छावला गैंगरेप केस: सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला और उस पर उठते सवाल

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- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- Author, सुचित्र मोहंती
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
राजधानी दिल्ली के छावला में एक 19 साल की लड़की का गैंगरेप और फिर उनकी हत्या करने के मामले में तीन लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को रिहा कर दिया.
2012 के इस बहुचर्चित गैंगरेप और हत्याकांड मामले में तीन अभियुक्तों को निचली अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी. बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के ज़रिए दी गई सज़ा को बरक़रार रखा था.
लेकिन सोमवार को अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों के अभाव में तीनों अभियुक्तों को रिहा कर दिया. निचली अदालत और हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान उस लड़की को अनामिका का नाम दिया गया था. इसलिए हम इसे अनामिका केस कहेंगे.
क्या है पूरा मामला?

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अनामिका उत्तराखंड के पौड़ी की रहने वाली थीं. वो दिल्ली के छावला में रह रही थीं. नौ फ़रवरी, 2012 की शाम नौकरी से लौटते वक़्त उन्हें तीन लोगों ने अग़वा कर लिया था.
पुलिस ने इस मामले में राहुल, रवि और विनोद नाम के तीन लोगों को गिरफ़्तार किया था.
इनकी पूछताछ के बाद पुलिस ने 14 फ़रवरी को दिल्ली से सटे हरियाणा के रेवाड़ी के एक खेत में से उनकी लाश बरामद की थी. पुलिस के अनुसार लाश बहुत ही बुरी हालत में थी.
उनके साथ गैंगरेप किया गया था और फिर बड़ी बेरहमी से उनकी हत्या कर दी गई थी. पुलिस के अनुसार उनके शरीर को सिगरेट और गर्म लोहे से दाग़ा गया था.
उनके चेहरे और आंखों में तेज़ाब डाला गया था.
साल 2014 में निचली अदालत ने तीनों अभियुक्तों को फांसी की सज़ा सुनाई थी जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 2014 के ही अपने फ़ैसले में बरक़रार रखा था.
बचाव पक्ष ने फ़ैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और फिर सोमवार सात नवंबर, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों अभियुक्तों को बरी कर दिया.
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सुप्रीम कोर्ट ने किस आधार पर उन्हें रिहा किया

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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस रविंद्र भट्ट और जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच ने मामले की सुनवाई की.
इसी साल छह फ़रवरी को तीन जजों की इस बेंच ने फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे सात नवंबर, 2022 को सुनाया गया.
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की तरफ़ से एडीशनल सॉलिसीटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने फांसी की सज़ा को बरक़रार रखने की माँग की थी.
लेकिन इस मामले में एमाइकस क्यूरी (कोर्ट की सहयोगी) बनाई गईं वरिष्ठ वकील सोनिया माथुर ने सुप्रीम कोर्ट में दोषियों के साथ सहानुभूति बरतने का अनुरोध किया था.
उनकी दलील थी कि अदालत को दोषियों को सुधरने का मौक़ा देने पर विचार करना चाहिए.
उनका यह भी दावा था कि तीनों अभियुक्तों में से एक विनोद मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस और निचली अदालत पर जांच को ठीस से नहीं करने और सुनवाई के दौरान कई अनियमितताएं बरतने का आरोप लगाया है.
सप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने अभियुक्तों के डीएनए सैंपल तो लिए, लेकिन वो उसे बिना किसी सुरक्षा के 11 दिनों तक पुलिस के मालख़ाने में पड़े रहे.
पुलिस ने 49 गवाहों में से 10 का क्रॉस एग्ज़ैमिनेशन भी नहीं करवाया.
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ,अभियुक्तों को निष्पक्ष मुक़दमे का लाभ नहीं मिला जिसका उन्हें अधिकार था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने इस बात की जाँच नहीं की कि डीएनए रिपोर्ट का आधार क्या था और इसके लिए सही तकनीक का इस्तेमाल किया गया था या नहीं.
अपने 40 पन्नों के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके सामने जो भी सबूत रखे गए हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के ख़िलाफ़ जुर्म साबित करने में नाकाम रहा है.
अदालत ने इस बात को स्वीकार किया कि यह बहुत ही घृणित अपराध है, लेकिन सबूतों के अभाव में अदालत के पास उन्हें रिहा करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सच है कि अगर अभियुक्त बरी हो जाते हैं तो इससे समाज में और ख़ासकर पीड़ित के परिवार में पीड़ा और बेचैनी बढ़ेगी, लेकिन क़ानून इस बात की इजाज़त नहीं देता है कि सिर्फ़ शक और नैतिकता की बुनियाद पर अदालत किसी को दोषी क़रार दे.

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परिवार की प्रतिक्रिया
अनामिका के पिता ने कहा कि उन्होंने तो सोचा भी नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट से इस तरह का फ़ैसला आएगा. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट न्याय देने के लिए है.
उन्होंने कहा, “कलयुग आ गया है, लेकिन इतना कलयुग भी नहीं होना चाहिए. उनके हौसले बुलंद हो जाएंगे, मुजरिम खुलेआम अपराध करेंगे. अब न्याय के लिए किसके पास जाएंगे.”
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निचली अदालत ने अभियुक्तों को फांसी की सज़ा सुनाई थी जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने बरक़रार रखा था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पूरी तरह बरी कर दिया.
बीबीसी से बातचीत में अनामिका की वकील चारु खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इससे ग़लत संदेश जाएगा और इससे अपराधी का मनोबल और बढ़ेगा.
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इतने गंभीर अपराध के मामले में फ़ैसला सुनाते हुए केवल पांच सेकंड का समय लिया और दो लाइन में कह दिया कि हाईकोर्ट और निचली अदालत के फ़ैसले को रद्द किया जाता है और अभियुक्तों को रिहा किया जाता है.
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जिस बुनियाद पर अपना फ़ैसला सुनाया है, वो बेबुनियाद है.
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से लगता है कि दिल्ली पुलिस ख़ुद अपराधी है और दिल्ली हाईकोर्ट के जज अपने काम को ठीक से नहीं करना जानते हैं.
इस मामले में पीड़िता के परिवार को इंसाफ़ दिलाने की मुहिम में शामिल सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि 11 साल के बाद परिवार को इंसाफ़ नहीं मिला.
उन्होंने कहा कि उन्हें तो यक़ीन ही नहीं हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्तों को पूरी तरह बरी कर दिया है. उन्होंने कहा कि वो फ़ैसले से बहुत आहत हैं और अनामिका का परिवार पूरी तरह टूट गया है.
योगिता ने कहा कि उनकी फ़िलहाल सबसे बड़ी चिंता परिवार की सुरक्षा की है.
उन्होंने कहा कि अभियुक्त पास में ही रहते हैं और वो एक-दो दिन में जेल से बाहर आ जाएंगे.
उन्होंने कहा कि वो दिल्ली पुलिस से परिवार की सुरक्षा के लिए अनुरोध करेंगी.

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दिल्ली पुलिस और निचली अदालत के लिए कितना बड़ा झटका

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बहुत से लोग इसको दिल्ली के बहुचर्चित निर्भया गैंगरेप और हत्या केस से जोड़ कर देख रहे हैं. निर्भया केस भी साल 2012 में हुआ था.
लेकिन एमाइकस क्यूरी सोनिया माथुर की राय इससे बिल्कुल अलग है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि दोनों केस की तुलना करना सही नहीं है. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि निर्भया मामले में एक ज़ख़्मी चश्मदीद गवाह था जिसकी गवाही क़ानून की नज़र में सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है.
उनके अनुसार, अनामिका मामले में दुर्भाग्य से कोई भी चश्मदीद नहीं है और यह पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर है. सोनिया माथुर ने कहा कि दिल्ली पुलिस, हरियाणा पुलिस और प्राइवेट गवाहों ने अलग-अलग बयान दिए थे. उन्होंने कहा कि उनका रोल पूरी तरह स्वतंत्र होकर सुप्रीम कोर्ट के सामने सिर्फ़ गवाह और सबूत को सामने रखना था. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ़्ते तक सुनवाई की थी और हर मामले की पूरी गहराई से जाँच की थी. दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आरएस सोधी (रिटायर्ड) ने कहा कि यह फ़ैसला क़ानून के आधार पर हुआ है, न्याय के आधार पर नहीं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर जाँच में कोई कमी रही है तो यह देखना भी अदालत का फ़र्ज़ है कि क्या वो कमियां इतनी गंभीर हैं कि इससे फ़ैसला ही उलट जाए.
उन्होंने कहा कि सबूतों को समझना बहुत ही तकनीकी चीज़ है और इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए.
पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश का कहना है कि यह कोई असाधारण नहीं है.
उन्होंने कहा कि पटना हाईकोर्ट में उनका अनुभव है कि जिन मामलों में निचली अदालत फांसी की सज़ा सुनाती थी, 99 फ़ीसद मामले में ऊपरी अदालत से उन्हें बरी कर दिया जाता था. उन्होंने कहा कि कई बार लोग अपराध और अपराधी को एक साथ जोड़ देते हैं. यह सच है कि यह एक जघन्य अपराध था, लेकिन पुलिस अगर ग़लत आदमी को पकड़ कर पेश कर देती है तो अदालत का फ़र्ज़ है कि वो उन्हें रिहा करे.
उन्होंने कहा कि न्याय का मतलब है कि जो असल अपराधी है उसको सज़ा मिले, यह नहीं कि पुलिस जिसको अपराधी कहे उसको सज़ा मिले.
क़ानूनी विकल्प

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इस मामले में पीड़िता के परिवार और सरकार के पास कई क़ानूनी विकल्प हैं.
वो पुनर्विचार याचिका दायर कर सकते हैं. वहां भी उनके अनुसार फ़ैसला नहीं मिला तो वो क्यूरेटिव याचिका दायर कर सकते हैं.
अनामिका की वकील चारू खन्ना ने कहा कि परिवार का संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि वो पुनर्विचार याचिका दायर करेंगी.
उन्होंने उम्मीद जताई है कि सरकार भी याचिका दायर करेगी.
उन्होंने कहा कि यह केस दिल्ली सरकार के पास था, लेकिन इस केस की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली सरकार से केस अपने पास ले लिया था.
उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृहमंत्रालय को इस पर फ़ौरन पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए. जस्टिस सोधी ने कहा कि यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो इस मामले में आगे कार्रवाई करे.
उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट कहता है कि इन तीन अभियुक्तों ने अपराध नहीं किया है तो पुलिस की ज़िम्मेदारी है कि वो पता लगाए कि अपराध किसने किया है.
और अगर सुप्रीम कोर्ट कहता है कि इन्हीं तीनों ने अपराध किया है, लेकिन उनके ख़िलाफ़ जमा किए सबूत पर्याप्त नहीं हैं तो यह भी पुलिस की ज़िम्मेदारी है कि इसकी जाँच दोबारा शुरू करे.
सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने कहा कि क़ानूनी विकल्प कितने प्रभावी होंगे, उन्हें नहीं पता.
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद न्यायालय से उनका विश्वास ख़त्म हो गया है, लेकिन उनकी कोशिश है कि परिवार का मनोबल नहीं टूटे.
उन्होंने कहा कि वो पुनर्विचार याचिका दायर ज़रूर करेंगी और सोशल मीडिया पर परिवार के लिए समर्थन का आह्वान कर रही हैं.
(इस रिपोर्ट के लिए हमारे सहयोगी सुचित्र मोहंती ने भी मदद की)
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