बिहार में क्या वाक़ई चल रहा था फ़र्ज़ी पुलिस थाना?

    • Author, विष्णु नारायण
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार में फ़र्जी पुलिसकर्मियों के ज़रिए उगाही का एक मामला सामने आया है.

राज्य की ओर से चलाई जा रही योजनाओं को लेकर पहले भी धांधली की ख़बरें आती रही हैं. चाहे सालों पहले मर चुके लोगों के नाम पर आवास के आवंटन और पैसे की निकासी का मामला हो या फिर डायरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफ़र जैसी केंद्र की स्कीम में धांधली जैसे मामले.

अब बिहार के बांका ज़िले से ख़बर आई है कि फ़र्ज़ी पुलिसकर्मियों की मदद से लोगों से केंद्र और राज्य की योजनाओं के आवंटन के नाम पर उगाही की जा रही थी और इसके लिए शहर के बीचोंबीच पिछले आठ महीने से एक दफ़्तर भी चलाया जा रहा था.

आख़िर ये मामला क्या है और कितने दिनों से चल रहा था ये सब?

क्या है पूरा मामला?

मीडिया ख़बरों के मुताबिक सूबे के बांका ज़िले में लोगों से पुलिस में नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी की जा रही थी. एक गिरोह ज़िले के बांका थाना क्षेत्र में स्कॉर्ट पुलिस पटना के नाम से फ़र्जी थाना चला रहा था.

पूरे मामले को समझने के लिए हमने बांका थाना क्षेत्र के थानाध्यक्ष शंभू यादव से बात की.

शंभू यादव इस मामले पर कहते हैं, "बुधवार (17 अगस्त) की सुबह इलाके में गश्ती के दौरान एक संदिग्ध महिला दिखी. वह पुलिस की ड्रेस पहने हुए थी, लेकिन ड्रेस में कुछ गड़बड़ थी. शक के आधार पर मैंने उस महिला से पूछताछ करने की कोशिश की तो वो भागने लगी. उसे दौड़कर पकड़ा. पूछताछ पर पता चला कि महिला एक पुरुष चौकीदार के साथ इलाके के अनुराग गेस्ट हाउस के कमरों से चलाए जा रहे ऑफ़िस के बाहर चौकीदारी करती है."

वो आगे बताते हैं, "पड़ताल में हमने पाया कि अनुराग गेस्ट हाउस के दो कमरों से फ़र्ज़ी ऑफ़िस का संचालन किया जा रहा है. यह ऑफ़िस यहां आठ महीने से चल रहा था. दफ़्तर में बैठने वाले लोग स्थानीय लोगों से प्रधानमंत्री आवास योजना, इंदिरा आवास योजना, जल-नल योजना और पीडीएस जैसी योजनाओं का फ़ायदा दिलाने के नाम पर ठगी किया करते थे.

ऑफिस में आने-जाने वाले स्थानीय लोगों को शक न हो इसलिए दो चौकीदारों (एक पुरुष और एक महिला) को बाहर फ़र्जी तरीक़े से तैनात कर रखा था. ऑफिस से कई तरह के रजिस्टर भी बरामद हुए हैं- जैसे- बिहार स्टेट फ़ूड एंड सप्लाई कॉर्पोरेशन लिमिटेड समेत और भी कई रजिस्टर."

थानाध्यक्ष कहते हैं, "पुलिस ने उक्त मामले में अब तक पांच लोगों को गिरफ़्तार किया है. अब तक की पड़ताल के हिसाब से ज़िले के फुल्लीडुमर गांव और थाना क्षेत्र में रहने वाले भोला यादव इस मामले का मास्टरमाइंड है. मास्टरमाइंड अब तक पुलिस की पकड़ में नहीं आ सका है. वह इस ऑफ़िसनुमा जगह पर कार्यरत लोगों को 500 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी देता था. पुलिस ने मौके से कई रजिस्टर और मुहरें भी बरामद की हैं."

बहाली के नाम पर ठगी और उगाही

वहीं जब हमने उनसे यह बात पूछी कि क्या पुलिस में बहाली के नाम पर भी स्थानीय लोगों से ठगी हो रही थी तो उन्होंने कहा, "हां. जिन दो चौकीदारों को हमने मौके से गिरफ़्तार किया है. उनका ये कहना है कि उनसे भी यहां तैनाती के नाम पर 90 हज़ार और 55 हज़ार रुपये लिए गए. उन्हें कहा गया कि पुलिस की ओर से उनके लिए ड्रेस आई है.

उन्हें हथियार के नाम पर देसी कट्टा दिया गया था. हालांकि एक बात तो स्पष्ट है कि यहां स्थानीय लोगों से ज़िला समादेष्टा कार्यालय के नाम पर आवेदन लिया जाता था. इन लोगों ने एक फ़र्ज़ी ऑफ़िस का माहौल यहां बना रखा था ताकि लोगों को आसानी से ठगा जा सके. बाकी बातें आगे की जांच से स्पष्ट होंगी."

इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए हमने बांका ज़िले के एसडीपीओ दिनेश चंद्र श्रीवास्तव से बातचीत की. एसडीपीओ ने बताया कि उनकी ही नज़र सड़क पार करती हुई फ़र्ज़ी महिला पुलिसकर्मी पर सबसे पहले पड़ी थी.

एसडीपीओ बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "जब मेरी नज़र उस महिला पुलिस पर पड़ी तो मुझे कुछ अटपटा लगा, क्योंकि उसके पास मुझे पिस्तौल जैसी कोई चीज़ दिखी. जबकि महिला सिपाही के पास पिस्तौल तो होती नहीं. बाद में पाया कि पिस्तौल के नाम पर उसे देसी कट्टा थमाया गया है. पूछताछ में पता चला कि वह एक ऑफ़िस के बाहर तैनात रहती है. उसे 500 रुपये रोज़ाना मिलते हैं."

"आगे की पड़ताल में पुलिस ने पाया कि इस गिरोह का सरगना भोला यादव है और उसने इस महिला से भी पुलिस में नौकरी के नाम पर पैसे (55 हजार रुपये) ऐंठ लिए हैं. बाकी बातें इस गिरोह के सरगना भोला यादव की गिरफ़्तारी के बाद ही स्पष्ट होंगी कि वह और क्या-क्या करता है? उसने और किन-किन लोगों को इस गोरखधंधे से जोड़ रखा है?"

क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार?

जब इस संदर्भ में हमने दैनिक भास्कर के स्थानीय रिपोर्टर और उक्त मामले में रिपोर्ट करने गए प्रिंस राज से बात की तो उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "शहर के अनुराग गेस्ट हाउस के कमरों से फ़र्जी ऑफ़िस का संचालन किया जा रहा था. ऑफ़िस के दो लोग ऑफ़िसर बनकर गांवों में जाते थे और साथ में फ़र्ज़ी पुलिस रहती थी. स्थानीय लोगों से केंद्र और राज्य की योजनाओं का फ़ायदा दिलाने के नाम पर ठगी की जाती थी. ऑफ़िस जाने पर ऐसी कोई बात नहीं दिखाई पड़ती कि वहां से कोई थाना चलाया जा रहा था."

प्रिंस राज ज़ोर देकर कहते हैं कि "देखिए बांका ज़िले में फ़र्ज़ी तरीक़े से थाना को संचालित किए जाने वाली ख़बर झूठी और भ्रामक है."

वहीं पुलिस का भी कहना है कि यहां लोगों से केंद्रीय और राज्य की योजनाओं के साथ पुलिस बहाली के नाम पर पैसे ऐंठने का काम होता था, लेकिन फ़र्जी थाने का संचालन नहीं किया जा रहा था.

कुल मिलाकर स्थानीय मीडिया में फ़र्ज़ी थाने के संचालन को लेकर चलाई जा रही ख़बरों को देखते हुए यह एक फ़र्जीवाड़े का मामला अधिक लगता है.

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