कार्यरत हैं.

मोनू के मुताबिक 26 जुलाई के दिन उन्हें ही सुरक्षित निकालने के लिए सोनू और छोटा भाई उदित अनुमंडल परिसर पहुँचे थे. उनका दावा है कि उनके भाई का प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं था.

उन्होंने पुलिस की ओर से जारी सीसीटीवी फुटेज और अधिकारियों के दावे पर सवाल खड़ा करते हुए कहा, "पुलिस की थ्योरी पर मुझे यक़ीन नहीं. पुलिस के वीडियो को मैंने तीन-चार बार देखा, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि एक सेकेंड में कैसे कोई व्यक्ति दो आदमी को गोली मार सकता है. जब तक पुलिस इस मामले की जाँच करेगी सच्चाई सामने नहीं आएगी. हम चाहते हैं कि मामले की सीबीआई जाँच हो तभी हमें न्याय मिलेगा."

वहीं उनकी माँ की हालत बेहद नाज़ुक बनी हुई है. वह अपने बेटे की मौत को याद करते हुए रह-रहकर रोने लगती हैं.

वो कहती हैं, "मेरा बेटा तो वापस नहीं आ सकता लेकिन हमको न्याय चाहिए. जिसने भी बेटे को मारा उसे पुलिस पकड़े. गोली किसने मारी इसकी सीबीआई जाँच हो. मेरे बेटे का न तो प्रदर्शन से कोई लेना-देना था और न ही किसी से कोई दुश्मनी."

वहीं ख़ुर्शीद के पिता मसीउर रहमान ने बताया कि उनके बेटे अनियमित बिजली सप्लाई के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शन में शामिल होने के लिए बारसोई प्रखंड गए थे, लेकिन वहाँ से वे जीवित नहीं लौटे.

'पुलिस ने गोली क्यों चलाई?'

घर के एकमात्र कमाऊ शख़्स होने की वजह से ख़ुर्शीद ही अपने परिवार का सहारा थे.

मसीउर रहमान ने बताया,"पूरे इलाक़े में बिजली की भारी कटौती होती है इसलिए गाँव के और भी कई लोग प्रदर्शन में शामिल होने वहां गए थे, और गांववालों के मार्फ़त ही ख़ुर्शीद की मौत की ख़बर मिली. हम यही चाहते हैं कि सरकार हमारे परिवार को उचित मुआवज़ा दे."

ख़ुर्शीद के छोटे भाई खालिद ने बताया, "हम और बड़े भैया उस दिन प्रदर्शन में शामिल होने के लिए अनुमंडल पर गए थे. हमारे मीटर का ऐड्रेस वग़ैरह बदलवाना था लेकिन देखते ही देखते माहौल बिगड़ गया. पुलिस फ़ायरिंग करने लगी और मैंने देखा कि उनको गोली लगी गई, मेरी हालत ही ख़राब हो गई."

खालिद अपने भाई की ज़िम्मेदारियों का जिक्र करते हुए कहते हैं, "वे टेम्पू चलाकर सबका पालन-पोषण करते थे. हमारे घर पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा. बूढ़े माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है. कुछ मुआवजा मिले. मामले की जाँच हो कि पुलिस ने गोलियाँ क्यों चलाईं."

जिलाधिकारी रवि प्रकाश मृतकों को लगने वाली गोलियों को लेकर कहते हैं, "घटनास्थल की जाँच और सीसीटीवी फ़ुटेज के एनालिसिस के आधार पर किसी क्रिमिनल की तरफ़ से गोली मारने की बात सामने आयी है. पोस्टमार्टम और एफएसएल की रिपोर्ट आने के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा कि मृतकों को लगी गोलियाँ किसकी हैं."

स्थानीय विधायक के सवाल

ज़िला प्रशासन की ओर से जारी किए गए सीसीटीवी फ़ुटेज और दावे पर स्थानीय विधायक महबूब आलम कहते हैं कि जनता को न्याय मिलना चाहिए.

उन्होंने कहा, "पुलिस नया वीडियो फुटेज़ जारी करके नया नैरेटिव पैदा करना चाहती है. हम लोग शुरू से ही मांग कर रहे हैं कि इस मामले की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच हो ताकि जनता को न्याय मिल सके."

"निर्दोष की हत्या हुई है और इस हत्या को जनता जायज नहीं ठहरा सकती है. अपराध पुलिस ने किया है, उनके ख़िलाफ़ पर मुक़दमा दर्ज होना चाहिए."

उन्होंने यह भी कहा, "मूल सवाल यह है कि ऐसी नौबत क्यों आयी कि हज़ारों लोगों को प्रखंड कार्यालय पर आकर बिजली के लिए प्रदर्शन करना पड़े. 24 घंटे में 5 घंटे भी बिजली नहीं आ रही. रात में भी बिजली नहीं मिल रही. यह खेती और सिंचाई का समय है. आक्रोश की वजह से खुद ही बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई थी."

वो कहते हैं कि स्थानीय जनप्रतिनिधि होने की नाते इस मामले में वो अपनी ज़िम्मेदारी लेते हैं.

उन्होंने कहा, "प्रदर्शन के लिहाज़ से आयोजकों ने जानकारी पहले ही प्रशासन को दे दी थी. इसके अलावा मैंने भी एसडीएम और डीएसपी को फ़ोन कर भारी भीड़ की संभावना को लेकर जानकारी दी थी. लेकिन प्रशासन की तैयारी नाकाफ़ी रही."

"प्रशासन ने ऐसी स्थिति उत्पन्न होने दी और एहतियातन कोई तैयारी नहीं की. आख़िर लोगों का आक्रोश कोई आपराधिक आक्रोश तो है नहीं."

बिजली सप्लाई को लेकर धरना-प्रदर्शन के आयोजक मोअज़्ज़म हुसैन, भीड़ के उग्र होने और पुलिस फ़ायरिंग के मामले पर कहते हैं, "इलाक़े में बिजली की समस्या के चलते हमलोगों ने प्रदर्शन किया था. दिन के दिन लगभग डेढ़ बजे तक सबकुछ शांतिपूर्वक चल भी रहा था. हमने धरना-प्रदर्शन में शामिल लोगों को थामे भी रखा लेकिन वहाँ कुछ उपद्रवी तत्व ज़रूर थे जिन्होंने वहाँ से बिजली कार्यालय की ओर रुख़ किया."

वो कहते हैं, "इसके बाद हमें गोलियों की आवाज़ सुनाई पड़ी. प्रशासन ने फ़ायरिंग की, तो किन्हीं नाजायज़ और उपद्रवी लोगों ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए भी फ़ायरिंग की. उन्होंने माहौल को ख़राब करने की कोशिशें कीं. हम लोगों ने उस समय ये सुना कि पुलिस ने फायरिंग की और एक की मौत हुई है दो अस्पताल ले गए हैं."

एक अन्य चश्मदीद और बारसोई कोर्ट में वकालत कर रहे अधिवक्ता अशोक कुमार कहते हैं, "कई ग्राम पंचायतों के मुखिया और समिति सदस्यों ने प्रखंड कार्यालय पर मीटिंग की और फिर भीड़ बिजली बोर्ड की ओर बढ़ने लगी. हो-हल्ला होने लगा. देखते-देखते पूरा इलाक़ा रणक्षेत्र में तब्दील हो गया. इसके बाद पुलिस ने गोलियां चलाईं."

हालांकि पुलिस प्रशासन ने गोलियां चलाने से पहले लाठीचार्ज भी किया और हवाई फ़ायरिंग भी की. लेकिन प्रशासन का दावा है कि इससे भीड़ क़ाबू में नहीं आ सकी.

ज़िलाधिकारी रवि प्रकाश कहते हैं, "भीड़ ने एसडीओ-एसडीपीओ समेत बिजली विभाग के कर्मचारियों को बंधक बना लिया था. उन्हें वॉर्निंग दी गई और माइल्ड लाठीचार्ज किया गया लेकिन जब भीड़ फिर भी नहीं हटी तो हवाई और सीमित फायरिंग की गई थी."

बिजली सप्लाई कितनी बड़ी समस्या?

बारसोई अनुमंडल परिसर में (26 जुलाई) को चली गोलियों के बाद से मूल समस्या पर बातचीत नहीं हो रही है.

सियासी दल समेत आम लोगों की दिलचस्पी भी इस बात को जानने में अधिक है कि गोलियाँ आख़िर किसने और किन परिस्थितियों में चलाईं, लेकिन इस शोरगुल के बीच मूल मुद्दा (बिजली सप्लाई) ग़ायब हो चुका है.

बारसोई अनुमंडल कार्यालय के करीब किराना सामान के होलसेलर आनंद कुमार भगत बताते हैं, "बीते दो महीनों से बिजली की सप्लाई बहुत ही ख़राब रही. आधे घंटे बिजली आती थी तो दो घंटे कट जाती थी. पूरे दिन में सात-आठ घंटा बिजली मिलना भी मुश्किल हो गया था."

वहीं स्थानीय किसान तैयब हुसैन के हिसाब से रात-रात भर बिजली की कटौती हो जाया करती थी. दो घंटे सप्लाई होती तो तीन घंटे कटौती रहती.

दरअसल इस वक्त किसानों के लिए धान रोपने का समय है, जिसके लिए पानी चाहिए और पानी के लिए मोटर पंप चलाने के लिए बिजली की ज़रूरत है. इसलिए भी ग्रामीणों में बिजली व्यवस्था के लिए ज़्यादा आक्रोश दिखता है.

बिजली कटौती के संदर्भ में बारसोई सब स्टेशन के कार्यपालक सहायक पिंटू कुमार तांती ने कहा, "एक तो गर्मी के दिनों में खपत बढ़ जाती है और बारसोई में खपत के हिसाब से बिजली भी नहीं मिलती. आबादी के हिसाब से 16-18 मेगावॉट तक बिजली मिलनी चाहिए लेकिन 8-10 मेगावॉट बिजली ही मिल पाती है. तो आगे से ही लोडशेडिंग की जाती है. हम लोग मैनेज करके चला रहे हैं."

क्या कहना है बिहार सरकार का?

इस पूरे मामले पर जब मीडिया ने प्रदेश के ऊर्जा मंत्री बिजेन्द्र यादव से सवाल किए तो उनका कहना था कि कोई बदमाशी करेगा तो पुलिस क्या करेगी, लाठीचार्ज और गोलियाँ तो चलती ही हैं.

वहीं मुआवज़े के सवाल पर उन्होंने मामला देखे जाने की बात कही.

उनके इस बयान को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए हैं, हालांकि जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं, "ऊर्जा मंत्री के पूरे बयान को चलाने के बजाय काटकर चलाया गया. उन्होंने दो बातें बोली थीं कि सरकार मुआवज़े पर विचार करेगी, लेकिन किसी ने चलाया नहीं. उन्होंने क़ानून व्यवस्था को हाथ में लेने के संदर्भ में बयान दिया था लेकिन उसे प्रदर्शन से जोड़ दिया गया."

नीरज कुमार विरोध प्रदर्शन के बारे में कहते हैं, "समस्या का निदान 25 जुलाई को ही कर लिया गया था. 50 केवीए के ट्रांसफ़ॉर्मर में ख़राबी थी. उसे ठीक करा लिया गया था. इससे पहले छह दिन तक बिजली के लो वोल्टेज की समस्या रही लेकिन उसे भी ठीक करा लिया गया."

पूरे मामले पर राज्य सरकार के पक्ष के बारे में नीरज कुमार ने कहा, "सरकार का इस पूरे मामले में यह पक्ष है कि दोनों लोगों की मौत पुलिस की गोलियों से नहीं हुई. प्रशासन ने इस संदर्भ में सीसीटीवी फ़ुटेज भी जारी किया है. अब यह सरकार का दायित्व है कि वह अपराधी और उसकी मंशा का पता करे."

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी वाक़ये के दिन से ही इस पूरे मामले में न्यायिक जाँच की माँग कर रहे हैं.

वहीं स्थानीय भाकपा (माले) विधायक दल के नेता महबूब आलम इसे पुलिस की दमनात्मक कार्रवाई बताते हुए कहते हैं, "पुलिस पर 302 के तहत मुक़दमा होना चाहिए."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)