नवाज़ शरीफ़ ने क्यों कहा- वाजपेयी से किया वादा तोड़ा, ये हमारा कसूर

नवाज़ शरीफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी

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पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने 'भारत से वादा तोड़ने को अपनी ग़लती' की बात कही है.

मुस्लिम लीग (नवाज़) पार्टी की जनरल काउंसिल की एक बैठक में नवाज़ शरीफ़ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ 'पाकिस्तान की वादाख़िलाफ़ी' का ज़िक्र करते हुए ये बात कही.

शरीफ़ की पार्टी की ये बैठक 28 मई को हो रही थी.

इसी तारीख़ को पाकिस्तान ने साल 1998 में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था.

इससे पहले 11 और 13 मई 1998 को भारत ने एडवांस परमाणु हथियारों के पांच परीक्षण किए थे.

इस परीक्षण के बाद कुछ महीने बाद फ़रवरी 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर का दौरा किया था.

नवाज़ शरीफ़ ने अब कहा है, ''परमाणु धमाके करना बहुत बड़ा फ़ैसला था. आप जानते हैं कि भारतीय संसद में ये ख़बर दी गई कि पाकिस्तान ने पांच धमाकों से आज जवाब दे दिया. उसके बाद वाजपेयी साहेब लाहौर आए. याद है या नहीं याद है?''

शरीफ़ बोले, ''वाजपेयी साहेब आए और हमसे आकर वादा किया. ये बात अलग है कि हमने वादे के ख़िलाफ़ अर्ज़ी की. उसमें हमारा कसूर है. उसमें हम कसूरवार हैं.''

अटल बिहारी वाजपेयी के लाहौर दौरे के बाद कारगिल में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ था. तब नवाज़ शरीफ़ पाकिस्तान के पीएम थे और जनरल परेवज़ मुशर्रफ़ सेना प्रमुख थे. बाद में मुशर्रफ़ ने तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथों में ले ली थी.

28 मई को हुए कार्यक्रम कते दौरान नवाज़ शरीफ़

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शरीफ़ और क्या कुछ बोले?

पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) की बैठक में शरीफ़ ने अपनी सरकारों की उपलब्धियों को गिनवाया.

इस कार्यक्रम में पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण के बाद नवाज़ शरीफ़ के देश के नाम संबोधन को भी दिखाया गया.

इस संबोधन में शरीफ़ ने 1998 में कहा था, ''भारत ने कितने अग्नि और पृथ्वी मिसाइल चलाए. मगर आप जानते हैं कि जब हमने एक छोड़ा तो क्या हुआ. बीते दिनों भारत ने जो एटमी परीक्षण किए. आज हमने उसका भी हिसाब चुका दिया है और पांच एटमी परीक्षण किए हैं. अल्लाह का शुक्रिया कि हम ये तजुर्बा हासिल कर सके. हमने जो किया वो पाकिस्तान की आवाम का फ़ैसला है.''

अब 28 मई को हुए कार्यक्रम में शरीफ़ उस दौर के बारे में कुछ दावे करते हैं.

जुलाई 1999 में शरीफ़ के साथ बिल क्लिंटन

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अमेरिका को लेकर शरीफ़ ने क्या दावा किया?

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शरीफ़ दावा करते हैं, ''आज 28 मई है. इस दिन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कहा कि हम आपको पांच अरब डॉलर दे रहे हैं. आप मेहरबानी करके एटम धमाका ना करें. हमारा ज़मीर ख़रीदने की कोशिश की.''

नवाज़ शरीफ़ बोले, ''मैंने उनसे कहा कि हमारे ज़मीर का सौदा ना करें, हम बिकने वाली क़ौम नहीं हैं. उस ज़माने के पांच अरब डॉलर हमने वापस कर दिए. क्लिंटन बोले- आप पर प्रतिबंध लग जाएंगे. ये सब रिकॉर्ड में दर्ज होगा.''

शरीफ़ कहते हैं, ''मैंने कहा- लगा दें पाबंदियां, क्या होगा. फिर हमने एटम धमाके कर डाले.''

इस कार्यक्रम में शरीफ़ अपनी सरकार की उपलब्धियों को भी गिनवाते हैं.

शरीफ़ ने पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा, ''हमें आज ये मान लेना चाहिए कि हमने अपने पैरों में ख़ुद कुल्हाड़ी मारी है. 1990 में जब मैं प्रधानमंत्री बना तो लोगों ने अगर टांगें ना खींची होती तो आज पाकिस्तान ख़ुशहाल मुल्क होता.''

शरीफ़ जिस बैठक में ये सब बातें कर रहे थे, उसी में उन्हें पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) का अध्यक्ष चुना गया.

छह साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने शरीफ़ को अयोग्य क़रार दिया था. शरीफ़ अपने भाषण में तत्कालीन चीफ़ जस्टिस को भी कोसते नज़र आए.

परवेज मुशर्रफ़ के साथ नवाज़ शरीफ़

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शरीफ़ के बयान पर पाकिस्तान में कैसी प्रतिक्रिया?

बीबीसी संवाददाता शुमाइली जाफ़री ने विश्लेषक अस्कारी रिज़वी से शरीफ़ के बयान पर बात की.

रिज़वी कहते हैं, ''शरीफ़ अपने बयान से परवेज़ मुशर्रफ़ पर निशाना साध रहे थे. शरीफ़ ने सेना की कोई आलोचना नहीं की. शरीफ़ ने भारतीय मीडिया को चलाने के लिए कंटेंट दे दिया है और अपने लिए शर्मिंदगी की स्थिति पैदा कर दी है. सच ये है कि किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता. इस बारे में पर्याप्त जानकारी पहले से ही सार्वजनिक है.''

रिज़वी ने कहा कि शरीफ़ के साथ दिक़्क़त ये है कि वो अतीत में खोए हैं और उसके चुनिंदा हिस्से अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं. शरीफ़ मौजूदा मसलों पर बात नहीं कर रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार मंसूर अली ख़ान ने अपने ब्लॉग में कहा, ''इस बयान ने शरीफ़ ने औपचारिक तौर पर ये स्वीकार कर लिया है कि पाकिस्तान ने 1999 समझौते का उल्लंघन किया. मुझे नहीं मालूम कि ये ग़लती है या इरादतन कदम. आज मियां साहब ने युद्ध की पूरी ज़िम्मेदारी ले ली. आप इसे कड़वी सच्चाई कह सकते हैं लेकिन अब जब विदेश मंत्री इशाक डार विदेश जाएंगे तो उनको सवालों का सामना करना होगा.''

लाहौर में नवाज़ शरीफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी

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लाहौर समझौता क्या था?

नवाज़ शरीफ़ वाजपेयी के साथ जिस समझौते के तहत हुए वादे को तोड़ने की बात कर रहे थे, उसे लाहौर समझौते के नाम से जाना जाता है.

ये समझौता 21 फरवरी 1999 में हुआ था.

समझौते के तहत दोनों देशों के बीच शांति और स्थिरता की बात की गई थी.

इस समझौते में परमाणु हथियारों के अचानक या ग़ैर-इरादतन इस्तेमाल को रोकने का वादा किया गया.

समझौते को दोनों देशों की संसद ने मंज़ूरी भी दी थी.

दोनों देशों ने कई स्तरों पर बातचीत के ज़रिए विवादों को हल करने की योजना भी बनाने की बात कही थी.

इस दौरे में शरीफ़ ने वाजपेयी की लिखी एक नज़्म भी पढ़ी थी.

ये नज़्म थी- ''जंग न होने देंगे, हम जंग न होने देंगे…"

वाजपेयी इस दौरे के लिए बस से पाकिस्तान आए थे. तब पाकिस्तान में इस फ़ैसले को सराहा गया था. कई राजनीतिक दलों ने तब इसे दोनों देशों के बीच विवाद सुलझाने की पहल के तौर पर देखा था.

हालांकि इस समझौते के कुछ महीनों बाद जम्मू कश्मीर के कारगिल में पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ की ख़बरें सामने आईं.

पाकिस्तान के घुसपैठ की जानकारी ताशी नामग्याल नाम के एक चरवाहे ने दी थी.

इसके बाद दोनों देश के बीच कारगिल में गोलाबारी शुरू हो गई थी.

भारत में इसे 'ऑपरेशन विजय' और पाकिस्तान में 'ऑपरेशन कोह-ए-पैमा' यानी 'ऑपरेशन पर्वतारोहण' का नाम दिया गया.

इस जंग में 500 से ज़्यादा भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी. पाकिस्तान की ओर से सैनिकों के मारे जाने के बारे में आधिकारिक तौर पर कोई संख्या नहीं बताई जाती है.

ऐसी भी रिपोर्ट्स हैं, जिसमें पाकिस्तान सेना के अपने सैनिकों का शव कारगिल से ना ले जाने की बातें कही गईं.

वाजपेयी मीनार-ए-पाकिस्तान स्मारक भी गए थे.

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इमेज कैप्शन, वाजपेयी मीनार-ए-पाकिस्तान स्मारक भी गए थे. तस्वीर फरवरी 1999 की है.

वाजपेयी के दौरे का पाकिस्तान में विरोध

कारगिल में हुए युद्ध के पीछे परवेज़ मुशर्रफ़ की अहम भूमिका बताई जाती है.

गैलेंट्री अवॉर्ड्स की वेबसाइट के एक दस्तावेज़ के मुताबिक़, शरीफ़ को पता नहीं था कि उनकी नाक के नीचे सेना के जनरल क्या कर रहे हैं.

जब वाजपेयी ने तीन दिन का लाहौर का दौरा किया था, तब शाही क़िले में हुए स्वागत समारोह में सेना प्रमुख मुशर्रफ़ नहीं थे.

बीबीसी के आसिफ़ फ़ारूक़ी के मुताबिक़, तब पाकिस्तान में अफ़वाहें थीं कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ भारतीय प्रधानमंत्री को सैल्यूट करने के हक़ में नहीं थे.

शाही क़िले में एक तरफ़ जंग ना होने की बातें हो रही थीं, दूसरी तरफ़ राजनीतिक दल जमात-ए-इस्लामी के सदस्य सड़कों पर पथराव कर रहे थे.

हालांकि विरोध का सामना अटल बिहारी वाजपेयी को भी करना पड़ा था.

वाजपेयी मीनार-ए-पाकिस्तान स्मारक भी गए थे.

यहां जाने से पहले वाजपेयी ने कहा था, "मुझे कहा गया कि अगर मैं मीनार-ए-पाकिस्तान पर जाऊंगा तो पाकिस्तान के बनने पर मुहिम लग जाएगी. अरे भाई, पाकिस्तान बन चुका, ये हक़ीक़त है और इसे अब किसी मुहर की ज़रूरत नही."

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