पुतिन का भारत दौरा: दोनों देशों के संबंधों में जो मुश्किलें आती हैं आड़े

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- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की यात्रा से भारत को सबसे ज़्यादा क्या उम्मीद है? - मैंने यह सवाल भारतीय विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी से पूछा.
उन्होंने कहा, "हम रूस के साथ आर्थिक रिश्ते मज़बूत करना चाहते हैं. अभी हम रूस से ज़्यादा ख़रीदते हैं और बहुत कम बेचते हैं. इससे असंतुलन हो रहा है. हम इसे ठीक करना चाहते हैं."
इसके कुछ ही देर बाद, पत्रकारों से एक अलग बातचीत में रूस ने भी इस बात को माना. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा, "हमें पता है कि हमारे भारतीय दोस्त चिंतित हैं. हम भारत से ज़्यादा सामान ख़रीदना चाहते हैं."
क्या यह संयोग है? या भारत और रूस पूरी तरह एकमत हैं? या फिर दोनों देशों की सोच में फ़र्क़ है कि दुनिया के सामने क्या दिखाना है?
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बातचीत में जहाँ भारतीय अधिकारियों ने रक्षा संबंधों को कम महत्व दिया है, वहीं पेस्कोव ने इस पर खुलकर बात की.
उन्होंने कहा कि एसयू-57 लड़ाकू विमान का मुद्दा इस दौरे के एजेंडे में ज़रूर रहेगा. उन्होंने यह भी पुष्टि की कि एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम पर दोनों देशों के 'शीर्ष नेताओं' के बीच बातचीत होगी.
तो, इस समय भारत के लिए क्या दांव पर है? रूस क्या हासिल करना चाहता है? और दोनों देश अमेरिका, चीन जैसे मुल्कों से रिश्ते बनाए रखते हुए अपने समीकरण कैसे संतुलित करेंगे?

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शुरुआत रणनीतिक रिश्तों से
दोनों देशों ने अपने रिश्ते को ख़ास रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया है.
इसके तहत भारत और रूस के बीच 'वार्षिक शिखर सम्मेलन' की व्यवस्था है.
इसमें दोनों देशों के शीर्ष नेता बारी-बारी से एक-दूसरे के देश में मिलते हैं. भारतीय सरकार के अनुसार, अब तक ऐसे 22 शिखर सम्मेलन हो चुके हैं.
भारत और रूस जी20, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) और संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों के सदस्य हैं.
भारत कहता है कि दोनों देश इन मंचों पर मिलकर काम करते हैं. भारत रूस को उन देशों में गिनता है, जो उसकी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट पाने की कोशिश का समर्थन करते हैं.
हालांकि, साल 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद यह पहली बार है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन भारत आ रहे हैं. उन्होंने 2023 में भारत में हुए जी20 शिखर सम्मेलन में भी हिस्सा नहीं लिया था.
इस बीच, दोनों देशों के नेताओं ने साल 2022 में पांच बार और 2023 में दो बार फ़ोन पर बात की. जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मॉस्को भी गए थे.
पूर्व भारतीय विदेश सचिव शशांक के अनुसार, आज भारत और रूस को एक-दूसरे की ज़रूरत है क्योंकि दोनों पर दबाव है.
बीबीसी हिन्दी से बात करते हुए शशांक ने कहा, "यूक्रेन मुद्दे का हल नहीं होने से रूस पश्चिमी देशों के दबाव में है और अमेरिका की तरफ़ से लगाए गए टैरिफ़ के कारण भारत भी दबाव में है. मेरा मानना है कि भारत और रूस और भरोसे के साथ काम करना चाहते हैं, लेकिन इसे बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बनाना चाहते ताकि अमेरिका नाराज़ न हो. इसलिए शायद बहुत सी नई घोषणाएं न हों बल्कि चीज़ें पुराने समझौतों या उनमें ही बदलाव के रूप में दिखाई जाएं."
बात रक्षा सौदों की

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भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि रक्षा समझौते के एलान की संभावना कम है. एक अधिकारी ने बताया, "हम यह नहीं कहना चाहते कि नेता क्या चर्चा करेंगे लेकिन परंपरा के अनुसार, शिखर सम्मेलन में रक्षा सौदों की घोषणा नहीं होती. बातचीत जारी है और इसमें समय लग सकता है".
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान से संघर्ष के बाद यह पहला शिखर सम्मेलन है.
भारतीय वायु सेना (आईएएफ़) ने उस संघर्ष के दौरान रूसी एयर डिफ़ेंस सिस्टम एस-400 के प्रदर्शन की खुलकर तारीफ़ की थी.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इंडो-रूसी सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल ब्रह्मोस के सटीक काम करने की सराहना की थी.
आज भी भारतीय वायु सेना का मुख्य लड़ाकू विमान रूसी डिज़ाइन वाला सुखोई-30 एमकेआई है.
लेकिन उस संघर्ष के बाद पाकिस्तान ने घोषणा की कि उसे चीन से 40 फिफ्थ जेनरेशन के जे-35 स्टेल्थ लड़ाकू विमान की आपूर्ति का भरोसा मिला है. इस तकनीक वाले विमान भारत के पास नहीं हैं.
इसके अलावा, भारतीय वायु सेना को तुरंत और लड़ाकू विमानों की ज़रूरत है ताकि उसकी'42 स्क्वॉड्रन' की ताक़त पूरी हो सके. भारतीय वायु सेना के पास फ़िलहाल 30 स्क्वॉड्रन हैं. आमतौर पर एक स्क्वॉड्रन में 18 लड़ाकू विमान होते हैं.
इन वजहों से उन्नत रूसी एसयू-57 जेट पर हो रही चर्चाओं का महत्व बढ़ गया है.
रक्षा साझेदारी में मुश्किलें

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लेकिन इस साझेदारी में कुछ कमियां भी सामने आई हैं.
पूर्व विदेश सचिव शशांक ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "भारत रूस से बचे हुए एस-400 की डिलीवरी जल्दी करने को कहेगा".
रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक़, भारत रूस से परमाणु ऊर्जा से चलने वाली और हमला करने वाली पनडुब्बी की डिलीवरी पर पक्का भरोसा चाहता है.
एक अधिकारी ने बताया, "यह इस साल आनी थी लेकिन पनडुब्बी पर काम अब भी जारी है".
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत के लिए हथियारों का सबसे बड़ा स्रोत अब भी रूस है. साल 2020 से 2024 के बीच भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी 36% रही.
हालांकि, यह साल 2010-2014 की तुलना में काफ़ी कम है. उस वक़्त यह 72% थी. एसआईपीआरआई का कहना है कि "भारत अब हथियारों की सप्लाई के लिए पश्चिमी देशों, ख़ासकर फ़्रांस, इसराइल और अमेरिका की ओर बढ़ रहा है".
इन सबके बीच एक और बदलाव हो रहा है.
पहले रिश्ता ख़रीदार और विक्रेता का था लेकिन पिछले साल के संयुक्त बयान के मुताबिक़ अब साझेदारी संयुक्त रिसर्च और डेवलपमेंट की ओर बढ़ रही है.
भारत और रूस ने भारत में पुर्ज़ों के संयुक्त निर्माण को बढ़ावा देने और फिर उन्हें दोस्ताना तीसरे देशों को निर्यात करने पर भी सहमति जताई है.

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कारोबारी संबंध
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड स्तर, 68.7 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गया.
इसमें भारत का रूस को निर्यात सिर्फ़ 4.9 अरब डॉलर का था. इसमें दवाइयां, लोहा और स्टील शामिल हैं. बाकी सब आयात थे. इनमें तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद वग़ैरह शामिल हैं.
एक भारतीय अधिकारी ने कहा, "अभी हम रूस को ज़्यादा सामान नहीं भेज पा रहे हैं क्योंकि ड्यूटी और टैरिफ़ जैसी बाधाएं हैं. हमने रूस समेत यूरोएशियन इकोनॉमिक यूनियन के साथ फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) पर बातचीत शुरू की है. समझौता होने के बाद ये दिक्कतें कम होंगी.''
''हम चाहते हैं कि भारत की दवाइयां, कृषि उत्पाद, रोज़मर्रा के सामान, समुद्री उत्पाद, आलू और अनार रूस तक पहुंचे. इसके अलावा, कुशल और अर्ध-कुशल भारतीय कामगारों की आवाजाही पर भी रूस के साथ समझौता होने की संभावना है."
राजोली सिद्धार्थ जयप्रकाश ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में काम करते हैं और रूस की विदेश और आर्थिक नीतियों का अध्ययन करते हैं.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी से कहा कि समझौतों के अलावा, "भारत को रूस में बाज़ार ढूंढने के लिए मेहनत करनी होगी. रूस को उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरण चाहिए, जो पश्चिमी पाबंदियों की वजह से उसे आसानी से नहीं मिल रहे. लेकिन चीन पहले से वहां मौजूद है और एक निर्यात-प्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण उसकी स्थिति मज़बूत है."
तेल की ख़रीद और भारत पर दबाव

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यूक्रेन पर हमले के बाद भारत रूसी कच्चे तेल की ख़रीद एक बड़े बदलाव और भू-राजनीतिक टकराव की कहानी है.
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (जीटीआरआई) के मुताबिक़, साल 2021 तक रूस से तेल की ख़रीद बहुत कम थी. सालाना आयात मुश्किल से दो-तीन अरब डॉलर और भारत की तेल ज़रूरतों का सिर्फ़ एक-दो फ़ीसदी था. यह साल 2024 तक बढ़कर 52.7 अरब डॉलर हो गया और रूस की हिस्सेदारी कुल आयात में 37.3% तक पहुँच गई.
यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी तेल की कमाई को निशाना बनाया. इसी वजह से अमेरिका ने भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ़ लगा दिया. इसके बाद कुल टैरिफ़ 50% हो गया. इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ा. भारत ने इस क़दम को अनुचित और अन्यायपूर्ण बताया.
हाल के महीनों में ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि भारत रूसी तेल नहीं ख़रीदेगा. दूसरी ओर भारत ने कहा कि यह फ़ैसला व्यावसायिक आधार पर होगा.
जीटीआरआई के आंकड़ों के अनुसार, अभी भारत में रूसी तेल की हिस्सेदारी घटकर 31.8% हो गई है. मॉस्को में पेस्कोव ने बिना भारत का नाम लिए कहा कि रूस 'तेल की सप्लाई में कमी रोकने के तरीक़े ढूंढेगा'.
खाद पर निर्भरता

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भारत के लिए रूस उर्वरक ख़रीदने का बड़ा स्रोत है
रूस के सरकारी बैंक स्बेर के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2024 में भारत ने रूस से 4.7 मिलियन टन खाद ख़रीदी. यह साल 2021 की तुलना में 4.3 गुना ज़्यादा है. यह निर्भरता जल्दी ख़त्म होने वाली नहीं है.
पिछले शिखर सम्मेलन के संयुक्त बयान के अनुसार, भारत रूस से खाद की 'लंबे समय तक लगातार सप्लाई' चाहता है और इसके लिए 'कंपनियों के बीच लंबे समय के समझौते' की योजना है.
और क्या ज़रूरी मुद्दे हैं जिन पर विशेषज्ञों की नज़र होगी?
इस सवाल पर पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं, "जिन क्षेत्रों में रूस भारत को तकनीक देने के लिए तैयार हो - जैसे, यात्री या फ़ौजी विमान मिलकर बनाना. यह एक तरीक़ा हो सकता है. ऐसे प्रोजेक्ट भारत के आत्मनिर्भर बनने के लक्ष्य में मदद करेंगे और रूस को बड़ा बाज़ार देंगे. तकनीक के मामले में रूस जो भारत को दे सकता है, वह बहुत कम देश दे सकते हैं".
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















