मोदी और शी ने मिलाया हाथ, रिश्तों के पटरी पर लौटने की कितनी आस

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- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पांच साल से द्विपक्षीय रिश्तों में जमी बर्फ़ बुधवार को रूस के कज़ान में उस समय पिघली जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने द्विपक्षीय वार्ता के दौरान गर्मजोशी से हाथ मिलाया.
दोनों नेताओं के बीच पांच साल बाद पहली बार द्विपक्षीय वार्ता हुई और दोनों नेताओं ने सीमा पर तनाव घटाने को लेकर हुए समझौते का स्वागत किया.
दोनों ही नेताओं ने 'सीमा पर शांति' बनाए रखने की प्राथमिकता को रेखांकित किया और 'आपसी विश्वास, 'आपसी सम्मान' और 'आपसी संवेदनशीलता' को रिश्तों की बुनियाद बताया.'
शी जिनपिंग ने और अधिक 'आपसी संवाद और सहयोग' पर जोर देते हुए कहा, "दोनों देशों के लोग और अंतरराष्ट्रीय जगत हमारी मुलाक़ात को बहुत ग़ौर से देख रहा है."

साल 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में दोनों देशों की सेनाओं के बीच हिंसक झड़प हो गई थी जिसमें भारत के 20 सैनिक मारे गए थे जबकि चीन के कई सैनिक हताहत हुए थे. इसके बाद से दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हो गए थे.
इसके क़रीब साढ़े चार साल बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध सामान्य करने को लेकर पहल के संकेत तब मिले जब बीते सोमवार को भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव कम करने को लेकर दोनों देशों के बीच समझौते की घोषणा की.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने भी इसे एक मौका बताते हुए कहा है, "भारत चीन मुद्दे के हल के लिए यह एक अहम मौका है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए."
भारत चीन संबंधों पर बारीक़ नज़र रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि संबंध सामान्य बनाने में मोदी और शी जिनपिंग की मुलाक़ात एक अहम कदम है.
कितनी अहम है ये मुलाक़ात

बीते पांच सालों में दोनों देशों के रिश्ते तल्ख़ी वाले रहे हैं. ऐसे में ये पहलकदमी काफ़ी अहम है.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर राजन कुमार कहते हैं,''भारत और चीन के शीर्ष नेताओं की ये मुलाक़ात काफ़ी अहम है क्योंकि एक सप्ताह पहले तक नहीं पता था कि दोनों देशों के बीच ऐसी कोई बैठक होने जा रही है. दोनों देशों ने लद्दाख़ में सीमा पर डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया की घोषणा करने के बाद ये बैठक की है.''
उनके अनुसार, ''दोनों नेताओं पर दबाव था कि लद्दाख़ में तनातनी की स्थिति में अगर मुलाक़ात होती तो सवाल पूछे जाते कि सीमा पर जवान जमे हैं और मुलाक़ात हो रही है. इस हिसाब से देखा जाए तो ये बैठक महत्वपूर्ण है.''
वो कहते हैं,'' भारत डायलॉग डिप्लोमेसी की बात करता है इस बैठक के बाद वो दावा कर सकता है कि वो जिसका दावा करता है उसको करता भी है, झगड़े को डायलॉग के ज़रिए सुलझाया है.''
कुछ विश्लेषक तनाव कम करने के समझौते और वार्ता की मेज पर चीन को लाने को भारत की 'बड़ी जीत' के रूप में देखते हैं.
नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत के अनुसार,''दोनों देशों के बीच बातचीत की शुरुआत बहुत अहम है.''
बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उन्होंने कहा,'' यह भारत की एक तरह से बड़ी जीत है. भारत एक बड़ी शक्ति के सामने चार साल तक खड़ा रहा और उसने बार-बार ये कहा कि जबतक सीमा पर स्थिति सामान्य नहीं होती बाकी क्षेत्रों में भी रिश्ते सामान्य नहीं होंगे. और ताज़ा समझौते में चीन ने इसे स्वीकार किया.''
वो कहते हैं,'' यथास्थिति की बात मानकर चीन ने भारत के बुनियादी नज़रिये को स्वीकार किया और उस आधार पर अपनी नीति में बदलाव किया है. हालांकि यह उसी इलाक़े से संबंधित है, जहां 2020 में समस्या पैदा हुई थी.''
उनके मुताबिक,''यह एक बड़ी उपलब्धि है कि 2020 से संबंधों में जो ठहराव आया था उसमें प्रगति हो रही है. भारत ने यह स्पष्ट कर दिया था कि जबतक सीमा पर यथास्थिति बहाल नहीं होती. द्विपक्षीय संबंध भी आगे नहीं बढ़ पाएंगे. बीते सोमवार को डिसइंगेजमेंट के समझौते का जो एलान हुआ था, मोदी और शी जिनपिंग की मुलाक़ात इसपर मुहर लगाने के लिए हुई है.”
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं, "पीएम मोदी ने कहा कि एक दूसरे के प्रति आदर और संवेदनशीलता नहीं होगी तो आपसी संबंध आगे नहीं बढ़ पाएंगे. इसका ये भी संकेत है कि शुरुआत ज़रूर हुई है लेकिन आगे का रास्ता तभी खुलेगा जब कुछ हद तक चीन अपना रवैया बदलेगा. और मुझे लगता है कि इस मुलाक़ात से यही संदेश निकलता है."
हालांकि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर राजन कुमार कहते हैं कि इस बैठक के ज़रिए सीमा के कुछ मुद्दे सुलझते नज़र आएंगे लेकिन ''ये नहीं समझा जाना चाहिए कि इसके ज़रिए चीन-भारत के सारे मुद्दे सुलझ जाएंगे.''
आर्थिक मज़बूरियों की भूमिका

पिछले पांच साल से दोनों नेताओं के बीच कोई द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई थी. हालांकि इसका असर उस तरह से आर्थिक हितों पर नहीं पड़ा लेकिन संबंध सामान्य करने में दोनों पक्षों के आर्थिक हित भी रहे हैं.
दोनों देशों के बीच व्यापार एक अहम मुद्दा रहा है.
डॉक्टर राजन कुमार कहते हैं, ''हम 80 अरब डॉलर के सामान आयात करते हैं और सिर्फ़ 40 अरब का निर्यात करते हैं. चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बड़ा मुद्दा है. भारत इस मुश्किल को सुलझाना चाहता है.''
दोनों देशों के बीच 2023 में 136 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था. यही नहीं चीन अमेरिका को पछाड़कर भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर भी बन गया है.
लेकिन पिछली कुछ तिमाहियों में चीन की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है. जबकि दूसरी तरफ़ तनाव की वजह से भारत में चीन का निवेश प्रभावित हुआ है. भारत को भी अपने मैन्युफ़ैक्चरिंग क्षेत्र के लिए कच्चे माल की आपूर्ति की भारी ज़रूरत है.
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं, ''दोनों देश चाहते रहे हैं कि आर्थिक संबंध सामान्य हों. भले ही व्यापार बना रहा लेकिन भारत ने चीनी निवेश को लेकर कड़ा रुख़ अपनाया और मानदंड बहुत कड़े कर दिए थे. इसकी वजह से भारत में निवेश करना चीन के लिए मुश्किल हो गया था."
उनके अनुसार, "निवेश में तो कमी आई ही बल्कि महत्वपूर्ण आधारभूत ढांचे से तो यह बाहर ही हो गया. 2020 से पहले तो ये भी चर्चा थी कि चीन की अग्रणी टेलीकॉम कंपनी हुवावे भारत में 5जी के प्रसार में शिरकत कर सकती है. लेकिन विवाद के बाद चीजें आगे नहीं बढ़ पाईं.''
प्रोफ़ेसर पंत का कहना है कि इस समय चीन की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं है और वो ज़रूर चाहेगा कि भारत जैसे बाज़ार में उसे जगह मिलती रहे.
लेकिन इस विवाद से भारत को भी समस्या हुई है.
हर्ष पंत कहते हैं, ''भारतीय उद्योगों को जो सामान चाहिए, सरकार के रुख़ के कारण उसकी आपूर्ति में मुश्किलें आ रही हैं. भारत के उद्योग जगत की ओर से भी इसे लेकर थोड़ा दबाव रहा है और उसका कहना है कि चीन के साथ अगर संबंध थोड़े सामान्य होते हैं तो उससे भारत को मैन्युफ़ैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने में ज़्यादा कामयाबी मिलेगी. भारत भी चाहता है कि उसकी घरेलू उत्पादकता बढ़े.''
यानी दोनों तरफ़ ये चाहत रही है कि अगर संबंध सामान्य होते हैं तो दोनों के व्यापार पटरी पर आएंगे.
भू-राजनीति और भारत चीन संबंध

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चीन के साथ संबंधों में खटास के चलते भारत की अमेरिका से क़रीबियां बढ़ी हैं. भारत अमेरिका की अगुआई वाले क्वाड गुट का सदस्य बन गया है जिसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया हैं.
पिछले महीने ही क्वाड नेताओं की अमेरिका में बैठक हुई थी. इस दौरान पीएम मोदी ने कहा, "हम किसी के ख़िलाफ़ नहीं हैं. हम सभी क़ानून पर आधारित एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान और सभी मसलों के शांतिपूर्ण ढंग से हल निकालने का समर्थन करते हैं."
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत का कहना है कि भारत अपने हितों के अनुरूप अन्य देशों से रिश्ते क़ायम कर रहा है और ऐसा करके वो एक डिटरेंस (प्रतिरोध) बनाना चाहता है.
हालांकि शी जिनपिंग और मोदी की मुलाक़ात के बाद चीन ने अपने बयान में "बहुध्रुवीय दुनिया" की बात कही है, लेकिन भारत का पहले से ही स्टैंड रहा है कि वो किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं होगा.
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं, ''चीन बहुध्रुवीय दुनिया की तो बात करता है क्योंकि अमेरिका से उसकी प्रतिद्वंद्विता है लेकिन वो बहुध्रुवीय एशिया की बात नहीं करता है और उसने हिंद महासागर से लेकर भारत के पड़ोसी देशों के माध्यम से भारत को एक दूसरे दर्जे की शक्ति बनाने की पूरी कोशिश की है.”
बुधवार को भारत ने अपने बयान में 'बहुध्रुवीय एशिया और बहुपध्रुवीय दुनिया' की बात दोहराते हुए द्विपक्षीय संबंधों को हर मोर्चे पर सुधारने और विकास से जुड़ी चुनौतियों को सुलझाने की बात कही.
प्रोफ़ेसर पंत का कहना है,''अगर चीन का रवैया विस्तारवादी और आक्रामक रहेगा और भारत से रिश्तों का वो सम्मान नहीं करेगा को भारत को दूसरे देशों के साथ संबंध बनाने ही पड़ेंगे. यह चीन पर निर्भर करता है कि वो भारत के साथ कैसे रिश्ते रखना चाहता है.''
पहले भी हुई हैं ऐसी वार्ताएं

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प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि दोनों देशों के बीच विवाद निपटाने की मंशा से कई वार्ताएं हुई हैं. डोकलाम का जब संकट पैदा हुआ तो चीन के वुहान में ब्रिक्स सम्मेलन था और वहां दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई.
उन्होंने कहा, ''ये कहा गया कि हम 'वुहान स्पिरिट' को आगे बढ़ाएंगे. इसके बाद 2019 में चेन्नई के पास महाबलिपुरम में दोनों नेताओं के बीच मुलाक़ात हुई और उसके बाद गलवान में फ़ौजी झड़प हो गई.''
वो कहते हैं, "यह जो समझौता हुआ और फिर मुलाक़ात हुई है वो 2020 में पैदा हुए मुद्दों को हल करने से अधिक जुड़ी है. इससे ज़्यादा कुछ नहीं है."
उनके अनुसार, ''बहुत उम्मीद पालना ग़ैरज़रूरी है. ये सोचना कि दोनों देशों के संबंध बिल्कुल बदल जाएंगे या चीन का हृदय परिवर्तन हो गया है, ये कहना जल्दबाज़ी होगी.''
हालांकि चीन की ओर से इस पहल को उम्मीद के साथ देखा जा रहा है.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, "चीन-भारत संबंधों की दिशा वैश्विक ट्रेंड्स और क्षेत्रीय समीकरणों से निर्धारित होती है. ये पूर्व की दो महान प्राचीन सभ्यताएं हैं और उभरते विकासशील देशों के रूप में, चीन-भारत संबंधों के महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं जो द्विपक्षीय संबंधों से आगे जाते हैं."
"चीन और भारत को एकता और सहयोग का चुनाव करते हुए अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता को बरकरार रखना चाहिए. उन्हें एक दूसरे की कामयाबी के लिए प्रयास करना चाहिए और एक-दूसरे से उलझने से बचना चाहिए."
अन्य मुद्दों पर क्या होगा असर?

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चीन और भारत के बीच सिर्फ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को ही लेकर ही विवाद नहीं है.
प्रोफ़ेसर पंत का कहना है, ''कई समस्याओं में से यह सिर्फ एक है."
असल में चीन भारत के भूभाग और अरुणाचल प्रदेश पर भी दावा करता रहा है. अरुणाचल को वो 'दक्षिणी तिब्बत' कहता है.
प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं, "सबसे बड़ी समस्या ये है कि चीन ने भारत को बराबरी से कभी नहीं देखा. चीन के पास जो भी विकल्प थे, उसके माध्य से वो भारत को एक दूसरे दर्जे की शक्ति के रूप में खड़ा करने की कोशिश की. चाहे वो पाकिस्तान का इस्तेमाल हो या हिंद महासागर में द्विपक्षीय हालात हों, या भारत तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शामिल न होने देना हो."
वो कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि भारत या भारत सरकार में ऐसा कोई भ्रम होना चाहिए कि इस समझौते के बाद बहुत कुछ बदल गया है या चीन की ओर से कुछ बड़ा बदलाव आया है.''
हालांकि डॉक्टर राजन कुमार भी बहुत उम्मीद जताने को लेकर अगाह करते हैं.
वो कहते हैं, ''सीमा के मुद्दे पूरी तरह सुलझ पाएंगे इसकी उम्मीद नहीं है क्योंकि अरुणाचल प्रदेश और भूटान में पेट्रोलिंग हमेशा टकराव का मुद्दा बना रहेगा. समझौते होने के बाद चीन अपने क़ब्ज़े वाले हिस्से में इन्फ़्रास्ट्रक्चर बनाने लगता है.''
शायद यही वजह है कि भारत की ओर से सावधानी बरती जा रही है और पीएम मोदी ने भी कहा कि 'किसी भी सूरत में शांति भंग नहीं होने देना चाहिए.'
अब जब बातचीत शुरू हुई तो उम्मीद की जानी चाहिए कि यह दूर तक जाए. डॉ. राजन कुमार भी कहते हैं, ''बातचीत जब शुरू होती है तो वो काफ़ी दूर तक जा सकती है.''
और जैसा कि प्रोफ़ेसर पंत का कहना है, ''एलएसी पर तनाव कम होता है तो इसका अच्छा असर व्यापार भी पड़ सकता है, जिसकी दोनों देशों को ज़रूरत है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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