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इस आईपीएस अधिकारी ने 51 साल की उम्र में रचा इतिहास
- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
1997 बैच के आईपीएस अधिकारी अमित सिन्हा ने 51 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर की वेट लिफ़्टिंग चैंपियनशिप में क्वॉलिफाई करके इतिहास रच दिया है.
ये 'वर्ल्ड क्लासिक एंड इक्विप्ड मास्टर्स पावरलिफ़्टिंग चैंपियनशिप' है जो 8 से 15 अक्तूबर के बीच मंगोलिया के उलान बतोर शहर में आयोजित होगी.
सिन्हा ने इससे पहले 12 से 16 जुलाई के बीच विशाखापट्टनम में आयोजित हुई 'ऑल इंडिया मास्टर्स क्लासिक पावर लिफ्टिंग चैंपियनशिप' में 105 किलोग्राम भारवर्ग में 435 किलोग्राम वज़न उठाकर गोल्ड मेडल हासिल किया है.
बीबीसी ने अमित सिन्हा के साथ ख़ास बातचीत में उनके सफ़र और चुनौतियों को समझने की कोशिश की है.
अमित सिन्हा का जन्म बिहार में हुआ. उन्होंने पटना के सेंट जेवियर्स स्कूल में शुरुआती शिक्षा के बाद आईआईटी रुड़की में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
आईआईटी में पढ़ाई से वेटलिफ़्टिंग तक
आईआईटी रुड़की आने से पहले तक उनकी पावर-लिफ़्टिंग में कोई रुचि नहीं थी, लेकिन एक दोस्त के बड़े भाई को देखकर उन्होंने वेट लिफ़्टिंग में हाथ आज़माना शुरू किया.
इसके बाद 1990 से 1994 तक आईआईटी की पढ़ाई के दौरान उन्होंने न सिर्फ़ कई मेडल जीते, बल्कि यूनिवर्सिटी रिकॉर्ड्स भी तोड़े.
इनमें बिट्स पिलानी में इंटर-यूनिवर्सिटी में जीते गए दो गोल्ड और दो सिल्वर मेडल शामिल हैं.
ऐसे में हमने पूछा कि जब वे रिकॉर्ड तोड़ रहे थे तो क्या उन्हें यह ख़्याल नहीं आया कि खेल में ही करियर बनाया जाए?
सिन्हा कहते हैं, "हमने जिस पीढ़ी में आईआईटी से पढ़ाई की थी तब यह माना जाता था कि जल्दी से जल्दी पढ़ाई पूरी करके नौकरी पा लो, बाक़ी सब चीज़ें शौकिया हैं."
पचास साल की उम्र में शुरू की तैयारी
पुलिस में आने के बारे में कहते हैं कि जब वह पढ़ाई के दौरान पावर लिफ़्टिंग कर रहे थे तो लोग कहते थे कि उन पर वर्दी बहुत फबेगी और उन्हें पुलिस अफ़सर बनना चाहिए.
ये बात उनके दिमाग़ में बैठ गई. जब उन्होंने सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी शुरू की तो उनकी पहली पसंद आईपीएस भी ही थी.
वेट लिफ़्टिंग के साथ ही पेंटिंग और गाने-बजाने का शौक रखने वाले अमित सिन्हा इस समय उत्तराखंड पुलिस में एडीजी एडमिन के पद पर तैनात हैं.
विशाखापट्टनम में आयोजित हुई प्रतियोगिता की मास्टर्स श्रेणी में खेलने के लिए न्यूनतम उम्र सीमा 40 साल है. इस इवेंट में 40-50, 50-60 और 60 से 70 उम्र वर्ग वाले लोग हिस्सा ले सकते थे.
ऐसे में जब सिन्हा ने इस इवेंट में हिस्सा लेने के बारे में सोचा तो उन्हें लगा कि वह काफ़ी ज़्यादा उम्र में इस तरह का प्रयास करने जा रहे हैं.
वे कहते हैं, "मैं जब वहां पहुंचा तो मैंने देखा कि मुझसे उम्र में कहीं बड़े लोग खेल रहे हैं और शान से बता रहे हैं कि वह इतने सालों से जिम जाते हैं. यह देखकर एक उत्साह भी महसूस हुआ और थोड़ी शर्म भी आई कि मैं क्या सोच रहा था."
अपनी जीत का श्रेय इस माहौल को देते हुए वह कहते हैं, "मैं गया तो था सिर्फ़ पार्टिसिपेट करने लेकिन मेरे गोल्ड जीतने में इस सबका भी बहुत योगदान रहा. जब मैंने लोगों को बोलते हुए सुना कि एज इज़ जस्ट अ नंबर (उम्र एक संख्या भर तो है) तो मैंने कहा कि यह तो बहुत बढ़िया बात है और उससे प्रभावित होकर मैंने और अच्छा परफॉर्म किया."
लेकिन 51 वर्षीय अमित सिन्हा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता कितनी चुनौतीपूर्ण होगी.
इसके जवाब में अमित सिन्हा कहते हैं, "उन्होंने इस दिशा में तैयारियाँ शुरू कर दी हैं. यह ओपन टूर्नामेंट है जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के अच्छे खिलाड़ी शामिल होंगे. ऐसे में खुद को इम्प्रूव करना बहुत ज़रूरी है."
लेकिन नौकरी के बीच वह इंटरनेशनल इवेंट के लिए समय कैसे निकाल पा रहे हैं.
इसका जवाब देते हुए अमित सिन्हा कहते हैं, "उन्होंने जान-बूझकर जिम भी ऑफ़िस के पास वाला ही चुना ताकि अगर कोई इमरजेंसी हो तो वह तुरंत ऑफ़िस पहुंच सकें. वह ऑफ़िस में एक जोड़ी ड्रेस भी रखते हैं ताकि ज़रूरत पड़े तो मीटिंग में शामिल भी हो सकें."
सिन्हा कहते हैं कि टाइम मैनेजमेंट करके यह किया जा सकता है और फिर "मेरे वरिष्ठ अधिकारी और सहकर्मी बहुत सहयोग करते हैं."
"इसके अलावा ई-ऑफ़िस आने का भी फ़ायदा हुआ है. इससे न सिर्फ़ जल्दी काम निपट जाता है बल्कि अगर कोई फ़ाइल रह गई तो उसे घर में जाकर भी किया जा सकता है."
उत्तराखंड पुलिस विभाग में लाए सुधार
अमित सिन्हा साल 2017 से 2021 तक आईटीडीए (सूचना प्रौद्योगिकी विकास एजेंसी) के निदेशक भी रहे हैं.
पुलिस अधिकारी बताते हैं कि अमित सिन्हा के कार्यकाल में ही उत्तराखंड पुलिस में स्वान (स्टेट वाइड एरिया नेटवर्क) को शामिल किया गया था. इसे सॉफ़्टवेयर डिफ़ाइंड स्वान (SDWAN) में बदला गया, जो उस समय बिल्कुल नई चीज़ थी.
इससे ज़्यादातर बैठकें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होने लगीं और पुलिस अधिकारियों के आने-जाने, खाने-ठहरने पर ख़र्च होने वाला पैसा ही नहीं बचा, समय भी बचा.
अमित सिन्हा ने बीबीसी को बताया, "2013 की केदारनाथ आपदा के समय उन्हें पहली बार ड्रोन का महत्व समझ आया था. 16 -17 जून की रात को आपदा आई और 18 को बतौर डीआईजी गढ़वाल रेंज वह वहाँ पहुंच गए थे."
राहत और बचाव कार्यों का नेतृत्व कर रहे सिन्हा को उसी समय लगा कि ऐसी आपदा में ड्रोन बहुत काम की चीज़ हो सकती है क्योंकि तब 35-40 हेलिकॉप्टर राहत कार्यों में जुटे हुए थे.
उनके आईटीडीए का निदेशक बनने के बाद 2018 में उत्तराखंड में ड्रोन का इस्तेमाल शुरू किया गया.
अब पुलिस के पास भी ड्रोन ऑपरेटर्स और ट्रेनर्स हैं.
वे कहते हैं, "उत्तराखंड जैसी विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए ड्रोन के ऐसे प्रयोग बहुत कारगर हो सकते हैं."
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि उनका पूरा करियर हमेशा बिना हिचकोले खाए आगे बढ़ता रहा. बीती 21 जुलाई को ही उत्तराखंड सरकार ने चार वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के तबादले किए या उनकी ज़िम्मेदारियों में परिवर्तन किया. इनमें एडीजी अमित सिन्हा भी थे.
उनसे सतर्कता और पुलिस दूरसंचार कि ज़िम्दारियां ले ली गईं थीं और सिर्फ़ एडीजी एडमिनिस्ट्रेशन की ज़िम्मेदारी ही उनके पास रह गई थी. इसे पनिशमेंट ट्रांस्फ़र के रूप में भी देखा गया था.
इसके अलावा 2009 के एमबीए छात्र रणबीर सिंह फर्जी एनकाउंटर के बाद भी उन्हें उनके पद से हटाया गया था.
सिन्हा उस समय देहरादून के एसएसपी की ज़िम्मेदारी संभाल रहे थे. बाद में यह केस सीबीआई को सौंप दिया गया था.
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