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प्रज्वल रेवन्ना मामले में पहचान के लिए अपनाई गई ये अनोखी तकनीक
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
जनता दल (सेक्युलर) के पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना को बलात्कार के एक मामले में उम्र क़ैद की सज़ा हुई है.
इस मामले की जाँच कर रही टीम ने प्रज्वल रेवन्ना के ख़िलाफ़ आरोप साबित करने के लिए आधुनिक डिजिटल तरीक़े का इस्तेमाल किया. इसे 'बहुस्तरीय डिजिटल कॉम्पेरिज़न सिस्टम' कहा जा सकता है.
इसके तहत अभियुक्त के शरीर के एक हिस्से पर मौजूद ख़ास निशान, आवाज़ और डीएनए की तुलना और पहचान की गई.
इस मामले की जाँच के लिए एसआईटी ने जो तरीक़ा अपनाया उसे सबसे पहले तुर्की में बाल यौन शोषण और हिंसक सामग्री से जुड़े एक केस में आज़माया गया था. जापान के एक रिसर्च पेपर में भी इस तकनीक का ज़िक्र किया गया है.
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जाँच के दौरान फ़ॉरेंसिक टीम ने भी वीडियो बनाए और तस्वीरें लीं. फिर जाँच टीम ने रेवन्ना के बनाए वीडियो से उसमें दिख रहे उनके निजी अंगों और आवाज़ की तुलना की.
एक अधिकारी ने बताया कि यह फ़िंगरप्रिंट का मिलान करने जैसा है.
पिछले दिनों इस मामले में निर्वाचित प्रतिनिधियों (सांसद, विधायक) के मामलों की विशेष अदालत के जज संतोष गजानन भट ने फ़ैसला दिया है.
प्रज्वल रेवन्ना को 48 साल की घरेलू सहायिका का बलात्कार करने के मामले में ताउम्र सश्रम क़ैद की सज़ा सुनाई गई है.
अदालत ने सज़ा सुनाते हुए कहा था, "ये अपराध पूरे समाज के ख़िलाफ़ किया गया अपराध माना जा सकता है. ऐसा समाज जहाँ महिलाओं की पूजा की जाती है."
इन चार चीज़ों से हुई पहचान
प्रज्वल रेवन्ना ने हासन ज़िले के होलेनरसीपुर में अपने पारिवारिक फ़ार्महाउस और बेंगलुरु के बासवनगुड़ी स्थित घर में महिला का बलात्कार करते हुए जो वीडियो बनाए थे, उसमें अपना चेहरा छिपा लिया था.
लेकिन एसआईटी ने जाँच का जो तरीक़ा अपनाया, उसके सामने प्रज्वल रेवन्ना की कोशिश नाकाम रही.
एसआईटी ने तुर्की के एक मामले और जापान की रिसर्च स्टडी में इस्तेमाल की गई तकनीक अपनाकर उनकी ये चाल कामयाब नहीं होने दी.
नाम न छापने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी ने बताया, "शरीर पर जितने अधिक पहचाने जा सकने वाले निशान होंगे, उससे छिपे हुए व्यक्ति की तस्वीरें और विजुअल की पुष्टि की संभावना और बढ़ जाएगी. भले ही चेहरा न दिखे. प्रज्वल रेवन्ना के प्राइवेट पार्ट्स पर घाव के निशान थे."
एसआईटी के प्रमुख एडीजीपी बीके सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा, "चार अलग-अलग पहचान थीं जिनसे ये मामला साबित हो सका. पहली पहचान थी-डीएनए, दूसरी-आवाज़, तीसरी, पहचाने जा सकने वाले निशान. सर्वाइवर का बयान तो पहले से ही मौजूद था, इस केस के लिए ये बेहद अहम था."
बीके सिंह ने पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या की जाँच के लिए बनी एसआईटी का भी नेतृत्व किया था.
इस जांच ने गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी के मामलों को सुलझाने में भी मदद की थी.
जज ने एसआईटी की "वैज्ञानिक जाँच की आधुनिक तकनीक अपनाने और स्पष्ट जाँच की सराहना की."
तुर्की की केस स्टडी में दो अभियुक्तों ने एक 12 वर्षीय लड़की के साथ यौन हिंसा की तस्वीर सोशल मीडिया पर भेजी थी.
जाँच में पाया गया कि तिल, घाव के निशान और मॉर्फ़ोलॉजिकल फ़ीचर (शरीर के आकार और बनावट से जुड़ी विशेषता) एक संदिग्ध के निजी अंगों से मेल खाते थे. साथ ही कुछ और समानता भी थी.
विशेषज्ञों की मदद से हुई जांच
वहीं रेवन्ना मामले में जब पहली बार उस महिला का बलात्कार फ़ार्महाउस के सर्वेंट क्वार्टर में हुआ था तो उस सर्वाइवर ने अपने कुछ कपड़े वहीं छोड़ दिए थे.
एक जाँचकर्ता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि उस कपड़े से भी फ़ॉरेंसिक टीम को काफ़ी मदद मिली. इस पर मिला वीर्य अभियुक्त के वीर्य से मेल खाता था.
रेवन्ना के शरीर के अंगों जैसे उंगलियों, हथेलियों और पैरों की तस्वीरों और वीडियो को एक टीम को भेजा गया. इसमें मूत्र रोग विशेषज्ञ, त्वचा रोग विशेषज्ञ और हड्डी रोग विशेषज्ञ शामिल थे.
टीम ने जाँच कर यह पुष्टि की कि वीडियो और तस्वीरें अभियुक्त की ही हैं.
शुरुआत में डॉक्टरों ने अभियुक्त के निजी अंगों की तस्वीर लेने का पुलिस अधिकारियों का अनुरोध ठुकरा दिया था.
एक अधिकारी ने कहा कि डॉक्टरों का कहना था कि ये मेडिकल एथिक्स के ख़िलाफ़ है, लेकिन अदालत से आदेश मिलने के बाद डॉक्टर मान गए.
फिर दोनों तस्वीरों की तुलना की गई. जज ने अपने 480 पन्नों के फ़ैसले में कहा कि ये पुख़्ता तौर पर संकेत देती हैं कि दोनों तस्वीरें एक ही व्यक्ति की हैं.
जज संतोष गजानन भट ने यह भी कहा, "अभियोजन पक्ष ने ये साबित कर दिया है कि अभियुक्त प्रज्वल रेवन्ना ने जबरन यौन संबंध बनाते हुए वीडियो बनाए थे. साथ ही यह भी साबित हुआ कि अभियुक्त ने इन घटनाओं को अपने मोबाइल फ़ोन में रिकॉर्ड किया ताकि महिला पर दबाव डाला जा सके. अभियोजन पक्ष ने जो साबित किया है वो संदेह से परे है."
अदालत ने कहा, "अभियोजन पक्ष ने यह भी साबित किया कि जो वीडियो रिकॉर्ड डिजिटल सबूत के तौर पर अदालत में पेश किए गए उन्हें न तो एडिट किया गया था और न ही मॉर्फ़ किया गया था. वीडियो में मौजूद पुरुष और महिला की आवाज़ें अभियुक्त और सर्वाइवर की आवाज़ के नमूनों से मेल खाती हैं."
अदालत ने कहा, "बार-बार उसका (महिला का) बलात्कार करना हत्या करने से भी बड़ा अपराध है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.