अमेरिका का अचानक बढ़ा 'पाकिस्तान प्रेम' क्या मोदी सरकार के लिए संदेश है?

एस जयशंकर

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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हालिया घटनाक्रम क्या भारत के लिए झटका है?

  • अमेरिका ने पाकिस्तान को एफ़-16 के लिए 45 करोड़ डॉलर के पैकेज की घोषणा की
  • पाकिस्तान में अमेरिका के राजदूत ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को 'आज़ाद जम्मू-कश्मीर' कहा
  • जर्मनी की विदेश मंत्री ने कहा कि कश्मीर में उसकी भी भूमिका और ज़िम्मेदारी है
  • जी-7 ने रूस के तेल पर प्राइस कैप लगाने का फ़ैसला किया है
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पिछले कुछ हफ़्तों में पश्चिमी देशों से भारत को लेकर जो बयान आए हैं, उन्हें मोदी सरकार के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है.

सबसे हालिया टिप्पणी जर्मनी की विदेश मंत्री की ओर से आई है. जर्मनी की विदेश मंत्री एनालीना बेयरबॉक ने सात अक्तूबर को बर्लिन में पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था कि कश्मीर मामले में जर्मनी की भी भूमिका और ज़िम्मेदारी है.

जर्मन विदेश मंत्री ने कहा कि कश्मीर समस्या का समाधान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत होना चाहिए.

जर्मन विदेश मंत्री के इस बयान को भारत के ख़िलाफ़ देखा गया. भारत कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा मानता है और वह किसी तीसरे देश के दख़ल को ख़ारिज करता रहा है.

दूसरी तरफ़, जर्मनी की विदेश मंत्री ने कह दिया कि इस मामले में उनके देश की भी भूमिका और ज़िम्मेदारी है. जर्मनी की विदेश मंत्री के इस बयान को पाकिस्तान में राजनयिक रूप से जीत के तौर पर देखा गया.

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भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने जर्मनी में पाकिस्तान के राजदूत डॉ. मोहम्मद फ़ैसल की तारीफ़ करते हुए कहा कि कश्मीर पर जर्मनी के इस रुख़ के लिए वह बधाई के पात्र हैं.

अब्दुल बासित ने कहा, "भारत में जर्मनी को लेकर बहुत ग़ुस्सा है. जर्मनी ने कश्मीर को लेकर जो कहा, उससे भारत का चिढ़ना लाज़िमी है. इससे ठीक पहले पाकिस्तान में अमेरिका के राजदूत डोनाल्ड ब्लोम ने पाकिस्तान के कश्मीर को आज़ाद जम्मू-कश्मीर कहा था. बाइडन प्रशासन ने पाकिस्तान के एफ़-16 लड़ाकू विमान के पार्ट्स के लिए 45 करोड़ डॉलर के पैकेज देने की भी घोषणा की थी. इन तीनों बातों को लेकर भारत में बेचैनी है कि क्या पाकिस्तान की विदेश नीति कामयाब हो रही है?"

अब्दुल बासित कहते हैं कि जर्मनी का यह रुख़ यूरोपीय संघ तक भी पहुँच सकता है. बासित कहते हैं, "बड़े अरसे बाद पश्चिम से कश्मीर के मामले में पाकिस्तान के हक़ में बयान आया है."

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भारत की आपत्ति

जर्मनी और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की जम्मू-कश्मीर को लेकर की गई टिप्पणी पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी.

भारत ने जर्मनी और पाकिस्तान से कहा है कि वो कश्मीर मुद्दे की जगह पाकिस्तान स्थित चरमपंथियों से मुक़ाबला करने पर ध्यान दें जो लंबे समय से जम्मू-कश्मीर को निशाना बनाते रहे हैं.

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भारत की आपत्ति को लेकर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने भी एक बयान जारी किया. इस बयान में भारत की आपत्ति को 'ग़ैरज़रूरी' बताया गया.

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने जर्मनी की विदेश मंत्री की कश्मीर पर टिप्पणी को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है.

कंवल सिब्बल ने ट्वीट कर कहा है, "जर्मनी को कश्मीर में उसकी कथित ज़िम्मेदारी का हक़ किसने दिया है? जर्मनी की विदेश मंत्री का खुलेआम यह कहना है कि कश्मीर में उसकी भी भूमिका और ज़िम्मेदारी है, यह अमेरिका और यहाँ तक कि ब्रिटेन के रुख़ से भी आगे की टिप्पणी है. अमेरिका अब कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का ज़िक्र नहीं करता है. कोई भी यूरोपीय देश इस तरह से दख़ल नहीं देता है. फ़्रांस ने ख़ुद को अलग कर लिया है."

कहा जा रहा है कि यूक्रेन पर रूस के हमले को लेकर भारत के रुख़ से अमेरिका और यूरोप के देश नाराज़ है. इसी नाराज़गी के आईने में पश्चिमी देशों की कश्मीर और पाकिस्तान पर प्रतिक्रिया देखी जा रही है.

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24 फ़रवरी को यूक्रेन पर रूस ने सैन्य कार्रवाई की घोषणा की तब से भारत का वहाँ से तेल आयात बढ़ता गया. पश्चिम के देश बिल्कुल नहीं चाहते हैं कि रूस से भारत तेल आयात करे.

पश्चिम के देश रूस के अंतरराष्ट्रीय कारोबार को पूरी तरह से बंद करना चाहते हैं ताकि आर्थिक रूप से उसे कमज़ोर किया जा सके. लेकिन भारत और चीन के तेल ख़रीदने से रूस के ऊर्जा निर्यात पर बहुत असर नहीं पड़ा है.

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रूस पर रुख़ को लेकर निराशा

दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में पश्चिमी देशों ने रूस के ख़िलाफ़ जितने प्रस्ताव पेश किए, उस पर भारत ने वोटिंग से दूरी बना ली. पश्चिमी देशों का दबाव था कि भारत रूस के ख़िलाफ़ वोटिंग करे, लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया.

भारत का तर्क था कि इससे यूक्रेन मुद्दे का समाधान नहीं होगा. भारत और रूस की दोस्ती की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है. शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान अमेरिका के साथ था, लेकिन भारत ने ख़ुद को किसी भी खेमे में नहीं रखा था.

हालाँकि भारत को वैचारिक रूप से सोवियत यूनियन के साथ ही माना जाता था.

भारत की विदेश नीति की बुनियाद नेहरू ने गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत में रखी थी. लेकिन अब कहा जा रहा है कि भारत की नीति में बदलाव आया है. अब नॉन अलाइनमेंट की जगह मल्टीइंगेजमेंट यानी गुटनिरपेक्षता की जगह सभी गुटों में रहने पर ज़ोर है.

मिसाल के तौर पर भारत चीन और रूस की अगुआई वाले ब्रिक्स के साथ एसएसीओ में भी है और अमेरिका-जापान के नेतृत्व वाले क्वॉड में भी.

लेकिन जब दुनिया दो ध्रुवों में बँट रही हो, ऐसे में सभी गुटों के साथ रहना आसान नहीं होता है. भारत पर भी किसी एक खेमे को चुनने का दबाव है पर भारत इसके लिए अब भी तैयार नहीं दिख रहा है.

एक बार फिर से दुनिया दो ध्रुवीय होती दिख रही है. एक तरफ़ चीन और रूस हैं तो दूसरी तरफ़ पश्चिमी देश. भारत रूस से अपना दशकों पुराना संबंध पश्चिम के दबाव में ख़राब नहीं करना चाहता है.

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जयशंकर का पश्चिमी देशों पर निशाना

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर हैं. वह सालाना 'फ़ॉरेन मिनिस्टर्स फ़्रेमवर्क डायलॉग' में शामिल होने गए हैं. सोमवार को ऑस्ट्रेलिया दौरे में पत्रकारों से बात करते हुए एस जयशंकर ने पश्चिमी देशों को जमकर निशाने पर लिया.

भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि पश्चिमी देश सालों से सैन्य तानाशाही वाले देश पाकिस्तान को हथियार मुहैया कराते रहे, लेकिन भारत को नहीं दिया. एस जयशंकर ने रूस के साथ भारत के रक्षा संबंधों का जमकर बचाव किया. उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों का पसंदीदा साझेदार सैन्य तानाशाह वाला पड़ोसी देश रहा है.

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एस जयशंकर ने कहा, "पश्चिमी देश सालों से पाकिस्तान में हथियारों की आपूर्ति करते रहे, लेकिन भारत के साथ सालों तक ऐसा नहीं किया. अब वे कह रहे हैं कि भारत को रूस से हथियार ख़रीदना बंद कर देना चाहिए जबकि रूस अतीत में भारत के साथ खड़ा रहा है. रूस के साथ हमारा पुराना संबंध है और यह संबंध दोनों के हितों के लिए ज़रूरी रहा है.

रूस के साथ हमारे संबंधों के विस्तार में पश्चिमी देशों की उपेक्षा भी एक कारण है. पश्चिमी देशों से लिए हमारे पड़ोस का सैन्य तानाशाह देश ज़्यादा अहम रहा है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हम फ़ैसले भविष्य के हितों और वर्तमान हालात के आधार पर लेते हैं."

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रैंड कॉर्पोरेशन में रक्षा और दक्षिण एशिया के विशेषज्ञ डेरेक जे ग्रोसमैन ने भारतीय विदेश नीति की तारीफ़ में कहा है, "मुझे लगता है कि हम भारतीय विदेश नीति के स्वर्ण काल में रह रहे हैं. पहली बार भारत हर जगह मौजूद है और एक ताक़त के तौर पर काम कर रहा है. भारत जल्द ही ख़ुद ही एक महाशक्ति बन सकता है."

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दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं कि पाकिस्तान के प्रति पश्चिम का प्रेम बढ़ना कोई चौंकाने वाला नहीं है.

वह कहते हैं, "पाकिस्तान अमेरिका का पुराना साझेदार है. पाकिस्तान के साथ अमेरिका या पश्चिम के संबंध को हमेशा भारत के आईने में नहीं देखना चाहिए. पश्चिम नहीं चाहता है कि पाकिस्तान पूरी तरह से रूस और चीन के खेमे में चला जाए. ऐसे में अमेरिका पाकिस्तान को भी अपने साथ इंगेज रखना चाहता है."

संजय पांडे कहते हैं, "रूस के मामले में भारत का जो रुख़ है, उससे पश्चिम ख़ुश नहीं है और पाकिस्तान के साथ दोस्ती बढ़ाकर संदेश देने की कोशिश कर रहा है. लेकिन भारत ने भी इस बार दिखा दिया है कि वह पश्चिम का पिछलग्गू नहीं बन सकता. भारत ने बता दिया है रूस उसका आज़माया हुआ पार्टनर है और वह अपने हितों से समझौता नहीं कर सकता है."

1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच 13 दिनों का युद्ध हुआ था. यह युद्ध पूर्वी पाकिस्तान में उपजे मानवीय संकट के कारण हुआ था. इस युद्ध के बाद ही पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बना. इससे पहले भारत पूरी दुनिया को पूर्वी पाकिस्तान में पश्चिमी पाकिस्तान के आधिपत्य को लेकर समझाने की कोशिश कर रहा था.

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विदेश नीति की बुनियाद

पूर्वी पाकिस्तान से भारी संख्या में शरणार्थी भारत आ रहे थे. पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान के बीच बिना कोई राजनीतिक समाधान के उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी. तब सोवियत यूनियन एकमात्र देश था, जिसने भारत की सुनी.

1971 के अगस्त महीने में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 'इंडिया-सोवियत ट्रीटी ऑफ़ पीस, फ़्रेंडशिप एंड कोऑपरेशन' पर हस्ताक्षर किया. इस समझौते के तहत सोवियत यूनियन ने भारत को आश्वस्त किया था कि युद्ध की स्थिति में वो राजनयिक और हथियार दोनों से समर्थन देगा.

अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने आठ अप्रैल को संपादकीय पन्ने पर एक लेख लिखा था.

इस लेख में उन्होंने बताया है कि जब 1957 में सोवियत संघ ने हंगरी में हस्तक्षेप किया था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में बताया था कि उन्होंने इसके लिए सोवियत संघ की निंदा नहीं करने का फ़ैसला क्यों किया था.

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स्टैनली ने अपने लेख में लिखा है, "नेहरू ने कहा था कि दुनिया में साल दर साल और रोज़ ब रोज़ कई चीज़ें हो रही हैं और इन्हें हम पूरी तरह से नापसंद करते हैं. लेकिन हम इसकी निंदा नहीं करते हैं, क्योंकि जब कोई समस्या के समाधान की कोशिश कर रहा होता है तो किसी के नाम लेने और निंदा करने से कोई मदद नहीं मिलती है."

स्टैनली ने लिखा है, "नेहरू की यह नीति आज भी भारत को मुश्किल घड़ी में मागर्दशन का काम करती है. ख़ासकर टकराव की घड़ी में जब भारत के दो पार्टनर ही भिड़ रहे हों. वो चाहे 1956 में सोवियत संघ का हंगरी में हस्तक्षेप रहा हो या 1968 में चेकोस्लोवाकिया में या 1979 में अफ़ग़ानिस्तान में या फिर 2003 में अमेरिका ने इराक़ पर हमला किया था, तब भी भारत का रुख़ तटस्थ ही रहा था. भारत ने तब भी बिना नाम लिए आम लोगों के मारे जाने की निंदा की थी और संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग से बाहर रहा था."

भारत में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन विदेश नीति के मामले में नेहरू की गुटनिरपेक्ष की नीति बुनियाद रही है और इसका पालन सभी सरकारों ने किया है.

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