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जेटली का जाना बीजेपी के लिए कितनी बड़ी क्षति
- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
छात्र नेता से राजनीति में आए अरुण जेटली न केवल भाजपा के बड़े नेताओं में शामिल थे बल्कि उन्हें बुद्धिजीवी वर्ग में भी सम्मान प्राप्त था.
अरुण जेटली की मौत के कुछ दिन पहले एक और वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज का देहांत हुआ था. उससे पहले इसी साल मार्च में पूर्व रक्षा मंत्री और गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर और बीते साल नवंबर में एचएन अनंत कुमार का देहांत हो गया था. इन सभी नेताओं को जन-नेता कम और बुद्धिजीवी नेता ज़्यादा माना जाता था.
जहां जेटली, सुषमा और अनंत कुमार वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के बेहद करीबी माने जाते थे और बुद्धिजीवी माने जाते थे, तो पर्रिकर आईआईटी से डिग्री लेने वाले नेता के के रूप में जाने जाते थे.
वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता कहती हैं कि एक के बाद एक बड़े नेताओं का निधन पार्टी के लिए बड़ी क्षति है.
हालांकि वो सवाल करती हैं कि "ये पार्टी के लिए दुखद तो है लेकिन क्या जो नया बीजेपी है उसमें क्या इन लोगों की कोई जगह थी, ख़ास कर सुषमा स्वराज और अरुण जेटली. इन्होंने जो कुछ सीखा वो लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी से सीखा था, उनके लिए कोई जगह थी पार्टी में ऐसा लगता नहीं है. मुझे लगता है कि इनकी जगह आहिस्ता-आहिस्ता कम हो गई थी."
अरुण जेटली ने बड़े विवादों के बीच भाजपा का हमेशा बचाव किया. 2005 में पार्टी की विद्रोही नेता उमा भारती पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा और उन्हें पार्टी से निष्कासित किया गया.
इसके जवाब में लालकृष्ण आडवाणी के पाकिस्तान जाने को लेकर उमा भारती ने उन्हें अनुशासनहीन बताया. लेकिन इसके कुछ दिन बाद उन्हें फिर पार्टी में शामिल किया गया.
इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को एक साक्षात्कार में अरुण जेटली ने जो कहा वो बताता है कि पार्टी में सबको साथ में लेकर चलने का बारे में वो क्या सोचते थे.
अरुण जेटली कहा था, "राजनीतिक पार्टी में किसी मालिक-नौकर के रिश्ते जैसा कुछ नहीं होता. ये एक परिवार की तरह होती है और हम इसे इसी तरह चलाते हैं. कभी कभी आप उन्हें ग़लतियों के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं, कभी आप उनको खुश करते हैं, कभी आप उन्हें स्नेह का एहसास कराते हैं और कभी कभी आप उन्हें माफ भी करते हैं."
स्मिता गुप्ता कहती हैं कि एक जगह है जहां उनकी कमी महसूस होगी, और वो है राज्यसभा में जहां वो दस साल तक विपक्ष के नेता या फिर सदन के नेता रहे थे.
"इनकी एक बहुत बड़ी भूमिका रही था सदन में संपर्क बनाए रखने में. बीजेपी के दूसरे कार्यकाल में उनकी जगह पर दूसरा नेता चुना गया लेकिन वो उनकी जगह नहीं ले पाए. अरुण जेटली ने अपने छात्र नेता होने के दौरान विपक्ष के नेताओं के साथ भी जो संबंध बनाए और निभाए थे उन्हीं के कारण उन्हें राज्यसभा में काफी मदद मिली."
वरिष्ठ पत्रकार जयंतो रॉय चौधुरी बताते हैं कि छात्र नेता रहने के दौरान दूसरी पार्टी से जुड़े नेताओं से उनके अच्छे संबंध थे. वो बताते हैं कि आपातकाल के दौरान वो जेल गए, बाद में जब वो जेल से वापिस आए जो दिल्ली विश्वविद्यालय के हीरो बन गए.
वो कहते हैं, "इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के जो पहले चुनाव थे उनमें एबीवीपी, एसएफ़आई (सीपीएम का यूथ विंग), एआईएसएफ़ (सीपीआई का यूथ विंग) ने एक साथ मिल कर एनएसयूआई (कांग्रेस का यूथ विंग) के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा. जेटली उस वक्त छात्र नहीं थे लेकिन उन्होंने कैम्पेनिंग में हिस्सा लिया. सबको साथ में ले कर चलने का उनका फॉर्मूला था उस वक्त के लिए रहा हो लेकिन बाद में इसका फायदा उन्हें मिला."
स्मिता गुप्ता एक वाकया बताती हैं. "जब अरुण जेटली भाजपा के यूथ विंग के नेता हुआ करते थे उस वक्त कांग्रेस यूथ विंग के नेता आनंद शर्मा थे और सीपीआईएम के यूथ विंग के नेता सीताराम येचुरी थे. एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा सेने के लिए ये तीनों गए थे और वहां अरुण जेटली और आनंद शर्मा के ही कमरे में ठहरे थे."
वो कहती हैं कि इतने सालों से इस तरह की गहरा रिश्ता जो बना है उसे जेटली ने निभाया और इसका लाभ भी उन्हें मिलता रहा.
स्मिता गुप्ता कहती हैं कि बीजेपी की विचारधारा की बात हो तो ये सभी नेता- अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और मनोहर पर्रिकर- सब एक साथ थे लेकिन एक मानवीय गुण भी होता है जो इनमें पाया जाता था और इस कारण कई लोग इन्हें याद करेंगे. साथ ही गणतांत्रिक नियमों को ये नेता मानते थे.
राज्यसभा में अगस्त 2015 को दिया उनका एक भाषण बताता है कि जेटली भारतीय गणतंत्र को किस प्रकार देखते थे.
उन्होंने कहा था, "भारत जैसे बड़े देशों में अलग-अलग राय होना बड़ी बात नहीं. लेकिन अपने विचार दिखाने में हमें हिंसा की मदद नहीं लेनी चाहिए क्योंकि अलग-अलग स्तर पर इसका असर हो सकता है."
जयंतो रॉय चौधुरी बताते हैं कि जीएसटी को लेकर अरुण जेटली की काफी आलोचना हुई लेकिन ये भी याद रखना होगा कि आज से 20 साल बाद उन्हें इसके लिए याद किया जाएगा.
वो कहते हैं, "इसमें सुधार की ज़रूरत है लेकिन ये एक अच्छी टैक्स प्रणाली है जो चिदंबरम साहब ने शुरू की थी, प्रणब बाबू मे भी इसे पारित कराने की कोशिश की थी. लेकिन इसका श्रेय जेटली को मिला क्योंकि उन्होंने सबकी बात सुन कर, सबसे मिल-मिला कर के इस पारित कर पाए."
वो कहते हैं कि पॉलिटिक्स ऑफ़ कॉन्सेन्सस यानी सभी को साथ लेकर चलने की राजनीति में वो पारंगत थे.
अरुण जेटली के बाद पार्टी में इस जगह को कौन भर पाएगा इसके जवाब में जयंतो रॉय चौधुरी कहते हैं कि अब हर पार्टी में ज़िद्दीपना आ गया है.
उन्हीं के शब्दों में, "किस पार्टी में पॉलिटिक्स ऑफ़ कॉन्सेन्सस है अभी तो हमें ये भी देखना होगा."
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