चीन की 'रूसी इलाक़े' पर दावेदारी, पुतिन सरकार ने अब तोड़ी चुप्पी

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चीन ने पिछले हफ़्ते जब अपना नया नक़्शा जारी किया तो भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, नेपाल और ताइवान ने कड़ी आपत्ति जताई लेकिन रूस ख़ामोश रहा था.
चीन ने नए नक़्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को अपने हिस्से के तौर पर दिखाया था तो साउथ चाइना सी में मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स और ताइवान के समुद्री क्षेत्रों और द्वीपों को अपना बताया था.
चीन ने अपने नए नक़्शे में विवादित बोल्शोई उस्सुरीस्की द्वीप को भी शामिल कर लिया, जो चीन और रूस के उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित है. हालांकि इस द्वीप को लेकर दोनों देशों के बीच पहले समझौता हो चुका है.
इस द्वीप में रूस का भी हिस्सा है लेकिन चीन ने अपने नए नक़्शे में पूरे द्वीप को अपना बताया है.
कुछ दिनों की ख़ामोशी के बाद रूस के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को विवादित द्वीप पर चीन के दावे को लेकर अपनी चुप्पी तोड़ी.
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जख़ारोवा ने द्वीप पर चीनी दावे को ख़ारिज करते हुए कहा कि 15 साल पहले द्विपक्षीय समझौतों के ज़रिए द्वीप पर स्वामित्व के सवाल को सुलझा लिया गया था.
विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर प्रकाशित बयान में जख़ारोवा ने कहा कि दोनों देश इस स्थिति पर कायम हैं कि हमारे बीच यह सीमा विवाद हल हो गया है.
उन्होंने कहा कि साल 2005 में दोनों देशों के बीच समझौता हुआ था, जिसके अनुसार बोल्शोई उस्सुरीस्की द्वीप को दोनों देशों के बीच बाँटा गया था.
लेकिन चीन ने प्रकाशित नए मैप में 135 वर्ग मील द्वीप पर अपना दावा किया है.
जखारोवा का कहना है कि दोनों देशों ने कई सालों की मेहनत के बाद सीमा विवाद को सुलझाया था और ऐसा करने से दोनों देशों के बीच संबंध मज़बूत हुए हैं.
उन्होंने कहा कि ऐसा करने से क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को भी मज़बूती मिली है और यह दुनिया के सभी देशों के सामने एक मिसाल की तरह है कि कैसे सीमा विवाद को सुलझाया जा सकता है.
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने ट्वीट कर कहा कि यह कोई मामूली ग़लती नहीं है, क्योंकि चीन का यह नक़्शा उसके संप्रभुता के दावों का नए क्षेत्रों में विस्तार करता है जो अब 10 डैश लाइन तक जाता है.
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उन्होंने लिखा, “क्या रूस के साथ ग़लती सुधारने के लिए चीन नया मैप जारी करेगा? क्या उसने आधिकारिक तौर पर ग़लती स्वीकार कर ली है?"
सिब्बल ने कहा कि विरोध के बावजूद अन्य दावों के साथ नया नक़्शा जारी करने से दोनों देशों के बीच दोस्ती को नुक़सान पहुँचेगा.
चीन के नए मैप पर भारत में रूस के राजदूत डेनिस एलिपोफ़ ने भी प्रतिक्रिया दी है. पत्रकार सिद्धांत सिब्बल ने उनकी प्रतिक्रिया को एक्स पर पोस्ट किया है.
प्रतिक्रिया देते हुए डेनिस ने कहा कि रूस भारत की तरह इसे बड़ा मुद्दा नहीं मानता है और ज़मीन पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं है.
1969 में आमूर और उसुरी नदी के तट पर सोवियत संघ और चीन के बीच एक युद्ध भी हो चुका है.
इस युद्ध में यूएसएसआर ने चीन पर परमाणु हमले की धमकी तक दे डाली थी.
इसमें चीन को क़दम पीछे खींचने पड़े थे. 2004 में दोनों देशों के बीच समझौते हुए और सेंट्रल एशिया के कई द्वीपों को रूस ने चीन को सौंप दिया था.

कितना पुराना है विवाद?
बोल्शोई उस्सुरीस्की द्वीप, चीन और रूस के बीच दुश्मनी की एक बड़ी वजह रहा है. चार दशकों की लंबी बातचीत के बाद दोनों देशों ने साल 2004 में इस मामले को लेकर समझौता किया था.
न्यूजवीक ने लिखा है कि समझौते के मुताबिक़ रूस ने ताराबारोव और बोल्शाई उस्सुरीस्की का कुछ हिस्सा चीन को सौंप दिया था, जिसके बाद चीन इस बात पर सहमत हुआ था कि वह भविष्य में रूस के और अधिक क्षेत्र पर अपना दावा नहीं करेगा.
साल 2005 में व्लादिमीर पुतिन ने इस समझौते की सराहना की थी, जिसके बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों मज़बूत होने का सिलसिला शुरू हुआ था.
बोल्शोई उस्सुरीस्की द्वीप, उस्सुरी और अमूर नदियों के संगम पर स्थित है, जिसके चलते रूस और चीन दोनों इस द्वीप पर दावा करते हैं.
साल 2008 में सीमा तय हुई, जिसमें दोनों देशों ने द्वीप को लगभग आधे-आधे हिस्से में बाँट दिया. रूस ने द्वीप के 350 वर्ग किलोमीटर में से 170 वर्ग किलोमीटर चीन को सौंप दिया.
जब साल 1860 में देशों के बीच अमूर नदी के साथ साथ सीमाएं खींची गई तो उस द्वीप पर स्वामित्व को लेकर सवाल उठने लगे, क्योंकि तब तक इसकी स्थिति स्पष्ट नहीं थी.
बोल्शोई उस्सुरीस्की द्वीप और पड़ोसी द्वीप ताराबोरव को 1929 में सोवियत सैनिकों ने अपने कब्जे में ले लिया था. साल 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद भी दोनों द्वीप रूस के नियंत्रण में रहे.
साल 2008 में रूस ने ताराबारोव, बोल्शाई उस्सुरीस्की द्वीप का हिस्सा और छोटे द्वीप विनोग्राडोवा, कोरेस्की, रोमाश्किलन को चीन को सौंप दिया था.
साल 2016 में रूस की समाचार एजेंसी ताश ने चीनी अख़बार के हवाले से चलाया कि दोनों देशों के बीच बोल्शाई उस्सुरीस्की की सीमा पर बॉर्डर क्रॉसिंग स्थापित करने के लिए बात हुई थी.
उस वक़्त रूस ने सीमा पर चौकियों का सुझाव दिया था, इसका फ़ायदा रूस के शहर खाबरोवस्क और चीन के शहर हेइलोंगजियांग प्रांत के फुयुआन के बीच यात्रा को अनुमति देना था.

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चीन-रूस की दोस्ती पर प्रभाव?
चीन और सोवियत संघ के बीच 1950 में मित्रता, गठबंधन और पारस्परिक सहयोग की जिस संधि पर माओ और स्टालिन ने हस्ताक्षर किए थे, उसके 73 साल गुज़रने के बाद शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन ने दुनिया के सामने दोनों देशों की "बेपनाह दोस्ती" दिखाई है.
लेकिन दोनों मुल्क तमाम वैचारिक मतभेद, मनमुटाव, सुलह और एक सशस्त्र टकराव का लंबा रास्ता तय करते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं.
इन दोनों पड़ोसियों का इतिहास लंबा और कई घटनाओं से भरा रहा है. दशकों तक सोवियत संघ और चीन साम्यवाद के दो बड़े ध्रुव थे, जो सिद्धांतों की अपनी-अपनी व्याख्या और अपने वैश्विक प्रभाव को लेकर कई बार आमने-सामने आए.
यूक्रेन पर हमले के बाद से रूस पर पश्चिम के देशों ने बड़े पैमाने पर प्रतिबंध लगाए हैं, बावजूद इसके चीन रूस का साथ देता आया है.
प्रतिबंधों के बाद से रूस, आर्थिक संबंधों के मामले में चीन पर पहले से ज्यादा निर्भर हो गया है. मार्च, 2023 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग रूस पहुंचे थे, जहां उन्होंने दोनों देशों के बीच संबंधों में नए युग की घोषणा की थी.
उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन को एक 'स्पष्ट वक्ता और खुले दिल वाला दोस्त' बताया था.
दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय व्यापार, ऊर्जा और राजनीतिक संबंधों को लेकर भी चर्चा हुई.
पुतिन ने चीन को "रूस का सबसे प्रमुख व्यापारिक साझेदार" बताते हुए पिछले साल से ज़्यादा व्यापार करने का संकल्प लिया.
रूस की सरकारी मीडिया के मुताबिक़ दोनों नेताओं ने साइबेरिया में एक पाइपलाइन बनाने पर सहमति दी. इस पाइपलाइन से रूसी गैस मंगोलिया से होते हुए चीन पहुंचाई जा सकेगी.
इतना ही नहीं दोनों नेताओं ने नए ऑकस पैक्ट को लेकर अपनी चिंताएं भी जाहिर कीं. ऑकस पैक्ट ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच हुआ रक्षा समझौता है.
साथ ही एशिया में नेटो की बढ़ती मौजूदगी पर सैन्य और सुरक्षा के जुड़े मुद्दों को लेकर भी चिंता ज़ाहिर की.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि मैप से उपजे विवाद ने क्या दोनों देशों के बीच नए कूटनीतिक संकट को पैदा कर दिया है? और इस मुश्किल समय में रूस अपने दोस्त चीन से किस तरह इस मुद्दे को सुलझाएगा?

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शी जिनपिंग का रूस प्रेम
शी जिनपिंग का रूस की ओर झुकाव उनके परिवार और परवरिश से भी जुड़ा है.
डब्ल्यूएसजे ने शी जिनपिंग की जीवनी से जुड़ी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''1953 में जब शी जिनपिंग का जन्म हुआ तो उसी साल माओत्से तुंग ने चीन की राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य व्यवस्था के लिए सोवियत यूनियन को मॉडल मान उसका अध्ययन करने के लिए एक कैंपेन शुरू किया था.
शी जिनपिंग के पिता शी चोंग्शुन क्रांतिकारी थे और माओ की लड़ाई से जुड़े थे. 1950 के दशक के आख़िर में शी चोंग्शुन सोवियत यूनियन में भारी उद्योग की पढ़ाई करने गए थे. माओ ने सोवियत यूनियन को पढ़ने और समझने का जो कैंपेन चलाया, उसका असर नौजवान शी जिनपिंग पर ख़ासा पड़ा था.
इतिहासकारों के अनुसार, जिनपिंग के दिमाग़ में सोवियत मूल्यों, इतिहास और संस्कृति की जगह बन चुकी थी.''
1991 में जब सोवियत यूनियन टूटकर रूस बना तब भी दोनों देशों के संबंध और सुधरे. दोनों ने अमेरिका को एक प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखना शुरू किया.
राष्ट्रपति बनने के बाद शी जिनपिंग ने 2013 में पहला विदेशी दौरा रूस का किया था. इस दौरे में शी जिनपिंग ने रूस के साथ चीन के ख़ास संबंधों का ज़िक्र किया था और कहा था कि उनका व्यक्तित्व पुतिन की तरह ही है. उसके बाद से दोनों नेता एक-दूसरे को जन्मदिन पर शुभकामनाएं देते रहे हैं.
सत्ता में आने के बाद शी जिनपिंग ने चीन के नेतृत्व की संरचना को भी अपने हिसाब से किया. कहा जाता है कि नेतृत्व के मामले में उन्होंने पुतिन मॉडल को अपनाया. इसके तहत शक्तिशाली पोलित ब्यूरो को कमज़ोर किया और ख़ुद को ज़्यादा शक्तिशाली बनाया.
2014 में जब रूस ने क्राइमिया को यूक्रेन से अलग कर अपने नियंत्रण में लिया तब से दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध और गहरे हुए हैं. चीन ने रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी प्रतिबंधों का विरोध तब भी किया था.
इस बार भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूप के ख़िलाफ़ अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने जितने बार प्रस्ताव पेश किए चीन ने उनका साथ नहीं दिया.
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