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पाकिस्तान की अमेरिका नीति वाक़ई सफल हो रही है?
पिछले साल जनवरी में व्हाइट हाउस में दूसरी बार डोनाल्ड ट्रंप के आने से दो महीने पहले भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि भारत ट्रंप की वापसी से 'नर्वस' नहीं है.
उन्होंने कहा था, "मैं जानता हूं कि बहुत सारे देश अमेरिका को लेकर आज नर्वस हैं, लेकिन ईमानदारी से कहूं, हम उन देशों में नहीं हैं."
लेकिन ट्रंप ने जनवरी 2025 से व्हाइट हाउस दोबारा संभाला, उसके बाद से भारत और अमेरिका के संबंधों में गर्मजोशी नहीं है.
दूसरी ओर ट्रंप के पहले कार्यकाल के समय से पाकिस्तान के साथ अमेरिका के ठंडे पड़े रिश्तों में लगातार गर्माहट देखी गई.
अभी बीते 22 जनवरी को दावोस में पाकिस्तान के पीएम शहबाज़ शरीफ़ ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ़ पीस' के आधिकारिक समारोह में शामिल हुए, जहां फ़ील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर भी मौजूद थे.
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ग़ज़ा के पुनर्निर्माण के लिए बनाए जा रहे इस बोर्ड ऑफ़ पीस में शामिल होने के मौक़े पर शहबाज़ शरीफ़ ने ट्रंप के साथ हस्ताक्षर किए और इस दौरान दोनों के बीच गर्मजोशी की तस्वीरें काफ़ी वायरल हुईं.
हालांकि इस बोर्ड ऑफ़ पीस पर भारत ने कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा है. इसमें शामिल होने के लिए ट्रंप ने भारत को भी न्योता भेजा है.
बीते एक साल में भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते तनावपूर्ण होते गए हैं, पहले टैरिफ़ को लेकर दूरी बढ़ी और फिर बीते मई में भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद से स्थितियां और तल्ख़ होती गईं.
कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत से तनातनी के मौक़े का पाकिस्तान ने फ़ायदा उठाया और ट्रंप के पहले कार्यकाल में जिस पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्ते ठंडे बस्ते में चले गए थे उसमें क़रीबी आती चली गई.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
21 जनवरी को थिंक टैंक तक्षशिला इंस्टिट्यूशन के निदेशक नितिन पाई ने एक्स पर लिखा था, ''मैं यह देखकर हैरान हूं कि किस तरह की बहुत सारी टिप्पणियां यह कह रही हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के साथ रिश्तों को संभालने में नई दिल्ली की ग़लती है. ऐसा तर्क पूरी तरह ग़लत है और केवल बाद की समझ पर आधारित है."
"इनमें से कोई भी बात वैसी नहीं है, जैसी बताई जा रही है. विजेता के साथ खड़ा होना समझदारी होती है. भारत की व्यापार वार्ताएं हमेशा कठिन रही हैं क्योंकि इसमें जुड़े हित बहुत बड़े हैं. भारत-पाकिस्तान के मामले में अमेरिकी दख़ल को स्वीकार न करना एक बुनियादी सिद्धांत है.''
नितिन पाई की इस टिप्पणी के जवाब में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बनी में राजनीति विज्ञान के असोसिएट प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र क्लैरी ने कहा, ''अगर पूरी दुनिया ही ग़लतियां निकाल रही है, तो समस्या कहां है, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है. मेरी नज़र में नई दिल्ली ने तीन ग़लतियां कीं-
- 2024 के दौरान बाइडन की विदाई को लेकर वे खुलकर उत्साहित दिखे, जिसे अमेरिका से आने वाले लोगों ने साफ़ तौर पर महसूस किया.
- उन्होंने व्यापार वार्ताओं को ज़रूरत से ज्यादा खींचा जबकि दूसरों ने ऐसा नहीं किया.
- ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप को कोई प्रतीकात्मक पुष्टि देने में संघर्ष करते रहे.
प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र ने लिखा, "मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि समस्या ट्रंप हैं. इसलिए भारत की ग़लतियों को एक ऐसे व्यक्ति को संभालने में हुई चूकों के रूप में समझा जाना चाहिए, जो ख़ुद समस्याग्रस्त है. मैं भी चाहता हूं कि वे समस्याग्रस्त न हों लेकिन हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, वह यही है."
प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र ने ट्रंप के पीस ऑफ बोर्ड में पाकिस्तान के शामिल होने और दावोस में ट्रंप के साथ शहबाज़ शरीफ़ मौजूदगी का एक वीडियो पोस्ट किया.
इसके साथ उन्होंने लिखा है, ''पाकिस्तान को ऐतिहासिक रूप से अमेरिका के साथ कूटनीतिक सफलता मिलने का एक कारण यह रहा है कि उसने अक्सर यह आकलन किया है कि अमेरिका के नेतृत्व वाली पहलों के साथ खड़ा होना वॉशिंगटन में भरोसा हासिल करने के लिए फ़ायदेमंद है, भले ही इससे आगे चलकर अन्य समस्याएं पैदा हों. इस्लामाबाद अक्सर यह गणना करता है कि भविष्य की परेशानियों को भविष्य में संभाला जा सकता है, बशर्ते आज की परेशानियों को कम किया जा सके.''
पिछले साल सितंबर महीने में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोईद यूसुफ़ ने फ़ॉरेन अफ़ेयर्स में एक लंबा लेख लिखा था. इस लेख का शीर्षक था- क्यों अमेरिका को पाकिस्तान पर दांव लगाना चाहिए?
मोईद यूसुफ़ ने लिखा था, ''अमेरिका ने भारत पर दांव लगाया था लेकिन सफल नहीं हुआ. दो दशकों के बाद भी भारत क्षेत्र और उससे बाहर अमेरिकी प्राथमिकताओं के साथ ख़ुद को पूरी तरह जोड़ने के लिए न तो इच्छुक है और न ही सक्षम.''
''इस साल दोनों देशों के रिश्तों में दरार पड़नी शुरू हो गई. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बहुध्रुवीयता की नई दिल्ली की आदर्शवादी तलाश यानी ऐसी दुनिया जो किसी एक महाशक्ति के वर्चस्व या दो महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा पर आधारित न हो, वॉशिंगटन को खटकती रही है. अब इसी वजह से भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नाराज़गी झेलनी पड़ी है. रूसी तेल की भारत की जारी ख़रीद का हवाला देते हुए ट्रंप ने अगस्त में भारत से आयात पर टैरिफ बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया, जो किसी भी देश पर लगाया गया उनका सबसे ऊचा शुल्क है.''
''हालात और बिगड़ते हुए, नई दिल्ली ने बीजिंग के साथ रिश्ते मज़बूत करने का संकेत दिया और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन का दौरा किया, जहां उन्होंने चीनी नेता शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बेहद सार्वजनिक और सौहार्दपूर्ण मुलाक़ातें कीं. इसी समय, अमेरिका और भारत के पड़ोसी के साथ प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के बीच रिश्तों में हैरान करने वाली नरमी देखी गई है. जनवरी में व्हाइट हाउस लौटने के बाद से ट्रंप पाकिस्तान की सेना के प्रति नरम रुख दिखाते रहे हैं.''
''मार्च में उन्होंने 2021 में काबुल में हुए उस बम धमाके में कथित रूप से शामिल इस्लामिक स्टेट के एक आतंकी की गिरफ्तारी के लिए पाकिस्तान की तारीफ़ की, जिसमें 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे. इसके बाद मई में उन्होंने दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिनों तक चले उस सैन्य टकराव को ख़त्म कराया, जो ख़तरनाक रूप से बढ़ सकता था.''
भारत अमेरिकी रिश्ते में कहां से शुरू हुई तल्ख़ी
अंतरराष्ट्रीय मामलों की मैग्ज़ीन 'द डिप्लोमेट' के अनुसार, भारत और अमेरिकी संबंधों में साल 2025 में ऐसा कुछ हुआ, जिसकी कल्पना मुश्किल थी.
वॉशिंगटन का "स्वाभाविक" साझेदार माने जाने वाले भारत पर 50 प्रतिशत का कड़ा टैरिफ़ लगाया गया.
वहीं पाकिस्तान व्हाइट हाउस में अमेरिका के नए पसंदीदा सहयोगी के तौर पर अपनी जगह बनाने लगा.
इसकी शुरुआत तब हुई, जब नई दिल्ली ने मई 2025 में पाकिस्तान के साथ हुए टकराव को ख़त्म कराने में मध्यस्थता करने के डोनाल्ड ट्रंप के दावे को सार्वजनिक रूप से ख़ारिज कर दिया.
इसके बाद भारत-अमेरिका संबंध पर ऐसी बर्फ़ जमी जिसके पिघलने की निकट भविष्य में कोई संभावना नहीं दिखती.
न तो क्वॉड शिखर सम्मेलन हुआ और न ही कोई ऐसा व्यापार समझौता सामने आया, जिससे भारत को बेहद ऊंचे टैरिफ़ से राहत मिल सके.
संबंधों में तल्खी तब और बढ़ी जब बीते नवंबर में अमेरिकी हाउस पैनल की रिपोर्ट में कहा गया कि "भारत के साथ चार दिनों तक चले संघर्ष में पाकिस्तान की सैन्य सफलता ने चीनी हथियारों का प्रदर्शन किया."
ख़ुद राष्ट्रपति ट्रंप भारत का बिना नाम लिए कई बार कह चुके हैं कि उस लड़ाई में पांच विमान गिराए गए. बाद के बयानों में उन्होंने ये संख्या भी बढ़ाई.
जबकि भारत की ओर से विमान गिराए जाने को लेकर कोई जानकारी नहीं दी गई बल्कि पाकिस्तान के विमानों को नुकसान पहुंचाने की बात कही गई.
ट्रंप ने ये भी दावा किया कि भारत पाकिस्तान के बीच संघर्ष को उन्होंने रुकवाया, जिससे भारत लगातार इनकार करता रहा है.
पाकिस्तान की क़रीबी
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से पहले तक भारत को चीन पर दबाव बनाने के लिए अमेरिकी रणनीति के लिए अहम माना जाता था. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान को चीन परस्त के रूप में देखा जाता था.
लेकिन अब अमेरिका-पाकिस्तान संबंध मज़बूत होते दिख रहे हैं. ऐसा भी नहीं है कि चीन से पाकिस्तान के संबंध ख़राब हो रहे हैं. ट्रंप ने भारत पर ऊंचे टैरिफ (25 प्रतिशत रेसिप्रोकल और 25 प्रतिशत रूसी तेल ख़रीदने के लिए दंडात्मक) लगाए हैं.
इससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ संबंध सुधारने की दो दशक से अधिक पुरानी अमेरिकी नीति पलटती दिख रही है.
ट्रंप अब पाकिस्तान और उसके आर्मी प्रमुख की तारीफ़ करते दिखते हैं. दूसरी तरफ़ भारत ने ट्रंप के उन दावों को ख़ारिज किया है कि मई में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ युद्धविराम कराया था.
पश्चिम एशिया में भी पाकिस्तान की प्रासंगिकता बढ़ती दिख रही है. पाकिस्तान ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस में भी शामिल है. इसमें शामिल होने का निमंत्रण भारत को भी मिला है लेकिन अभी तक मोदी सरकार ने कोई फ़ैसला नहीं किया है.
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से पिछले साल नवंबर में द एशिया ग्रुप में पार्टनर और ओबामा प्रशासन के दौरान दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों की पूर्व अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री निशा बिस्वाल ने कहा था, ''एक मज़बूत अमेरिका-पाकिस्तान संबंध अमेरिका को भारत पर भी कुछ दबाव बनाने की क्षमता दे सकता है. दोनों देशों को अपनी-अपनी योग्यता के आधार पर खड़ा होना होगा."
उन्होंने कहा था, "जिस हद तक अमेरिका पाकिस्तान पर प्रभाव और दबाव डाल सकता है और संकट के समय ऐसा करने के लिए उसके साथ संबंध मौजूद हैं, यह एक महत्वपूर्ण पहलू है. आप ऐसा पाकिस्तान नहीं चाहते जो अमेरिकी प्रभाव से पूरी तरह अछूता हो."
पाकिस्तान और अमेरिका शीत युद्ध के दौर से ही साझेदार रहे हैं. 1980 के दशक में, पाकिस्तान ने सोवियत संघ से लड़ रहे अफगान विद्रोहियों को समर्थन पहुंचाने में अमेरिका के साथ सहयोग किया. बाद में पाकिस्तान ने अमेरिका के कथित आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध में लॉजिस्टिक समर्थन प्रदान किया.
अमेरिका और पाकिस्तान की बढ़ती क़रीबी को भारत के ख़िलाफ़ भी देखा जा रहा है लेकिन अमेरिका में पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने पीटीआई को दिए इंटरव्यू में इसका विश्लेषण अलग तरह से किया है.
जॉन बोल्टन ने पीटीआई से कहा, "मेरा मानना है कि भारत–अमेरिका संबंध संभवतः 21वीं सदी में हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संबंध हैं. लेकिन पाकिस्तान से निपटना भी अप्रासंगिक नहीं है.''
''ख़ासकर इसलिए कि चीन पाकिस्तान में, विशेष रूप से पाकिस्तानी सेना के साथ अपनी पकड़ मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है. यह मुझे बेहद चिंताजनक लगता है और ज़ाहिर है कि यह भारत के लिए भी चिंता का विषय है.''
बोल्टन ने कहा, ''इसलिए हमारे हित जुड़े हुए हैं. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान और अन्य समूहों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के साथ हमारे कुछ साझा हित भी हैं. मेरा मानना है कि अगर हम पाकिस्तान के साथ काम कर सकें और उन्हें यह याद दिला सकें कि चीन उनके लिए भी उतना ही ख़तरा है, जितना भारत के लिए तो आगे बढ़ने का यही एक आधार हो सकता है. मुझे नहीं पता कि यह ट्रंप की सोच है या नहीं लेकिन अगर मैं उन्हें सलाह दे रहा होता तो यही कहता."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.