हिमाचल में कांग्रेस आर-पार के मूड में, जानिए क्या हैं सरकार बचाने के विकल्प- प्रेस रिव्यू

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हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार बुधवार को संघर्ष करती हुई नज़र आई.
राज्यसभा चुनाव में हिमाचल की एक सीट पर मिली हार के बाद राज्य में कांग्रेस के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है.
हिमाचल सरकार में मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भी अपने पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा बुधवार सुबह की थी. हालांकि बाद में वो इसे लेकर नरम दिखे.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट में कहा गया है कि कांग्रेस के उन छह विधायकों को अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, जिन्होंने बजट पास करने के लिए पार्टी के जारी व्हिप का उल्लंघन किया.
इन छह विधायकों की क्रॉस वोटिंग करने के कारण हिमाचल की एक राज्यसभा सीट पर अभिषेक मनु सिंघवी बीजेपी के हर्ष महाजन से हार गए थे.
हालांकि हिमाचल विधानसभा में कांग्रेस सरकार बुधवार को बजट पास करवाने में सफल रही. इसे लेकर विधानसभा में हंगामा भी हुआ और 15 बीजेपी विधायकों को निष्कासित भी किया गया.

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सुक्खू सरकार पर ख़तरा बरकरार
हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने बजट भले ही पास करवा लिया है, मगर सुक्खू सरकार की मुश्किलें ख़त्म नहीं हुईं हैं.
ट्रिब्यून की रिपोर्ट में कहा गया है कि बीजेपी सत्तारूढ़ कांग्रेस के और विधायकों को अपने साथ लाने की कोशिशों में जुटी हुई है. ऐसे में हिमाचल में सत्ता की लड़ाई अभी तो बस शुरू हुई है.
बीजेपी अगर कांग्रेस के विधायकों को तोड़ती है तो कम से कम 14 विधायकों को तोड़ना होगा तभी दलबदल क़ानून से बचा जा सकता है. अभी कांग्रेस के केवल छह विधायकों ने ही बीजेपी को वोट किया था. अगर ये छह विधायक विधानसभा में बीजेपी के पाले में आते हैं और कांग्रेस का विरोध करते हैं तो ऐसे में इन पर दलबदल क़ानून की तलवार लटकी रहेगी.
कांग्रेस ने छह विधायकों को अयोग्य करार देने के लिए कहा है. कांग्रेस की याचिका पर विधानसभा स्पीकर कुलदीप पठानिया को सुनवाई करनी है. ऐसे में कांग्रेस और बीजेपी की लीगल टीम दिल्ली से हिमाचल पहुँच चुकी हैं.
हिमाचल में सियासी हलचल बढ़ने की शुरुआत मंगलवार को तब हुई थी, जब 40 विधायकों वाली कांग्रेस को 25 विधायकों वाली बीजेपी के सामने हार का सामना करना पड़ा था.
कांग्रेस के छह विधायकों, तीन निर्दलीय विधायकों ने बीजेपी के पक्ष में वोटिंग की और हर्ष महाजन ये सीट जीतने में सफल रहे.
इसके बाद सुक्खू सरकार के बने रहने पर सवाल उठने लगे थे. राज्य में कांग्रेस को संघर्ष करता देख पार्टी आलाकमान ने डीके शिवकुमार, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और भूपेश बघेल को पर्यवेक्षक बनाकर हिमाचल भेजा है.
ये नेता विधायकों से बात कर रहे हैं और उनकी समस्याओं को सुन रहे हैं.

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विक्रमादित्य सिंह का इस्तीफ़ा
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, हिमाचल में कांग्रेस सरकार पर ख़तरा मंडराने की एक वजह विक्रमादित्य सिंह का सुक्खू के विरोध में आ जाना भी है.
राज्यसभा के लिए वोटिंग वाले दिन विक्रमादित्य सिंह ने कहा था, ''जहां तक मेरी अंतरात्मा की बात है वो स्पष्ट है. बाक़ी किसी ने क्रॉस वोटिंग की हो तो उसके बारे में पता नहीं है.''
मंगलवार को जो विक्रमादित्य कांग्रेस के साथ होने की बात कर रहे थे, बुधवार को वही सुक्खू सरकार के ख़िलाफ़ नज़र आए.
बाद में सीएम सुक्खू ने विक्रमादित्य सिंह को अपना छोटा भाई बताया और उनकी समस्याओं को सुनने की बात कही.
बुधवार रात को विक्रमादित्य सिंह जब मीडिया के सामने आए तो इस्तीफ़े पर नरम नज़र आए.
विक्रमादित्य सिंह ने कहा, ''हमने पर्यवेक्षकों से बात की है. हमने उन्हें वर्तमान स्थिति के बारे में सूचित कर दिया है. जब तक कोई निर्णय नहीं हो जाता, मैं अपने इस्तीफ़े पर ज़ोर नहीं दूंगा. आने वाले समय में अंतिम निर्णय लिया जाएगा.''
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष और विक्रमादित्य सिंह की मां प्रतिभा सिंह ने कहा, ''विक्रमादित्य ने पार्टी से नहीं बल्कि कैबिनेट से इस्तीफ़ा दिया है. उन्होंने अभी तक यही कहा है कि उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया है और यह स्वीकार नहीं किया गया है. अब पर्यवेक्षकों को देखना है कि क्या करना है.''
विक्रमादित्य सिंह हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे हैं.
प्रतिभा सिंह ने कहा, ''जब से सरकार बनी है, तब से कुछ बातें ठीक नहीं चल रही थीं. हम हाईकमान के संज्ञान में ये बात बार-बार ले गए. हम चाहते थे कि वो इस पर कोई फैसला करते. उन्हें भी बुलाते और हमें भी बुलाते और इसका कोई हल निकालते तो आज हम इस स्थिति पर नहीं पहुंचते.''


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किन विधायकों ने हिमाचल में सुक्खू के लिए मुश्किलें खड़ी कीं
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल प्रदेश कांग्रेस का जो विवाद अब सामने आया है, वो महीनों से चल रहा था.
उत्तर भारत में कांग्रेस की सरकार सिर्फ़ हिमाचल में है. ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले ये विरोध पार्टी के लिए मुश्किलें ला सकता है.
कांग्रेस से बाग़ी हुए विधायकों की अगुवाई तीन बार के विधायक राजेंद्र राणा कर रहे हैं. वो सुक्खू के ज़िले हमीरपुर के सुजानपुर से आते हैं. इसके अलावा चार बार से धर्मशाला से विधायक सुधीर शर्मा ने भी कांग्रेस के ख़िलाफ़ जाने का फ़ैसला किया.

क्रॉस वोटिंग करने वाले दूसरे विधायकों के नाम हैं-
- बड़सर से विधायक इंद्रदत्त लखनपाल
- लाहौल स्पीति से विधायक रवि ठाकुर
- गगरेट से विधायक चैतन्य शर्मा
- कुटलेहड़ से विधायक दविंद्र कुमार
कांग्रेस के छह विधायकों के अलावा तीन निर्दलीय विधायकों ने भी राज्यसभा चुनाव में बीजेपी के लिए वोटिंग की थी.
- हमीरपुर से विधायक आशीष शर्मा
- डेहरा से होशियार सिंह
- नालागढ़ से केएल ठाकुर

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विधायक नाराज़ क्यों?
राज्य में कांग्रेस की जीत के बाद राणा को कैबिनेट में जगह मिलने की उम्मीद थी. लेकिन सुक्खू कैबिनेट में राणा को जगह नहीं मिली थी.
राणा 2014 में कांग्रेस में शामिल हुए थे. 2012 में वो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव में जीते थे और राज्य नेतृत्व की खुलकर आलोचना करते रहे.
वीरभद्र सरकार में सुधीर शर्मा शहरी विकास मंत्री रहे थे लेकिन उन्हें भी सुक्खू कैबिनेट में जगह नहीं मिली थी.
देविंद्र भुट्टो पहली बार कांग्रेस की टिकट पर जीतकर विधायक बने हैं. वो 2013 में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे. सुक्खू सरकार पर अवहेलना करने का आरोप वो लगाते रहे हैं.
लखनपाल तीन बार विधायक रह चुके हैं. वो शिमला म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में काउंसलर रह चुके हैं. इन्हें भी उम्मीद थी कि सुक्खू कैबिनेट में जगह मिलेगी मगर ऐसा हो ना सका.
चैतन्य शर्मा भी अपने विधानसभा क्षेत्र में काम ना करवाए जाने को लेकर सुक्खू सरकार की आलोचना करते रहे हैं.
उत्तराखंड के पूर्व चीफ सेक्रेटरी राकेश शर्मा के बेटे चैतन्य ने अमेरिका से पढ़ाई की है.
रवि ठाकुर ने भी सुक्खू सरकार पर उनकी विधानसभा को नज़रअंदाज़ करने का आरोप लगाया है.
हमीरपुर से निर्दलीय विधायक आशीष शर्मा ने 2022 चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी दोनों से टिकट मांगा था. मगर जब टिकट नहीं मिला तो वो निर्दलीय ही चुनाव लड़े.
होशियार सिंह दो बार से निर्दलीय विधायक हैं. हालांकि बीच में वो बीजेपी में शामिल हुए थे, मगर 2022 में बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दी थी. वो टिकट की मांग के साथ कांग्रेस के पास भी पहुंचे थे.
नालागढ़ से निर्दलीय विधायक पहली बार बीजेपी की टिकट पर 2012 में जीते थे. हालांकि 2017 चुनाव में वो हार गए थे और 2022 में पार्टी ने जब टिकट नहीं दिया तो वो निर्दलीय चुनाव लड़े.

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राज्यसभा चुनाव के नतीजों से संघर्ष शुरू
हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा के नतीजों से सुक्खू सरकार की मुश्किलें बड़ी हुई हैं.
इस चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार को भी 34 और बीजेपी के उम्मीदवार को 34 वोट मिले थे. ऐसे में फैसला लॉटरी सिस्टम के ज़रिए हुआ था.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि जन-प्रतिनिधि क़ानून में ऐसी स्थिति के लिए नियम है कि जब दोनों पक्षों को बराबर वोट मिलें तो क्या करना चाहिए.
क़ानून का सेक्शन 65 कहता है कि मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद अगर उम्मीदवारों के बीच बराबर वोट पाए जाते हैं तो लॉटरी से ज़रिए किसी को विजेता घोषित किया जा सकता है.
इस क़ानून में अदालत से भी इसी प्रक्रिया को मानने के लिए कहा गया है.
इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इस तरह से लॉटरी के ज़रिए कोई चुना हुया है या नहीं, इसकी जानकारी चुनाव आयोग की वेबसाइट पर नहीं है.
चुनाव आयोग के प्रवक्ता की ओर से भी इस बारे में जवाब नहीं दिया गया था.
पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने भी लॉटरी के ज़रिए किसी उम्मीदवार को विजेता चुने जाने के बारे में नहीं सुना है.
हालांकि स्थानी चुनावों में लॉटरी के ज़रिए विजेता घोषित किए जाते रहे हैं.
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