भारत में सोची-समझी रणनीति के तहत घुसपैठ करता आया है चीन, शोध में दावा

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"भारत के पश्चिमी और मध्य सीमाओं पर चीन ने अचानक या ग़लती से घुसपैठ नहीं की, बल्कि, ये सोची-समझी रणनीति और कोशिशों का हिस्सा था. इसके ज़रिए चीन सीमाई इलाक़ों में स्थायी नियंत्रण करना चाहता था."
भारत में चीन की कथित घुसपैठ के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के शोध (राइज़िंग टेंशन इन हिमालय: अ जियोस्पेशल एनालिसिस ऑफ़ चाइनीज़ इनकर्शन) में ये दावा किया गया है.
ये अध्ययन अमेरिका की नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी, नीदरलैंड्स की टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ़ डेल्फ़्ट और नीदरलैंड्स डिफ़ेंस एकेडमी ने मिलकर किया.
इस अध्ययन के लिए साल 2006 से 2020 के बीच भारत में चीन के कथित घुसपैठ के आँकड़ों को देखा गया और अलग-अलग तरीक़ों से इनका विश्लेषण किया गया.
इस अध्ययन के अनुसार भारत में चीन की घुसपैठ को दो अलग-अलग संघर्षों के तौर पर बाँटा जा सकता है- पश्चिम/ मध्य (अक्साई चिन वाला इलाक़ा) और पूर्व (अरुणाचल प्रदेश).
लद्दाख के अक्साई चिन इलाक़े को भारत अपना क्षेत्र मानता है, लेकिन वहाँ चीन का नियंत्रण है.
भारत दावा करता है कि चीन ने 1962 के युद्ध के दौरान वहाँ हज़ारों किलोमीटर ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
अपने विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पाया कि पश्चिम में चीनी घुसपैठ रणनीतिक रूप से सोची-समझी योजना थी. इसका मक़सद स्थायी नियंत्रण हासिल करना था.
शोध में ‘घुसपैठ’ को उन सीमाई इलाक़ों में चीनी सेना की किसी भी तरह की आवाजाही के तौर पर परिभाषित किया गया है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का इलाक़ा माना जाता है.
शोधकर्ताओं ने 13 ऐसे हॉटस्पॉट चिह्नित किए, जहाँ चीन ने कई बार घुसपैठ की.
15 साल के आँकड़ों के अनुसार, चीन ने हर साल औसतन क़रीब आठ बार घुसपैठ की. हालाँकि, सरकारी आँकड़ें इससे कहीं अधिक हैं.
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विवाद क्या है?
भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा की 3,488 किलोमीटर लंबी दूरी को लेकर एक राय नहीं है.
चीन मानता है कि अरुणाचल प्रदेश दक्षिण तिब्बत का हिस्सा है, जबकि भारत इस दावे को ख़ारिज करता है.
लद्दाख में अक्साई चिन एक बड़ा क्षेत्र है जो फ़िलहाल चीन के नियंत्रण में है, लेकिन भारत इसे अपना हिस्सा बताता है.
भारत सरकार के आँकड़ों के अनुसार, चीनी सेना वर्ष 2016 से 2018 के बीच 1 हज़ार 25 बार भारतीय क्षेत्र में घुसी थी.
वर्ष 2019 में तत्कालीन रक्षा राज्य मंत्री श्रीपद नाइक ने लोकसभा में ये जानकारी दी थी कि केवल 2016 में ही चीन ने 273 बार घुसपैठ की, जो संख्या 2017 में बढ़कर 426 हो गई थी और 2018 में ये 326 पर आई.
टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ़ डेल्फ़्ट के जॉन टीनो ब्रीदूवर और रॉबर्ट फ़ॉकिंक, प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ पब्लिक इंटरनेशनल अफ़ेयर्स के केविन ग्रीन, नीदरलैंड्स डिफ़ेंस एकेडमी के रॉय लिंडलॉफ़ के साथ ही नीदरलैंड्स के कुछ और विशेषज्ञ, अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेंट के सुब्रमण्यम और बफ़ेट इंस्टीट्यूट ऑफ़ ग्लोबल अफ़ेयर्स ने इस शोध में अपना योगदान दिया है.
गुरुवार को इस अध्ययन से जुड़ी प्रेस रिलीज़ जारी की गई. इसके अनुसार, भारतीय सीमा में चीन की घुसपैठ ग़लती से होने वाली घटना नहीं थी. समय के साथ-साथ चीनी घुसपैठ के मामले भी बढ़े हैं.
शोधकर्ताओं ने पाया कि पूर्वी और मध्य इलाक़ों में हुए संघर्ष चीन की सोची-समझी विस्तारवादी नीति का हिस्सा थे.
नॉर्थवेस्टर्न के वीएस सुब्रमण्यम कहते हैं, “अचानक या बिना पूर्व योजना के चीन की घुसपैठ किए जाने की संभावना बहुत ही कम है, लेकिन पूर्वी सेक्टर में ऐसे मामले पश्चिम की तुलना में कम हैं.”

थोड़ा-थोड़ा कर के बड़ा हिस्सा हथियाने की कोशिश
शोधकर्ताओं को ये भी संकेत मिले कि सिर्फ़ अक्साई चिन में ही सोची-समझी कोशिशों के तहत बार-बार घुसपैठ की गई. लंबे समय तक ज़्यादा से ज़्यादा सैनिक तैनात करके चीन यहाँ अपना स्थायी नियंत्रण चाहता है.
वीएस सुब्रमण्यम कहते हैं, “चीन थोड़ा सा क्षेत्र हथियाता है और जब तक भारत उसे चीनी क्षेत्र स्वीकार न कर ले, तब तक वो ये जारी रखता है. चीन छोटे-छोटे हिस्से पर कब्ज़ा करता है, लेकिन समय के साथ-साथ ये ज़मीन का बड़ा हिस्सा बन जाता है.”
अक्साई चिन में चीन की अधिक रुचि पर सुब्रमण्यम कहते हैं कि वेस्टर्न सेक्टर में घुसपैठ के अधिक मामले चौंकाने वाली बात नहीं है.
वो कहते हैं कि अक्साई चिन एक ऐसे रणनीतिक महत्व वाली जगह है, जहाँ चीन विकास करना चाहता है.
इसलिए ये उनके लिहाज़ से बहुत ज़रूरी है. ये चीन और तिब्बत, शिनजियांग जैसे उसके स्वायत्त इलाक़ों के बीच एक अहम मार्ग है.
इस शोध में जून 2020 के गलवान संघर्ष का भी ज़िक्र है. इस संघर्ष में भारत के 20 जवानों की मौत हो गई थी. वहीं, चीन ने आधिकारिक रूप से अपने चार सैनिकों की मौत की बात काफ़ी समय बात स्वीकार की.
हालाँकि भारत दावा करता है कि चीन के कहीं अधिक सैनिक मारे गए थे. कुछ रिपोर्ट्स में भी ये दावा किया जाता है कि चीन के ज़्यादा सैनिक मारे गए थे.
शोध में कहा गया है कि चीन थोड़े-थोड़े समय में भारतीय क्षेत्र में घुसने की कोशिश करता रहता है.
कई दौर की सैन्य वार्ताओं और कूटनीति के ज़रिए तनाव वाली कई जगहों से दोनों देशों ने अपने सैनिकों को पीछे हटा लिया है.
हालांकि, डेमचोक और देप्सांग इलाक़ों में विवाद नहीं सुलझ पाया है.

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चीन कब बढ़ाता है 'घुसपैठ'?
नॉर्थ वेस्टर्न के अध्ययन में सुब्रमण्यम ने और उनके सहयोगियों के एक अन्य शोध का भी ज़िक्र है.
इसके अनुसार, जब-जब चीन ख़ुद को सबसे अधिक असुरक्षित महसूस करता है, वो घुसपैठ की गतिविधि तेज़ कर देता है.
सुब्रमण्यम कहते हैं, “हमने पाया कि जब चीन आर्थिक मोर्चे पर संकट से जूझ रहा हो, उसके उपभोक्ताओं का भरोसा डिगा हो, तो वो हमला करता है. इसके साथ ही भारत और अमेरिका के बीच क़रीबी बढ़ने पर भी चीन घुसपैठ की कोशिशें तेज़ कर देता है.”
शोध के अनुसार, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के ‘क्वॉड समूह’ में शामिल होने ने भी संभवतः सीमा पर चीन की गतिविधियों को तेज़ करने में भूमिका निभाई.
दूसरी ओर चीन पाकिस्तान के साथ सहयोग बढ़ा रहा है और वो अफ़ग़ानिस्तान से पश्चिमी देशों की सेना जाने के बाद ख़ाली हुई जगह को भी भरने के लिए तैयार है.
चीन की विदेश नीति भी तेज़ी से आक्रामक होती जा रही है. उसने ताइवान के इर्द-गिर्द सैन्य अभ्यास बढ़ाए हैं और दक्षिण चीन सागर में भी विस्तार कर रहा है.

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विश्व की दो सबसे अधिक आबादी वाले देशों के बीच बढ़ते इस तनाव को वैश्विक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिहाज से जोख़िम भरा माना गया है.
हालांकि, निष्कर्ष के तौर पर शोध में ये भी कहा गया है कि निकट भविष्य में भारत और चीन के बीच स्थितियां सुधरने की कोई संभावना नहीं है और अभी भी दोनों देश लगातार हाई अलर्ट पर हैं.
भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में बीते 29 महीनों से तनाव की स्थिति बनी हुई है.
पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद से ही दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में भी गर्मजोशी नहीं दिख रही है.
भारत लगातार अपने इस रुख़ पर क़ायम है कि सीमा पर शांति बनाए रखने के बाद ही द्विपक्षीय संबंध आगे बढ़ सकते हैं.
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