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भाजपा संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन: क्या एक तीर से कई निशाने लगाए गए हैं?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बात साल 2013 की है जब ऐसे क़यास लगाए जाने लगे थे कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद का चेहरा बन सकते हैं.
ऐसा इसलिए था क्योंकि शिवराज सिंह और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ही पार्टी के दो ऐसे चेहरे थे जिनका सबसे लंबा कार्यकाल रहा था और इन दोनों के 'विकास के मॉडल' की ख़ूब प्रशंसा भी की जा रही थी.
वर्ष 2013 में शिवराज सिंह और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एक साथ भारतीय जनता पार्टी के 'पार्लियामेंट्री बोर्ड' में शामिल किया गया था.
उस समय पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्णा आडवाणी भी चौहान के 'शासन चलाने' और उनके द्वारा किए जा रहे विकास के तरीकों की तारीफ़ करते नहीं थकते थे.
इस मामले में छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह भी लगभग बराबर की तारीफ़ बटोर रहे थे. आडवाणी द्वारा शिवराज सिंह चौहान की तारीफ़ से संकेत साफ़ मिलने लगे थे कि हो सकता है कि साफ़ छवि वाले रमन सिंह का चेहरा बतौर प्रधानमंत्री आगे कर भारतीय जनता पार्टी उन्हें आम चुनाव के दंगल में उतारेगी.
मगर सबको आश्चर्य तब हुआ जब आम चुनाव के ठीक पहले पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि नरेंद्र मोदी पार्टी के प्रधानमंत्री पद का चेहरा होंगे.
'पार्लियामेंट्री बोर्ड' से पुरानी भाजपा के चेहरे नदारद
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ये संयोग ही है कि राजनाथ सिंह के अलावा 'पुरानी भाजपा' के ज़्यादातर चेहरे 'पार्लियामेंट्री बोर्ड' से अब नदारद हैं.
विश्लेषक ये भी कहते हैं कि 2013 तक भारतीय जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड में पार्टी के मुख्यमंत्रियों को शामिल करने की परंपरा रही है. इस परंपरा का लाभ सिर्फ़ महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को ही मिल पाया है.
वहीं पार्टी के लिए अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देने वाले सर्बानंद सोनोवाल और कर्नाटक में पार्टी के वयोवृद्ध नेता बी एस येदियुरप्पा को संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया है.
येदियुरप्पा चार बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और तीन बार विधानसभा में विपक्ष के नेता भी. बावजूद इसके कि वर्ष 2012 में उन्होंने पार्टी भी छोड़ दी थी और भाजपा के नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए थे.
लेकिन वो लिंगायत समाज से आते हैं जिसके वोट निर्णायक माने जाते हैं यानी जिस दल को लिंगायत समाज ने वोट दे दिए उसके लिए कर्नाटक की सत्ता का रास्ता साफ़ हो जाता है. विश्लेषक कहते हैं कि उनके वापस भाजपा में लौटने का श्रेय अमित शाह को ही जाता है.
इसलिए जब पिछले साल उन्हें मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के लिए कहा गया तो वो अमित शाह के कहने पर इसके लिए तैयार हो गए.
विश्लेषकों का ये भी कहना है कि सब को ये विश्वास भी था कि इस बार विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए इतनी 'शानदार जीत' हासिल करने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 15 सदस्यों वाले संसदीय बोर्ड में निश्चित रूप से शामिल किया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
हुआ कुछ ऐसा कि पार्टी के सबसे कद्दावर नेता और पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी और शिवराज सिंह चौहान को हटाकर छह नए चेहरों को बोर्ड में शामिल किया गया.
फेरबदल के पीछे की वजह
वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित का कहना है कि संसदीय बोर्ड में शिवराज सिंह चौहान एक मात्र ऐसे नेता थे जो मोदी के प्रधानमंत्री बनने से भी पहले से थे. बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं कि ये झटका तो ज़रूर है चौहान के लिए, मगर उससे भी ज़्यादा ये संकेत दिया गया है कि संगठन में उनका क़द अब क्या रह गया है.
हालांकि पार्टी के नेता संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन के बाद ये दलील दे रहे हैं कि जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं या फिर जिन राज्यों में भाजपा को विपक्षी दलों से ज़ोरदार टक्कर मिल रही है उन राज्यों के लोगों को शामिल किया गया है या बदला गया है.
राकेश दीक्षित कहते हैं कि चौहान की जगह उज्जैन के रहने वाले सत्यनारायण जटिया को ज़रूर संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया है, लेकिन उनका राजनीतिक क़द मध्य प्रदेश में कभी ऊंचा नहीं रहा है.
वो कहते हैं, ''वो जातीय दलित नेता हैं मगर अपने क्षेत्र से वर्ष 2009 में चुनाव हार चुके हैं. वो अटल बिहारी वाजपेयी कार्यकाल में बहुत सक्रिय मंत्री ज़रूर रहे हैं. फिलहाल उनका उतना प्रभाव न तो उनके समुदाय में रह गया है ना ही मध्य प्रदेश की राजनीति में.''
मध्य प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. दीक्षित कहते हैं कि ऐसे चेहरों को शामिल किया गया है जो ''सिर्फ़ हाँ में हाँ मिला सकें और जिनसे ऐसा ख़तरा पैदा न हो कि उनका क़द संगठन या राज्य में बहुत ऊंचा हो जाए".
वो मानते हैं कि वैसे ही लोग अब संसदीय बोर्ड में रह गए हैं जिन्हें गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वरदहस्त हासिल है.
उन्हें लगता है कि भाजपा ने किसी भी कार्यरत मुख्यमंत्री को संसदीय दल में शामिल नहीं करने के फ़ैसले से 'एक तीर से दो निशाने' लगाए हैं और इसी रणनीति के तहत शिवराज सिंह चौहान और योगी आदित्यनाथ को संसदीय बोर्ड में शामिल नहीं किया गया है.
इस बार किसी केंद्रीय मंत्री को भी शामिल नहीं किया गया जबकि निर्मला सीतारमण और स्मृति ईरानी का संसदीय बोर्ड में शामिल होना तय माना जा रहा था.
फेरबदल पर क्या कहते हैं संघ विचारक
स्तंभकार और संघ के विचारक राजीव तुली इस फेरबदल को 'पीढ़ीगत बदलाव' के रूप में देखते हैं. उनका कहना है हर अध्यक्ष को अधिकार है कि वो अपने हिसाब से सांगठनिक बदलाव लाए. ऐसा हुआ भी है. उनका कहना है कि पिछले तीन सालों से कोई फेरबदल नहीं हुआ था.
राजीव तुली कहते हैं कि कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं जिनको ध्यान में रखकर सांगठनिक ढांचे में फेरबदल ज़रूरी था.
उदाहरण स्वरूप उन्होंने कहा कि वेंकय्या नायडू ही संसदीय बोर्ड में दक्षिण भारत का चेहरा हुआ करते थे. अब येदियुरप्पा और वनथी श्रीनिवास को शामिल किया गया है. वनथी श्रीनिवास भारतीय जनता पार्टी की महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं. वहीं सुधा यादव हरियाणा की और के लक्ष्मण तेलंगाना के रहने वाले हैं.
वो कहते हैं, "संगठन का विस्तार हो रहा है. संगठन अलग-अलग राज्यों के लिए अलग तरह की नीतियों पर काम करता है. इसलिए नए चेहरों की ज़रूरत होती है. कुछ उलटफेर करना भी ज़रूरी होता है. इसको उसी निगाह से देखा जाना चाहिए."
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