बिहार में मॉब लिंचिंग: 'जब पुलिस ही डर कर भागने लगी तो ज़हीरुद्दीन को कौन बचाता'

विष्णु नारायण

बीबीसी हिंदी के लिए, सारण (बिहार) से

“कोई आकर शीशा फोड़ दे रहा है. कोई आकर चाकू दिखा रहा है. कोई आया तो टायर की हवा खोल दी. बोल रहा है कि कल इन लोगों का परब (बकरीद) है. इन लोगों का आज ही परब कर देना है. उसके बाद पुलिस आई. पुलिस भी ईंट-पत्थर और भगदड़ देखकर भागने लगी, तो ज़हीरुद्दीन को कौन बचाता. वो (ज़हीरुद्दीन) भागने से मजबूर थे. अपाहिज थे. उनके साथ बड़ी बेदर्दी से क्या किया, क्या ना किया? हमने किसी तरह भागकर जान बचाई.”

ऐसा कहना है कय्यूम खान (55 वर्ष) का जो कि बुधवार 28 जून को उसी छोटे ट्रक पर सवार थे, जिसके ड्राइवर जहीरुद्दीन (55 वर्ष) की भीड़ ने बिहार के छपरा जिले के जलालपुर थाना क्षेत्र के बंगरा गाँव (नदी पर) से गुजरने वाली सड़क पर पीट-पीटकर हत्या कर दी.

स्पॉट पर पहुँचने पर हम पाते हैं कि अब भी ट्रक के शीशे बिखरे पड़े हैं, और कुछ चप्पलें भी दिखाई दे रही हैं. नज़दीकी थाने की पुलिस ट्रक को वहाँ से टोचन करके आगे के नगरा बाज़ार ले गई है.

ट्रक को देखकर यह अंदाज़ा लगाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं कि ज़हीरुद्दीन पर बुधवार की शाम को क्या कुछ गुजरी होगी? ड्राइवर और बग़ल की सीट पर अब तक रोड़े-पत्थर पड़े हुए हैं.

28 जून की शाम क्या हुआ?

वैसे तो अब तक यह बात जगज़ाहिर हो गई है कि किसी ख़राबी की वजह से जब ट्रक चालक (ज़हीरुद्दीन) को ट्रक बंगरा गाँव के सामने पड़ने वाले हनुमान मंदिर के नज़दीक रोकना पड़ा, तो वहाँ से गुजरने वाले किसी लड़के ने पास आकर पूछताछ की कि ट्रक में क्या लोड है?

जब जवाब में मुर्दारी (मृत जानवरों) की हड्डी का ज़िक्र ड्राइवर और स्टाफ़ द्वारा किया गया, तो लड़कों के बुलावे पर इकट्ठा हो रही भीड़ ने उनसे हड्डी दिखाने को कहा.

बकौल कय्यूम खान लोगों ने ट्रक पर चढ़कर भी सब-कुछ देखा, लेकिन फिर भी मानने को तैयार न हुए कि गाड़ी में गोमांस लोड नहीं है.

लोगों ने उनसे फ़ैक्ट्री (हड्डी फ़ैक्ट्री) के मालिक को फ़ोन लगाने को कहा और उन्होंने ऐसा किया भी लेकिन लोग फिर भी नहीं माने और इस ज़िद पर अड़े रहे कि हड्डियों के नीचे गोमांस है.

वे इस पूरी घटना और पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, “ऐसी घटनाएँ पहले नहीं थीं, इसी रोड से कभी बैलगाड़ी तो कभी बहँगी पर खुल्लेआम हड्डियाँ आया करतीं. अब तो कहीं निकलने से भी डर लग रहा कि कोई आकर मार देगा. कितने दूर-दूर से काम करके चले आए और अपने घर के दरवाज़े पर आकर ऐसा हो गया.”

स्पॉट पर पहुँचने और तमाम कोशिशें करने के बावजूद कोई कुछ भी स्पष्ट बताने को तैयार नहीं. आस-पास के लोग ज़रूर दबी ज़ुबान में ऐसी बातें कह रहे कि आजकल के लड़के किसी के दाबी (दबाव) में तो हैं नहीं, पता नहीं कहां से शोर उठे और सब स्वाहा हो जाए.

ज़हीरुद्दीन अपनी माँ के लिए बुढ़ापा का सहारा थे, अपाहिज होने के बावजूद भी वे ट्रक चलाने को मजबूर थे.

घटना के बाद ज़हीरुद्दीन का परिवार बिखर गया है.

उनकी माँ (लैला ख़ातून- 75 वर्ष) हमसे बातचीत में कहती हैं, “वो पैर से कामयाब नहीं था. एक बार कलकत्ता में गाड़ी लड़ गई थी, तभी से वो लंगड़ाकर चलता था. सब भाग गए और वो भाग नहीं पाया. वही थोड़ा-बहुत पैसा देता था तो मैं अपने कमर का इलाज करवाती थी. मैं कमर की रोगी हूँ. वो आशा भी टूट गई. बच्चे अभी पाँव पर खड़े नहीं हुए हैं.”

लैला ख़ातून आगे कहती हैं, “यह कारोबार-धंधा हमारे लिए कोई नई बात नहीं है, न इलाक़े के लिए. पहले तो टायर (बैलगाड़ी) और ट्रेन पर लोड होकर हड्डियां कानपुर और जहां-तहां जाती थी. मेरे ससुर भी इस काम को करते थे. पहले कभी इस तरह की बात नहीं हुई लेकिन उस रोज़ न जाने क्या हुआ कि मेरे लाचार बेटे को लोगों ने मार डाला.”

वहीं उनकी बेटी सैद्दुनिशा (24 वर्ष) कहती हैं, “मेरे पापा लाचार थे. हम लोगों ने कई बार काम छोड़ने को भी कहा क्योंकि वो पैर से लाचार थे, लेकिन अपनी औलादों के लिए नाइट ड्यूटी करने लगे कि थोड़ा पैसा कमा लेंगे तो घर बढ़िया से चलेगा. मेरे पापा कोई अवैध काम तो कर नहीं रहे थे. हमें इंसाफ़ चाहिए.”

छपरा ज़िले के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में 6 महीने के भीतर यह दूसरी ऐसी घटना है जब भीड़ ने किसी व्यक्ति को गोमांस की तस्करी के शक में पीट-पीटकर मार डाला हो.

पहली घटना ज़िले के रसूलपुर थाना क्षेत्र में रिपोर्ट हुई थी, वहीं दूसरी जमालपुर के बंगरा गाँव के ठीक सामने.

दोनों मामले भले ही अलग-अलग हों लेकिन दोनों में लोगों ने गोमांस का ज़िक्र किया है, और फिर पकड़ में आ जाने वाले शख़्स को पीट-पीटकर मार डाला.

हड्डियों का इस घटना से क्या कनेक्शन?

इस पूरे घटनाक्रम में हड्डियों का ज़िक्र शुरू से ही आ रहा है, तो कई लोगों के ज़ेहन में ऐसे भी सवाल आ सकते हैं कि जानवरों की हड्डियाँ कहां जा रही थीं? और कौन लोग हैं जो हड्डियों के कारोबार से जुड़े हैं.

तो इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए हम छपरा ज़िले के नगरा प्रखंड में स्थित उस फ़ैक्ट्री तक पहुँच गए जहां मृत जानवरों की हड्डियों की प्रोसेसिंग का काम सालों से जारी है. यह उनका वैध कारोबार है, उन्हें प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन योजना के अंतर्गत मदद भी मिली है.

फ़ैक्ट्री के संचालक मोहम्मद सफाकत बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, “हमारा यह काम कोई नई बात नहीं है. हम पीढ़ियों से यह काम कर रहे हैं. हमारे दादा हड्डियाँ पहले ट्रेन से लोड करके कानपुर भेजते थे, और अब गुजरात की स्टरलिंग बायोटेक लिमिटेड कंपनी में जाती हैं. हम हड्डियों को चूरा बनाकर गुजरात भेजते हैं, और इससे कई लोगों का रोज़गार-धंधा चलता है.”

जब हमने फ़ैक्ट्री और हड्डियों के जहां-तहां से लाने को लेकर सवाल किए तो उन्होंने हमसे ही पलटकर पूछा कि राज्य में किसी तरह का कारोबार करना गुनाह है क्या? हम तो कुछ भी अवैध नहीं कर रहे. 

उन्होंने कहा, “मुर्दाहा (मृत जानवरों) की हड्डियों को उठाने का काम तो अंग्रेजों के ज़माने से चला आ रहा. इसका पूरा नेटवर्क है. गाँव के बाहरी हिस्से में जब मुर्दा जानवर फेंक दिए जाते हैं तो डोम समाज के लोग उसे कलेक्ट करते हैं."

वे कहते हैं, "हम अपने नेटवर्क से उसे उठवा लेते हैं. वजन करके बदले में पैसा दे देते हैं. हम तो गाँव-समाज में जहां-तहां फैलने वाली गंध और बीमारी का ही निपटारा कर रहे, फिर ऐसा जुलुम क्यों?"

अभियुक्तों की गिरफ़्तारी पर क्या कह रही पुलिस?

इस पूरी घटना और अभियुक्तों की गिरफ़्तारी को लेकर हमने छपरा ज़िले के पुलिस अधीक्षक गौरव मंगला से संपर्क किया.

पुलिस अधीक्षक प्रेस नोट के हवाले से कहते हैं, “28 जून को मोहम्मद ज़हरुद्दीन जानवरों की हड्डी फैक्ट्री में ले जा रहे थे तभी उनकी गाड़ी जलालपुर थाना क्षेत्र में खराब हो गई. वहां दुर्गंध से भीड़ जमा हो गई और भीड़ ने उन्हें पीट पीटकर घायल कर दिया, और इलाज के क्रम में उनकी मौत हो गई.”

“इस मामले में 7 अप्राथमिकी अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया गया है. मृतक के परिजनों के बयान पर 20-25 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है.”

हालाँकि इस पूरे मामले में पुलिस-प्रशासन की ओर से जारी अनुसंधान और कार्रवाई अब तक नाकाफ़ी ही नज़र आ रहा है, क्योंकि इस घटना में 6 लोगों पर नामज़द एफआईआर है लेकिन एक भी नामज़द व्यक्ति अब तक नहीं पकड़ा जा सका है.

ज़िले के कप्तान (पुलिस अधीक्षक) ने भी हमसे बातचीत में यह बात स्वीकार की है कि इस मामले में 29 जून (अप्राथमिकी दर्ज गिरफ़्तारियों) के अलावा अब तक कोई डेवलपमेंट नहीं है.

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