राम मंदिर के बाद क्या काशी और मथुरा को लेकर भी है कोई तैयारी?- प्रेस रिव्यू

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अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद अब बीजेपी और आरएसएस के सामने काशी और मथुरा में भव्य मंदिर की मांग तूल पकड़ सकती है.
कोलकाता से प्रकाशित होने वाला अंग्रेज़ी दैनिक द टेलिग्राफ़ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि बीजेपी के भीतर मौजूद सूत्रों ने उसे बताया है कि सोमवार को राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा पूरी होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत के बार-बार "संयम और विनम्रता" की अपील के बावजूद, अयोध्या की तरह मथुरा और काशी में मंदिरों से सटे मस्जिदों के हिस्सों को दूर हटाने की मांग आने वाले दिनों में बीजेपी के सामने सिर उठाती रहेगी.
एक सूत्र ने अख़बार को बताया कि "मंदिर में राम लला की मूर्ति स्थापित होने के बाद मथुरा में कृष्ण और काशी/वाराणसी में शिव की स्थापना को लेकर मांग बढ़ सकती है."
इस व्यक्ति का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि राजनीतिक फ़ायदे के लिए धार्मिक मुद्दों का दबाव जारी रहेगा.
हालांकि बीजेपी ने अपने आधिकारिक एजेंडे में न तो मथुरा और न ही काशी की बात कही है, लेकिन हिंदू संगठन और कुछ लोग इन दो जगहों के लिए अयोध्या रामजन्मभूमि की तर्ज़ पर मंदिर के लिए दबाव बना रहे हैं. ये संगठन अदालतों में तो लड़ ही रहे हैं, साथ-साथ सड़कों पर भी अपनी मुहिम छेड़ रहे हैं.
ये मामला अदालत में ले कर जाने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के पास मौजूद ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर के पास मौजूद शाही ईदगाह यहाँ पहले से बने मंदिरों को तोड़कर बनाए गए थे. ये मंदिर मुग़ल काल में तोड़े गए थे और अब यहाँ फिर से मंदिर बनाए जाने चाहिए.
अयोध्या में नए मंदिर निर्माण के बाद अब ये काशी और मथुरा के मुद्दों को भी फिर से हवा मिल रही है और अदालतों में भी इनकी सुनवाई तेज़ हो गई है.
अख़बार लिखता है कि इसी महीने सुप्रीम कोर्ट ने शाही ईदगाह के परिसर के इंस्पेक्शन के लिए कमिश्नर नियुक्त करने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फ़ैसले पर रोक लगा दी थी.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू समूहों के मामले को लेकर कुछ नहीं कहा था, जिसमें दावा किया गया था कि मस्जिद की ज़मीन पर पहले एक मंदिर बना हुआ था.
वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद के मामले में पुरातत्व सर्वेक्षण ने स्थानीय कोर्ट में पहले ही एक रिपोर्ट सौंप दी है. इस मामले की सुनवाई इलाहाबाद कोर्ट में भी हो रही है.

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2022 में हिंदू समूह उस वक्त चर्चा में आए थे जब उन्होंने ये दावा किया था कि मस्जिद के भीतर मौजूद फव्वारा असल में "शिवलिंग" है.
एक बीजेपी नेता ने टेलिग्राफ़ से कहा कि उन्हें भरोसा है कि काशी और मथुरा मामले में भी अदालत का फ़ैसला हिंदुओं के पक्ष में होगा.
उन्होंने कहा, "राम जन्मभूमि मंदिर प्रोजेक्ट ने हिंदुओं को जागृत कर दिया है. अब न तो पार्टी को और न ही आरएसएस को आवाज़ उठाने की ज़रूरत है. अब लोग ही इस मामले को उठाएंगे और पूरा करेंगे."
ज्ञानवापी मामले के सुर्खियों में आने के बाद काशी और मथुरा से जुड़े एक सवाल पर बीजेपी के राष्ट्रीय प्रमुख जेपी नड्डा ने कहा था कि इस तरह के विवादित मुद्दों पर "अदालत और संविधान ही फ़ैसला लेंगे."
बीजेपी के एक जनरल सेक्रेटरी ने टेलिग्राफ़ से कहा था, "सर्वेक्षण चल रहा है, ऐसे में आने वाले निकट भविष्य में मथुरा और काशी में हिंदू मंदिरों को गिराने से जुड़े सबूत अदालत में पेश किए जाएंगे. इसके बाद ये मामले अपने आप बढ़ेंगे. अगर ज्ञानवापी मस्जिद के भीतर शिवलिंग की मौजूदगी की पुष्टि हो गई तो पार्टी नेता भी इस बोलने के लिए बाध्य हो जाएंगे."
बीजेपी के भीतर के सूत्रों ने अख़बार को बताया कि हो सकता है कि आगामी लोकसभा चुनावों में ये दोनों मुद्दे अहम न बने लेकिन हो सकता है कि उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ये मुद्दे चर्चा के केंद्र में हों.
उत्तर प्रदेश से बीजेपी के एक सांसद ने कहा कि "लोकसभा चुनावों के बाद काशी और मथुरा के मुद्दे भी बीजेपी और मोदी के एजेंडे में शामिल हो जाएंगे."
उनका दावा है कि कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा समाजवादी पार्टी के मुसलमान-यादव वोट बैंक को कड़ी टक्कर दे सकता है.
बीजेपी सांसद ने कहा कि पीएम मोदी ने हाल में अपने मथुरा दौरे में कहा था कि, "वो दिन दूर नहीं जब ब्रज क्षेत्र में (मथुरा-वृंदावन) भी भगवान के दर्शन और भी भव्यता के साथ होंगे."
उन्होंने कहा, "मोदीजी का बयान ये साफ़ संकेत था कि राम जन्मभूमि के बाद अब कृष्ण जन्मभूमि में भव्य मंदिर का नंबर है, लेकिन अभी नहीं. ये मुद्दा मोदीजी के तीसरी बार सत्ता में आने के लिए रिज़र्व है."
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पुंछ-राजौरी में अधिक सुरक्षाबलों की तैनाती
बीते तीन सालों में जम्मू कश्मीर के पुंछ-राजौरी सेक्टर में सुरक्षाबलों पर कुछ हमलों के बाद सेना ने अब यहाँ सुरक्षाबलों की तौनाती बढ़ी दी है.
अधिकारियों के हवाले से द इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि बीते साल इस इलाक़े में सुरक्षाबलों पर तीन हमले हुए थे, जिसके बाद यहां मौजूद राष्ट्रीय राइफ़ल्स की छह कंपनियों को कम कर चार करने की योजना को फ़िलहाल टाल दिया गया है.
जम्मू कश्मीर में चरमपंथ रोधी अभियान की ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय राइफ़ल्स की ही है.
सूत्रों के हवाले से अख़बार लिखता है कि अलग-अलग रिज़र्व बलों से इस सेक्टर में तीन ब्रिगेड अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है. एक ब्रिगेड में क़रीब 3,500 सैनिक शामिल होते हैं.
अख़बार लिखता है कि अतिरिक्त सैन्यबलों की तैनाती से 2021 में यहां राष्ट्रीय राइफ़ल्स के कुछ सैन्यबलों को हटाने से हुई कमी को पूरा किया जा सके. लेकिन साथ ही साथ इससे वहां की रोड ओपनिंग पार्टीज़ (सैन्य काफिले के जाने से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जाने वाला दल) को भी इससे मदद मिलेगी.

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मालदीव में चीनी पोत नहीं करेगा रिसर्च
मालदीव की सरकार के अनुसार चीन का रिसर्च पोत शियांग यांग होंग 03 मालदीव को बंदरगाह पर तो पहुंचेगा लेकिन मालदीव के आसपास के समंदर में रिसर्च नहीं करेगा.
अख़बार द हिंदू में छपी एक ख़बर के अनुसार श्रीलंका के विदेशी रीसर्च पोत के अपने यहां आने पर एक साल की रोक लगाने के बाद चीनी पोत के मालदीव जाने को लेकर भारत में कुछ हलकों में चिंता जताई जा रही थी.
मंगलवार को मालदीव के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, "चीनी सरकार ने कूटनीतिक तौर पर मालदीव की सरकार से बंदरगाह पर तैनात कर्मचारियों के रोटेशन और उन तक ज़रूरी सामान पहुंचाने के लिए पोत को आने देने के लिए ज़रूरी मंज़ूरी गुज़ारिश की है."
"जब तक चीन का ये पोत यहां है, वो मालदीव के समंदर में कोई रिसर्च नहीं करेगा."
ये बयान विदेश मंत्री मूसा ज़मीर ने सोशल मीडिया पर भी साझा किया. बयान के अनुसार मालदीव शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए मित्र देशों से नागरिक और सैन्य पोत को अपने यहां आने देना जारी रखेगा.
अख़बार लिखता है कि चीन का शियांग यांग होंग 03 एक रिसर्च पोत है. इस साल की शुरूआत में पोत ने श्रीलंका में उतरने के लिए क्लीयरेंस मांगा था, लेकिन उसे वहां इजाज़त नहीं मिली. इसके बाद अब ये मालदीव की तरफ जा रहा है और अगले महीने की शुरूआत में वहां पहुंच सकता है.
अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने भी इस ख़बर को जगह दी है, हालांकि अख़बार ने इस पोत को चीन का जासूसी पोत कहा है.
अख़बार लिखता है कि बार-बार भारत के दबाव डालने पर श्रीलंका ने साइंटिफ़िक और सैन्य उद्देश्यों के लिए आंकड़े इकट्ठा करने वाले रिसर्च और सर्वे पोतों के अपने यहां आने पर एक साल की रोक लगा दी थी.
अख़बार लिखता है कि मालदीव के अपने यहां से भारतीय सैनिकों को वापिस बुलाने की बात करने के बाद से तनाव झेल रहे भारत और मालदीव के बीच रिश्तों में तनाव और गहरा सकता है.

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मतदान की तारीख़ को लेकर आयोग ने दी सफाई
इसी महीने की 19 तारीख को दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर ने दिस्सी के 11 जिला निर्वाचन अधिकारियों को एक चिट्ठी लिखी थी. इसमें मतदान की संभावित तारिख 16 अप्रैल बताई गई थी जिसके बाद चुनाव की तारीखों को लेकर अटकलें लगाई जाने लगीं.
अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार अब चुनाव आयोग ने ये स्पष्ट किया है कि चिट्ठी में दी गई तारीख केवल रेफरेंस के लिए थी, वो तारीखों की घोषणा नही थी.
दिल्ली के सीईओ ने कहा कि आगामी चुनाव की तैयारियों के लिए एक "काल्पनिक तारीख" के तौर पर 16 अप्रैल की तारीख दी गई थी.
सीईओ ने कहा इसका तारीख का चुनावों की असल तारीख से कोई लेनादेना नहीं है, सही समय पर चुनाव आयोग, चुनाव की तारीखों का ऐलान करेगा.
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