पुतिन के भारत दौरे से दोनों देशों को क्या फ़ायदा होगा? क्या कह रहे हैं दोनों देशों के एक्सपर्ट

व्लादिमीर पुतिन, नरेंद्र मोदी

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इस समय फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों चीन की यात्रा पर हैं और दूसरी तरफ़ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चार दिसंबर को भारत के दो दिवसीय दौरे पर पहुंच चुके हैं.

लेकिन पुतिन के भारत दौरे की चर्चा ज़्यादा हो रही है. पश्चिमी देश इस दौरे पर क़रीबी से नज़र रखे हुए हैं. रूस से भारत के संबंधों को लेकर पश्चिम के देश असहज भी रहते हैं.

एक दिसंबर को भारत में फ़्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी के राजनयिकों ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में संयुक्त लेख लिख कर यूक्रेन युद्ध को लंबा खींचने के लिए रूस को ज़िम्मेदार ठहराया था.

इसके जवाब में भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलिपोव ने उसी अख़बार में एक लेख लिखा और संयुक्त लेख को यूक्रेन जंग के बारे में भारतीय जनता को 'गुमराह' करने वाला बताया.

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फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के राजनयिकों के लेख का रूस में भारत के राजदूत रहे और भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने तीखी आलोचना की.

बर्लिन में ग्लोबल पब्लिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर थॉर्स्टन बेनर ने संयुक्त लेख का बचाव करते हुए बुधवार को एक्स पर लिखा, "उस लेख में भारतीय विदेश नीति को लेकर एक भी लाइन नहीं है...मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि कोई कैसे और क्यों इसे कूटनीतिक अपमान या दख़ल के रूप में बता सकता है."

इस पर कंवल सिब्बल ने एक्स पर लंबा जवाब लिखा, जिसमें उन्होंने एक 'दोस्ताना दौरे को लेकर विवाद' पैदा करने की कोशिश बताया.

रूस के विशेषज्ञ इस दौरे को कैसे देख रहे हैं?

मोदी और पुतिन

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इमेज कैप्शन, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल जुलाई में रूस का दो दिवसीय दौरा किया था
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रशियन एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ के इंस्टीट्यूट ऑफ़ ओरिएंटल स्टडीज़ में सेंटर फोर साइंटिफ़िक एंड एनॉलिटिकल इन्फ़ॉर्मेशन के प्रमुख निकोलाई प्लोत्निकोव ने द हिंदू के साथ बातचीत में भारतीय विदेश नीति को 'व्यावहारिक' बताया.

उन्होंने कहा, "दोनों देशों के बीच कई सालों की दोस्ती और रणनीतिक सहयोग में एकता रही है. द्विपक्षीय संबंध और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अंदर भी सहयोग लगातार आगे बढ़ रहा है. नई दिल्ली में वार्ता का एजेंडा मुख्य रूप से इस बात से तय हो रहा है कि हम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से आने वाले भारी बाहरी दबाव के अनुरूप ख़ुद को कैसे ढाल सकें."

हालांकि कुछ रिपोट्स हैं, जिनमें कहा गया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए भारत ने रूसी तेल ख़रीद को काफ़ी हद तक कम कर दिया है लेकिन प्लोत्निकोव का कहना है कि इससे भारत को अच्छा लाभ होता है.

उन्होंने द हिन्दू से कहा, "भारतीय आयातों में रूसी तेल का अच्छा ख़ासा हिस्सा है और इसे ख़रीद कर भारत अच्छा मुनाफ़ा कमाता है. एक ऐसे फ़ायदेमंद पेशकश को कोई क्यों ठुकराएगा, जिससे सरकारी ख़ज़ाने को भरने का मौक़ा मिलता हो."

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि तेल से अलग भारत और रूस दूसरे क्षेत्रों में साझेदारी के मौक़ों को तलाश रहे हैं.

बुधवार को एक कार्यक्रम में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि सरकारों के बीच समझौतों में 'मोबिलिटी, हमारी कूटनीति का एक बहुत अहम हिस्सा' है.

द हिन्दू से ही मॉस्को स्थित विश्लेषक आरिफ़ असालियोग्लू ने कहा, " रूस को भारतीय कुशल और अर्ध-कुशल कामगारों की भारी ज़रूरत है और रूस में पांच लाख भारतीय कामगारों की आवश्यकता हो सकती है."

उन्होंने कहा कि यूक्रेन संघर्ष की शुरुआत से ही पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव का सामना करने में रूस के लिए चीन और भारत का समर्थन महत्वपूर्ण रहा है.

भारत में कूटनीतिक विशेषज्ञ कैसे देख रहे हैं

चीन के तियानजिन में रूसी राष्ट्रपति पुतिन, भारत के प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, बीते सितंबर की शुरुआत में चीन के तियानजिन में रूसी राष्ट्रपति पुतिन, भारत के प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

यूक्रेन युद्ध के बाद से ही रूस इस बात पर ज़ोर देने लगा है कि वर्ल्ड ऑर्डर में शक्ति संतुलन अब बदल रहा है.

बीते अगस्त के अंत में जब चीन के तियानजिन में चीन, रूस और भारत के नेता मिले तो बहुध्रुवीय दुनिया की बात का विशेष तौर पर उल्लेख किया गया.

भारत की नीति शुरू से ही गुटनिरपेक्ष की रही है लेकिन जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक तनाव बढ़ रहा है, भारत पर भी दबाव बढ़ा है कि वह किसी एक पक्ष को चुने. ख़ासकर अमेरिका से ऐसा दबाव बढ़ा है.

द न्यू राइज़िंग पॉवर्स इन ए मल्टिपोलर वर्ल्ड के लेखक और भूराजनीतिक मामलों के जानकार ज़ोरावर दौलत सिंह का कहना है कि भारत एक नई विश्व व्यवस्था के लिए ख़ुद को तैयार कर रहा है.

उन्होंने एक्स पर लिखा, "2000 के दशक के मध्य में भारत के लिए अमेरिकी नव-रूढ़िवादी योजना का मूल आधार था कि रूस को हटाकर भारत को अपने खेमे का 'महाशक्ति' बनाना. लेकिन रूस के उभार ने उनकी योजनाओं पर पानी फिर गया."

"यह सप्ताह इसलिए अहम है क्योंकि भारत आखिरकार अपने भ्रमों को दूर कर रहा है और खुद को एक नई विश्व व्यवस्था के लिए तैयार कर रहा है."

सामरिक मामलों के विशेषज्ञ प्रवीन साहनी ने एक्स पर लिखा, "राष्ट्रपति पुतिन का दौरा साल 2025 में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम है. अगर राष्ट्रपति ट्रंप क्वॉड समिट के लिए भारत आए होते, तो पुतिन अपनी यात्रा को स्थगित कर सकते थे."

पुतिन के दौरे के द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मायने हैं. यह साल 2026 में भारत के ब्रिक्स के लिए रूस के समर्थन से कहीं आगे है.

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट में सीनियर फ़ेलो तन्वी मदान ने अपने एक लेख में कहा है कि पुतिन की यात्रा के मार्फ़त दोनों देशों का मक़सद एक संकेत देना भी है.

उनके अनुसार, "भारत सरकार अपने यहां ये दिखाना चाहेगी कि अमेरिकी दबाव के बावजूद उसके पास स्वायत्तता या स्वतंत्रता है. वहीं मॉस्को इस दौरे से भारत पर उसके पश्चिम के साथ संबंधों को लेकर दबाव डालना चाहेगा."

हालांकि दूसरी ओर भारत के सामने पश्चिम से संबंधों के संतुलन को साधने की चुनौती होगी.

तन्वी लिखती हैं, "रूस का ज़ोर रक्षा सहयोग पर रहेगा जबकि भारत आर्थिक और अन्य संबंधों को बढ़ाने की कोशिश करेगा. रूस अत्याधुनिक फ़ाइटर प्लेन सुखोई-57 की पेशकश कर सकता है. इस समय भारत के रूसी तेल आयात के कम होने से रूस के पास रक्षा ऐसा क्षेत्र है, जहां से उसे डॉलर मिल सके."

उनके अनुसार, "भारत एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम की आपूर्ति और सुखोई-30 को अपग्रेड करने से जुड़े समझौते की उम्मीद करता है. इसके अलावा आर्कटिक क्षेत्र और हिंद महासागर में दोनों देशों के बीच सहयोग को और बढ़ाने पर सहमति हो सकती है."

रक्षा क्षेत्र से आगे...

सुखोई-57

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इमेज कैप्शन, रूस का सुखोई-57 फ़ाइटर प्लेन इसी साल की शुरुआत में भारत के एयर शो- एयरो इंडिया 2025 में शामिल हुआ था.

यूक्रेन पर रूसी हमले की भारत ने कभी निंदा नहीं की और दूसरी तरफ़ रूस से भारत का कारोबार बढ़ता गया. इस वजह से पश्चिम के देश भारत को लेकर ख़फ़ा रहते हैं.

इंस्टीट्यूट ऑफ साउथ एशियन स्टडीज में विजिटंग प्रोफ़ेसर सी राजामोहन ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है. ''जो बाइडन ने अमेरिका-भारत साझेदारी में भारत के रूस से संबंधों को आड़े नहीं आने दिया था. दूसरी तरफ़ बाइडन से ज़्यादा रूस विरोधी नहीं होने के बावजूद ट्रंप ने भारत के ख़िलाफ़ रूसी तेल ख़रीद का हवाला देकर 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ लगा दिया."

"ट्रंप को दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सबसे ज़्यादा रूस-समर्थक अमेरिकी राष्ट्रपति माना जा सकता है. भारत को रूसी तेल ख़रीदने के लिए दंडित करते हुए भी, ट्रंप अमेरिका के लिए रूसी हाइड्रोकार्बन और खनिज चाहते हैं. अमेरिकी और यूरोप के मीडिया रिपोर्टों से संकेत मिलते हैं कि ट्रंप की शांति-कूटनीति रूस में व्यापारिक अवसरों को बढ़ाने और यूक्रेन के प्राकृतिक संसाधनों तक विशेष पहुंच सुरक्षित करने की महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी हुई है.''

सी राजामोहन ने लिखा है, ''यूरोप यूक्रेन पर दिल्ली के रुख़ से असहज है. ज़ाहिर है कि यूरोप अमेरिका के बाद भारत का सबसे अहम साझेदार है. लेकिन यूरोप ने भारत के ख़िलाफ़ ट्रंप की तरह कोई टैरिफ़ नहीं लगाया. भारत यूरोप के साथ गहरे संबंध बनाना चाहता है. ऐसे में भारत यूरोप और रूस के बीच शांति देखना पसंद करेगा. पुतिन की यात्रा दिल्ली को यूरोप की सुलह-संधि के प्रति अपने समर्थन की फिर से पुष्टि करने का अवसर देती है.''

सी राजामोहन ने लिखा है, ''यूरोप को अब ऐसा अमेरिका दिख रहा है जो अपने सहयोगियों की रक्षा करने की तुलना में रूस के साथ सौदे करने में अधिक रुचि रखता है. युद्ध ने यूरोप और रूस के बीच पारस्परिक निर्भरता को तोड़ दिया है. यूरोप दो तरह की चिंता का सामना कर रहा है. रूस से ख़तरा और अमेरिका की ओर से छोड़े जाने का डर. उसे ट्रंप और पुतिन की ओर से तय की गई शांति पसंद नहीं है.''

सी राजामोहन ने लिखा है, ''जब पुतिन 2000 में राष्ट्रपति के रूप में पहली बार भारत आए थे तो उनका मक़सद भारत के प्रति रूस की सोवियत के बाद वाली उपेक्षा को समाप्त करना था. वह अवसर दोनों पक्षों से चूक गया. इस हफ़्ते मोदी और पुतिन को संबंधों को अधिक मज़बूत और आधुनिक आधार पर स्थापित करने का एक नया अवसर प्रदान करता है.''

चीन के साथ रूस के संबंध

शी और पुतिन

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इमेज कैप्शन, रूस और चीन के बीच रणनीतिक सहयोग गहरा हुआ है.

भारत के पूर्व राजनयिकों और कूटनीतिक विशेषज्ञों में इस बात को लेकर असमंजस बना हुआ है कि चीन के साथ रूस की क़रीबी को देखते हुए भारत-रूस का सहयोग किस स्तर तक पहुंचेगा.

तन्वी मदान ने लिखा है, "इस यात्रा में बहुत सारी अच्छी बातें कही जाएंगी लेकिन चीन और पाकिस्तान के साथ रूस के संबंधों को लेकर, भारत-रूस संबंधों की कुछ सीमाएं भी होंगी. बहुत कुछ इस बात निर्भर करेगा कि क्या घोषणाएं होती हैं, क्या लागू होता और पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है और यूक्रेन जंग का क्या नतीज़ा निकलता है."

उन्होंने उम्मीद जताई है कि इस दौरे से भारत ये उम्मीद करेगा कि पश्चिमी देशों के साथ संबंध पटरी पर बने रहेंगे और उसका कारण है कि ख़ुद ट्रंप प्रशासन, रूसी राष्ट्रपति के साथ वार्ता कर रहा है और पश्चिमी साझेदार भारत के साथ संवाद बनाए रखने की अहमियत को समझते हैं.

कूटनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी का कहना है कि पुतिन का भारत दौरा ये दिखाता है कि भारत के साथ अपनी साझेदारी को रूस अहमियत देता है और वह खुद को बीजिंग का जूनियर पार्टनर नहीं बनाना चाहता.

रूस के सरकार मीडिया आरटी के एडिटर एन चीफ़ फ्योदोर लुक्यानोव ने गुरुवार को, "क्या मॉस्को-दिल्ली धुरी, पश्चिमी दुनिया के दबदबे के बाद के समय का लिए एक टेंप्लेट है?"- शीर्षक से एक लेख लिखा.

इसमें उन्होंने लिखा है, "भारत-रूस संबंध इस बात का उदाहरण है कि उठापठक वाले दौर में कैसे स्थिरता को बनाए रखा जाए. ये संबंध बहुत से लोगों के लिए ईर्ष्या का विषय रहा है."

उन्होंने लिखा, "भारत की नीति स्थिर रही है इसके एजेंडा के केंद्र में खुद का विकास बना हुआ है... इसकी वैश्विक दबदबे की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है..."

"इसका बढ़ता राजनीतिक वज़न उसकी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं का नतीजा नहीं, बल्कि दुनिया में हो रहे बदलावों का नतीजा है. यह कुछ प्रमुख शक्तियों की अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों में भारत का समर्थन हासिल करने की बढ़ती चाहत का भी नतीजा है."

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