अमित शाह की सर्वदलीय बैठक क्या मणिपुर में हिंसा रोक सकेगी
दीपक मंडल
बीबीसी संवाददाता

मणिपुर में पिछले 54 दिनों से जारी मैतेई समुदाय और कुकी-जोमी जनजातियों के बीच जारी हिंसक संघर्ष की आग बुझती नहीं दिख रही है.
पूर्वोत्तर भारत के इस अहम राज्य में अब भी पुलिस और सरकारी गोदामों से हथियार लूटे जा रहे हैं. विधायकों और मंत्रियों के घरों पर हमले हो रहे हैं. हिंसा की आग रह-रह कर भड़क उठती है.
हालात काबू में नहीं हैं. हर गुजरते दिन के साथ मैतेई और कुकी समुदायों के बीच विभाजन की रेखा और चौड़ी होती जा रही है.
ऐसे में राज्य के हालात को लेकर केंद्रीय गृह मंंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नई दिल्ली में हुई सर्वदलीय बैठक से उम्मीदें काफ़ी बढ़ गई हैं.
हालांकि बैठक में शामिल विपक्षी दलों ने मणिपुर के हालात के लिए केंद्र को ज़िम्मेदार ठहराया. उनके मुताबिक़ ये देर से उठाया गया एक नाकाम क़दम है.
कांग्रेस समेत कुछ दूसरी विपक्षी पार्टियों ने हिंसा पर पीएम नरेंद्र मोदी की ‘चुप्पी’ पर सवाल उठाया और मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को हटाने की मांग की.
विपक्ष का कहना था कि केंद्र को तुरंत एक सर्वदलीय शिष्टमंडल मणिपुर भेजना चाहिए ताकि राज्य के लोगों को ये भरोसा पैदा हो कि मोदी सरकार सचमुच यहां के हालात को लेकर गंभीर है.
विश्लेषकों का मानना है कि शाह का सर्वदलीय बैठक बुलाने का फ़ैसला इस बात का संकेत है कि केंद्र ने अब ये मानना शुरू कर दिया है कि मणिपुर की समस्या सेना की तैनाती से नहीं सुलझेगी. इसका राजनीतिक समाधान निकालना होगा.
फ़िलहाल राज्य में 40 हज़ार सुरक्षाकर्मी तैनात हैं. इनमें भारतीय सेना के सैनिक, अर्द्धसैनिक बल और पुलिस बल के लोग शामिल हैं. लेकिन इसके बावजूद हिंसा रुक नहीं रही है.

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मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच अविश्वास की खाई इतनी चौड़ी हो गई है कि सेना तैनात कर शांति बहाल करना मुश्किल काम लग रहा है.
लिहाजा, शाह की इस बैठक को सही दिशा में उठाया गया क़दम माना जा रहा है.
हालांकि कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने कहा है कि अगर केंद्र राज्य में शांति बहाल करने के प्रति गंभीर है तो सबसे पहले मुख्यंत्री एन. बीरेन सिंह को बर्खास्त कर वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाए और तुरंत एक सर्वदलीय शिष्टमंडल भेजे.
कांग्रेस ने तो यहां तक कहा कि सर्वदलीय बैठक में उसके प्रतिनिधि के तौर पर शामिल ओ इबोबी सिंह को तीन घंटे की बैठक में अपनी बात रखने के लिए सिर्फ़ सात मिनट का समय दिया गया.
इबोबी सिंह 15 साल तक मणिपुर के मुख्यमंत्री रहे हैं और इस बैठक में शामिल होने वाले वो राज्य के एक मात्र व्यक्ति थे.
बैठक में गृह मंत्रालय के प्रजेंटेशन के दौरान कहा गया कि राज्य में तीन मई को भड़की हिंसा से लेकर अब तक 131 लोगों की मौत हो चुकी है.
अमित शाह ने कहा कि केंद्र ने हालात संभालने के लिए पूरी गंभीरता से काम किया है. 13 जून के बाद राज्य में एक भी शख्स की मौत नहीं हुई है.
लेकिन विपक्षी दलों का कहना है एम बीरेन सिंह वहां पक्षपात कर रहे हैं और समस्या के लिए काफ़ी हद तक वही ज़िम्मेदार हैं.
बैठक में शामिल सीपीएम के जॉन ब्रिटास ने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य में हिंसा को लेकर 6000 एफ़आईआर दर्ज हुई है लेकिन सिर्फ 144 गिरफ्तारियां हुई हैं.
ख़ुद अमित शाह ने माना कि कई इलाकों में महिलाएं प्रदर्शन कर रही हैं और इस वजह से सुरक्षा बलों के लिए वहां घुसना मुश्किल हो रहा है. उन्हें डर है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ कड़ाई की गई तो हालात और संगीन मोड़ ले सकते हैं.
24 जून को सेना को विद्रोही ग्रुप केवाईकेएल के 12 कैडरों को छोड़ना पड़ा क्योंकि उनके समर्थन में बड़ी तादाद में महिलाएं सामने आ गई थीं.
सवाल है कि आख़िर 40 हज़ार सुरक्षाकर्मी लगाने के 54 दिन बाद भी राज्य में शांति बहाल क्यों नहीं हो पा रही है?
इस सवाल की पड़ताल के लिए हमने मणिपुर यूनिवर्सिटी के नामबोल एल सनोई कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट की असिस्टेंट प्रोफेसर निगोम्बाम श्रीमा से बात की.

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40 हजार सुरक्षाकर्मियों के बावजूद हालात बेकाबू क्यों?
निगोम्बाम श्रीमा ने कहा, "40 हज़ार हों या 50 हज़ार सुरक्षाकर्मीं, जब तक राज्य एक्शन नहीं लेगा शांति स्थापित नहीं हो सकती. दरअसल, राज्य सरकार जब तक कुकी उग्रवादी संगठनों के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स वापस लेकर कार्रवाई नहीं करती तब तक हिंसा रुकना मुश्किल है."
राज्य सरकार ने ऐसे 30 संगठनों से सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन समझौता किया था. लेकिन सिर्फ़ दो संगठनों के साथ हुए समझौतों को रद्द किया गया है.
उन्होंने कहा,‘’ हाल में मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने कहा था कि कुकी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ गांवों में लोगों ने जो हथियारबंद दल बनाए हैं, उन्हें अपना काम बंद कर देना चाहिए. गोली-बंदूक चलाना उनका काम नहीं है. लेकिन राज्य के सुरक्षाकर्मी कुकी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ एक्शन नहीं ले पा रहे हैं और यही वजह है कि लोगों को हथियार उठाना पड़ रहा है.’’
श्रीमा कहती हैं, ‘’लोग डरे हुए हैं, इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए हथियार उठाए हुए हैं. वहीं दूसरी ओर कुकी विद्रोही भी हिंसा नहीं रोक रहे हैं. श्रीमा का कहना है, इस टकराव की वजह से शांति कायम नहीं हो रही है. लिहाजा जब तक सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स ख़त्म करके हिंसा फैलाने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती तब तक हालात काबू नहीं होंगे.’’

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सीएम बीरेन सिंह को हटाने की क्यों हो रही मांग?
राज्य में हिंसा पर रोक न लगा पाने की वजह से एन. बीरेन सिंह सवालों के घेरे में हैं. बीरेन सिंह मैतेई समुदाय से आते हैं.
सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने आरोप लगाया चूंकि वो मैतेई समुदाय का पक्ष ले रहे हैं, इसलिए राज्य में शांति बहाल नहीं हो रही है.
लिहाजा उन्हें तुरंत हटा कर राष्ट्रपति शासन लागू करना चाहिए.
लेकिन श्रीमा कहती हैं, ‘’मणिपुर की राजनीति अलग है. यहां लोग उसी पार्टी को सत्ता में लाना चाहते हैं जिसका केंद्र में शासन हो.
सवाल एक्शन लेने का है. मौजूदा सीएम को हटाने या दूसरा सीएम लाने से बात बनेगी, इसकी गारंटी नहीं है. जो भी मुख्यमंत्री होगा उसे एक्शन लेना होगा. इस बात की गारंटी नहीं है कि नया मुख्यमंत्री एक्शन लेगा ही.
वो कहती हैं, ‘’केंद्र सरकार क्या कर रही है और राज्य सरकार क्या, ये समझ नहीं आ रहा है. क्योंकि यहां के लोगों को कुछ होता हुआ दिख नहीं रहा है?’’
वो कहती हैं, ‘’ राज्य सरकार का काम इस जमीन की संप्रभुता की रक्षा करना है. आतंरिक अशांति को रोकना है. लेकिन ये काम राज्य कर नहीं कर रहा है. तो सवाल मुख्यमंत्री हटाने या बदलने के नहीं बल्कि मौजूदा हालात में कदम उठाने का है. दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है के राज्य ये काम नहीं कर रहा है.’’

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मोदी की चुप्पी से निराशा
मणिपुर में जारी हिंसा पर पीएम नरेंद्र मोदी के रुख़ को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. उनके आलोचक आरोप लगा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी राज्य में हिंसा के बीच अमेरिका चले गए. उन्होंने अब तक कोई बयान नहीं दिया है.
हालांकि अमित शाह का कहना है कि नरेंद्र मोदी को राज्य के हालात के बारे में हर दिन जानकारी दी जा रही है. वो राज्य के हालात से बख़ूबी वाकिफ हैं.
जब हमने श्रीमा से पीएम मोदी के मौजूदा की कथित चुप्पी के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ये सवाल सिर्फ़ राज्य के बाहर ही नहीं अंदर भी उठ रहे हैं.
उन्होंने कहा, "यहां महिलाओं के काफ़ी बड़े-बड़े संगठन है. हर दिन मैं ख़बरों में सुन रही हूं कि ये संगठन ये सवाल ज़ोर-शोर से उठा रहे हैं कि मोदी जी की केंद्र सरकार इस मामले पर चुप क्यों है. बीरेन सिंह सरकार ने मोदी सरकार बात क्यों नहीं की? दरअसल, हमारे लोगों का केंद्र और राज्य सरकार दोनों से विश्वास उठ गया है.’’
वो कहती हैं, "यहां वोटर मेनिफेस्टो देख कर या पार्टी लाइन पर वोट देकर सरकार नहीं बनाते हैं. वो केंद्र की सरकार को देख कर सरकार बनाते हैं. लेकिन अब लोगों को लग रहा है कि वे ठगे गए गए हैं."
मणिपुर में काम कर रहे मानवाधिकार कार्यकर्ता के. ओनील कहते हैं,’’अगर नरेंद्र मोदी और अमित शाह शांति बहाली के लिए काम कर रहे होते तो ज़मीन पर इसके नतीजे देखने को मिल जाते. दरअसल, मणिपुर में अभी जो हालात हैं वो इनके इसी रवैये का नतीजा है.’’
वो कहते हैं,’’ अमित शाह ने मणिपुर के हालात को लेकर जो सर्वदलीय बैठक की है वो भी सिर्फ़ दिखावा ही है. कई विपक्षी पार्टियों ने तो कहा कि उन्हें सही से अपनी बात तक नहीं रखने दी गई.’’
मौजूदा हालात
बीबीसी संवाददाता सौतिक विश्वास ने हाल की अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि मणिपुर में पिछले लगभग दो महीने से जारी हिंसा में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 400 लोग घायल हुए हैं.
वो लिखते हैं, ‘’मैतेई और कुकी समुदाय के लोगों के बीच हिंसा में लगभग 60 हज़ार लोग को घर छोड़ना पड़ा है. ये लोग राज्य के 350 राहत शिविरों में रह रहे हैं. हिंसा करने वालों ने पुलिस वालों से जो चार हजार से अधिक हथियार लूटे हैं, उनका एक चौथाई ही बरामद हो सका है.’’
अपनी रिपोर्ट में वो लिखते हैं,’’दोनों समुदाय के लोगों के बीच अविश्वास की गहरी खाई है. कुकी समुदाय के लोग कह रहे हैं सुरक्षाकर्मी मैतेई समुदाय को लोगों का पक्ष ले रहे हैं. वहीं मैतेई समुदाय के लोगों का कहना है कि सुरक्षाकर्मी कुकियों का पक्ष ले रहे हैं.’’
‘’राज्य में जारी हिंसा में अब तक 200 चर्चों और 17 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया है. यहां तक कि स्थानीय विधायकों और मंदिरों के घरों पर भी हमले हुए हैं.’’
नॉर्थईस्ट इंडिया विमन इनशिएटिव फॉर पीस की वीणालक्ष्मी पेप्राम ने सौतिक बिस्वास से कहा, "शुरुआती दो दिनों की हिंसा के दौरान लोगों के घर जलाए गए. कइयों को पीट-पीट कर मार डाला गया. उन्हें यातनाएं दी गईं और ज़िंदा जला दिया गया. मणिपुर ने अपने अब के इतिहास में ऐसी हिंसा कभी नहीं देखी थी."

कैसे शुरू हुई हिंसा?
तीन मई को ये हिंसा तब शुरू हुई जब मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के ख़िलाफ़ राज्य के कुकी समेत दूसरे जनजातीय समुदाय ने रैली निकाली जो बाद में हिंसक हो गई.
उन्होंने मैतेई समुदाय पर हमले किए. जवाब में मैतेई समुदाय ने भी अपनी बदले की कार्रवाई शुरू कर दी और मैतेई बहुल इलाक़ों में रह रहे कुकी समुदाय के लोगों के घर जला दिए गए और उन पर हमले किए गए.
इन हमलों के बाद मैतेई बहुल इलाकों में रहने वाले कुकी और कुकी बहुल इलाकों में रहने वाले मैतेई अपने-अपने घर छोड़कर जाने लगे.
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य के पहाड़ी इलाकों से कुकी चरमपंथी मैतेई इलाकों में गोलीबारी कर रहे हैं जिससे बड़ी संख्या में मैतेई लोग मारे जा रहे हैं.
हाल ही में मणिपुर से लौटे बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव ने बताया कि मणिपुर में हालात बेहद तनावपूर्ण हैं.
नितिन ने बताया, “राजधानी इंफाल तक में बेहद तनाव है. सीआरपीएफ़ के जवानों ने हमें सख्त हिदायत दी कि हम गाड़ी से बाहर ना निकलें. हिंसा का स्केल देखते हुए लगता है कि यहां कुकी और मैतेई समुदायों की आपसी रंजिश तो है ही साथ ही लगता है कि बाहर से भी आए चरमपंथी हिंसा में शामिल हैं. उनके पास अत्याधुनिक हथियार भी हो सकते हैं.”
फ़िलहाल राज्य में 40 हज़ार सुरक्षाकर्मी तैनात हैं. इससे समझा जा सकता है कि हालात कितने ख़राब हैं.
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