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सुखोई और एफ़-35 के बीच कौन-सा लड़ाकू विमान चुनेगा भारत?
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
यह भारत के लिए एक अहम फैसला है कि वह अपनी वायुसेना को आधुनिक बनाने के लिए किस दिशा में जाए.
लेकिन क्या एक आधुनिक अमेरिकी फाइटर जेट इस समस्या का सही समाधान है?
पिछले महीने, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वॉशिंगटन दौरे पर गए थे, तब उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की.
इस मुलाकात के दौरान ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका भारत को एफ-35 फाइटर जेट देने के लिए तैयार है. यह जेट अमेरिका केवल अपने करीबियों और सहयोगियों को ही देता है.
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एफ-35 एक "पांचवीं पीढ़ी" (फिफ्थ जनरेशन) का मल्टी-रोल फाइटर जेट है. जो उन्नत सेंसर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बने कॉम्बैट सिस्टम और डेटा शेयरिंग जैसी आधुनिक तकनीकों से लैस है.
यह जेट रडार को चकमा देने में सक्षम है और इसे दुनिया का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान माना जाता है.
लेकिन इसकी कीमत भी लगभग 8 करोड़ डॉलर (करीब 670 करोड़ रुपये) प्रति यूनिट है, जो इसे सबसे महंगे जेट्स में से एक बनाती है.
फिफ्थ-जनरेशन फाइटर जेट की सबसे बड़ी ख़ासियत इसकी स्टेल्थ यानी अदृश्य रहने की क्षमता है.
चीन की चुनौती
कई जानकारों का कहना है कि भारत की वायुसेना में लड़ाकू विमानों की संख्या लगातार घट रही है और चीन की सैन्य ताकत बढ़ रही है.
ऐसे में भारत के सामने एक सवाल ये है कि या अमेरिका से आधुनिक लेकिन बेहद महंगा एफ-35 खरीदे या फिर रूस के साथ रक्षा सहयोग को मज़बूत करते हुए उसके सबसे आधुनिक स्टेल्थ फाइटर जेट, सुखोई एसयू-57 का प्रोडक्शन अपने यहां करे.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला इतना सीधा नहीं है. अमेरिका और रूस के बीच जो प्रतिद्वंद्विता है उसकी एक अहम झलक पिछले महीने बेंगलुरु में हुए एशिया के सबसे बड़े एयर शो, एयरो इंडिया में मिली. इसमें दोनों देशों के जेट विमानों ने हिस्सा लिया.
ट्रंप की एफ-35 की पेशकश प्रतीकात्मक लगती है ताकि अमेरिका अपने हथियारों की बिक्री बढ़ा सके. कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के सीनियर फेलो एश्ले जे टेलिस का कहना है कि यह डील भारत के लिए काफी मुश्किल साबित हो सकती है.
भारत की वायुसेना पहले से ही अपने स्वदेशी फाइटर जेट एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) और फ्रांस से खरीदे गए राफेल जेट्स पर ध्यान दे रही है. दरअसल भारत को अमेरिकी विमानों के को-प्रोडक्शन का अधिकार नहीं मिल जाता है तब तक इस तरह की डील उसके लिए मुश्किल होगी.
एएमसीए को भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) विकसित कर रहा है और यह भारत का अपना स्टेल्थ फाइटर जेट होगा.
टेलिस ने कहा, "यह संभावना बहुत कम है कि अमेरिका एफ-35 के सह-निर्माण का अधिकार भारत को देगा. अगर भारत इसे खरीदता भी है, तो यह सिर्फ सीधी बिक्री होगी. यह प्रधानमंत्री मोदी के मेक इन इंडिया अभियान के अनुरूप नहीं होगा. साथ ही, एफ-35 की डील के बाद भारत पर जो सख्त एंड-यूज़र मॉनिटरिंग लागू होगी, वह भी भारत को रास नहीं आएगी."
भारत के सामने एफ-35 को लेकर काफी चुनौतियां हैं. इसकी कीमत बहुत ज्यादा है, इसकी देखभाल करना भी काफी महंगा है और इसके संचालन में कई दिक्कतें हैं.
सुरक्षा विशेषज्ञ स्टीफन ब्रायन जो वेपन्स एंड स्ट्रैटेजी नामक सबस्टैक कॉलम में लिखते हैं कि अमेरिकी वायुसेना में इस जेट की उपलब्ता सिर्फ 51 फ़ीसदी है.
वो लिखते हैं, "सवाल ये है कि क्या भारत एफ-35 पर अरबों रुपये खर्च करने के लिए तैयार है, ख़ास कर ये जानते हुए रूस का लड़ाकू विमान सस्ते में मिल सकता है."
लेकिन कई लोग एसयू-57 को भी सही विकल्प नहीं मानते है. भारत ने साल 2018 में इस विमान को रूस के साथ मिलकर बनाने की योजना छोड़ दी थी. इसकी वजह तकनीकी साझेदारी, लागत में साझेदारी और जेट के डिजाइन को लेकर हुए मतभेद थे.
यह साफ है कि भारतीय वायु सेना पुरानी हो रही है और लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही है.
भारत के पास फिलहाल 31 फाइटर और कॉम्बैट स्क्वाड्रन हैं, जिनमें ज्यादातर रूसी और सोवियत संघ के समय के हैं. जबकि जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है.
सबसे बड़ी समस्या है कि सुखोई-30, जो भारतीय वायुसेना का सबसे भरोसेमंद विमान है, उसके लिए एक बेहतर और दीर्घकालिक विकल्प खोजना.
यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बानी के राजनीतिक विज्ञानी क्रिस्टोफर क्लेरी ने हाल ही में आईएसएस मिलिट्री बैलेंस के डेटा का हवाला दिया, जो भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाला है. साल 2014 से साल 2024 के बीच, चीन ने अपनी सेना में 435 नए फाइटर और ग्राउंड अटैक विमान जोड़े, पाकिस्तान ने 31 नए विमान जोड़े, जबकि भारत की वायुसेना के पास 151 लड़ाकू विमान कम हो गए.
भारत की लड़ाकू विमान विस्तार योजना मुख्य रूप से स्वदेशी निर्माण पर केंद्रित है, जिसमें 500 से अधिक विमानों को शामिल करने की योजना है. इनमें ज्यादातर हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) होंगे.
भारत ने 83 तेजस मार्क 1ए विमानों का ऑर्डर दिया है, जो एक तेज और बहुउद्देशीय स्वदेशी फाइटर जेट है. इसके अलावा 97 और तेजस मार्क 1ए के ऑर्डर जल्द ही दिए जाएंगे.
साथ ही, ज्यादा भारी और एडंवास तेजस मार्क 2 का भी विकास जारी है. हालांकि भारत का अपना स्टेल्थ बनने में अभी कम से कम दस साल लग सकते हैं.
भारतीय सेना के लिए इस चक्र को तोड़ना क्यों जरूरी
भारत ने वायुसेना के 20 अरब डॉलर के मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (एमआरएफए) कार्यक्रम के तहत 114 मल्टीरोल फाइटर जेट खरीदने की भी योजना बनाई है.
इस योजना के तहत विदेशी जेट विमानों को भारत में बनाने की शर्त रखी गई है, जिसमें तकनीक हस्तांतरण (ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी) की जरूरत होगी और यही इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी चुनौती है.
यह प्रोजेक्ट साल 2019 से रुका हुआ है. भारत सरकार और फ्रांस सरकार के बीच राफेल विमानों की खरीद पर हुई अलोचना के बाद, अब भारतीय सरकार चाहती है कि यह डील पूरी तरह पारदर्शी और बिना किसी विवाद के हो.
इस डील के लिए पांच जेट विमान दौड़ में है, जिनमें राफेल सबसे आगे है क्योंकि यह पहले से ही भारतीय वायुसेना में इस्तेमाल हो रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय वायु सेना के आधुनिकीकरण में तीन बड़ी बाधाएं हैं: फंडिंग, देरी और विदेशी विमानों पर निर्भरता.
भारत के रक्षा बजट में कमी आई है. विदेशी फाइटर जेट्स खरीदने में काफी समय लग सकता है.
भारत अपने देश में बने विमानों को प्राथमिकता देता है, लेकिन डीआरडीओ की परियोजनाओं में देरी के कारण अक्सर विदेशी विमानों को अस्थायी रूप से खरीदना पड़ता है.
यह एक ऐसा चक्र बन गया है, जिसे तोड़ने के लिए जरूरी है कि भारत समय पर अपने खुद के सक्षम लड़ाकू विमान बनाए. इसके अलावा, जनरल इलेक्ट्रिक के एफ- 404 इंजन की आपूर्ति में देरी के कारण भी इन विमानों की डिलीवरी में अड़चन आ रही है.
रक्षा मंत्रालय की सोच और भारतीय वायुसेना की ज़रूरतों में तालमेल की कमी एक बड़ी समस्या है.
यूरेशिया ग्रुप के विश्लेषक राहुल भाटिया के मुताबिक, यही वजह है कि वायुसेना को कई बार मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
शुरुआत में भारतीय वायुसेना को तेजस मार्क 1 पर पूरा भरोसा नहीं था, इसलिए इसमें कई सुधार किए गए, जैसे तेजस मार्क 1ए और तेजस मार्क 2.
यूरेशिया ग्रुप के विश्लेषक राहुल भाटिया ने बताया, "लेकिन इन विमानों के विकास में लगने वाले दशकों लंबे समय से सशस्त्र बलों में काफी निराशा है. उनकी जरूरतें समय के साथ बदलती रहती हैं क्योंकि नई तकनीकें आती रहती हैं और इसी वजह से प्रोजेक्ट्स में और ज्यादा देरी हो रही है."
भारतीय वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने भी इन देरी को लेकर अपनी हताशा खुलकर जाहिर की थी.
हाल ही में एक सेमिनार में एयर मार्शल सिंह ने कहा, "मैं कसम खा सकता हूं कि मैं बाहर से कुछ नहीं खरीदूंगा और भारत में ही बने विमानों का इंतजार करूंगा. लेकिन अगर ये विमान समय पर नहीं बनते, तो ऐसा करना मुमकिन नहीं होगा."
उन्होंने यह भी कहा, "हम सब जानते हैं कि हमारे पास इस वक्त लड़ाकू विमानों की बहुत कमी है. जिन विमानों की डिलीवरी का वादा किया गया था, वो भी काफी धीमी गति से आ रही है. ऐसे में हमें जल्द ही ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी, जिससे इस कमी को जल्दी पूरा किया जा सके."
यह बयान तेजस मार्क 1ए की देरी को लेकर था, जिसकी डिलीवरी पिछले साल फरवरी में शुरू होनी थी, लेकिन अभी तक शुरू नहीं हुई है.
भारत की पहली प्राथमिकता है स्वदेशी फाइटर जेट
भारत की पहली प्राथमिकता स्वदेशी स्टेल्थ फाइटर जेट बनाना है, जिसके विकास के लिए अब तक 1 अरब डॉलर से ज़्यादा खर्च हो चुके हैं.
यूरेशिया ग्रुप के विशेषज्ञ राहुल भाटिया का कहना है, "भारत किसी विदेशी स्टेल्थ जेट पर तभी विचार करेगा जब सुरक्षा को लेकर कोई तुरंत खतरा पैदा हो."
चीन के पास जे-20 और जे-35 जैसे दो कथित स्टेल्थ फाइटर जेट हैं, लेकिन माना जाता है कि ये अमेरिकी मानकों से काफी पीछे हैं.
अधिकतर जानकारों का मानना है कि भारत न तो अमेरिकी लड़ाकू विमान खरीदेगा और न ही रूसी.
भाटिया बताते हैं, "अल्पकालिक रूप से, जब भी ज़रूरत पड़ी है, भारत ने आपातकालीन खरीद कर के कमी पूरी की है. मध्यम अवधि में भारत साझा निर्माण (को-प्रोडक्शन) पर ध्यान देगा. लेकिन लंबे समय का लक्ष्य साफ़ है, अपने लड़ाकू विमानों का देश में निर्माण."
भारत के लिए वायुसेना की ताकत सिर्फ विमान खरीदने में नहीं है, बल्कि इन्हें भारत में बनाना ज़्यादा ज़रूरी है, वो भी किसी मज़बूत पश्चिमी साझेदार के साथ.
लेकिन इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ज़रूरी है कि भारत अपने स्वदेशी लड़ाकू विमानों को समय पर तैयार करे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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