कश्मीर को लेकर हमारे रुख़ में कोई बदलाव नहींः अमेरिका

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- Author, सलीम रिज़वी
- पदनाम, न्यूयॉर्क से, बीबीसी के लिए
अमेरिका ने एक बार फिर ज़ोर देकर कहा है कि कश्मीर के मुद्दे पर उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है और उसका मानना है कि बाहरी हस्तक्षेप के बग़ैर ही यह मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए.
अमरीकी विदेश मंत्रालय में दक्षिण और सेंट्रल एशिया मामलों के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट डॉनल्ड लू ने बीबीसी हिंदी से खास बातचीत करते हुए यह बात कही.
डॉनल्ड लू ने कहा कि, “मैं यह साफ़ कर देना चाहता हूं कि कश्मीर मुद्दे पर हमारी नीति में कतई कोई तब्दीली नहीं आई है. हम अब भी यही मानते हैं कि अगर कश्मीर मुद्दे पर कोई सीधी बातचीत होनी है तो वह भारत और पाकिस्तान के बीच ही होनी है. और कश्मीर मुद्दे पर बातचीत का दायरा, उसका विषय और उस बातचीत की गति भी भारत और पाकिस्तान को आपस में ही तय करना होगी.”
अमेरिकी राजदूत का पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर का दौरा

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हाल ही में पाकिस्तान में मौजूद अमरीकी राजदूत डॉनल्ड ब्लोम ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर इलाक़े का दौरा करने के बाद सोशल मीडिया वेबसाइट ट्विटर पर लिखा कि उन्होंने ‘आज़ाद जम्मू एंड कश्मीर’ का दौरा किया.
भारत मानता है कि इस इलाक़े पर पाकिस्तान ने कब्ज़ा किया हुआ है. इस सिलसिले में भारत ने अपनी नाराज़गी भी जताई थी.
बीबीसी हिंदी के सवाल के जवाब में अमरीकी अधिकारी डॉनल्ड लू ने कश्मीर के बारे में कहा, “हां, यह सच है कि पाकिस्तान में हमारे राजदूत डॉनल्ड ब्लोम पाकिस्तान के कश्मीर वाले इलाक़े में गए थे और यह कोई नई बात नहीं है. ऐसे तो पिछले वर्षों में हमारे कई राजदूत कई इलाकों के दौरे करते रहे हैं. और उसी तरह हमारे राजदूत भारत में कश्मीर इलाक़े का भी दौरा करते रहे हैं.”
इस साल अक्तूबर महीने की शुरूआत में अमरीकी विदेश मंत्रालय की ओर से एक ट्रेवल एडवाइज़री भी जारी की गई थी जिसमें अमरीकी नागरिकों को चेताया गया कि वह भारत में कश्मीर के इलाक़े में आतंकवाद और हिंसा से बचने के लिए वहां का दौरा न करें.
इसके अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच की लाइन ऑफ़ कंट्रोल से भी कम से कम 10 किलोमीटर की दूरी के फ़ासले पर रहने की हिदायत दी गई है. एडवइज़री में कहा गया है कि इस इलाक़े में सैन्य झड़प होने का खतरा है.
क्या भारत-पाकिस्तान के बीच झड़प का ख़तरा बढ़ा है?

लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच की लाइन ऑफ़ कंट्रोल या एलओसी पर दोंनों देशों के बीच सैन्य झड़प का ख़तरा क्या वाक़ई बढ़ गया है?
इस सवाल पर डॉनल्ड लू ने कहा, “हम बहुत आभारी हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच की लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर साल 2021 में फिर से लागू किया गय युद्धविराम अभी तक जारी है. मुझे लगता है कि कश्मीर के इलाक़े में हिंसा का स्तर कम हो रहा है और इंमरजेंसी या विद्रोह और तनाव के स्तर में भी कमी आ रही है. यह अच्छी बात है. लेकिन इसको हल्के में नहीं लिया जा सकता है.”
डॉनल्ड लू ने कश्मीर में जल्द चुनाव की प्रक्रिया की बहाली पर भी अमेरिका का रुख़ साफ़ किया.
उन्होंने कहा, “हम भारत सरकार को इस बात के लिए प्रोत्साहित करते हैं कि कश्मीर में स्थानीय चुनाव की प्रक्रिया को बहाल किया जाए, राजनीतिक अधिकारों को भी बहाल किया जाए. इसके आलावा यह सुनिश्चित किया जाए कि कश्मीर में मीडिया अपना काम कर सके. यह सारी चीज़ें कश्मीर में अमन कायम रखने के लिए सख्त ज़रूरी हैं. मुझे उम्मीद है कि अगले कई सालों तक ऐसा अमन कायम रह सकेगा.”
अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-16 पर मदद क्यों दी?

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हाल ही में अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमानों से संबंधित 450 मिलियन डॉलर की सहायता देने की घोषणा की. इस पर भारत ने नाराज़गी जताई, तो अमेरिका ने यह कहकर पल्ला झाड़ना चाहा कि यह तो पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई के लिए मदद दी जा रही है.
लेकिन भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साफ़ तौर पर कहा कि “अमेरिका ऐसे बयान देकर किसी को बेवकूफ़ नहीं बना सकता है.”
उनका कहना है कि भारत मानता है कि पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की सैन्य मदद को भारत के ख़िलाफ़ ही प्रयोग किया जाता है.
एफ़-16 के मामले पर डॉनल्ड लू कहते हैं, “मैं यह बात साफ़ कर देना चाहता हूं कि यह कोई सैन्य मदद का प्रोग्राम नहीं है बल्कि यह अमेरिका द्वारा सैन्य सामान बेचने का मामला है. एफ़-16 लड़ाकू विमानों से संबंधित जो मदद अमेरिका पाकिस्तान को दे रहा है वह कोई नए विमान बेचने का मामला नहीं है, इसमें कोई नए हथियार नहीं दिए जा रहे, और न ही तो कोई नई सैन्य सलाहियत दी जा रही है.”
वो कहते हैं, “यह तो बस पुराने विमानों की मेंटेनेंस का मामला है. और यह पाकिस्तान का मामला नहीं है बल्कि अमरीका की सरकारी नीति का मामला है. जब भी वह किसी देश को सैन्य साज़ोसामान बेचता है तो उन सामान से जुड़ी तकनीकी मदद देने का भी वादा करता है.”
अमेरिका और पाकिस्तान

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अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सैन्य संबंध काफी पुराने रहे हैं.
1979 से 1990 के बीच में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेना से लड़ाई के लिए अफ़ग़ान मुजाहिदीन को पाकिस्तान के ज़रिए मदद भेजी. इसमें अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक मदद के तौर पर 5 अरब डॉलर से अधिक दिए.
कई जानकार यह भी कहते हैं कि उस दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान को अरबों डॉलर की ऐसी रकम भी भेजी जिसका कोई हिसाब-किताब भी नहीं है.
उस दौर में अमेरिका से मिलने वाली अधिकतर सैन्य मदद में पाकिस्तान को एफ़-16 लड़ाकू विमान समेत कई उच्च तकनीक के सैन्य साज़ोसामान आसानी से मिलते रहे.
2001 से 2017 तक अमेरिका ने पाकिस्तान को 33 अरब डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद दी जिनमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में खर्चा भी शामिल है.
पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद तो ले ली, लेकिन उसके बदले में उस तरह काम नहीं किया जैसा अमेरिका चाहता था. बल्कि यह भी आरोप लगे कि पाकिस्तान ने अमरीकी आर्थिक मदद की इसी रकम में से तालिबान और अन्य चरमपंथी गुटों को भी मदद पहुंचाई.
जानकार यह भी मानते हैं कि पाकिस्तान ने अमरीकी सहायता का बड़ा हिस्सा भारत के ख़िलाफ़ सैन्य तैयारी में भी लगाया.

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पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा सैन्य मदद देने का सिलसिला तब बहाल हुआ जब इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद से हटाए गए.
पूर्व क्रिकेट कप्तान इमरान ख़ान ने ये आरोप लगाया था की उनकी सरकार को बेदखल करने के पीछे अमेरिका का हाथ है.
जब इस बारे में बीबीसी ने डॉनल्ड लू से सवाल किया तो उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वो पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में कोई सवाल नहीं लेंगे.
भारत के साथ संबंधों पर क्या बोले?

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भारत और अमेरिका के संबंधों के बारे में असिसटेंट सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट डॉनल्ड लू कहते हैं कि भारत के साथ अमेरिका के बेहतरीन संबंध सिर्फ़ अमेरिका की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि एशिया और विश्व की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है.
वो कहते हैं, “अमेरिका और भारत के बीच संबंध विश्वभर में सबसे अहम संबंध हैं.”
उनका कहना है कि दोनों के बीच रिश्तों के तीन अहम पहलू हैं- आर्थिक, सुरक्षा और पीपल टू पीपल संबंध.
डॉनल्ड लू कहते हैं, “पिछले 30 वर्षों से अमेरिका और भारत के बीच आर्थिक मामलों में संबंध अब नई उंचाइयां छू रहे हैं, जिसमें दोंनों देशों के बीच व्यापार अब 157 अरब डॉलर से अधिक का हो गया है और उसके साथ दोनों एकदूसरे के यहां निवेश भी कर रहे हैं. इससे एक नए अध्याय की शुरूआत हो रही है.”
उनका कहना था कि सुरक्षा के क्षेत्र में अमेरिका और भारत का सहयोग अद्भुत है. इसमें दोनों के बीच साझा सैन्य अभ्यास, रक्षा से जुड़े सामान का व्यापार, और दोनों का मिलकर रक्षा के क्षेत्र में आधुनिकतम चीज़ों का निर्माण, उत्पादन और उनका व्यापार भी शामिल है.
डॉनल्ड लू कहते हैं, “रक्षा समझौतों को अमली जामा पहनाते हुए अब अमेरिका अपनी सबसे संवेदनशील टेक्नालॉजी भी भारत को ट्रांसफ़र कर रहा है और उनको बेहतर बनाने में दोनों देश मिलकर सहयोग भी कर रहे हैं.”
इस मामले में वह P-8I मैरीटाइम सर्विलांस विमान का हवाला देते हैं और बताते हैं कि इस तकनीक को भारत से पहले किसी भी देश को न बेचा गया और न ही किसी के साथ साझा किया गया.
इस सिलसिले में अन्य सैन्य साज़ोसामान का ज़िक्र करते हुए डॉनल्ड लू कहते हैं, “अब हम भारत के साथ बातचीत कर रहे हैं जिससे प्रेडेटर ड्रोन, एफ़-18 लड़ाकू विमान जैसे आधुनिक सामान भी संभवत: भारत को बेचे जा सकेंगे.”

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भारत में हाल के वर्षों में मानवाधिकार के उल्लंघन से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी के बारे में सवाल के जवाब में डॉनल्ड लू ने कहा, “मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों पर हमने भारत सरकार के साथ उच्च्तम स्तर पर बैठकों में चर्चा की है. भारत एक जनतंत्र है और वहां आज़ाद न्यायपालिका, मीडिया और एक एक्टिव सिविल सोसायटी है.”
“मैं समझता हूं कि मानवाधिकार से जुड़े इन मामलों को हल करने के लिए भारत में जो जनतांत्रिक संस्थान हैं उनको काफ़ी सक्रीय होना होगा.”
यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से रूस को लेकर भारत की नीति पर अमेरिका के साथ मतभेद भी सामने आए. रूस पर अमेरिका के लगाए प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदना जारी रखा है, इससे अमेरिका खुश नहीं है.
इस मामले पर डॉनल्ड लू ने कहा, “इसमें कोई अचंभे की बात नहीं है कि कभी-कभी रूस के मामले में अमेरिका और भारत के तरीके अलग होते हैं. लेकिन हम दोनों युद्ध के जल्द ख़त्म होने के पक्ष में हैं और मानते हैं कि युद्ध को ख़त्म करने के साथ-साथ सभी देशों की संप्रभुता, अखंडता और आज़ादी के अंतरराष्ट्रीय उसूलों का भी सम्मान किया जाए.”
डॉनल्ड लू का कहना है कि आने वाले समय में रूस-यूक्रेन युद्ध ख़त्म करने में वो भारत को एक अहम किरदार निभाता देख रहे हैं.
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